बुजुर्ग फालतू नहीं हैं!

बुजुर्ग फालतू नहीं हैं!

उस दिन बुजुर्ग दिवस था। मैं आंखें चैकअप करवाने हस्पताल गया तो वहां एक बुजुर्ग भी थे जो नर्स से अपने आप्रेशन के बारे जानकारी प्राप्त कर रहे थे। जब नर्स ने बताया कि मोतियाबिंद के आप्रेशन के दो घंटे के बाद वे घर जा सकते हैं तो वे सज्जन निवेदन करने लगे कि ‘क्या मैं यहां दो दिन और नहीं रह सकता, घर में मेरी देखभाल करने वाला कोई नहीं।’ मुझे मालूम नहीं कि उस सज्जन के परिवार की क्या स्थिति है, बच्चे हैं या नहीं, लेकिन उनके शब्द ‘घर में मेरी देखभाल करने वाला कोई नहीं’, आज तक मुझे परेशान करते रहे हैं। उस सज्जन की क्या मजबूरी है? और उनके जैसे और कितने हैं? संयुक्त परिवार के टूटने तथा व्यक्तिगत आज़ादी की भावना के प्रबल होने का सबसे बुरा प्रभाव बुजुर्गों पर पड़ा है। कईयों के बच्चे नौकरी के लिए घर छोड़ देते हैं और उन्हें तन्हा जीवन व्यतीत करना पड़ता है। ज़िंदगी के जिस मुकाम पर उन्हें सहारे तथा सहयोगी की सबसे अधिक जरूरत होती है, उन्हें अकेले लाचार जिंदगी व्यतीत करनी पड़ती है। सबसे बड़ी त्रासदी उन बुजुर्गों की है जो अपने बच्चे के दुर्व्यवहार का शिकार होते हैं। उनकी खुदगर्जी तथा लालच से गहरी चोट पहुंचती है। जयदाद हड़पने का प्रयास किया जाता है। संयुक्त राष्ट्र के एक सर्वेक्षण के अनुसार पंजाब में 11 प्रतिशत बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार होता है। बाकी प्रदेशों की भी यही हालत होगी। जिन्हें पेट काट कर बड़ा किया वे न केवल बेसहारा छोड़ देते हैं बल्कि कई बार सहारा छीनने का भी प्रयास करते हैं। ‘बागवान’ फिल्म में यह बहुत दर्दनाक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

बुजुर्ग एक घर का ताला ही नहीं मर्यादा भी होते हैं। उनके दिशा निर्देश में परिवार सही चलता है। औलाद क्यों नहीं समझती कि जो दुर्व्यवहार वे अपने मां-बाप से करेंगे वैसा ही दुर्व्यवहार उनकी औलाद उनके साथ दोहराएगी? सारे ऐसे नहीं हैं। जितने लोगों को मैं जानता हूं सबके बच्चे अगर उसी शहर में हैं तो साथ ही रहते हैं, और खुशी से रहते हैं। माधुरी दीक्षित का भी कहना है कि अमेरिका से लौटने का एक कारण उनके माता-पिता हैं। लेकिन ऐसे भी कई परिवार है जहां लगातार क्लेश रहता है, बुढ़ापे में चैन की जगह तनाव मिलता है। भारत में बुजुर्गों के लिए सरकारी सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध नहीं इसलिए समस्या गंभीर होती जा रही है क्योंकि भारत की जनसंख्या का 8 प्रतिशत 60 वर्ष से अधिक की आयु का है। ऐसी उम्र में बीमारियां परेशान करने लग पड़ती हैं। अगर सहारा न हो तो जिंदगी दोहरा बोझ बन जाती है।

बुजुर्गों को संभालने की जिम्मेवार से छुटकारा पाने के लिए अब वृद्ध आश्रम या ओल्ड एज होम खोले जा रहे हैं। मुझे इस संस्था से अत्यन्त नफरत है। बच्चों को अपनी जिम्मेवारी के बचने का रास्ता क्यों दिया जाए? जिनका कोई सहारा नहीं उनकी बात तो फिर समझ आती है लेकिन वे लोग भी होम में पहुंच रहे हैं जिनके बच्चे जीवित हैं पर अपने बुजुर्गों की जिम्मेवारी निभाना नहीं चाहते इसलिए उन्हें होम में जमा करवा देते हैं। मैंने अमेरिका में भी कई ओल्ड एज होम देखे हैं। बहुत अच्छी देखरेख होती है। बढिय़ा रहन-सहन और खाना पीना मिलता है। मैडिकल सुविधा भी मिलती है। लेकिन एक कमी पूरी नहीं होती। अकेलापन खाने को आता है। कईयों के बच्चे कई कई वर्ष मिलने नहीं आते। यही हालत उन लोगों की हो रही है जो यहां वृद्ध आश्रम में भर्ती हैं। बच्चे भर्ती करवा फारिग हो गए। लानत है ऐसी औलाद पर! संस्कार रहे नहीं। जरूरतें बढ़ गई। खोखली आज़ादी की इस दौड़ में बुजुर्ग फालतू बन रहे हैं।

ज़माना जरूर बदल रहा है पर अगर आपने बच्चों में अच्छे संस्कार डाले हैं तो वे अपना धर्म निभाएंगे। अगर बच्चे भटक रहे हैं तो इसमें मां-बाप की भी कुछ जिम्मेवारी है। शायद लाड़-प्यार अधिक किया गया। शायद अनुशासन की तरफ ध्यान नहीं दिया। शायद खुद अच्छी मिसाल कायम नहीं की। अब हालात के अनुसार बुजुर्गों को खुद भी कुछ बदलना चाहिए। प्राय: देखा गया है कि मां-बाप बच्चों को बिल्कुल आज़ादी जिसे आज की भाषा में ‘स्पेस’ कहा जाता है, देने को तैयार नहीं। जब बेटा दफ्तर से आएगा तो मां-बाप चाहेंगे कि वह एकदम उनके पास बैठे जबकि उसकी पत्नी भी दिन भर उसका इंतज़ार कर रही है। कई बुजुर्ग अपना समय भूल जाते हैं और जब युवा भी वही कुछ करना शुरू कर देते हैं जो वे खुद कर चुके हैं, तो नाराज़ हो जाते हैं। बहुत जरूरी है कि दोनों पीढिय़ों के बीच संवाद रहे। कई बार विशेष तौर पर बाप अपनी अक्कड़ में औलाद के बीच दूरी बना लेते हैं। मेरे एक मित्र हैं जिनका यहां बड़ा कारखाना है। एक ही लड़का है जो कैनेडा में फिज़ूल जीवन व्यतीत कर रहा था। मैंने कहा ‘तुम्हें जरूरत है उसे बुला क्यों नहीं लेते?’ उत्तर मिला, ‘मैं क्यूं बुलाऊं उसे मालूम नहीं कि हम अकेले हैं?’ मैंने कहा वह जवान है समझ नहीं है पर तुम तो समझदारी दिखाओ। जवाब मिला ‘नहीं बुलाऊंगा।’ लेकिन कुछ दिन सोचने के बाद फोन कर दिया और दो महीने के बाद लड़का घर लौट आया। मित्र ने मेरा धन्यवाद किया। लेकिन कहानी में अभी ट्विस्ट बाकी था। कुछ ही दिनों में लड़का लड़झगड़ कर वापिस चला गया। लेकिन गतिरोध टूट चुका था। बाप ने फिर फोन किया। वह लौट आया। सदा के लिए। उसके लिए अलग फ्लैट लिया गया लेकिन उसने अलग रहने से इंकार कर दिया। आज वह विवाहित है, एक बच्चा है और सारा संयुक्त परिवार खुशी से इकट्ठा रह रहा है।

अर्थात् बड़ों को भी अपने अहम और स्वभाव पर नियंत्रण रखना चाहिए।  बच्चों को बताना चाहिए कि आपको उनसे प्यार है, जरूरत है। विशेष तौर पर जब बाप बेटा एक ही बिसनेस में होते हैं तो सोच का टकराव शुरू हो जाता है। ऐसी स्थिति में बाप को पीछे हट जाना चाहिए। बेटा कुछ गलतियां करेगा लेकिन ठोकर खा कर सीख जाएगा। हमें यह याद रखना चाहिए कि हमारे बच्चे नई पीढ़ी से हैं। यह वह पीढ़ी है जिसे इतने नए प्रभावों का सामना करना पड़ा जितना पहले किसी भी पीढ़ी को नहीं करना पड़ा। जो नहीं समझते और सारा वक्त कुढ़ते रहते हैं वे अपने परिवार को नष्ट कर देते हैं। जमाने के साथ बदलना चाहिए। बुजुर्गों को भी समझना चाहिए उनके लिए ज़माना नहीं बदलेगा। और इसके साथ ही जरूरी है कि मायूसी त्याग बुजुर्ग जीवन का नया मकसद तलाशें। वे फालतू नहीं हैं। उन्हें किसी समूह का सदस्य बन कर सक्रिय जीवन व्यतीत करना चाहिए। मैं इस संदर्भ में विशेष प्रशंसा वरिष्ठ नागरिक केसरी क्लब की करना चाहता हूं जिसे छोटी बहन किरण चोपड़ा चला रही हैं। इसके 20,000 सदस्य हैं। बुजुर्गों का अकेलापन दूर किया जाता है, उन्हें एक प्रकार से फिर आर्ट ऑफ लिविंग सिखाया जाता है। कईयों को तो रैम्प पर देखा गया है। जो किरण कर रही हैं वह प्रयास बहुत कम लोग करते हैं क्योंकि समाज के पास बुजुर्गों के लिए समय कम है। इसी के साथ पढऩा लिखना भी जारी रहना चाहिए। जालन्धर में हमारे पुराने 90 साल के मास्टर दीवान चंद रोज़ाना गरीब बच्चों को नि:शुल्क पढ़ाते हैं। 98 वर्ष के खुशवंत सिंह अभी भी लिखते पढ़ते हैं। खाली बैठना न केवल बीमारी बल्कि पारिवारिक क्लेश को भी आमंत्रित करना है। अपने आपको ‘यूज़फुल’ बनाना चाहिए।

आजकल एक और रिवाज़ भी शुरू हो गया है। अकेले रह गए बुजुर्ग बिन विवाह किए साथी ढूंढने लग पड़े हैं। गुजरात में ऐसे बुजुर्गों के लिए साथी ढूंढने के लिए बाकायदा सम्मेलन आयोजित किया जाता है। वे शादी नहीं करते लेकिन इकट्ठे रहते हैं और एक दूसरे की देखभाल करते हैं जिसे लिव-इन कहा जाता है। यह गलत है या सही? यह पाठकों की राय पर छोड़ता हूं। पर यह ध्यान रखा जाए कि जो बिल्कुल बेसहारा है उसे सहारा चाहिए।

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Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.

2 Comments

  1. Touching sir .I think ..Indian govt should take the initiatives for the betterment of old people …still lot of amendments are required in constitution …facilities like health and old age pension …needed to be introduced ….

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  2. The myopic, schizophrenic adoption of modernity and Westernization, along with the centrality of money have all… relegated the elderly to the margins of socio- political thinking.
    But in the current dominant consumerist- materialistic thinking , an increasing number of elderly are being neglected and suffer from a sense of worthlessness.
    The young are so busy….so sucked up… in the routine of getting and spending …that they don’t have time to spend with the elderly in their own house.
    कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते …
    मुदतें हो गयी हैं चुप रहते ..
    The old have much to give… they are a reservoir of knowledge and experience…

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