‘गांधी-थकावट’ से पीड़ित है यह देश

 ‘गांधी-थकावट’ से पीड़ित है यह देश

कांग्रेस पार्टी अधिकृत तौर पर इस बात का सख्ती से प्रतिवाद कर चुकी है लेकिन कांग्रेस के अंदर से यह आवाज़ उठनी बंद नहीं हो रही कि प्रियंका गांधी वाड्रा को राजनीति के मैदान में उतारा जाए।  इस मांग से दो तीन बीतें निकल रही हैं। एक कि ज़मीनी स्तर पर कांग्रेस के नेता तथा कार्यकर्ता पार्टी की हालत के बारे चिंतित हैं। उन्हें सत्ता की आदत पड़ गई है अब घबराहट है कि यह हाथ से निकल न जाए। दूसरा, वह ‘भईया’ के नेतृत्व से असंतुष्ट हैं। समझ गए हैं कि वे ‘भार’ उठाने में सफल नहीं रहे। राहुल मेहनत बहुत कर रहे हैं देश भर के चक्कर लगा रहे हैं लेकिन कहीं लोगों से रिश्ता कायम नहीं हुआ। मिसाल के तौर पर दलितों के उद्धार के लिए उन्होंने ‘जुपिटर विलैसिटी’ का जो उदाहरण दिया है वह तो मुझे समझने में काफी समय लगा था। तीसरा, ऐसी संकट की स्थिति में कांग्रेसजन को गांधी परिवार से बाहर कोई नज़र नहीं आता। ऐसी दास मानसिकता है कि 81 वर्षीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी कह चुके हैं कि वे राहुल के नीचे काम करने को तैयार हैं।

पुरानी बात है। लालकृष्ण आडवाणी ने भी मुझे एक बार बताया था कि प्रियंका एक चुनाव जीत सकती हैं। इसमें शक नहीं कि प्रियंका वाड्रा का आकर्षण है। कईयों को उनमें दूसरी इंदिरा गांधी नज़र आती है, लेकिन उन्हें राजनीति में पूरा नहीं उतारा जाएगा। इसका एक कारण तो यह है कि प्रियंका के उतारने का मतलब होगा कि सोनिया गांधी ने यह स्वीकार कर लिया कि राहुल का सिक्का नहीं चल रहा। सोनिया गांधी यह कभी मानने को तैयार नहीं होंगी। न ही प्रियंका ही तैयार होंगी। परिवार समझ बैठा है कि राहुल अभी जवान है इस बार नहीं तो अगली बार उन्हें मौका मिल जाएगा। परिवार सत्ता के दो केंद्र बिल्कुल स्वीकार नहीं करेगा। एक घबराहट और है। यह है प्रियंका के पति राबर्ट वाड्रा के ज़मीनी कारनामे। अगर प्रियंका को मोदी के सामने खड़ा किया गया तो यह सारा पिटारा खुल जाएगा। पहले ही नरेंद्र मोदी ‘दामादजी की सरकार’ का ज़िक्र कर चुके हैं। यह भी अहसास है कि जरूरी नहीं कि प्रियंका का सिक्का चल जाए। आखिर उनके प्रचार के बावजूद विधानसभा चुनावों में रायबेरली तथा अमेठी की 10 सीटों में से कांग्रेस केवल दो ही जीत सकी। इस वक्त जबकि देश में सत्ता विरोधी जबरदस्त रूझान है नेतृत्व प्रियंका को मैदान में उतारने का जोखिम नहीं लेगा। यह मुट्ठी बंद रखी जाएगी।

इस एक परिवार पर इस बड़ी कांग्रेस पार्टी की निर्भरता तो अब दयनीय बनती जा रही है। परिवार का नाम तथा इनकी दो कुबार्नियों के अतिरिक्त देश को बताने के लिए कांग्रेस के पास अधिक कुछ नहीं। अब फिर सरकार खाद्य सुरक्षा कानून के अधीन योजना का नाम ‘इंदिराअम्मा  अन्न योजना’ रखने की तैयारी में है। इस संदर्भ में कांग्रेस के प्रवक्ता दो तर्क देते हैं। एक, उनका कहना है कि ‘गरीबी हटाओ’ का नारा इंदिरा गांधी के नाम से जुड़ा है इसलिए यह योजना उनके नाम से जुड़नी चाहिए। यह नारा इंदिरा गांधी ने 1971 का चुनाव जीतने के लिए लगाया था। लेकिन ये महापुरुष यह बताने के लिए तैयार नहीं कि 42 वर्ष के बाद भी अगर गरीबी नहीं खत्म हुई तो जिम्मेवारी किस की है? अगर आज भी लगभग 70 प्रतिशत ग्रामीण जनसंख्या गरीब है कि उन्हें सस्ता अनाज दिया जाना है, तो जिम्मेवारी तो निश्चित तौर पर उन लोगों की है जो इंदिरा गांधी का नाम लेकर बार-बार सत्ता में आते रहे हैं। दूसरा तर्क यह दिया जा रहा है कि इंदिरा गांधी ने देश के लिए कुर्बानी दी इसलिए उन्हें याद करने के लिए उनके नाम पर योजना रखी जाएगी। राजीव गांधी के नाम पर रखी गई सरकारी योजनाओं के बारे भी यही तर्क दिया जा रहा है। यह बात तो सही है कि दोनों देश के लिए शहीद हुए थे लेकिन इस ‘कुर्बानी’ को कितना सम्मानित किया जाना है? लगभग 50 प्रतिशत केंद्रीय योजनाएं (58 में से 27) इसी परिवार के सदस्यों के नाम पर हैं। 16 राजीव गांधी के नाम, 8 इंदिरा गांधी के नाम तथा 3 जवाहरलाल नेहरू के नाम। जो भी योजनाएं आम आदमी की जिंदगी को छूती हैं, कई सौ शिक्षा संस्थाए, हवाई अड्डे, लगभग सभी 50 खेल अवार्ड, 20 स्टेडियम, कई सौ सड़कें, चौराहे, 50 प्रादेशिक योजनाएं, जवाहरलाल नेहरू इंदिरा गांधी या राजीव गांधी के नाम पर रखी गई हैं। अनुमान है कि कुल 450 केंद्रीय तथा प्रादेशिक योजनाएं जिन पर अरबों रुपए खर्च हो रहा है कांग्रेस के इन तीन आईकॉन के नाम पर रखी गई हैं। क्या बाकी नेताओं ने देश के लिए योगदान नहीं डाला? महात्मा गांधी? सरदार पटेल? सुभाष चंद्र बोस? भगत सिंह? बाबा साहिब अम्बेदकर? बाबू राजेंद्र प्रसाद? लाल बहादुर शास्त्री ऐसे अनगिनत नेताओं को याद करने की जरूरत नहीं है?

महात्मा गांधी से बड़ा तो कोई आधुनिक भारतीय नहीं कहा जा सकता। उनके नाम पर भी केवल 4 सरकारी योजनाएं हैं। यही स्थिति अम्बेदकर की है। सुभाष बोस, सरदार पटेल, भगत सिंह, श्यामा प्रसाद मुखर्जी को भुला दिया गया क्योंकि उन लोगों की विचारधारा ने जवाहरलाल नेहरू की विचारधारा से टक्कर ली थी और यह परिवार विरोध को कभी माफ नहीं करता। पी.वी. नरसिम्हाराव का हश्र सामने है। सरदार पटेल ने तो देश के लिए प्रधानमंत्री पद की कुर्बानी दे दी थी, लेकिन इन्हें सम्मान नहीं दिया जाएगा क्योंकि पटेल नेहरू के बराबर की शख्सियत थे। हरित क्रांति लाल बहादुर शास्त्री के समय शुरू हुई। उन्हें भी इसकी कभी मान्यता नहीं दी गई। प्रवृत्ति यह है कि जो सही है या अच्छा है वह तो परिवार के नाम बाकी बदनामी सहने के लिए नरसिम्हा राव या मनमोहन सिंह! लेकिन ऐसा कब तक चलेगा? कितनी और परियोजनाएं और संस्थाएं जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी या राजीव गांधी के नाम पर रखी जाएंगी? मैं मानता हूं कि कश्मीर तथा चीन के बारे गलतियों के बावजूद जवाहरलालजी देश के सबसे महान् प्रधानमंत्री थे। उन्होंने विभाजन की त्रासदी से देश को उबारा तथा भविष्य की नींव रखी। इंदिरा गांधी ने दमदार नेतृत्व दिया। पर इन नामों का कब तक दोहन किया जाएगा। इस देश ने इस परिवार के प्रति कितनी और कृतज्ञता प्रकट करनी है, कितना और शुक्रिया अदा करना है? 2009 में खुद राहुल गांधी ने कहा था कि वह वंशवाद की उपज है लेकिन चाहते हैं कि पार्टी इससे उबरे। लेकिन पार्टी वहीं की वहीं फंसी हुई है। कांग्रेस पार्टी कब तक अतीत को भुनाने का प्रयास करती रहेगी? और अगर सोनिया गांधी, राहुल गांधी तथा प्रियंका गांधी के बावजूद कांग्रेस का पतन नहीं रुका तो कांग्रेस का क्या बनेगा? और कोई आसरा तो है नहीं। पर लोगों में अब गांधी-थकावट नज़र आ रही है। जनता अब पांच साल आराम करना चाहती है। और ‘गांधी’ से यहां मेरा अभिप्राय महात्मा से नहीं है। बापू ने तो कभी अपने लिए कुछ नहीं मांगा, कुछ श्रेय नहीं लिया लेकिन यहां तो श्रेय लेने की अधीरता नज़र आती है जिस पर एक पुराना प्रसंग याद आता है। जवाहरलाल नेहरू की बहन विजय लक्ष्मी पंडित ने लिखा है, ‘मैं यह सुन-सुन कर थक गई थी कि नेहरू परिवार ने सबसे बड़ी कुर्बानी की है… मुझे याद है कि किसी ने मुझ से पूछा था कि ‘क्या आप समझती हैं कि नेहरू खानदान ने सबसे अधिक कुर्बानी दी थी?’ ‘मेरा जवाब था कि अगर हमने ऐसे किया है तो हमें मुआवज़ा भी बराबर मिल गया है।’ इंदिरा को यह बात पसंद नहीं आई। उस रात उसका फोन आया, ‘फूफी क्या आपने ऐसा कहा है?’ …मेरा जवाब था, ‘क्या तुम नहीं समझती कि यह सही कहा है? मेरा भाई इतने वर्ष सत्ता में रहा। उनके बाद तुम बनी…।’

विजय लक्ष्मी पंडित का यह कथन आज की कांग्रेस के लिए एक सबक होना चाहिए। बार-बार कुर्बानियों का ज़िक्र कर आप उनका अवमूल्य कर रहे हैं क्योंकि साफ है कि लोग अब परिवार से थक रहे हैं। पिछले 9 वर्षों ने मोहभंग कर दिया है।

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About Chander Mohan 565 Articles
Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.

2 Comments

  1. While this is one end of the political narrative, there exists another in the form of a smart, genuine young man who needs to know what he is doing. Someone has to tell Rahul Gandhi that he is not a philosopher and India doesn’t need one in him! We need a strong individual who is honest and willing to show courage. He need not constantly mention the problems of the political and bureaucratic class. We are only too aware of its failings, and are constantly made aware of them. We do not need a “magic wand” but someone with a will to change things and has not until date shown any will. Mr. Gandhi has floated thoughts on “what ails Indian society.” So, what next? There seems to be a stupor hovering over him, a cloud of inertia and intellectual lethargy. The country can ill afford a slumber of ideas, courage and determination in a man who is meant to be waking the nation up. What one misses in Mr. Gandhi is not earnestness of intent, not sincerity, but a crucial breaking of the trust barrier, a totally convincing breakthrough in winning the nation’s trust. He can fight all his political battles with Mr. Modi or anyone else but first he must be willing to fight the battle of his life for this country. Unless the nation sees him do that how can it entrust its future to him? His advisers don’t seem to see that the absence of a trust breakthrough in Mr. Gandhi is what Mr. Modi is cashing in on and substituting with his own brand of “I can do it” in surplus. India needs a good human being at its helm but also a proactive person with serious, practical ideas of how to change this nation. We have in him an exhaustingly long prologue; what we need now is the main action.

    Watching this presidential style battle being played out in the media on an everyday basis has only further increased my disappointment in us as a society. Urban India is intoxicated by these two people, and the so-called “real India” is being manipulated by the same individuals. The end result is that India seems to have reached a political cul-de-sac. What other options do we have? We can not only look for other options but can actually force a change from these two. It is up to us to demand decency and human empathy, responsibility-owning from Mr. Modi and courage and determination from Mr. Rahul Gandhi. If neither have it in them then they don’t deserve our votes, and nor do their parties, bereft as they are of ideas for change

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  2. However, it would be simplistic to expect a dramatic transfer of the reins to Priyanka. Her entry will never be at the expense of Rahul Gandhi. Rather it will be mainly to supplement the efforts of Sonia and Rahul, who are the No. 1 and No. 2 in the party. In fact, given that the Congress will in all probability do worse in 2014 than it did in 2009, the party may well keep its ‘trump card’ for a later date.
    Party strategists say the Congress trio has decided the roadmap to 2014. While Sonia will lead from the front, Rahul will be projected as the Prime Ministerial candidate. Priyanka will compliment his efforts by focusing her attention on select regions, particularly Uttar Pradesh.
    The clamour for Priyanka in the Congress, says less about the 40-year-old scion than it does about the 127-year-old party. It represents a desire to go back to a style of leadership that existed during the period of Indira and Rajiv Gandhi: a leadership that is decisive, dynamic and most importantly, has a direct connect with the masses.

    Read more at: http://indiatoday.intoday.in/story/priyanka-gandhi-political-scion-of-gandhi-family/1/212892.html

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