यात्रा का अंत? ( End of Yatra ? )

बाबरी मस्जिद के मामले में सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश की भाजपा के शीर्ष नेता लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती समेत 13 लोगों के खिलाफ मुकद्दमा चलेगा, के न केवल न्यायिक परिणाम निकलेंगे बल्कि इसके गंभीर राजनीतिक नतीजे भी निकलने तय है। एक बार फिर यह मुद्दा देश की राजनीति को भड़काने की क्षमता रखता है।

सुप्रीम कोर्ट ने इन नेताओं पर लगे आपराधिक साजिश के आरोपों को बहाल करने की सीबीआई की याचिका को स्वीकार करते हुए यह फैसला दिया है। दिलचस्प है कि मामला 25 वर्ष पुराना है। सीबीआई यूपीए के शासन में खामोश रही पर अब अचानक उसने गढ़े मुद्दे उखाड़ने का फैसला कर लिया है। ऐसा इस वक्त क्यों किया गया, यह खुद एक बुझारत है।

खैर यह अदालती मामला है। अदालत अपना काम करेगी लेकिन दिलचस्प है कि इतने ज्वलंत मामले पर कांग्रेस पार्टी की प्रतिक्रिया बहुत सावधानीपूर्ण रही है। आम तौर पर ऐसे मामलों में जिनमें मुसलमानों का हित जुड़ा हो, कांग्रेस जरूरत से अधिक मुखर रहती है। लेकिन इस बार इस मामले की नाजुकता को देखकर पार्टी में घबराहट है क्योंकि इस फैसले ने एक बार फिर राम मंदिर के मसले को राजनीति के ठीक बीच स्थापित कर दिया है।

कांग्रेस को घबराहट है कि भाजपा 2019 के चुनाव में इस मामले के दोहन की कोशिश करेगी। आखिर अगर दो वर्ष के बाद मामला तय होना है तो उस वक्त तक तो 2019 सर पर होंगे। अगर मुकद्दमा लटक गया, जैसा अक्सर यहां होता है तो भी रोज सुर्खियों में छाया रहेगा।

कांग्रेस को चिंता है कि इससे भाजपा फिर धु्रवीकरण न कर जाए। पहले ही पार्टी यह प्रभाव खत्म करने की कोशिश कर रही है कि उसका झुकाव मुसलमानों की तरफ है। कांग्रेस किस तरह फूंक-फूंक कर कदम उठा रही है यह इस बात से पता चलता है कि पार्टी से सीधे मुंह से मंत्री उमा भारत का इस्तीफा भी नहीं मांगा गया। मनीष तिवारी का केवल यह कहना था कि प्रधानमंत्री नैतिकता की बहुत बात करते हैं अब इसकी परीक्षा है। रणदीप सुरजेवाल का कहना था कि सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया, अब न्याय होना चाहिए। पार्टी तो सोनू निगम की अज़ान पर टिप्पणी पर भी चुप रही।

लेकिन कांग्रेस से भी अधिक यह फैसला और उसके बाद जो होने वाला है, भाजपा की आतंरिक राजनीति को प्रभावित करने वाला है क्योंकि इस विवाद के केन्द्र में लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती तथा कल्याण सिंह हैं।

विशेष तौर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का असर उस नेता पर होगा जिन्होंने 2 सीटों पर सिमटी भाजपा को भारतीय राजनीति का केन्द्र बिंदू बनाया और उस जगह पहुंचा दिया कि आज पार्टी के पास लोकसभा में प्रचंड बहुमत है। यह राजनीति की विडम्बना ही कही जाएगी कि जब पार्टी अपने लक्ष्य पर पहुंच चुकी है तो ‘रथ यात्री’ खुद को अदालत के कटघरे में पा रहें हैं। आज लाल कृष्ण आडवाणी अपनी हालत पर कह सकते हैं।

गैरों में नहीं चाहने वालों में लुटे हैं,
लुटना था अंधेरों में, उजालों में लुटे हैं!

अयोध्या में 6 दिसम्बर, 1992 की घटनाओं में लाल कृष्ण आडवाणी की भूमिका क्या थी इसका फैसला अदालत करेगी। वह खुद इसके बारे अपनी जीवनी MY COUNTRY MY LIFE   लिखते हैं, ‘‘मंच पर उपस्थित नेता तत्काल याचना करने लगे कि गुबंद पर चढ़े हुए कार सेवक उतर जाएं। लेकिन इसका कोई असर नहीं हो रहा था। उलटा और लोग उपर चढ़ रहे थे। शीघ्र मैंने देखा कि उनके हाथ में उपकरण थे और वह गुबंद को तोड़ रहे थे। ऐसे ही परेशान मंच पर और नेता भी थे। हमने महसूस किया कि कुछ गड़बड़ है…. गुबंद पर जो हो रहा था वह हमारे आंदोलन के सिद्धांतों के खिलाफ था…. मैं बहुत परेशान और बेबस महसूस कर रहा था…. 6 दिसम्बर की घटनाओं में मेरी भूमिका पर बेलगाम कीचड़ उछाला गया। मुझ पर यह आरोप लगाया गया कि मैंने लोगों को विवादित ढांचा गिराने के लिए उकसाया था…. सच्चाई से यह बहुत दूर है।’’

उन पर यह भी आरोप लगा कि वह राम मंदिर आंदोलन में आस्था के लिए नहीं बल्कि राजनीति के कारण जुड़े थे। उनके लिए राम मंदिर गद्दी तक पहुंचने का रास्ता था। लेकिन जब गद्दी उनके पास आ गई तो उन्होंने मुुंबई में ताज अटल बिहारी वाजपेयी के सर पर रख दिया।

राजनीति में ऐसी उदारता बहुत कम दिखाई जाती है। आडवाणी उस वक्त भाजपा के स्वभाविक पीएम थे लेकिन उन्होंने अपने वरिष्ठ साथी वाजपेयी को पीएम बनवा दिया। खुद वाजपेयी भी उस वक्त हैरान रह गए थे।

अदालत उनकी सफाई मानती है या नहीं, यह दो साल में पता चलेगा लेकिन इस घटना का आडवाणी पर बहुत प्रभाव हुआ लगता है। आखिर नैतिक जिम्मेवारी तो उन्हीं की बनती है क्योंकि उनकी रथयात्रा से यह हालात बने थे। बाद में आडवाणी ने अपनी छवि नरम करने की कोशिश में 6 दिसम्बर 1992 की घटना को जिंदगी का ‘सबसे दुखदाई दिन’ कह दिया। 2005 में कराची जाकर मुहम्मद अली जिन्ना को सैक्यूलर बता कर अपने पर उग्रवादी होने का चिपका ठप्पा उतारने की कोशिश की। लेकिन यह प्रयास बहुत उलटा पड़ा।
कराची में की गई यह गुस्ताखी आज तक आडवाणी को परेशान करती रही है। कहा जा सकता है

एक कदम गलत पड़ा था राहे शौक में
मंजिल तमाम उम्र हमें देखती रही

लेकिन उनके नेतृत्व में पार्टी दो चुनाव हार गई और जिन्ना को हिन्दू-मुस्लिम एकता का दूत कहना बहुत महंगा रहा। और अब जब वह राष्ट्रपति पद के प्रबल उम्मीदवार हो सकते थे तो सीबीआई ने गड़बड़ कर दिया। राष्ट्रपति बनने पर पाबंदी तो कोई नहीं है पर क्या नैतिक आधार पर उन्हें राष्ट्रपति या उप राष्ट्रपति बनाया जाना चाहिए?

सोमनाथ से अयोध्या की उनकी रथ यात्रा ने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी। 1989 से 1991 के बीच भाजपा का वोट 11 प्रतिशत से बढ़ कर 20 प्रतिशत हो गया। लोकसभा सीटें 85 से बढ़ कर 120 हो गई। आज भाजपा देश की सबसे बड़ी पार्टी है। नरेंद्र मोदी ने विपक्ष को मटियामेट कर दिया है। लेकिन मोदी ने भी आडवाणी द्वारा डाली गई बुनियाद पर अपनी मज़बूत इमारत खड़ी की है। अब वह मसला जीवित रहेगा जो 1991 के बाद भाजपा के हर घोषणापत्र में दर्ज किया गया है। अभिप्राय राम मंदिर से है।
लेकिन जिस व्यक्ति ने अपने को ‘निरन्तर यात्री’ कहा था राष्ट्रपति के चुनाव से ठीक पहले खुद को बहुत असुखद स्थिति में पा रहे हैं। वह कह सकते हैं,

हालत ने अजीब तमाशे दिखाए हैं
रिश्ते बदल गए, कभी रास्ते बदल गए!

बड़ा सवाल अब यह है कि यह ‘यात्रा’ का असुखद अंत होगा, या ‘गुरु दक्षिणा’ मिलेगी?

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Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.