इतिहास की लहर (On the Wave of History)

एनएसजी के मामले में सियोल में हमें सफलता नहीं मिली है। अब बताया जा रहा है कि दिसम्बर में एक और बैठक होगी जिसमें भारत जैसे उन देशों के दावे पर विचार होगा जिन्होंने एनपीटी पर हस्ताक्षर नहीं किए। लेकिन सियोल की असफलता बताती है कि अमेरिका के विश्वास पर बहुत विश्वास नहीं किया जा सकता। अगर आज के अमेरिका में सचमुच दम होता तो यह नतीजा नहीं निकलता कि अमेरिका समर्थक कई देशों ने भी साथ नहीं दिया। और स्पष्ट है कि व्यक्तिगत कूटनीति की गुंजाइश अवश्य है पर इसकी सीमा है। देश अपने हित को लेकर कदम उठाते हैं।
2008 में अमेरिका ने इसी एनएसजी से हमारे लिए अपवाद करवाया था जिसके कारण हम सामान्य परमाणु गतिविधियां कर सकते हैं। इस बार बराक ओबामा शी जिनपिंग को मना नहीं सके। इन आठ वर्षों में बहुत परिवर्तन आ गया है। अमेरिका की वह ताकत नहीं रही और चीन तेजी से रूस की जगह नम्बर दो बन गया है और उसका दुनिया को स्पष्ट संदेश है कि निकट भविष्य में वह भारत को दुनिया के मंच पर अपनी स्वभाविक जगह नहीं लेने देगा। जिसे बृजेश मिश्र ने ‘उत्तर का द्वेषपूर्ण पड़ोसी’ कहा था, चीन, ने अपने पत्ते खोल दिए हैं। सुरक्षा परिषद की हमारी सदस्यता का भी तीखा विरोध होगा। उन्हें झूला झुलाने से कुछ नहीं होगा। उनका यह भी संदेश है कि अमेरिका के कंधों पर सवार होकर हम अगर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बदलने का प्रयास करेंगे तो इसकी इज़ाजत नहीं मिलेगी। भारत को भी ब्रिक्स जैसे संगठन तथा जलवायु जैसे मामले में चीन से सहयोग की नीति पर दोबारा गौर करना चाहिए।
हमारी अमेरिका, जापान, वियतनाम जैसे देशों के साथ बढ़ती घनिष्ठता चीन को रास नहीं आ रही। वह समझते हैं कि अंतरराष्ट्रीय मामलों में भारत की बढ़ती भूमिका उनके हित में नहीं है। यह आज से नहीं 1962 से है जब उन्होंने एक और भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को धोखा दे उनकी अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को धक्का पहुंचाया था। अब फिर वही प्रयास नरेन्द्र मोदी के साथ किया गया। वह मोदी के बढ़ते अंतरराष्ट्रीय आकर्षण को भी खत्म करना चाहते हैं। सौभाग्यवश यह 1962 का भारत नहीं और मोदी जवाहरलाल नेहरू नहीं। अभी से भारत ने ‘एक देश’ को बता दिया है कि उनके रवैये का आपसी रिश्तों पर असर होगा।
चीन ने पाकिस्तान को भी गोद में ले रखा है। आजकल वह ‘इस्पाती-भाई’ हैं। पाकिस्तान तो वैसे भी सदा बिकने को तैयार रहता है! चीन उन्हें जबरदस्ती हमारे विरुद्ध खड़ा करना चाहता है। भारत ने ईरान में चाबहार बंदरगाह बनवा बता भी दिया है कि उनकी ‘मोतियों की माला’ हमें जकड़ नहीं सकेगी। वह हमें न केवल सामरिक हितों बल्कि अपनी सभ्यता के लिए भी खतरा समझते हैं। वह हमारे लोकतंत्र को भी पचा नहीं सके। संयुक्त राष्ट्र में मसूद अजहर जैसे आतंकी को बचाना भी चीन की भारत विरोधी नीति को प्रकट करता है लेकिन अब विरोध खुल कर है जिससे तत्कालीन रक्षामंत्री जार्ज फर्नांडीज का कथन, जिससे वह बाद में मुकर गए थे, याद आता है कि चीन भारत का दुश्मन नम्बर-ढ्ढ रहेगा।
कहा गया है कि वांछित गंतव्य तक पहुंचने के रास्ते में केवल दो गलतियां हो सकती हैं, (क) रास्ता पूरा नहीं करना और (ख) शुरू नहीं होना। मोदी सरकार पर यह दोनों ही दोष नहीं लग सकते। ठीक है कि अभी सफलता नहीं मिली लेकिन हम एससीओ तथा एमटीसीआर के सदस्य बन गए हैं। देश में मिले अपार समर्थन से अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगा कर प्रधानमंत्री मोदी कूटनीति में जोखिम उठाने को तैयार हैं। दुनिया को भी यह संदेश है कि आज के भारत में कल के भारत से अलग होने का दम खम है। नीति वही है जो अटलजी ने शुरू की थी और जिसे डा. मनमोहन सिंह आगे लेकर गए थे लेकिन इसमें वह तीक्ष्णता है जो पहले नहीं देखी गई थी। दोनों पहले प्रधानमंत्री वाजपेयी तथा मनमोहन सिंह गठबंधन के प्रधानमंत्री थे, नरेन्द्र मोदी के पास अपना बहुमत है इसलिए अधिक आश्वस्त हैं।
सिंगापुर के पहले और आईकॉनिक प्रधानमंत्री ली क्वान यू ने रत्न टाटा से कहा था कि अगर भारत नहीं उभरता तो एशिया डूब जाएगा। एशिया के देश जानते हैं कि चीन अगर यहां सर्वशक्तिमान हो गया तो सबको निगल जाएगा इसलिए भारत के उभार को इतना समर्थन मिल रहा है। आज भारत दुनिया की सबसे तेजी से उभर रही बड़ी अर्थव्यवस्था है। हम दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र हैं। 125 करोड़ भारतीय दुनिया का नक्शा बदल सकते हैं। 1947 में जब हम आजाद हुए तो हमारी अर्थव्यवस्था 50 अरब डालर की थी। भारत को केवल नंगे फकीरों तथा हाथियों और सपेरों का देश माना जाता था। आज हमारी अर्थव्यवस्था दो ट्रिलियन (बीस खरब) डालर की है। हर क्षेत्र में हम तरक्की कर रहे हैं।
भारत दुनिया का मैन्युफैक्चरिंग हब बनता जा रहा है। हम एक सैनिक ताकत हैं। विदेशों में हमारे लोग टैक्नोलोजी की क्रांति की पहली पंक्ति में हैं। दुनिया हमारी शांत कामयाबी को मान्यता दे रही है। हमारी सफलता ने हमें, नरेन्द्र मोदी के शब्दों में, ‘इतिहास की हिचकिचाहट’ से निकलने का रास्ता दिखा दिया है। नरेन्द्र मोदी आकांक्षापूर्ण भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनके लिए समस्या भी है कि लोग उनसे बहुत उम्मीद करते हैं।
लेकिन यह उम्मीद हकीकत पर आधारित होनी चाहिए। माओ त्सी तुंग के 20 वर्ष के शासन के बाद चीन ने विश्व मंच पर अपना दावा शुरू किया था। हम एकदम सफलता चाहते हैं जो संभव नहीं और अगर नहीं मिलती तो विलाप करना शुरू कर देते हैं। हम यह नहीं देख रहे कि एनएसजी में भी 48 में से 40 देशों ने हमारा समर्थन किया है चीन को छोड़ कर बाकी सभी बड़े देश हमारे साथ थे। प्रयास जारी रहना चाहिए। मामला केवल एनएसजी या परमाणु तजारत का ही नहीं बल्कि एक न्याय संगत विश्व व्यवस्था कायम करने का है जो इसमें हमारी विशिष्ट जगह को मान्यता दे। हमारा संदेश दोस्त तथा विरोधियों दोनों के लिए होना चाहिए कि देर सवेर हमें यह जगह मिलेगी ही। पांच सात साल के बाद जब हमारी अर्थव्यवस्था 5 ट्रिलियन डालर की हो जाएगी तो हमारे बिना अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं अपना महत्व खो देंगी।
यह देश बहुत बड़ा है और बहुत महत्वपूर्ण है। हमारे उभार को रोका नहीं जा सकता। भारत के प्रधानमंत्री का इन्कार करना चीन के लिए भी महंगा साबित हो सकता है। चीन हमारा सबसे बड़ा व्यापारिक पार्टनर है। 2015 में 70 अरब डालर का व्यापार हुआ था। चीन का हमें निर्यात तीन गुना है यह असंतुलन सही करने की जरूरत है।
अरनब गोस्वामी के साथ अपने इंटरव्यू में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बहुत खूबसूरत बात कही है कि ‘एक समय था जब समुद्र किनारे बैठ हम लहरों की गिनती करते थे…अब हमारे लिए समय आ गया है कि हम प्रयास कर लहरों पर विजय पाएं।’
प्रधानमंत्री जी, इतिहास की लहर अब हमारे पक्ष में चल रही है। देर सवेर वह हमें उस मंजिल तक लेकर जाएगी जिसकी हमें सदियों से तलाश है। देश आपके साथ है। कल हमारा है।

VN:F [1.9.22_1171]
Rating: 10.0/10 (1 vote cast)
VN:F [1.9.22_1171]
Rating: +1 (from 1 vote)
इतिहास की लहर (On the Wave of History), 10.0 out of 10 based on 1 rating
About Chander Mohan 412 Articles
Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.