सांप्रदायिक सौहार्द पर सैक्यूलर खतरा

सांप्रदायिक सौहार्द पर सैक्यूलर खतरा

राज्यों के पुलिस महानिदेशकों की बैठक के दौरान खुफिया ब्यूरो (आईबी) के प्रमुख आसिफ इब्राहिम ने चेतावनी दी कि देश का सांप्रदायिक सद्भाव खतरे में हैं जिसका फायदा इस चुनावी माहौल में देश विरोधी उठा सकते हैं। यह चेतावनी बहुत ठीक समय पर दी गई है। चुनाव चल रहे हैं और इनके विकास, महंगाई या सुशासन पर केंद्रित होने की जगह एक-दूसरे के खिलाफ ज़हरीले भाषण दिए जा रहे हैं। नरेंद्र मोदी भी जो पहले विकास पर केंद्रित थे अब अपने विरोधियों के जाल में फंस गए लगते हैं और कांग्रेस का चुनाव का एजेंडा बदलने का प्रयास सफल होता नज़र आ रहा है। इसीलिए राहुल गांधी की जगह सोनिया गांधी को नरेंद्र मोदी का मुकाबला करने के लिए मैदान में उतारा गया है। लेकिन यह अलग बात है। असली समस्या देश में बढ़ता सांप्रदायिक तनाव है जो हाथ से फिसलता जा रहा है। इसके कई कारण हैं पर एक कारण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने भी फटकार लगाई है उसका स्वागत है। मुजफ्फरनगर दंगों पर टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश की सरकार से सवाल किया कि दंगों का मुआवज़ा केवल मुसलमानों को क्यों दिया जा रहा है? क्या हिन्दू दंगा पीडि़त नहीं हैं। बैंच ने कहा यह गंभीर मसला है।

फटकार के बाद उत्तर प्रदेश की सरकार ने वायदा किया कि मजहब के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा और सभी पीडि़तों को मुआवज़ा मिलेगा लेकिन सवाल तो यह उठता है कि यह कैसी सरकारी तथा राजनीतिक मानसिकता है जो मुआवज़े के मामले में भी भेदभाव करती हैं? अगर आप अंग्रेजों की तरह हर मामले में दो बड़े समुदायों को बांटते जाओगे तो सांप्रदायिक सद्भाव तो यहां कायम हो ही नहीं सकता। जब से ये दंगे हुए हैं तब से ही शिकायत की जा रही है कि यह उच्च राजनीतिक साजिश का परिणाम है। पहले दंगे होने दो फिर जब लोग रोते बिलखते पास आएं तो राहत में पक्षपात कर उनके उद्धारक बन जाओ और दुनिया भर में घोषणा कर दो कि देखो हम कितने बड़े धर्मनिरपेक्ष हैं कि केवल मुसलमानों को राहत दे रहे हैं। और ऐसा करते हुए आप दोनों समुदायों के बीच दूरी इतनी बढ़ा दो की दोनों चैन से न रह सकें और दोनों लड़ते झगड़ते आपके पास शिकायत लेकर पहुंचते रहें?

इस देश में धर्मनिरपेक्षता की संज्ञा का बहुत गलत इस्तेमाल किया गया है। अगर आप हिन्दू हित की बात करते हैं तो आप धर्म निरपेक्ष हो ही नहीं सकते। अगर अमित शाह अयोध्या जाते हैं तो सैक्यूलर मीडिया एक हिमस्खलन की तरह उन पर गिर पड़ा लेकिन जब राजनेता टोपियां डाल इफ्तार पार्टियां देते हैं तो किसी की धर्मनिरपेक्षता को तकलीफ नहीं होती। संविधान अल्पसंख्यकों को सुरक्षा का विशेष अधिकार देता है। उत्तर प्रदेश की सरकार इस मामले में असफल रहने के बाद अब राजनीति कर रही है। उन्हें पुचकारने के लिए ऐसा कदम उठाया गया है कि आपसी अविश्वास और बढ़ेगा। हिन्दुओं में यह भावना बल पकड़ रही है कि राजनीति के कारण उन्हें पीछे धकेला जा रहा है।  आग शांत होने की जगह भड़कती रहेगी। बाटला हाऊस मुठभेड़ को केंद्रीय सरकार तथा दिल्ली सरकार की मोहर के बावजूद जिस तरह कांग्रेस के कुछ नेताओं ने इसे फर्जी तथा नकली साबित करने का प्रयास किया वह हमारे सामने है। इससे ये लोग मुसलमानों में यह भावना भरने का प्रयास कर रहे हैं कि उनके साथ ज्यादती हो रही है। उनके लड़कों को अनावश्यक उठाया जा रहा है। हिन्दू अपनी जगह परेशान हैं कि आतंकवादियों को बचाने तथा समर्थन देने का प्रयास हो रहा है। आखिर इंडियन मुजाहिद्दीन किसी की उपजाऊ कल्पना की पैदावार तो नहीं है।

एक राज्य का धर्म है कि वह सबको बराबर रखे, पक्षपात न करे और हर वर्ग की जान तथा माल की रक्षा करे।  हमारे सैक्यूलरिस्ट नरेंद्र मोदी को कोसते नहीं थकते लेकिन उनके सामने मोदी तथा मुलायम सिंह यादव की एक तुलना रखना चाहूंगा। 2004 में गुजरात में बाढ़ से केंद्रीय गुजरात में व्यापक तबाही हुई थी। महेश भट्ट मुंबई से कुछ स्वयं सेवी संगठनों के साथ राहत सामग्री बांटने गुजरात गए थे। बाद में उन्होंने नरेंद्र मोदी को बधाई दी कि राहत सामग्री पीडि़त लोगों को उनकी धार्मिक पहचान की अनदेखी कर दी गई। महेश भट्ट जो मोदी के आलोचक रहे हैं, और अब भी हैं, ने शायद सोचा होगा कि अल्पसंख्यकों को  राहत नहीं मिलेगी लेकिन उन्होंने पाया कि सबको बराबर राहत मिल रही है किसी से किसी प्रकार का भेदभाव नहीं हो रहा। ऐसे कदमों से आपसी अविश्वास कम होता है क्योंकि न किसी को शिकायत होती है न किसी को ईर्ष्या। विकास के लिए जो भी योजनाएं शुरू हों इन पर सबका बराबर हक होना चाहिए लेकिन हमारे सैक्यूलरवादी यहां भी शरारत करते रहते हैं। मुसलमानों के लिए आरक्षण या मुसलमानों के लिए विशेष साधनों की घोषणा के लॉलीपाप आपसी अविश्वास बढ़ाते हैं। मैं इन्हें लॉलीपाप इसलिए कह रहा हूं कि ठोस में मुसलमानों के लिए कुछ नहीं किया गया केवल घोषणाएं ही की गई ताकि वे झांसे में आ जाएं कि सैक्यूलर उनके कितने हितैषी हैं। अगर ये लोग मुसलमान के कल्याण में वास्तव में दिलचस्पी रखते तो आज यह समुदाय देश के पिछड़े समुदायों में न गिना जाता। इन सैक्यूलरवादियों की समस्या है कि अगर सब कुछ शांत हो जाए या बराबर हो जाए तो इनकी दुकान बंद हो जाए, इनकी पूछ खत्म हो जाए।

अगर देश में सांप्रदायिक सद्भाव चाहिए तो सबको बराबर देखना होगा। बराबर विकास, बराबर मौका, बराबर सुरक्षा, बराबर राहत। लेकिन तब इस धर्म निरपेक्ष टोले का महत्त्व खत्म हो जाएगा। भारत सरकार भी ऐसा कदम उठाने पर विचार कर रही है जिससे देश में सद्भावना तहस नहस हो जाएगी। चारों तरफ से घिरी यह यूपीए सरकार कोल्ड स्टोरेज़ से निकाल कर सांप्रदायिक हिंसा विरोधी विधेयक संसद में पेश करने की सोच रही है। अगर यह विधेयक कभी कानून बन गया तो देश में सौहार्द तबाह हो जाएगा क्योंकि यह विधेयक मान कर चलता है कि केवल बहुसंख्यक वर्ग ही सांप्रदायिक हिंसा तथा तनाव फैलाता है। यह ऐसा ज़ालिम कानून होगा कि यह हिन्दुओं पर यह शर्त लगाएगा कि वे खुद साबित करें कि वे निर्दोष हैं। यह संविधान की बराबरी की भावना के भी खिलाफ है लेकिन पापी वोट की खातिर यह हताश सरकार देश में यह आत्मघाती कदम उठाना चाहती है। ये दोनों बड़े समुदायों को सदा के लिए एक-दूसरे के खिलाफ खड़े कर देंगे।

ऐसा कानून आपसी रंजिश बढ़ाएगा। जमायत उलेमा-ए-हिन्द के महासचिव मौलाना मदनी ने सही कहा है कि गुजरात से अधिक दंगे तो राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश में हुए हैं। लेकिन क्योंकि यहां सैक्यूलर सरकारें हैं इसलिए सब चुप बैठे हैं। मदनी को यह भी शिकायत है कि मोदी का हौव्वा दिखा कर मुसलमानों को भयभीत क्यों किया जाता है? ऐसे लोगों को अपना कार्यक्रम बताना चाहिए। यही तो समस्या है। खुद दिखाने को कुछ नहीं, मुसलमानों को जो वायदे किए गए थे वे न पूरे हुए न पूरे करने का प्रयास ही किया गया इसलिए ध्यान हटाने का प्रयास हो रहा है। उनकी हालत क्या है यह उत्तर प्रदेश तथा राजस्थान में हुए धारावाहिक दंगों से पता चलता है। इसलिए अब मुसलमानों को पलोसने के लिए राहत सामग्री में पक्षपात जैसा अनाड़ी प्रयास किया गया जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें इतनी झाड़ डाली है। पर सवाल तो है कि ये कथित धर्मनिरपेक्ष सज्जन किस मिट्टी के बने हैं कि धर्म को ही देख कर राहत देने का प्रयास कर रहे थे? अंत में: उत्तरपूर्व में मिज़ोरम में मुख्यमंत्री पो लालथनहावला की इसलिए आलोचना हो रही है कि 2011 में कोलकाता के एक पूजा पंडाल में उन्होंने माथे पर तिलक लगवाया था। क्या मिज़ोरम को इस कथित धर्म निरपेक्ष व्यवस्था ने चर्च को ऑऊटसोर्स कर दिया है?

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Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.

2 Comments

  1. दोनों समुदायों को आपस में बांटने का घिनौना प्रयास, अति निंदनीय.

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  2. The Hindu identity is completely enmeshed, intertwined with this geographical entity called Bharat. Sadly due to minorityism and skewed variety of secularism followed by successive regimes in our country, the Hindus have been reduced to a “moral minority.”
    Coerced, subjugated, converted ………not only in Pakistan and Bangladesh …….but also in the North- East , J&K and tribal areas of Orrisa, MP, Chattisgarh, AP ………the Hindus have been “victims”……..in their own homeland. ……..having been denied the basic human rights….
    The bogey of secularism ……….is raised time and again ………to malign groups that speak of the rights of the Hindus…..
    Secularism in the present context has become a veneer…….a veil……..to shield the corrupt, communal and criminal elements …..a cozy ghetto where all can take shelter……
    It is hilarious that Tejpal in the recent molestation case ….tried to take shelter in the pseudo-secular ghetto by trying to lamely blame the ” communal” RSS of maligning him…….

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