एक अकेला इस शहर में Lonely in A Crowd: Sushant’s Suicide

मैं फ़िल्में कम देखता हूँ। सुशांत सिंह राजपूत की पहली फ़िल्म ‘काय पो छे’ देखी थी।  फ़िल्म दिलचस्प थी और सुशांत की अदाकारी प्रभावशाली थी। समझा गया कि बालीवुड को एक और स्टार मिल गया। हैंडसम और प्रतिभाशाली। यह भी संतोष से देखा गया कि महेन्द्र सिंह धोनी की तरह एक छोटे शहर से निकला नौजवान राष्ट्रीय आकाश पर चमका है। एक रियैलिटी शो में भी उसे देखा जहाँ लगा कि उसका दिल इसमें नहीं है। शारीरिक तौर पर वह उपस्थित है पर मानसिक तौर पर कहीं और है। फिर जब घर में फंदा लगा कर उसके आत्म हत्या करने के बारे सुना तो गहरा दुख हुआ। एक सितारा टूट गया। उसके बाद बहुत असुखद विवाद खड़ा हो गया  जो आज तक चल रहा है।  शिकायत की गई कि वह बालीवुड में ‘नैपोटिज़म’ जिसे देसी भाषा में भाई-भतीजावाद कहा जाता है का शिकार हो गया। कंगना रनौट जो ख़ुद छोटे शहर से निकल कर अपनी प्रतिभा के बल पर सफल रहीं हैं, इस मामलों में बहुत मुखर हैं।

भाई-भतीजावाद या गुट बाज़ी या कैम्प तो सदा से फ़िल्म उद्योग में रहें है। कभी दिलीप कुमार- राज कपूर-देवानंद का प्रभुत्व था पर संघर्ष कर राज कुमार, राजेन्द्र कुमार,धर्मेन्द्र, सुनील दत्त और बाद में राजेश खन्ना और  अमिताभ बच्चन ने अपनी जगह बनाई थी। निश्चित तौर पर कई आशावान होंगे जो सफल नही हुए लेकिन किसी के आत्म हत्या करने की ख़बर नही सुनी थी। गुरूदत्त के आत्महत्या करने की ख़बर आई थी पर वह अत्यन्त सफल इंसान थे और परिवार का कहना था कि यह आत्महत्या नही शराबी हालत में अधिक नींद की गोलियाँ खाने का परिणाम था। गुरूदत्त जितने प्रतिभाशाली थे उतने अनियंत्रित भी थे। गुरूदत्त की आयु 39 वर्ष की थी, सुशांत की 34 वर्ष।

फ़िल्म उद्योग में मंगेशकर बहनों की मनौपली की बात भी चली थी। शिकायत थी कि वह किसी और को प्रवेश नही करने देती लेकिन क्या कोई लता मंगेशकर या आशा भोंसले की प्रतिभा पर सवाल उठा सकता है? अगर दूसरी गायिकाएँ उनके बराबर  नही थीं तो यह उनका क़सूर तो नही। सोनू निगम का कहना है कि “म्यूज़िक माफ़िया फ़िल्म माफ़िया से कहीं सख़्त और निर्दयी है”। अरमान मलिक का कहना है कि उन्हें 12 गानों में रिप्लेस किया गया।  ए आर रहमान जैसे प्रसिद्ध संगीतकार का कहना है कि पूरी गैंग उनके पीछे पड़ी हुई है और उन्हें काम नही मिल रहा। लेकिन रहमान की अपनी विशिष्ट जगह है इसलिए डटे हुए हैं पर सुशांत जैसे असुरक्षित टूट जातें है। सुशांत को भी कुछ फ़िल्मों से हटा दिया गया, ऐसी चर्चा है। कई उद्योगों का तरह बालीवुड भी कैम्पों में काम करता है। अगर आप किसी कैम्प में नही तो लावारिस अपने हाल पर छोड़ दिए जाते हो। निर्देशक अनुराग कश्यप जैसे लोग भी है जिन्होंने ने अपनी प्रतिभा के बल पर जगह बनाई है लेकिन बहुत निराश हो जातें हैं जिनका ‘कनेक्शन’ या गॉडफ़ादर नही होता। कईयों को धमकी दी जाती ‘तुम्हें तोड़ दिया जाएगा’, ऐसी चर्चा है। बालीवुड के सत्ताधीश निर्मम हो सकते हैं पर यह आत्महत्या का कारण तो नही होना चाहिए।

असली बात है कि ज़िन्दगी पहले से अधिक जटिल और तनावपूर्ण बन चुकी है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने इसे और चुनौतीपूर्ण बना दिया है। बहुत नफ़रत फैलाई जाती है। ड्रग की समस्या भी आजकल है। ऐसी स्थिति में जो अपनो से दूर रहतें हैं वह चकरा जाते हैं। असफलता  को झेल नही सकते और समझतें हैं कि किस मुँह से वापिस जाऐंगे? एक स्टार के लिए मिले धक्के से समझौता करना तो और भी मुश्किल होगा। पुरानी फ़िल्म घरौंदा का गुलज़ार द्वारा लिखित गाना याद आता है, ‘एक अकेला इस शहर में’ जिसकी यह पंक्ति  भी हैं,

जीने की वजह तो कोई नही, मरने का बहाना ढूँढता हूँ

गाने में ‘अजनबी से शहर’ और उन सड़कों का ज़िक्र है जिन्हें ‘मंज़िल पे पहुँचते देखा नही’। क्या यही कारण था सुशांत सिंह की आत्महत्या का कि वह समझने लगे थे कि वह मंज़िल तक नही पहुँचेंगे? और मुम्बई जैसे महानगर मे ख़ुद को ‘एक अकेला’ पा रहे थे?  सुशांत सिंह की आत्महत्या के बाद परेशान हो कर लगभग एक दर्जन युवाओं ने आत्महत्या कर ली। छत्तीसगढ़ में एक 13 वर्ष की लड़की ने आत्महत्या कर ली और लिख कर छोड़ गई कि वह सुशांत सिंह की आत्महत्या से दुखी है। 13 वर्ष की आयु क्या होती है फिर भी इतना गम? दक्षिण भारत की अभिनेत्री विजयलक्षमी ने भी मानसिक तनाव के कारण ख़ुदकुशी का प्रयास किया ग़नीमत है कि वह बचा ली गई। एक सर्वेक्षण के अनुसार कोरोना के कारण देश में आत्महत्या के रुझान  में 35 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। नौकरी चले जाने, व्यापार में घाटा, घर में बंद रहने, अनिश्चित भविष्य के कारण कई लोग पलायन का यह रास्ता अपना लेते है और परिवार जनों के लिए मुसीबतों का ढेर छोड़ जाते हैं।

देश में आज जो माहौल है वह आशा का संचार नही करता जिसके कारण एक वर्ग में घबराहट, हताशा, उदासी, बेदिली, विषाद भर रहा है। भविष्य आशाहीन लगता है। दिल्ली के एक अफ़सर ने इसलिए आत्महत्या कर ली कि वह संक्रमण परिवार को न दे दे। वह अफ़सर नैगेटिव पाया गया। डब्ल्यू एच ओ ने भी सरकारों से कहा है कि वह लोगों की मानसिक सेहत की तरफ़ ध्यान दें। अंतराष्ट्रीय हैल्थ मैगज़ीन लैंसट के अनुसार भारत में मानसिक विकार बहुत बड़ी समस्या है। 2017 में 19 करोड़ भारतीय पीड़ित थे कोरोना ने यह संख्या बढ़ा दी है लेकिन इस तरफ़ पर्याप्त ध्यान नही दिया जा रहा। मोबाईल की घंटी के साथ कोरोना की जो लम्बी चेतावनी दी जाती है उस से भी दहशत बढ़ रही है। लोग समझ गए है कि क्या समस्या है, बार बार डराने की ज़रूरत नही।

दीपिका पादुकोण जैसी सफल अभिनेत्री ने माना कि 2014 में वह डिप्रेशन का शिकार हो गई थी। सार्वजनिक तौर पर दीपिका का कहना था, “आम राय थी कि मैं व्यवसायिक उंच्चाईयों को छू रही हूं लेकिन अन्दर से मैं खोखलापन महसूस कर रही थी… मैं अचानक रो पड़ती थी”। इस बहादुर लड़की ने अपनी समस्या दुनिया के सामने रख दी और बहुतों को अपनी अपनी मानसिक समस्या का सामना करने की हिम्मत भी दी। काश! ऐसी हिम्मत सुशांत  ने दिखाई होती। काश! उसने महेन्द्र सिंह धोनी की ज़िन्दगी से कुछ सीखा होता जिनका किरदार उसने सफलता पूर्ण निभाया था। धोनी को भी बराबर चुनौती मिली थी पर आज वह उस स्थिति में हैं कि वह फ़ैसला करेंगे कि वह कब क्रिकेट से रिटायर होंगे। किसी और में उन्हें रिटायर करने का दम नही।

पर अधिकतर लोग समाजिक तमाशा बनाने से घबराते हैं। ‘लोग क्या कहेंगे’ यहाँ बहुत बड़ी समस्या है इसलिए कई अन्दर ही अन्दर घुटते रहतें हैं। हमारे संदर्भ में एक और बड़ी समस्या है। गिरती अर्थ व्यवस्था ने बहुत से सपने चूर कर दिए हैं। दस साल पहले अलग स्थिति थी प्रभाव था कि सपने पूरे हो सकते है लेकिन अचानक यह प्रभाव फैल रहा है कि मौक़े ख़त्म हो रहे हैं। सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या पर इतनी जो प्रतिक्रिया हुई है इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि बहुत लोग उसके नैराश्य को महसूस करते हैं। वह समझते हैं कि अरमानों का गला घोटा जा रहा है।  जिन सैक्टरों मे पहले जगह मिलती थी, ट्रैवेल, एंटरटेनमेंट, हास्पिटैलिटी, सर्विस आदि में प्रतिभाशाली युवाओं के लिए दरवाज़े बंद होने लगें हैं। फ़िल्म और टीवी उद्योग भी लगभग बद हैं। निर्मलाजी को अर्थ व्यवस्था में कहीं कहीं हरियाली नज़र आ रही है पर इस वक़्त तोहर कम्पनी छटनी कर रही है। जब तक यह स्थिति नही बदलती उदासी और अनिश्चितता का माहौल बदलेगा नही जबकि देश के भविष्य के लिए आशा का बना रहना जरूरी है।

सुशांत की आत्महत्या कई और असुखद सवाल भी छोड़ गई है। क्या कोई नही था जिससे वह बात कर सकता, अपनी बेचैनी के बारे साँझा कर सकता? कोई नही था जो उसकी समस्या को समझता और उसे यह क़दम उठाने से रोकता? सुशांत अन्दर ही अन्दर घुलता रहा उसने दीपिका वाला रास्ता क्यों नही अपनाया? परिवार या मित्रों का सहारा क्यों नही लिया? इतना अकेलापन क्यों था ? उसके ‘पवित्र रिशते’ कहाँ थे? निदा फ़ाज़ली ने लिखा है,

                      यह क्या अजाब है सब अपने आप में गुम हैं

                       ज़बां मिली है मगर हम-ज़बां नही मिलता

यही हाल महानगरों की ज़िन्दगी का है भीड़ में भी इंसान अकेला है।  पारिवारिक तथा समाजिक कवच जों इंसान को सुरक्षा देता था वह कमज़ोर पड़ गया है। सहारा या सही सलाह देने वाले कम हो गए। अकेलापन न्यू नार्मल हो गया।  दो साल पहले इंग्लैंड में ‘मिनिस्टरी ऑफ लोनलीनैस’ अर्थात ‘अकेलेपन का मंत्रालय’ बनाया गया। जो मंत्री बनाई गईं उनका कहना था कि उनका समाज टूट रहा है, “हमारी संस्कृति यह बनती जा रही है कि हमें अपने में ही रहने को प्रोत्साहित किया जाता है। अपनी कमज़ोरी बताने से रोका जाता है”। हमारे समाज का भी यही हाल है पर यहाँ  इस समस्या के प्रति वह संवेदनशीलता नही है। मुहल्ला, गली, गाँव की संस्कृति बदल रही है। अपनापन कमज़ोर हो रहा है और ज़िन्दगी की आपाधापी मे कई टूट जातें हैं, कई छूट जाते है। अकेलापन उन्हें निगल जाता है।

मगर इस स्थिति से लड़ना है यह समझते हुए कि सबके सपने पूरे नही होते। इसे स्वीकार करना चाहिए,जैसे कहा गया कि ‘किसी को ज़मीन नही मिलती तो किसी को आसमान नही मिलता’।  हताशा में अंतिम क़दम उठाना कोई समाधान नही। समझना चाहिए कि यह काला काल भी गुज़र जाऐगा।  वह सुबह कभी तो आएगी ! उसकी तैयारी करनी चाहिए। फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की यह ख़ूबसूरत पंक्तियाँ याद आती हैं,

                      दिल ना उम्मीद तो नही नाकाम ही तो है,

                      लम्बी है ग़म की शाम, मगर शाम ही तो है !

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Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.