जय हो! (Jai Ho)

यह एक एतिहासिक क्षण है। एक प्रहार से इतिहास बदल दिया गया। जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटा कर उसे एक सामान्य दिल्ली जैसा राज्य बना दिया गया है। अनुच्छेद धारा 370 पूरी तरह से अस्थाई थी। अम्बेदकर तो इसके बिलकुल खिलाफ थे पर शेख अब्दुल्ला के दबाव में जवाहर लाल नेहरू इसके लिए तैयार हो गए थे। वह भी चाहते थे कि समय के साथ यह प्रभावहीन हो जाए। समझा गया था कि इसके द्वारा कश्मीर का बाकी देश में भावनात्मक विलय हो जाएगा लेकिन हुआ इसका उलट। इस अनुच्छेद ने कश्मीर और बाकी देश के बीच अलंघ्य दीवार खड़ी कर जिसके भारी दुष्परिणाम निकले, देश के लिए भी और कश्मीर के लिए भी। कश्मीर की तरक्की रुक गई क्योंकि बाहर से निवेश नहीं हो सकता और केवल पर्यटन तथा बागवानी के बल पर प्रदेश तरक्की नहीं कर सकता। बाकी देश के लोग एक-दूसरे से घुलमिलते हैं पर धारा 370 ने कश्मीरियों को अलग कर दिया और जिसने अलगाववाद की भावना को बल दिया जो बाद में  ‘आजादी’ मांग तथा दहशतगर्दी में परिवर्तित हो गई। अंडेमान-निकोबार भी भारत की मुख्यधारा के अधिक नजदीक है। कश्मीरियों का भारत की संस्कृति से कोई जोड़ नहीं है। आखिर वह अलग थे। उनके नेतृत्व ने भी उनमें कूट-कूट कर भर दिया कि वह विशेष हैं, अलग हैं। उनका भारत के संसाधनों पर तो अधिकार है पर भारत संघ के प्रति उनका कोई कर्त्तव्य नहीं, कोई जिम्मेवारी नहीं यहां तक कि अगर भारत को ब्लैकमेल करने के लिए पाकिस्तान से भी मदद लेनी पड़ी तो यह भी स्वाभाविक ही होगा।

अगर पश्चिम पाकिस्तान से आकर जम्मू-कश्मीर में बसे लोगों को 70 वर्षों के बाद भी मूल अधिकार नहीं मिले तो इसका कारण भी धारा 370 व 35ए है जिन्होंने प्रदेश को अधिकार दे दिए कि वह तय करें कि कौन वहां का स्थाई नागरिक है, कौन नहीं। वह अभी तक STATE LESS अर्थात कहीं के भी नागरिक नहीं हैं। हमारे जैसे परिवार जो पाकिस्तान से आकर पंजाब में बस गए थे उन्हें शुरू से ही पूरे अधिकार मिले हैं। दो भूतपूर्व शरणार्थी, इंद्र कुमार गुजराल और डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने। गुजराल साहिब जब पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद पंजाब आए तो उन्होंने मुझे बताया था कि  “हवाई जहाज में मैंने अपनी पत्नी से कहा था कि यह कैसा अद्भुत देश है जहां वह प्रधानमंत्री बन गया जो रिफ्यूजी बन कर यहां आया था।” लेकिन ऐसी सुविधा जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान से आए परिवारों को नहीं दी गई। अभी भी वह पश्चिम पाकिस्तान से आए रिफ्यूजी ही कहे जाते हैं क्योंकि कश्मीर की विभिन्न सरकारों जिन पर वहां के मुसलमान समुदाय का नियंत्रण रहा है ने उन्हें अधिकार देने से इंकार कर दिया। वह लोकसभा चुनाव में तो वोट डाल सकते हैं पर विधानसभा चुनाव में नहीं।

यह लोग विभाजन के जख्मों का जीता-जागता उदाहरण है। इन्हें भी अधिकार उसी कारण नहीं दिए गए जिस कारण कश्मीरी पंडितों को वहां से निकाला गया, क्योंकि वह हिन्दू थे। गैर मुसलमान थे। आजाद देश में नस्ली सफाई का यह एकमात्र न माफ करने वाला उदाहरण था। मस्जिदों से घोषणा की गई कि रातोंरात वादी छोड़ दो। यह कहा गया कि अपनी औरतों को छोड़ जाओ या मजहब बदल लो नहीं तो मरने को तैयार रहो। और एक भी कश्मीरी  ‘मेनस्ट्रीम’  अर्थात मुख्यधारा के नेता ने इसका विरोध नहीं किया। फारुख साहिब तो लंदन भाग गए। आज महबूबा मुफ्ती अगर बारुद फटने की धमकी दे रही है तो यह भी कह रही है कि  “आप एकमात्र मुस्लिम बहुमत राज्य के प्यार को जीतने में नाकाम रहे हो।” यह असली बात है। एक धर्म निरपेक्ष भारत में  “मुस्लिम बहुमत राज्य!” इस धारा ने जम्मू-कश्मीर की जनसंख्या और उसकी राजनीति को ऐसा बना दिया कि संतुलन वादी के मुसलमानों की तरफ झुक गया। यही कारण है कि वह नए परिसीमन का भी विरोध करते रहे क्योंकि वह जानते हैं कि तब वादी के मुसलमानों की धौंस कम हो जाएगी और वह देश को और ब्लैकमेल नहीं कर सकेंगे। कश्मीर में सेवारत आईपीएस अफसर अभिनव कुमार ने कुछ दिन पहले यह सही लिखा था,  “जब तक वादी के प्रभुत्व को खत्म नहीं किया जाता तब तक किसी भी प्रकार की ऑप्रेश्नल सफलता कश्मीर में बगावत को रोक नहीं सकेगी… समय आ गया है कि खेल के नियम ही बदल दिए जाएं। केवल सैन्य दृष्टि से ही नहीं जैसे बालाकोट में किया गया, बल्कि संवैधानिक तौर पर भी।”

और ऐसा ही भारत सरकार ने किया है। धारा 370 खत्म कर तथा जम्मू-कश्मीर को केन्द्रीय शासित बना कर यह प्रभुत्व खत्म कर दिया। कश्मीर के दर्जे के बारे अस्पष्टता बिलकुल खत्म कर दी गई है। पर इस हालात के लिए वहां के लोग खुद जिम्मेवार हैं। इसी प्रभुत्व ने वहां पत्थरबाज़ और पाकिस्तान के इशारे पर नाचने वाले नेता पैदा किए हैं। सोचा था कि हमें कोई हाथ नहीं लगा सकता पर अब एनआईए की जांच ने इन नेताओं की हवा निकाल दी। फारुख अब्दुल्ला का वीडियो उपलब्ध है जहां वह कह रहे हैं कि नरेन्द्र मोदी अगर दस बार भी पीएम बन जाए वह 370 को हटा नहीं सकते। अब न अलग संविधान रहा, न अलग झंडा। भूतपूर्व रियासत के सब अवशेष खत्म हुए। अब एक निशान, एक संविधान और एक राष्ट्र हो गए हैं। दूसरे राज्यों के लोग यहां जायदाद खरीद कर बस सकते हैं और सबसे महत्वपूर्ण है कि मजहब पर आधारित अलपसंख्यकवाद की धौंस खत्म हो गई।

देश में इस कदम का व्यापक स्वागत हुआ है, कई विपक्षी पार्टियों ने समर्थन दिया है तो इसलिए कि वह जानते हैं कि देश में इसका भारी समर्थन है। अरविंद केजरीवाल भी नरेन्द्र मोदी के किसी कदम की सराहना कर रहें हैं!  ‘हैडलॅस चिकन’  कांग्रेस को समझ नहीं आ रहा क्योंकि इसे लेकर कई नेता बागी हो रहे हैं। अफसोस है कि कांग्रेस के राहुल गांधी, पी. चिंदबरम और गुलाम नबी आजाद जैसे नेता उलटी दिशा में बह रहे हैं पर इनसे सवाल किया जा सकता है कि आप ने 72 वर्षों में कश्मीर को पटरी पर लाने के लिए क्या किया? आपने तो कश्मीर को केवल कुछ परिवारों को सौंप दिया जो अपनी जेबें भरने में खूब सफल रहे। कश्मीरी मुस्लिम नेताओं ने अपनी औलाद को बाहर भेज दूसरों के बच्चों को पत्थर पकड़ा दिए।

निश्चित तौर पर भारत सरकार ने यह कदम बहुत सोच-समझ कर और तैयारी से लिया है। भारी मात्रा में सैनिक भेेजे गए। ऐसे सख्त कदम तो कारगिल के युद्ध के समय भी नहीं उठाए गए थे। नियंत्रण रेखा पर तीखा जवाब देकर पाकिस्तान को बता दिया गया कि हमारे मामले में दखल की भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। सामरिक संतुलन बदल दिया गया। कहीं न कहीं अमेरिका को भी संदेश है कि आप अफगानिस्तान की वार्ता की सफलता चाहते हो तो हमारी संवेदनाओं का भी ध्यान रखो लेकिन असल संदेश कश्मीर के लोगों के लिए है कि अगर आपने तरक्की करनी है तो सारे देश के साथ मिल कर ही हो सकता है। अगर आपने कोपभवन में रहना है तो देश को आपकी संवेदनशीलता की परवाह करने की जरूरत नहीं। देश ने कश्मीर के लिए बहुत खून बहाया है। नवीनतम घटना पुलवामा की है। इन घटनाओं का देश पर असर हुआ है इसीलिए आज इतनी खुशी है कि देश के शरीर में चुभा एक बड़ा कांटा निकाल दिया गया। आगे चुनौती आएगी। पाकिस्तान तथा उसके समर्थक आग भडक़ाने की कोशिश करेंगे लेकिन जिस तरह यह सारा घटनाक्रम घटा है पूरा विश्वास है कि जिन्होंने इसे इस तरह दोषरहित सम्पन्न किया उन्होंने आगे क्या हो सकता है इसका पूरा आंकलन किया होगा।

फिलहाल में यह दो लोगों के संकल्प और साहस की कहानी है। हमने तो सोचा भी नहीं था कि यह दिन भी देखेंगे। नरेन्द्र मोदी तथा अमित शाह को न केवल बधाई बल्कि धन्यवाद। आपने इतिहास की गलती को सुधार दिया और इतिहास सदैव याद रखेगा कि 5/8/2019 को देश की एकता मज़बूत करने की तरफ साहसी और निर्णायक कदम उठाया गया। जय हो!

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Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.