पाकिस्तान का ‘भारत-चुनाव’ (Pakistan’s Indian Elections)

पाकिस्तान के हुकमरान को आजकल नींद नहीं आ रही है। भारत में चुनाव हो रहे हैं और वह सटपटा रहें हैं। कौन जीतेगा? कौन जीतेगा? उनके विदेशमंत्री शाह महमूद कुरैशी साहिब ने पहले घोषणा कर दी कि उनकी सरकार के पास विश्वसनीय खुफिया जानकारी है कि भारत 16 से 20 अप्रैल के बीच हमला करेगा फिर उनका कहना था कि भारत 23 अप्रैल को हमला करेगा। लेकिन अपना मज़ाक बनाने में उनके वजीर-ए-आज़म इमरान खान साहिब भी पीछे नहीं हैं। वह कह चुके हैं कि भारत बालाकोट जैसा और हमला कर सकता है। वह रोजाना नरेन्द्र मोदी पर ताबड़तोड़ हमले भी करते आ रहे हैं यहां तक कह दिया कि जब ‘छोटे लोग जब बड़े पदों पर बैठ जाए’ तो गड़बड़ तो होगी ही पर इमरान खान का सुर भी बदल गया है। अब उनका कहना है कि अगर नरेन्द्र मोदी जीत जाएं तो नई दिल्ली के साथ शांति वार्ता और कश्मीर मुद्दे के समाधान की संभावना ज्यादा है। अर्थात उनकी आशा उसी व्यक्ति से है जिसके आदेश पर बालाकोट का हमला हुआ था।
पहली बार है कि किसी भी विदेशी नेता ने इस तरह सीधा हमारे चुनाव में दखल देने का प्रयास किया है। विभिन्न बड़े देशों का भी अपने-अपने पसंद होगी। रुस तथा यूएई ने नरेन्द्र मोदी को सर्वोच्च सम्मान देकर अपनी पसंद साफ कर दी है पर सार्वजनिक टिप्पणी कोई नहीं करता जिस तरह इमरान खान ने की है। इस पर अंग्रेजी का मुहावरा याद आता है कि FOOLS RUSH IN WHERE ANGELS FEAR TO TREAD अर्थात मूर्ख वहां तेजी से भागे आते हैं जहां फरिश्ते कदम रखने से घबराते हैं! इमरान खान शायद भारत के मतदाता को उलझाना चाहते हैं, या मोदी के पाकिस्तान पर लगातार प्रहार को कुंद करना चाहते हैं, या अपने देश के फटेहाल से लोगों का ध्यान हटाना चाहते हैं पर इस प्रक्रिया में उन्होेंने साबित कर दिया है कि पाकिस्तान के शीर्ष पर भारत तथा नरेन्द्र मोदी को लेकर भारी व्याकुलता है। लगातार जिम्मेवार लोग भारत के चुनाव पर टिप्पणी कर रहें हैं। उनके विदेश मंत्री भारत से होने वाले हमले के बारे चेतावनी दे रहें हैं पर प्रधानमंत्री उसी सरकार में आशा की किरण देखते हैं। शायद ऐसी ही परिस्थिति के बारे गालिब ने कहा था कि ‘कुछ न समझे खुदा करे कोई!’
इमरान खान तथा उनके मंत्रियों की अपरिपक्व टिप्पणियों की उनके अपने देश में भी काफी आलोचना हो रही है। पाकिस्तान की प्रमुख सांसद शौरी रहमान ने पूछा है कि इमरान खान बताए कि ‘मोदी का यार कौन है?’ उल्लेखनीय है कि अपने चुनाव अभियान के दौरान इमरान खान का नारा था, ‘मोदी का जो यार है वह गद्दार है, गद्दार है।’ प्रमुख पत्रकार मरिआना बाबर ने लिखा है कि इमरान खान को ‘कूटनीति का सबक’ लेने की जरूरत है। अधिक गंभीरता दिखाते हुए कराची का प्रमुख अखबार डॉन सम्पादकीय में लिखता है, “हमारे यहां शिखर पर बैठे लोगों से अधिक परिपक्व दृष्टिकोण की अपेक्षा है।”
लेकिन उनका धर्म संकट इस उलझन से भी गंभीर है। मूल समस्या है कि वह यह नहीं तय कर पा रहे कि वह है क्या? क्या वह साऊदी अरब जैसा कट्टर इस्लामी राष्ट्र है या भारत जैसा उदार लोकतंत्र? उन्हें दोनों तरफ खींचा जा रहा है जिसके कारण उनका संकट और गहरा गया है। इतिहासकार बताते हैं कि मुहम्मद जिन्नाह भारत और पाकिस्तान के बीच ऐसी खुली सीमा चाहते थे जैसी अमेरिका और कनैडा के बीच है लेकिन जिया-उल-हक ने देश को कट्टरता की तरफ धकेल दिया। आज वहां 30,000 से अधिक मदरसें हैं जहां 25 लाख छात्र पढ़ते हैं। जब वह इन मदरसों से निकलेंगे तो उनमें इसके सिवाय कोई हुनर नहीं होगा कि वह कट्टर बन चुके होंगे। इमरान खान की सरकार इन पर नियंत्रण करना चाहती है पर इस मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालने की हिम्मत वह नहीं जुटा पा रहे हैं। यह बेरोजगार कट्टर युवक देश को और अस्थिर कर रहें हैं।
1973 में इस्लामिक विद्वान वहीद-उज़-ज़मन ने पाकिस्तान में यह मूलभूत सवाल उठाया था कि “खुदा न खास्ता अगर अरब, तुर्की या ईरानी इस्लाम को छोड़ देते हैं तो अरब फिर भी अरब रह जाएंगे, तुर्क तुर्क रहेंगे और ईरानी ईरानी रहेंगे पर अगर हम इस्लाम छोड़ दे तो हम क्या होंगे?” एक पाकिस्तानी अधिकारी ने 1980 में न्यूयार्क टाईम्स में इसका जवाब दिया, “दूसरे दर्जे के भारतवासी।” अपनी पहचान को लेकर पाकिस्तान फंसा हुआ है। यह वह मुस्लिम देश है जहां मुसलमान ही मुसलमान के खून के प्यासे हैं। अब फिर क्वेटा में हज़ारा शिया पर हुए हमले में 20 लोग मारे गए। पाकिस्तान की सेना दावा तो करती है कि उसने आतंकवाद पर नियंत्रण कर लिया है पर जैसे उनके परमाणु वैज्ञानिक तथा लेखक परवेज़ हुडभा ने कहा है, “हर किसम के मिलिटैंट ग्रुप…यहां खुले घूम रहे हैं। यह उस सेना के आगे से दनदनाते  गुजरते हैं जो यह दावा करती है कि उसने आतंकवाद को पराजित कर दिया है।” पत्रकार खालिद अहमद ने भी लिखा है कि “पाकिस्तान की अधिकतर जनसंख्या के लिए मदरसों के द्वारा पैदा उग्रवाद भी अब सामान्य बन चुका है।” उनके पंजाब के भावलपुर के सरकारी कालेज के अंग्रेजी विभाग के हैड खालिद हमीद को उनके अपने एक छात्र ने छुरा घोंप दिया क्योंकि उन्होंने नए छात्रों की वैलकम पार्टी में लड़के तथा लड़कियों को इकट्ठे आने दिया था। कातिल का मानना है कि यह इस्लाम की शिक्षा के खिलाफ हैै।
अपने अस्तित्व तथा पहचान की पाकिस्तान की जद्दोजहद के बीच भारत का मुद्दा चुनाव बन गया है और उनके नेताओं तथा अवाम के मनों पर यह छाया हुआ है। एक तरफ वह देख रहे हैं कि हर दो वर्ष के बाद भारत की अर्थ व्यवस्था पाकिस्तान की अर्थ व्यवस्था के बराबर बढ़ रही है इसलिए सियाने कह रहे हैं कि उन्हें भारत के साथ सामान्य संबंध कर लेने चाहिए और उसकी बढ़ती अर्थ व्यवस्था में हिस्सा पाना चाहिए, तो दूसरी तरफ अतीत के गहरे पूर्वाग्रह बदलने नहीं देते। पाकिस्तान की सारी विचारधारा ही नकारात्मक है कि वह भारत नहीं है और उसके हित भारत के विपक्ष में रहने में है। खालिद अहमद ने भी लिखा है कि “पाकिस्तान का राष्ट्रवाद 25 प्रतिशत भारत से नफरत पर आधारित है। इसे इस्लाम कहा जाता है क्योंकि ऐसा कर ही हम भारत और अपने में अंतर कर सकते हैं।” पाकिस्तान के पूर्व राजदूत हुसैन हकानी ने भी ‘पाकिस्तान की भारत के प्रति रोगात्मक मनोग्रस्ती’ का जिक्र किया है। इसी मनोग्रस्ती के कारण (1) उन्होंने आतंकवाद का राक्षस खड़ा किया है जो अब उनका ही भक्षण कर रहा है (2) इसी के कारण वहां सेना इतनी हावी हो गई है कि सरकार दब गई है। कहा जा रहा है कि ‘भारत से बचने के लिए’ ताकतवर सेना चाहिए।
हुकमरान की सेना हमारे साथ युद्ध नहीं चाहती क्योंकि वह जानते हैं कि वह जीत नहीं सकते पर वह शांति भी नहीं चाहते इसलिए आतंक के द्वारा मामला गर्म रखते हैं। विशेषज्ञ क्रिस्टीन फेयर ने लिखा है “पाक सेना वह कैंसर है जो देश की हत्या कर रहा है पर वहां के नागरिकों की मति इतनी भ्रष्ट हो चुकी है कि उन्हें यह समझ नहीं आ रहा।” पाकिस्तान राय की बनावट ऐसी बन चुकी है कि वह भारत के साथ शांति नहीं होने देती। क्या चुनाव के बाद कुछ सुधार होगा जैसे इमरान खान कह रहे हैं? तेजी से दिवालिया हो रहे पाकिस्तान के सामने विकल्प सीमित है। इमरान खान नई पारी शुरू कर सकते हैं। अगर वह नहीं करते तो (1) वह खुद असफल हो जाएंगे और (2) उनका देश और फिसलता जाएगा। पर सवाल यह है कि क्या सेना, उनके कट्टरवादी तथा उनकी खुफिया एजंसियां जिनका अस्तित्व भारत विरोध पर टिका है इसकी इज़ाजत भी देंगे? वहां कितना भी शोर हो हमारे चुनाव परिणाम इस हालत को बदल नहीं सकते।

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Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.