चाल और चरित्र पर चिंतन चाहिए (BJP Needs To Introspect)

2014 तथा 2019 में हम लोगों ने भाजपा को तीन कारणों से वोट दिया था। (1) नरेन्द्र मोदी (2) तेजी से विकास की आशा तथा (3) राजनीति में शुचिता का वादा। दूसरी मोदी सरकार के छ: महीने पूरे होने पर हम कह सकते हैं कि (1) तो सही चल रहें हैं लेकिन (2) तथा (3) पर सवालिया निशान लग रहा है और चिंता यह है कि कहीं (2) तथा (3) की छाया (1) पर न पड़ जाए और धीमी अर्थ व्यवस्था तथा भाजपा की भटकन नरेन्द्र मोदी की छवि को प्रभावित न कर जाए।
वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में अर्थ व्यवस्था को तगड़ा झटका लगा है और विकास की दर गिर कर 4.5 पहुंच गई है जबकि इसी समय पिछले साल यह 7 प्रतिशत थी। पिछली 26 तिमाहियों में यह सबसे कमज़ोर है। जब विकास की दर गिरती है तो इसका सीधा असर रोजगार पर पड़ता है। नई नौकरियां पैदा होने की जगह उलटा हो रहा है। केवल ओटो उद्योग में ही 350,000 नौकरियां चली गई हैं। बेरोजगारी की दर 45 वर्षों में सबसे अधिक है। सरकार कोशिश तो कर रही है पर मांग नहीं बढ़ रही विशेष तौर पर ग्रामीण क्षेत्र में 8.8 प्रतिशत खर्च की कमी हुई। इसका असर सीधा मैन्यूफैक्चरिंग सैक्टर पर पड़ रहा है जो नकारात्मक दिखा रही है। उपभोक्ता का कम खर्च करने का मतलब है कि लोग भविष्य के प्रति आशंकित हैं।
हाल ही में उद्योगपति राहुल बजाज ने यह कह कर सनसनी फैला दी कि कारप्रेट जगत सरकार से डरता है इसलिए लोग अपनी बात खुली नहीं कहते। राहुल बजाज अपनी बात ग्रहमंत्री अमित शाह तथा वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण की मौजूदगी में कह रहे थे अर्थात एक प्रकार से वह अपनी बात का प्रतिवाद भी कर रहे थे। जहां तक कारप्रेट जगत का सवाल आज से नहीं सदा से ही वह सावधानी से चलता है और किसी भी सरकार के साथ पंगा नहीं लेता। और कारप्रेट जगत भी मासूमों से भरा हुआ नहीं है इनमें से बहुत बैंकों को बड़ा चूना लगा चुके हैं। विजय माल्या इसका चलता-फिरता मौज मनाता उदाहरण है। जब कार्रवाई होती है तो ‘खौफ के माहौल’ की शिकायत करते हैं। लेकिन एक बात सही है कि सरकार की नीतियों के कारण लोगों में सहम है कि यह सरकार आगे न जाने क्या सख्त कदम उठा ले इसीलिए लोग खर्चा करने से घबरा रहें हैं। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी समाज में “गहरे अविश्वास तथा व्यापक भय के जहरीले मेल” का जिक्र किया है। डाक्टर साहिब सियाने हैं उनकी बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि लोग भविष्य को लेकर सहमे क्यों हैं? घर-बार का खर्च चार दशकों में सबसे कमज़ोर है। अब अवश्य एक धुंधली सी आशा की किरण नज़र आई है कि नवम्बर में पहली बार जीएसटी वसूली ने 1 लाख करोड़ रुपए का आंकड़ा पार किया है। यह अच्छा संकेत है लेकिन सबसे जरूरी है कि लोगों को विश्वास दिलाया जाए कि यह सरकार उनके दैनिक जीवन में और खलल नहीं डालेगी। इस माहौल में बैंक, बिसनेस, असफरशाही, आम लोग सब कदम उठाने से घबरा रहे हैं।
दूसरी शिकायत भाजपा की राजनीति से है जो लगातार निराशा करती जा रही और यह अहसास मिलता है कि सत्ता में आने के बाद भाजपा दूसरी कांग्रेस बनती जा रही है। गोवा, कर्नाटक तथा अब महाराष्ट्र में सत्ता में आने के लिए जो समझौते किए गए हैं वह लोगों के अवाक छोड़ गए हैं। भाजपा वह पार्टी है जो नैतिकता की बहुत दुहाई देती रही है लेकिन जैसे

समझौते किए गए उनके बाद तो कहा जा सकता है कि
कथनी और करनी में फरक क्यों है या रब्ब
वो जाते थे मयखाने में कसम खाने के बाद

2014 में नरेन्द्र मोदी ने वादा किया था कि “मैं न खाऊंगा न खाने दूंगा।” निजी ईमानदारी की उनकी अपनी प्रतिष्ठा अक्षुण्ण है पर कर्नाटक तथा महाराष्ट्र के बाद यही उनकी पार्टी के बारे नहीं कहा जा सकता। पार्टी दलबदलुओं को क्यों खिला रही है? कनार्टक में जेडीएस के 17 विधायकों को त्यागपत्र देने के लिए प्रेरित किया गया ताकि येदियुरप्पा की सरकार बन सके। कितना पैसा खर्च किया गया? और यह पैसा आया कहां से? महाराष्ट्र में 70,000 करोड़ रुपए के सिंचाई घोटाले के खलनायक अजीत पवार के साथ मिल कर सरकार बनाने की कोशिश की गई और अगले ही दिन 9 केसों में उसे बरी कर दिया गया। यह कैसा जादू है? ऐसा तो कांग्रेस के समय होता था, फिर बदला क्या? जिस काम में कांग्रेस ने 60 वर्षों में प्रवीणता पाई उसमें भाजपा 6 साल में एक्सपर्ट बन गई?
इससे पहले कई प्रांतों में थोक से उन पार्टियों से दलबदल करवाया गया जिनकी भाजपा आलोचना करती रही है। टीडीपी से सीएम रमेश, टीएमसी से मुकल राय तथा कांग्रेस से हिमंत बिसवास सरमा अब भाजपा की शोभा बढ़ा रहे हैं। झारखंड के चुनाव में भी दूसरी पार्टियों के लोगों को तोड़ कर टिकट दिए गए हैं जिन पर भ्रष्टाचार और यहां तक कि हत्या का आरोप है। एकाध प्रांत में सरकार नहीं बनती तो आफत नहीं आ जाएगी लेकिन भाजपा च् कांग्रेस मुक्तज्भारत के दिव्य स्वप्न में फंस गई है। ऐसा नहीं होगा, महाराष्ट्र ने यह फिर साबित कर दिया। राजस्थान तथा मध्यप्रदेश जैसे बड़े प्रदेशों में भी कांग्रेस की सरकारें हैं। विपक्ष एक लोकतंत्र की जरूरत है इसे शांति और शिष्टता से स्वीकार करना चाहिए।
उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री अवश्य बन गए हैं लेकिन उनके शपथ ग्रहण समारोह से सोनिया गांधी तथा राहुल गांधी अलग रहें हैं। अधिकतर महत्वपूर्ण विभाग एनसीपी को मिले हैं अर्थात पीछे से शरद पवार इस सरकार को चलाएंगे। शायद उद्धव ठाकरे के अपने लाचार होने का अहसास हो रहा है इसलिए फिर हिन्दुत्व की याद आ रही है। इस कथित टाईगर को शीघ्र समझ आ जाएगी कि टाईगर की सवारी कितनी जोखिम भरी होती है इसलिए उनसे कहना चाहंूंगा कि

कभी खुद ज़ोर से अपने ही गिर जाता है ज़ोरावर
मेरे कतिल कहीं तूं अपना ही कातिल न बन जाना

लेकिन उद्धव ठाकरे के भविष्य को लेकर चिंता नहीं चिंता भाजपा और उसकी सरकार के बारे है क्योंकि इस वक्त केवल यह पार्टी ही देश को संभाल सकती है। मुक्तलिफ सांझेदार सही सरकार नहीं दे सकते। दिल्ली में प्रादेशिक पार्टियों का जमघट विनाशक रहेगा। टीवी चैनलों पर भारत का बदलता राजनीतिक नक्शा दिखाया गया है जहां दिसम्बर, 2017 में देश के 71 प्रतिशत हिस्से पर भाजपा का कब्जा था वह नवम्बर, 2019 में घट कर 40 प्रतिशत रह गया है जबकि पार्टी के पास 300 सांसद है। पश्चिम बंगाल में भी भाजपा तीन उप चुनाव जीत नहीं सकी। इनका असर पड़ोसी झारखंड पर पड़ सकता है। बहुत जरूरी है कि भाजपा का नेतृत्व पार्टी की चाल तथा चरित्र पर घोर चिंतन करें। हमें स्ट्रीट स्मार्ट राजनीतिक मशीन नहीं चाहिए, हमें पुरानी संवेदनशील, साफ-सुथरी भाजपा चाहिए। भ्रष्ट नेताओं का दल-बदल करवा क्या मिला? साध्वी प्रज्ञा पर नियंत्रण क्यों नहीं हो रहा? कांग्रेस की तरह प्रादेशिक नेतृत्व की अदनेखी क्यों हो रही है? आम आदमी के लिए भ्रष्टाचार कम क्यों नहीं हुआ? राजनीति सबसे बड़ी बिसनेस बन गई है भाजपा यहां सफाई क्यों नहीं कर सकी? न सोनिया गांधी, न मनमोहन सिंह, न शरद पवार, न ममता बैनर्जी ही देश को नेतृत्व दे सकते हैं। देश को सही दिशा और सही नेतृत्व केवल नरेन्द्र मोदी ही दे सकते हैं। उन्हें लोगों की आवाज़ सुननी चाहिए।
अंत में : कल 6 दिसम्बर है जिस दिन अयोध्या में विवादित ढांचा गिराया गया था। कांग्रेस इसे काला दिन कहती है जबकि शिवसेना के लिए यह शौर्य दिवस है। इस बार दोनों पार्टनर इसे क्या कहेंगे? दिल बहलाने को उद्धवजी ख्याल अच्छा है!

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Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.