इमरान खान और ‘खतरनाक’ पाकिस्तान ( Imran Khan and ‘Dangerous’ Pakistan)

चार अमेरिकी राष्ट्रपतियों के सलाहकार रहे ब्रूस रीडल ने पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री इमरान खान की ताजपोशी पर लिखा है, “दुनिया का सबसे खतरनाक देश अब और खतरनाक बन गया है।” वह लिखते हैं,  “पाकिस्तान को हर हाल में अच्छी सरकार तथा स्वस्थ नागरिक-सेना रिश्ते चाहिए… उसे अपना परमाणु कार्यक्रम धीमा करना चाहिए… उनके अपने हित में है कि वह भारत के साथ बेहतर संबंध करें। सबसे अधिक उसे एक स्थिर तथा अनुभवी नेतृत्व चाहिए। पर ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला। एक अज्ञात भविष्य के लिए तैयार हो जाएं।

जिस वक्त इमरान खान सत्ता संभाल रहे हैं ब्रूस रीडल का यह आंकलन काफी सख्त लगता है पर यह हकीकत पर आधारित है। इमरान खान के पास अपना बहुमत नहीं है और उन्हें सेना का पालतू समझा जाता है। अगर वह सेना की इच्छा की अनदेखी करेंगे तो उनका भी वही हश्र किया जाएगा जो जुलफिकार अली भुट्टो या बेनजीर भुट्टो या नवाज शरीफ का किया गया। पाकिस्तान की वरिष्ठ पत्रकार मरिआना बाबर ने लिखा है कि इमरान खान को याद रखना चाहिए  “इन दिनों चाहे उन्हें सेना का समर्थन मिल रहा है लेकिन अगर उन्होंने अपनी जूती से पैर बाहर निकाले तो उनके लिए भी नवाज शरीफ की तरह बख्तरबंद गाड़ी का इंतजाम किया जा सकता है।”

पाकिस्तान के नियंत्रित लोकतंत्र में सेना की भूमिका निर्णायक रहेगी इसलिए जो लोग समझते हैं या आशा करते हैं कि इमरान खान के आने के बाद भारत के साथ संबंध बेहतर हो जाएंगे उन्हें यह गलतफहमी छोड़ देनी चाहिए। इमरान ने अवश्य कहा है कि अगर भारत एक कदम उठाएगा तो हम दो कदम उठाएंगे, पर यह उनके बस में नहीं है। उनके पल्ले कुछ नहीं है। पाकिस्तान की रक्षा तथा विदेश नीति पर सरकार का नहीं सेना का नियंत्रण है। नवाज शरीफ का भी कसूर क्या था? यही कि उन्होंने मुंबई पर 2008 में हुए हमले के लिए पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था को दोषी ठहरा दिया था। इमरान हमारे साथ बिना शर्त वार्ता चाहते हैं जिसके केन्द्र में कश्मीर हो। वह बार-बार गेंद हमारे पाले मेें फेंक रहे हैं जैसे कि बंद वार्ता को शुरू करना हमारी जिम्मेवारी है। पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने कहा है, “भारत की स्थिति में कोई परिवर्तन की जरूरत नहीं विशेष तौर पर उस वक्त जबकि उग्रवादी अतीत वाला एक राजनेता सेना की मदद से सत्ता में है और पाकिस्तान का जेहादी ढांचा पूरी तरह से कायम है।” पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिव शंकर मेनन का भी मानना है कि “दोनों देशों में रिश्तों में मूलभूत परिवर्तन नहीं होगा क्योंकि पाकिस्तान की सेना यह नहीं चाहती।”

भारत तब तक पहल के लिए तैयार नहीं होगा जब तक पाकिस्तान उधर से आतंकवाद तथा घुसपैठ नहीं रोकता और युद्ध विराम रेखा शांत नहीं हो जाती। निकट भविष्य में इसकी कोई संभावना नहीं।

इमरान के लिए पहली बड़ी समस्या है कि उनके पास बहुमत नहीं है। किसी तरह छोटी पार्टियों को मिला कर सरकार बनाई गई है लेकिन यह कभी भी गिराई जा सकती है। सबसे बड़े प्रांत पंजाब में तो उनकी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी भी नहीं है। किसी तरह उनका मुख्यमंत्री बना लिया गया है लेकिन सबसे बड़ी पार्टी तो नवाज शरीफ की मुस्लिम लीग  है। उपरी सदन सैनेट पर विपक्ष का नियंत्रण है। विपक्ष तो इस चुनाव परिणाम को ही नहीं मान रहा। पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग ने भी इसे इतिहास का सबसे गंदा चुनाव कहा है। अर्थात चुनाव की वैधता ही शंका में है।

दूसरी बड़ी समस्या खुद इमरान खान का अतीत है। उन्होंने शुरूआत एक प्लेब्वॉय की तरह की थी लेकिन बाद में लगातार कट्टर बनते गए यहां तक कि अब उस महिला से निकाह करवा लिया जो सारा वक्त बुर्के में रहती है। वह  कह ही चुके हैं कि उनकी तकदीर पाकिस्तान को अपनी इस्लामिक जड़ों की तरफ वापिस ले जाना है। एक भाषण में उन्होंने कहा था, “पाकिस्तान एकमात्र देश है जो मुसलमानों के लिए बनाया गया। मिस्त्र  मिस्त्रवालों के लिए है, ईरान ईरानियों के लिए है पर पाकिस्तान इस्लाम के लिए है।”

इमरान ने अपने राजनीतिक कैरियर को एक इस्लामवादी, भ्रष्टाचार विरोधी और पश्चिम विरोधी नेता के तौर पर बनाया है। इसके लिए उन्होंने सत्तारुढ़ व्यवस्था, सेना, उल्लमा तथा सुन्नी उग्रवादियों के साथ समझौता किया। ऐसा करते वक्त उन्होंने अहमदियों को गालियां दी और उस कानून का समर्थन किया जो उनके मत को अपराधी बनाता है। इतिहासकार मुकुल केसावन ने लिखा है, ” अच्छी बात है कि दाड़ी वाले कट्टरवादियों की पार्टियों ने चुनाव में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया पर इमरान खान में उन्हें क्लीन शेव, विश्ववादी, अंग्रेजी बोलने वाला नेता मिल गया है जो उनके मत का रक्षक होगा।”

अर्थात संभावना नहीं कि इमरान खान पाकिस्तान की दिशा में परिवर्तन करना चाहतें हैं या कर भी सकते हैं। उनकी तीसरी बड़ी समस्या आर्थिक है। पाकिस्तान दिवालिया है। उसका विदेशी मुद्दा का भंडार 9 अरब डॉलर है पर देनदारी इतनी है कि उसे तत्काल 12 अरब डॉलर चाहिए जिसके लिए वह अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के पास कटोरा लेकर जाने वाले हैं। लेकिन अमेरिका जो आईएमएफ का सबसे बड़ा ऋण दाता है ने आपत्ति की है कि इस पैसे से पाकिस्तान चीन के कर्जे  की अदायगी करेगा। पाकिस्तान के रुपए का एक साल में चार बार अवमूल्यन किया जा चुका है लेकिन भुगतान संतुलन ठीक नहीं हो रहा। पिछले साल उनके स्टॉक मार्केट ने दुनिया में सबसे बुरा प्रदर्शन किया था। न ही बाहर से पैसा आ रहा है। देश पर्यावरण विनाश के कगार पर। बताया जाता है कि 2025 में पानी की इतनी कमी हो जाएगी कि इतना पानी रह जाएगा जो प्यासे सोमालिया से एक तिहाई होगा। 1960 के बाद पांच गुना जनसंख्या बढ़ चुकी है क्योंकि इस्लाम में परिवार नियोजन वर्जित है। जनसंख्या के इस विस्फोट को संभालने की कोई योजना नहीं है।

चौथी समस्या सेना के साथ रिश्ता है। अपनी आजादी के बाद आधा समय पाकिस्तान सेना के नियंत्रण में रहा है। इमरान यह हकीकत कभी भूल नहीं सकते, न ही उन्हें भूलने ही दिया जाएगा। देश में सबसे भ्रष्ट संस्था भी सेना है। विशेषज्ञ आयशा सद्दीका ने बताया है कि किस तरह पाकिस्तान में सेना बड़ी जमींदार और व्यापारिक जादूगर बन गई है। जरनैल अपनी जेबें भरते रहते हैं। अगर इमरान खान इस भ्रष्टाचार पर नियंत्रण की कोशिश करेंगे तो उनका बेनजीर या नवाज शरीफ जैसा हश्र किया जाएगा।

इमरान की पांचवीं समस्या वहां के जेहादी और कट्टरवादी हैं। वह चुनाव में तो पिट गए हैं। जिस हाफिज सईद को कश्मीर के कुछ युवा अपना लीडर मानते हें उसकी पार्टी इस चुनाव में कुचली गई है। लेकिन चुनाव में 200 लोग मारे गए जिससे पता चलता है कि इनकी ताकत कायम है। अगर इमरान खान इन लोगों पर नियंत्रण नहीं करते तो भारत के साथ संबंध बेहतर नहीं हो सकते। पर इसकी संभावना बहुत कम लगी है।

अर्थात पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इस तरह जकड़े गए हैं कि पाकिस्तान के एक इतिहासकार एफएस एज़ाजुद्दीन ने तो उन्हें ‘बलि  का सफेद मृग’ कहा है। उन्हें किसी भी समय अस्थिर किया जा सकता है। अपने बचाव के लिए इमरान खान देश को अधिक कट्टर और अधिक खतरनाक बना सकते हैं।

इस बीच नवजोत सिंह सिद्धू की पाकिस्तान यात्रा चर्चा में है। उनका वहां जाना गलत नहीं पर पाकिस्तान के सेना चीफ बाजवा को दो बार गले लगाना शर्मनाक है। तरनतारन जिले के शहीद सूबेदार परमजीत सिंह का सिर पाकिस्तान सेना की बैट टीम काट कर ले गई थी। उससे एक दिन पहले ही बाजवा ने उस सीमा का दौरा किया था। अब शहीद परिवार सिद्धू से कह रहा है कि वह बाजवा से कम से कम यह तो पूछ लेते कि कटे हुए सिर कहां है? और नहीं तो वह शहीद की पगड़ी ही वापिस ले आते। उल्लेखनीय है कि जब सूबेदार परमजीत सिंह की हत्या की गई तो सिद्धू ने परिवार से मिलकर कहा था कि “एक सिर की जगह हम 10-10 सिर लाएंगे।” अभी तक सिद्धू ने अपनी राजनीति के लिए तमाशे का बहुत सहारा लिया है लेकिन यह तमाशा बहुत उलटा पड़ा है क्योंकि बाजवा वह शख्स है जो हमारे लोगों पर गोली चलाने का आदेश देता है। इस जप्फी की बड़ी कीमत आगे चलकर सिद्धू को चुकानी पड़ सकती है।

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Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.