यह गुस्ताखी माफ करने लायक नहीं

यह गुस्ताखी माफ करने लायक नहीं

पाकिस्तान की संसद ने एक प्रस्ताव पारित कर अफजल गुरू को फांसी दिए जाने की निंदा की है और उसके शव को उसके परिवारजनों को सौंपने की मांग भी की है। न केवल भारत के आंतरिक मामले में दखल देने वाले बल्कि एक प्रकार से हमें चिढ़ाने वाले इस प्रस्ताव में कश्मीरी अलगाववादियों को हर तरह से समर्थन देने का वायदा भी किया गया। यह आतंकी संगठनों को सिग्नल भी है कि बढ़े चलो, हम तुम्हारे साथ हैं! पाकिस्तान के राजनीतिक वर्ग ने आतंकवाद पर अपनी मोहर लगा दी है। हमारी संसद पर हमले को सही करार दिया। यह प्रस्ताव जयपुर में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ की हमारे विदेशमंत्री सलमान खुर्शीद द्वारा आवभगत के पांचवे दिन आया। चौथे दिन श्रीनगर में बेमाना में सीआरपीएफ पर फिदाईन हमला हुआ जिसमें 5 जवान मारे गए। यह भी उल्लेखनीय है कि यह प्रस्ताव उनके राजनीतिक वर्ग द्वारा जारी करवाया गया इसके लिए उनकी सेना या आईएसआई को जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता। पाकिस्तान की संसद ने अजमल कसाब जो उनका नागरिक था की फांसी पर कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया। अफजल गुरू के शव की उन्हें चिंता है पर अजमल कसाब के शव को तो उन्होंने लेने से ही इंकार कर दिया। न ही पाकिस्तान की संसद ने उनके एबटाबाद में अमेरिकी कार्रवाई में मारे गए ओसामा बिन लादेन के बारे ऐसा कोई प्रस्ताव पारित किया। लादेन को तो समुद्र में दफना दिया गया। उसका शव उसके परिवारजनों को सौंपने का कोई प्रस्ताव पाकिस्तान में पारित नहीं किया गया। इसका कारण साफ है। अमेरिका से झगड़ा लेने की जुर्रत नहीं है जबकि हमें गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं।

गंभीरता से ले भी क्यों? भारत सरकार की पहली प्रतिक्रिया बेहद कमजोर थी। हमारे गृहमंत्री ने जो बयान दिया है उससे तो लगता है कि वह फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं कि कहीं पाकिस्तान खफा न हो जाए। एक तरफ तो कहा कि श्रीनगर में मारे गए दोनों आतंकवादी विदेशी थे और उनसे मिली डायरी में पाकिस्तानी नम्बर लिखे थे फिर कह दिया कि ‘मैंने केवल यह कहा था कि आतंकवादी विदेशी हैं, यह नहीं कहा कि वे पाकिस्तानी हैं।’ पुराने श्रीनगर से एक पाकिस्तानी पकड़ा भी गया जो बेमाना पर हमला करने वाले गिरोह का सदस्य था पर फिर भी गृहमंत्री पाकिस्तान का खुला नाम लेने से कांपते हैं। जहां गृहमंत्री इतने कमजोर और कंफ्यूज्ड हों वहां कौन हमें गंभीरता से लेगा? उनका अवश्य कहना था कि सरकार ने चूड़ियां नहीं पहन रखी हैं। यह टिप्पणी फिल्मी के अतिरिक्त क्या है? जिस तरह केवल लाठी पकड़े जवान फिदाईन हमले में मारे गए उससे इसके अतिरिक्त क्या संदेश मिलता है कि वास्तव में इस सरकार ने चूड़ियां पहन रखी हैं? बाद में जनता, विपक्ष तथा मीडिया की प्रतिक्रिया के बाद सरकार ने कुछ कड़ा रवैया बनाया। हमारी संसद ने उनकी संसद के प्रस्ताव की निंदा की और उनकी हाकी टीम का दौरा रद्द कर दिया लेकिन सवाल तो है कि वह देश जो एक असफल राष्ट्र है, जिसके सेनाध्यक्ष ने अपने राष्ट्रपति से मिल कर सावधान किया कि स्थिति हाथ से फिसल रही है, तत्काल कदम उठाए जाएं, कि ऐसे दुश्मनी वाले प्रस्ताव पारित करने की हिम्मत कैसे हुई?

अफजल गुरू और उससे पहले अजमल कसाब को फांसी के बाद से मालूम था कि वादी में स्थिति खराब हो सकती है। न केवल लश्करे तोयबा बल्कि अल कायदा भी धमकी दे रहा था। सरकार के अपने पास इसके ढेरों संकेत थे फिर जवानों को स्थिति से निबटने के लिए उचित हथियार क्यों नहीं दिए गए? हमारे नादान गृहमंत्री का कहना है कि कई बार समस्या लाठी से सुलझाई जा सकती है। उनके अनुसार कश्मीर में शांति बहाली और प्रक्रिया चल रही है सरकार बंदूक दिखा कर काम नहीं करना चाहती। शिंदेजी, बंदूक अपने लोगों के खिलाफ नहीं पाकिस्तान से भेजे जा रहे आतंकवादियों के खिलाफ चाहिए। एके 47 का मुकाबला लाठी से नहीं हो सकता। पहली बार है कि वहां सीआरपीएफ के जवानों ने उन्हें गोलियों का सामना करने के लिए इस तरह निहत्थे छोड़ देने का खुला विरोध किया है। अगर शिंदे समझते हैं कि समस्या लाठी से ही सुलझाई जा सकती है तो वे कश्मीर का केवल लाठी के साथ दौरा कर तो दिखाएं? दिल्ली में सुरक्षित बैठे ऐसे फिजूल भाषण देना बहुत आसान है। उमर अब्दुल्ला जो खुद सुरक्षा कर्मियों से घिरे जैमर गाड़ी के साथ ही घूमते हैं भी मांग कर रहे हैं कि विशेष सशस्त्र सेना कानून (अफस्पा) वापिस लिया जाए। पहले वे भी लाठियों के पहरे में श्रीनगर में घूम कर दिखाएं? जिस दिन उमर यह कर दिखाएं उस दिन यह कानून वापिस ले लेना चाहिए।

2 मार्च को जो दो जवान हंडवाड़ा में मारे गए थे उनके पास भी हथियार नहीं थे। हर जवान की जान बहुमूल्य है। कश्मीर में ऐसी लापरवाही अस्वीकार्य है। उमर अब्दुल्ला भी अपने दादा तथा पिता के रास्ते पर चलते नजर आ रहे हैं। हर उचित या अनुचित तरीके से वे अपने लोगों की उग्र राय को संतुष्ट रखने का प्रयास कर रहे हैं।

अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में इज्ज़त मिलती नहीं अर्जित करनी पड़ती है। हाल ही में इटली हमारा तमाशा बना कर हटा है। दो भारतीयों की हत्या के दोषी उसके नौसैनिकों को पहले क्रिसमस मनाने के लिए और फिर वोट डालने के लिए स्वदेश जाने की इजाजत क्यों दी गई? उन पर दो भारतीय नागरिकों की हत्या का गंभीर आरोप है। क्या सरकार अपने कैदियों को दीवाली, या ईद, या गुरपूरब या क्रिसमस मनाने या चुनाव में वोट डालने की इस तरह इजाजत देने को तैयार है? अब शोर मचाया जा रहा है कि हमसे धोखा हो गया। नादानी तो आपकी है। इस बंगलिंग के लिए कौन जिम्मेवार है? क्या विदेशमंत्री जिम्मेवारी लेंगे कि उन्होंने देश का अपमान करवाया है? प्रधानमंत्री ने कहा है कि इटली की हरकत के गंभीर परिणाम निकलेंगे। देखते हैं। चाहे इटली हो या पाकिस्तान, या नन्हा मालदीव सब समझते हैं कि ‘न खंजर उठेंगे न तलवार इनसे, ये बाजू हमारे आजमाए हुए हैं!’ पाकिस्तान कुछ भी उत्तेजना दे, हमारे जवानों के सर कलम कर ले जाए हम तो उनके प्रधानमंत्री को जयपुर के शानदार रामबाग पैलेस में बिरयानी जरूर खिलाएंगे। आखिर मेहमान-नवाजी का तकाजा है! हमारी सरकार से अधिक दम तो अजमेर शरीफ के दीवान ने दिखाया जिन्होंने पाकिस्तान की हरकतों को देखते हुए राजा परवेज अशरफ का स्वागत करने से इंकार कर दिया। लेकिन भारत सरकार कागजी गोले दागती जाएगी। वे कश्मीर के हालात की बात करते हैं हम उन्हें ब्लूचिस्तान के हालात की याद नहीं करवाएंगे। हम उन्हें नहीं बताएंगे कि किस तरह कराची और दूसरे शहरों में शिया मुसलमानों का कत्लेआम हो रहा है। प्रधानमंत्री की पाकिस्तान नीति के चिथड़े उड़ गए हैं। अमृतसर में ब्रेकफास्ट, लाहौर में लंच और काबुल में डिनर की उनकी तमन्ना, कल्पना ही रहेगी। अटलजी के भी हाथ झुलस गए थे, मनमोहन सिंह के भी झुलस गए हैं। मनमोहन सिंह की आर्थिक नीति के बाद उनकी विदेश नीति भी असफल हो गई है। जब तक उनका यह प्रस्ताव रहेगा पाकिस्तान के साथ सामान्य रिश्ता नहीं हो सकता। देश में इंदिरा गांधी जैसे सशक्त नेतृत्व की जरूरत है। उनके आगे तो जिया उल हक भी मैडम, मैडम करते नहीं थकते थे।

-चन्द्रमोहन

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Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.