पाकिस्तान: चुनौती और मौका (Pakistan: Challenge and Opportunity)

आज किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान दोनों मौजूद रहेंगे। क्या दोनों में मुलाकात होगी? विदेश विभाग के प्रवक्ता रवीश कुमार का कहना है कि  “मेरी जानकारी के अनुसार” दोनों में कोई मुलाकात नहीं होने वाली। यह निराला वाक्य न इस बात का प्रतिवाद करता है और न ही पुष्टि करता है कि बिश्केक में दोनों नेताओं के बीच कुछ होने वाला है। मामला और भी पहेलीनुमा बनता है क्योंकि नए विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने एक महत्वपूर्ण भाषण में कहा है कि भारत को पड़ोस में  ‘उदार नीति’ अपनानी चाहिए और अपने पड़ोसियों से सहयोग के लिए खुद पहल करनी चाहिए। लेकिन पड़ोसियों में तो पाकिस्तान भी शामिल है तो क्या विदेश मंत्री कोई विशेष सिग्नल दे रहें हैं? बिश्केक से ठीक पहले पाक के विदेश सचिव सुहैल मुहम्मद की तीन दिन की  ‘निजी’  दिल्ली यात्रा भी चर्चा का विषय रही है।

मैं नहीं समझता कि यह सरकार इस वक्त उस देश के प्रति दोस्ती का हाथ बढ़ाने को तैयार है। हाल के चुनाव में पाकिस्तान बड़ा मुद्दा रहा है। यह वह देश है जो हमारे राष्ट्रीय हित पर लगातार चोट करता आ रहा है लेकिन हम उसे प्यार से या टकराव से सीधा करने में अब तक असफल रहें हैं। अब फिर इमरान खान ने एक और प्रेम पत्र लिख कर कश्मीर सहित सभी मसलों पर बातचीत की पेशकश की है। इमरान खान जानते हैं कि कश्मीर का जिक्र ही भारत के नेताओं को चिढ़ाने के लिए काफी है। अपने शपथ ग्रहण समारोह में सार्क को एक तरफ रख कर बंगाल की खाड़ी के बिम्सटेक देशों के नेताओं को आमंत्रित कर नरेन्द्र मोदी यह संकेत दे ही चुके हैं कि उन्हें अब पाकिस्तान की चिंता नहीं। जैसे सामरिक विश्लेषक मारुफ रज़ा ने भी लिखा है,  “मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में सीखा है कि जब तक पाकिस्तान में आतंकी समूह कायम है उनके साथ औपचारिक जुड़ाव निरर्थक कवायद है।”

इमरान खान की भारत के साथ बातचीत की बराबर रट, हाफिज सईद और मसूजद अजहर पर कुछ पाबंदी और अब उनकी सेना के बजट में कुछ कटौती सब बताते हैं कि अपनी गलत नीतियों और भारत के प्रति द्वेष के कारण पाकिस्तान किस तरह जकड़ा जा रहा है। दुनिया का छठा सबसे बड़ी जनसंख्या वाला देश जिसकी छठी सबसे बड़ी सेना है कि अर्थव्यवस्था महाराष्ट्र से भी कम है। जीडीपी का विकास नेपाल और मालदीव से भी कम है। मुद्रास्फीती इस तरह बढ़ रही है कि विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि 40 लाख लोग गरीबी रेखा के नीचे जाने वाले हैं और 10 लाख बेरोजगार होने वाले हैं। पाकिस्तान एक तरफ अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से कर्जा लेना चाहता है तो दूसरी तरफ उसके उपर एफएटीएफ की तलवार लटक रही है कि वह आतंकी गतिविधियों पर लगाम लगाएं। अगर एफएटीएफ उसे  ‘ब्लैक’ सूची में डाल देती है तो आईएमएफ जैसी किसी भी एजेंसी से वह कर्जा नहीं ले सकेंगे और उनकी अर्थव्यवस्था बिल्कुल डूब जाएगी जिसका आस-पड़ोस में भी असर पड़ेगा। इसीलिए इमरान खान के नेतृत्व में पाकिस्तान यह प्रभाव दे रहा है कि उनका आचरण बदल रहा है, वह बंदा बन रहें है।

पाकिस्तान में गरीबी, भूखमरी तथा दिवालियापन की उभर रही भयानक स्थिति नरेन्द्र मोदी के लिए बड़ा धर्म संकट है कि उस देश के साथ क्या सलूक किया जाए जिसने विभाजन के बाद पहले दिन से लगातार घोर दुश्मनी ही निभाई है? भारत के हर प्रधानमंत्री ने प्रयास किया। नरेन्द्र मोदी ने भी 2014 के शपथ समारोह में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को बुलाया था और खुद नवाज शरीफ के पारिवारिक समारोह में हिस्सा लेने के लिए लाहौर गए लेकिन बदले में मिला क्या? उरी, पठानकोट तथा पुलवामा? आज 2014 वाली स्थिति नहीं है। इन पांच वर्षों में तस्वीर बदल चुकी है। भारत बहुत मजबूत हुआ है जबकि पाकिस्तान का तेजी से पतन हो रहा है पर अपनी हजार मुश्किलों के बावजूद पाकिस्तान अभी इस जगह नहीं पहुुंचा जहां उससे सार्थक वार्ता हो सके। वह पहले कश्मीर मसले का समाधान चाहता है उसके बाद वह सहयोग करने को शायद तैयार हो जाए।

इसलिए भारत के हित में है कि हम पाकिस्तान पर दबाव जारी रखें और उस दिन का इंतज़ार करें जब वह मान जाए कि उनकी बस हो गई है। यह तो तय है कि यह दिन आएगा। आतंकवाद और वार्ता साथ-साथ नहीं चल सकते कि नीति जारी रहनी चाहिए। बालाकोट पर हमला करवा नरेन्द्र मोदी ने बता दिया कि वह अप्रत्याशित कर सकते हैं। अगली बार, अगर जरूरत पड़ी तो, वह अलग कुछ कर भी सकते हैं। पाकिस्तान के साथ व्यापारिक रिश्ते कमतर कर, सिंधु नदी के पानी का पूरा इस्तेमाल कर, एफएटीएफ में पाकिस्तान पर दबाव डाल, खाड़ी में पाकिस्तान के निकटवर्ती दोस्तों के साथ मज़बूत रिश्ते बना भारत चारों तरफ से पाकिस्तान को निचोडऩे की नीति पर चल रहा है। पाकिस्तान के बारे अमेरिका भी हमारी मदद कर रहा चाहे कई और मामलों मेें अमेरिका के साथ गंभीर मतभेद उभर रहे हैं। दाऊद इब्राहिम (1993 मुंबई हमला), ज़ाकिर रहमान लखवी (2008 मुंबई हमला), हाफिज सईद (2008 मुंबई हमला), मसूद अजहर (2001 संसद पर हमला, 2016 पठानकोट एयरबेस हमला, 2019 पुलवामा हमला)सब पाकिस्तान में इतमिनान से रह रहे हैं। अगर पाकिस्तान वास्तव में भारत के साथ अच्छे संबंध चाहता है तो इनके खिलाफ माकूल कार्रवाई होनी चाहिए या उन्हें हमारे हवाले किया जाना चाहिए।

उन्हें  ‘कश्मीर फर्स्ट’ मानसिकता भी छोडऩी होगी। जैसे उनके पत्रकार खालेद अहमद ने भी लिखा है,  “हर कोई जानता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से समझौता करने का मतलब है कि कश्मीर को भूलना होगा।”  पाकिस्तान को अपनी पश्चिमी सीमा पर बड़ी चुनौती मिल रही है। ईरान नाराज़ है। पहले ब्लूच बागी थे अब पशतून जो पाकिस्तान की व्यवस्था का हिस्सा रह चुके हैं, लगातार आंदोलन कर रहे हैं। वहां पिछले एक साल से यह नारा लगा रहे हैं,  “यह जो दहश्तगर्दी है इसके पीछे वर्दी है।”  डॉन अखबार में शाहिद हसन लिखते हैं,  “आगे बढ़ने के लिए ईमानदार आत्म विश्लेषण की जरूरत है। हमें यह कहना बंद करना होगा कि पाकिस्तान में केवल फरिश्ते ही रहते हैं।” खैबर पखतूनख्वा की विधानसभा के स्पीकर का कहना है कि इस कठिन दौर में दो नहीं एक रोटी खाएं।

पाकिस्तान में जो हालात बन रहे हैं वह नरेन्द्र मोदी की सरकार के लिए चुनौती तथा मौका दोनों है। पहली बात यह याद रखनी चाहिए कि दोनों देशों के बीच कुछ नाटकीय नहीं होना चाहिए। आज तक लाहौर बस यात्रा जैसा जो भी नाटकीय हुआ है वह उलटा पड़ा है। दूसरा, हमें अपनी बढ़ती आर्थिक ताकत का पाकिस्तान की कमर तोडऩे के लिए पूरा तथा और निर्दयतापूर्वक इस्तेमाल करना चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं जैसे आईएमएफ तथा एफएटीएफ से लॉबी कर पाकिस्तान को ब्लैक लिस्ट करवाने का प्रयास जारी चाहिए कि वह उन्हें आर्थिक पैकेज तब तक न दें जब तक वह वास्तव में आतंकी नैटवर्क नष्ट न कर दे। पाकिस्तान से उनकी बदमाशी की कीमत हमें वसूल करनी है। चाहे वह हमारा पड़ोसी देश है पर अभी उनके प्रति वह ‘उदार नीति’ अपनाई नहीं जानी चाहिए जिसकी वकालत विदेशमंत्री जयशंकर कर रहे हैं। पाकिस्तान के साथ अच्छे संबंध विदेश नीति का लक्ष्य होना चाहिए लेकिन यह लंबा मामला है। यह आकर्षक जरूर नज़र आता है पर अति अत्यावश्क नहीं है। भारत यह दुश्मनी झेलने की स्थिति में है। अगर हम इस वक्त बातचीत के लिए तैयार हो जाते हैं तो उन पर बंदा बनने का अंतर्राष्ट्रीय दबाव कमज़ोर पड़ जाएगा।

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Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.