बसंलजी, हमें रूम फ्रैशनर की अनुभूति कब होगी?
पवन बंसल से पहले रेल विभाग लालू प्रसाद यादव, राम बिलास पासवान, नीतीश कुमार तथा ममता बनर्जी या उनकी पार्टी के प्रतिनिधि रेलमंत्री रहे हैं। इस दौरान दो कमजोरियां रही हैं। एक, केवल पूर्व भारत का ख्याल रखा गया। दूसरा, इन सब का ध्यान सस्ती लोकप्रियता बढ़ाने में था रेल की आर्थिकता सही करने में नहीं। पिछले 10 वर्ष रेल का किराया नहीं बढ़ाया गया। रेल को आधुनिक तथा सुरक्षित बनाने तथा लोगों तथा उद्योग की जरूरत के अनुसार तैयार करने का प्रयास नहीं किया गया। कई पुल है जो अंग्रेजों के समय के हैं। मुंबई-दिल्ली मुख्य रेलमार्ग पर रतलाम के पास भैरोगढ़ का पुल 120 वर्ष पुराना है। इसे 2003-04 में असुरक्षित घोषित किया गया था लेकिन आज भी रोजाना 50 गाडिय़ां इस पर से गुजरती हैं। रेल विभाग क्यों हादसे की इंतजार में है? ऐसे और कितने पुल हैं? स्पष्ट है कि जहां इतना विशाल नैटवर्क हो वहां कमजोर आर्थिक स्थिति तबाही मचा सकती है। पवन बंसल के लिए समस्या है कि जिस वक्त उन्हें यह विभाग सौंपा गया है उसकी आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है। देश भी जो कभी 9 प्रतिशत वार्षिक की दर से तरक्की कर रहा था वह भी गिर कर 5 प्रतिशत की दर पर है। साधन इकट्ठे करना और मुश्किल हो गया है। बंसल के पास समय भी कम है। अगर रेलों को सही करना है तो पैसे का प्रबंध तो करना ही होगा। इतने बड़े रेल नैटवर्क को राम भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। लोग भी अधिक किराया देने के लिए तैयार हैं अगर साथ में सुविधाएं भी बेहतर की जाएं। अगर केवल किराए या भाड़ा ही बढ़ाया गया और रेल कार्यप्रणाली में गुणात्मक परिवर्तन नजर नहीं आया तो लोग बिगड़ जाएंगे।
दुनिया में कहीं भी इतनी दुर्घटनाएं नहीं होती जितनी यहां होती हैं। विदेशों में रेल दुर्घटना हो जाए तो तूफान मच उठता है। यहां इन्हें सामान्य समझा जाता है। ऐसे उपकरण उपलब्ध हैं जिनसे रेल दुर्घटनाएं रोकी जा सकती हैं। इनकी तत्काल जरूरत है। हजारों किलोमीटर ट्रैक बदलने वाला है। पुराने ट्रैक पर नई गाडिय़ां चलाना बुद्धिमत्ता नहीं है। इसके लिए नई गाड़ियां चाहिए जिसके लिए नए ट्रैक चाहिए, नया स्टाफ चाहिए। यात्रा अधिक आरामदायक बनाने की जरूरत है। टॉयलेट गंदे हैं। जिन्हें वीआईपी गाड़ियां कहा जाता है, राजधानी तथा शताब्दी, उनकी भी उपेक्षा के कारण हालत खस्ता हो रही है। नए एस्कलेटर लगाने की घोषणा की गई जबकि कई स्टेशन पर पुराने लगे बंद हैं। हवाई जहाजों की तरह रईसों के लिए महंगे अनुभूति डिब्बे चलाए जाएंगे। कई स्टेशनों पर लाऊंज भी बनेंगे जहां तीन घंटे बैठने के 300 रुपए लिए जाएंगे। यह गलत दिशा है। जरूरत आम आदमी के सफर को बेहतर करने की है।
चीन ने रेल यात्रा को रफ्तार देते हुए दुनिया में सबसे लम्बी हाई-स्पीड रेल लाईन को ट्रेनों के लिए खोल दिया है। 20 घंटे का राजधानी बीजिंग से दक्षिणी शहर ग्वांगझू का सफर लगभग 300 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से अब 8 घंटे में पूरा होगा। हमारी कथित वीआईपी गाड़ी भी 90 किलोमीटर प्रति घंटे तक ही सफर करती है। चीन अपनी इस हाई-स्पीड तकनीक को भारत को देना चाहता है हमारा रेल विभाग भी इसका इच्छुक है। रेलवे ने यहां बुलेट ट्रेन के लिए सात मार्गों का चयन भी किया है। दिशा और विचार सही है लेकिन इस वक्त जबकि कुप्रशासन के कारण रेल का भट्टा बैठा हुआ है ऐसी छलांग लगाने के बारे सोचना भी नहीं चाहिए। रेलमंत्री ने माना है कि रेलवे की घोषित योजनाओं पर अमल आधी सदी में भी मुश्किल है। इस आधी सदी के लिए सैम पिट्रोदा विशेषज्ञ ग्रुप का अनुमान है रेल विभाग को 560,000 करोड़ रुपए चाहिए। यह कहां से आएगा? इसीलिए इस वक्त बुलेट ट्रेन जैसी चमचमाती योजनाओं को लागू करने की जगह सबसे पहले रेल की आर्थिकता बेहतर करने की जरूरत है। लोग साफ-सुथरा सुरक्षित सफर चाहते हैं। ट्रेनों में अत्यधिक भीड़ है। मैं जालन्धर से दिल्ली सफर करता हूं। शताब्दी का टिकट लेने के लिए एक महीना पहले बुकिंग करवाना पड़ता है। अगर इस रूट पर एक और शताब्दी भी चलाई जाए तो भी भरी जाएंगी लेकिन इस तरफ ध्यान ही नहीं दिया गया।
एक और तरफ ध्यान देने की जरूरत है जिस पर अधिक पैसा भी खर्च नहीं होता, वह है ट्रेनों की सफाई तथा स्टेशनों का रख रखाव। जयराम रमेश का कहना है कि भारतीय रेल दुनिया का सबसे बड़ा खुला शौचालय है। मंत्री शौचालय को लेकर काफी मुखर हैं जिससे उनका मजाक भी बन रहा है कि वह शौचालय पर केंद्रित है पर वह इस तरफ ध्यान दिला कर बड़ी राष्ट्रीय सेवा कर रहे हैं। हमारा देश वास्तव में गंदा है। हमारी ‘सिविक सैंस’ अर्थात् अच्छे नागरिक की तरह रहने की भावना, बहुत कमजोर है, इसीलिए हमारे शहर इतने गंदे और अव्यवस्थित हैं। इसी कारण हमारी गाड़ियां भी और हमारे स्टेशन भी बेहद गंदे हैं। वास्तव में किसी भी शहर में सबसे गंदी और बदबू भरी जगह रेलवे स्टेशन है। प्रवेश करते ही स्वागत करती भड़ास के कारण नाक बंद करने को दिल चाहता है। रेलमंत्री का कहना है कि रेलगाड़ियों में बायोटायलेट तथा रेलवे स्टेशनों पर ग्रीन टायलेट बनाने की योजना है। मालूम नहीं यह योजना कब शुरू होगी कब नहीं; पर आजकल तो जालन्धर स्टेशन पर नवजात बच्चे जैसे मोटे-मोटे चूहे रेस लगाते नजर आते हैं।
दिल्ली में सफलतापूर्वक मैट्रो चला कर हमने सिद्ध कर दिया है कि सरकारी सेवा भी साफ-सुथरी और कार्यकुशल हो सकती है। पहले दिन से सही संस्कृति की नींव डाल दी गई। क्या समय नहीं आ गया कि रेल यातायात का भी कायाकल्प किया जाए और इसे केवल रोजगार देने वाली मशीन ही नहीं समझा जाए? नई दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे का टर्मिनल-3 विश्व के किसी भी बढिय़ा और व्यस्त हवाई अड्डे से टक्कर ले सकता है पर दूसरी तरफ नई दिल्ली का रेलवे स्टेशन लावारिस है। हवाई अड्डे के लिए कई फ्लाईओवर हैं पर पहाडग़ंज की तरफ से नई दिल्ली रेलवे स्टेशन तक पहुंचना ही किसी जोखिम से कम नहीं है। यहां फ्लाईओवर क्यों नहीं बन सकता? रेलवे स्टेशनों को हवाई अड्डों जैसी ऊंची छत क्यों नहीं दी जा सकती? साफ-सुथरे टायलेट तथा खाने की अच्छी जगह का क्यों प्रबंध नहीं हो सकता? रेल विभाग के बारे मानसिकता क्यों नहीं बदली जाती, इसलिए कि न नेता और न ही अफसर रेल से यात्रा करते हैं? न्यूयार्क के सैंट्रल रेलवे स्टेशन को टाईम्स स्कवेयर के बाद पर्यटकों की सबसे लोकप्रिय जगह माना गया है, लेकिन हमारे स्टेशन तो अपनी गंदगी के बारे कहते नजर आते हैं कि यात्रीगण कृपया इधर ध्यान मत दीजिए! कहते हैं कि जब रेल मंत्री बनने के बाद पवन बंसल ने दिल्ली-चंडीगढ़ शताब्दी पर सफर किया तो सारी गाड़ी में रूम फ्रैशनर का छिडक़ाव किया गया। हम तो सिटी ब्यूटीफुल के रहने वाले नहीं इसलिए हमारी किस्मत में रूम फ्रैशनर और लाऊंज नही हैं पर जहन में यह सवाल जरूर उठता है कि साफ -सुथरी सुरक्षित रेल यात्रा की ‘अनुभूति’ आम यात्री को कब होगी? जो पहले से बिगड़ हुए हैं उन्हें ही खुश क्यों किया जा रहा है? और मेरा तो देश के रेलमंत्री से सवाल है कि मुझे जरूरत पड़ने पर ‘तत्काल’ शताब्दी के टिकट का प्रबंध कब होगा?