संघ: निरंतरता और परिवर्तन ( RSS: Continuity and Change)

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत की तीन दिन की व्याख्यान श्रृंखला के प्रति देश में असामान्य दिलचस्पी है। इससे पहले वह पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को मुख्य अतिथि के तौर पर बुला चुके हैं। क्या बदलते समय को देखते हुए संघ भी बदल रहा है? आखिर आज की जीन्स डाले और हाथ में मोबाईल पकडऩे वाली पीढ़ी की जरूरत को देखते हुए संघ ने निक्कर की जगह पैंट शुरू कर ही दी है। पर क्या अब वैचारिक बदलाव के भी संकेत मिल रहें है? क्या आज के भारत की जरूरत को देखते हुए संघ अधिक उदार तथा दूसरों को साथ लेकर चलने वाली संस्था बन रही है?
राम माधव का मानना है कि वास्तव में संघ बदल रहा है। उन्होंने एक लेख लिखा है,  ‘गलासनॉस्ट इन आरएसएस’ जिसमें उनका निष्कर्ष था कि मोहन भागवत ने संघ का पुराना संकोच छोड़ दिया है। वह लिखते हैं, “भागवत बहुत आगे निकल गए हैं। उनके तीन दिन के व्याख्यान उन मामलों में खुलापन प्रदर्शित करते हैं जिनके साथ संघ जुड़ा हुआ है। क्योंकि मैं अंदरूनी तौर पर जुड़ा हुआ हूं इसलिए भागवत के बनने के बाद पिछले एक दशक में जो परिवर्तन आया है मैं उसका गवाह हूं। “
समरण रखे कि सोवियत यूनियन के अंतिम राष्ट्रपति मिखाईल गोर्बाच्योव ने 1988-91 के बीच ‘गलासनॉस्ट’ (खुलापन) तथा ‘पेरेस्त्रोइका’ (पुनर्निर्माण) की नीति शुरू की थी। उन्होंने रुसियों को बोलने की वह आजादी दे दी जो पहले उनके पास नहीं थी। राम माधव ने मोहन भागवत की तुलना गोर्बाच्योव से करने की कोशिश की है जो उनके इन शब्दों से स्पष्ट होता है, जब गोर्बाच्योव से उनके सुधार के प्रति उत्साह के बारे पूछा गया तो उनका जवाब था, “अगर मैं नहीं तो और कौन? और अगर अब नहीं तो कब?”
अर्थात राम माधव का मानना है कि मोहन भागवत आरएसएस का ‘सुधार’ कर रहे हैं और अगर अब नहीं तो कब? लेकिन दिलचस्प है कि राम माधव के उत्साह का प्रतिवाद संघ के उच्चाधिकारी मनमोहन वैद्य ने कर दिया। उनका कहना था कि संघ को ‘गलासनॉस्ट’ की कोई जरूरत नहीं। उनके अनुसार “संघ में स्पष्टवादिता नई बात नहीं। विचारों की तरंग के बारे खुली बहस हमारे जीवन का अभिन्न अंग है।”
मैंने जालंधर में खुद मोहन भागवत से यही सवाल किया था तो उन्होंने एक प्रकार से तौबा-तौबा करते हुए कहा कि “नहीं-नहीं यहां कोई गलासनॉस्ट नहीं है।” मैं भी समझता हूं कि रुसी संज्ञाओं का इस्तेमाल कर राम माधव ने गलती की है। वह यह भी भूल गए कि गोर्बाच्योव का अपना हश्र क्या हुआ था? देश में एक दम राजनीतिक अस्थिरता आ गई और सोवियत यूनियन का बिखराव हो गया। उन्हें अपयश में इस्तीफा देना पड़ा था।
शायद यही कारण है कि संघ के बड़े नेता  ‘गलासनॉस्ट’ से दूर भाग गए। निश्चित तौर पर मोहन भागवत गोर्बाच्योव से तुलना नहीं चाहेंगे लेकिन भागवत की व्याख्यान माला यह तो स्पष्ट करती है कि संघ में वैचारिक मंथन चल रहा है और वह अपने मूल सिद्धांतों पर कायम रखते हुए भी बदलते समय के अनुसार बदलने की कोशिश कर रहे हैं। आगे बढ़ने के लिए रास्ता तलाशा जा रहा है ताकि यह संगठन 21वीं सदी की आधुनिकता के साथ तालमेल बिठा सके। आखिर आरटिफिशल इंटैलिजेन्स के जमाने में कितना पीछे की तरफ देखा जा सकता है? अतीत से प्रेरणा प्राप्त करने की भी सीमा होती है। 92 वर्ष की यात्रा के बाद अगर दिशा पर सोच-विचार हो रहा है तो इसका स्वागत होना चाहिए।
भागवत की सबसे महत्वपूर्ण घोषणा है कि “मुसलमानों के बिना हिन्दू राष्ट्र नहीं हो सकता” और  “मुसलमानों के बिना हिन्दुत्व के मायने नहीं रहते।  “ऐसा कहते हुए उन्होंने खुद को दूसरे सरसंघचालक गुरु गोलवालकर के उग्र विचारों से अलग कर लिया है। मोहन भागवत का संदेश है कि गुरु गोलवालकर के विचार आज के भारत में प्रासंगिक नहीं रहे। संघ अब ऐसा राष्ट्रवाद का चलन चाहता है जो सबको साथ लेकर चले। वह हिन्दुत्व की व्यापकता की बात कहते हैं जबकि गुरु गोलवालकर के विचार थे कि, “हिन्दोस्तान के गैर हिन्दू लोगों को या तो हिन्दू संस्कृति और भाषा अपना लेनी चाहिए… या वह देश में हिन्दू राष्ट्र के अधीनस्थ रह सकते हैं। किसी पर उनका दावा नहीं होगा, वह किसी चीज की मांग नहीं कर सकेंगे न ही उनके कोई विशेषाधिकार ही होंगे-यहां तक कि उनके नागरिक अधिकार भी नहीं होंगे।”
गुरु गोलवालकर के विचारों तथा उनके संकलन  ‘बंच ऑफ थाटस’ ने संघ की छवि बहुत नकारात्मक बना दी थी। भागवत का कहना था कि इनका महत्व सामयिक ही था और आगे इस किताब से विवादास्पद हिस्सा निकाल दिए गए हैं। अर्थात संघ अब अपनी छवि चमकाने में लगा है और गोलवालकर के विचारों से पल्ला छुड़ा रहा है। भागवत ने संविधान में आस्था प्रकट की है जबकि गुरु गोलवालकर का तो लोकतंत्र में भी विश्वास नहीं था। आजादी की लड़ाई से भी वह दूर रहे। अब भागवत मान रहे हैं कि गोलवालकर के विचारों का समय एक प्रकार से एकसपायर हो गया है। भागवत ने तो संविधान की प्रस्तावना भी पढ़ दी और बाद में इसमें शामिल  ‘सैक्यूलरिज़म’  तथा  ‘सोशलिज़म’  में अपनी आस्था व्यक्त कर दी जबकि गोलवालकर को तो ‘सैक्यूलर’  शब्द से नफरत थी।
मोहन भागवत ने आजादी की लड़ाई में कांग्रेस की भूमिका की सराहना भी की है। उनका कहना है कि ‘संघ युक्त भारत में विश्वास रखता है मुक्त भारत में नहीं।’ उनकी इस टिप्पणी में दो व्यक्तियों के लिए फटकार है। एक, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह जो  ‘कांग्रेस मुक्त’ भारत की बात कहते रहतें हैं जो न संभव है और जो न ही सही है और न ही हो सकता है। दूसरा, उन्होंने साथ ही राहुल गांधी का भी जवाब दे दिया जिन्होंने संघ की तुलना मिस्त्र के हिंसक उग्रवादी संगठन ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ से की थी। राहुल गांधी की जानकारी भी राम माधव की तरह आधी-अधूरी ही है। संघ मुस्लिम ब्रदरहुड नहीं है, कोई तुलना नहीं बनती।
मोहन भागवत की व्याख्यानमाला एक बहुत महत्वपूर्ण घटनाक्रम है क्योंकि संघ अपनी तरह का देश में सबसे बड़ा संगठन है जिसकी 50 हजार से अधिक शाखाएं हैं और लाखों सदस्य हैं। इसलिए जिम्मेवारी भी बनती है कि देश के अंदर से तनाव हटाया जाए। तापमान कम किया जाए। सदस्यता में कुछ कमी आई है क्योंकि युवाओं का रुझान दूसरी बातों पर है। मोबाईल तथा इंटरनैट ने सब कुछ बदल दिया। यह डिजिटल युग है आप दकियानूसी विचारों से लोगों को कायल नहीं कर सकते। यह भी दुख की बात है कि लिंचिंग, लव जेहाद तथा विरोधियों पर हमले हिन्दुत्व के साथ जुड़ बदनामी कर रहे हैं। विदेशों में भी ‘हिन्दू उग्रवाद’ का मुद्दा है। संघ का भाजपा के साथ रिश्ता भी समस्याएं खड़ी करता है। आरएसएस पर दो किताबें लिखने वाले वालटर के ऐंडरसन ने लिखा है, “सरकार के खिलाफ अपनी शिकायतों के बावजूद संघ भाजपा को विजयी देखना चाहता है।” राम मंदिर के मामले में भागवत ने चुनाव के नजदीक अपने विचार बदल लिए हैं। पहले वह अदालती फैसले के इंतजार की बात करते थे अब उनका कहना है कि “सरकार कानून लाकर भव्य राम मंदिर का रास्ता प्रशस्त करे।”
यह शिकायत है कि सुप्रीम कोर्ट राम मंदिर पर फैसला करने में देर कर रहा है। अब फिर सुनवाई जनवरी 2019 तक टाल दी गई है लेकिन राम मंदिर पर भागवत के बदले विचार बताते हैं कि एक दम परिवर्तन करना कितना मुश्किल है। आखिर वफादारों की फौज को साथ लेकर चलना है। फिर भी मोहन भागवत की स्पष्टवादिता तथा दिशा परिवर्तन के संकेत तथा उनके समभाव के संदेश का स्वागत है। आशा है कि जितना महत्व वह एकता को देते हैं उतना ही महत्व वह विविधता को भी देंगे। देखना अब यह है कि कार्यकर्ता तथा जो संघ से प्रेरणा लेते हैं वह इस ‘सुधार’ पर कितना अमल करते हैं? यह केवल शाब्दिक परिवर्तन ही न रह जाए।

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About Chander Mohan 416 Articles
Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.