केजरीवाल की अराजकता

केजरीवाल की अराजकता

सरकारें सड़क से नहीं चल सकती। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का धरना अनुचित है और यह अराजक स्थिति को आमंत्रित कर रहा है। वह स्वीकार भी कर रहें हैं कि वह अराजकतावादी हैं। हैरानी है कि जिस मुख्यमंत्री ने संविधान की शपथ ली हो वह इस तरह धरने पर बैठा है। मामला कानूनमंत्री सोमनाथ भारती से जुड़ा है जिन्होंने कानून को हाथ में लेकर उस जगह छापा डलवा दिया जहां कुछ विदेशी महिलाएं रहती है। उन महिलाओं की जबरन मैडिकल जांच करवाई गई और उनके साथ घोर बदसलूकी की गई। रात के वक्त जब पुलिस ने छापा मारने से इंकार कर दिया तो सोमनाथ भारती भड़क गए और पुलिस अधिकारियों के साथ उनकी हाथापाई मुश्किल से बची। इस मामले से शुरू हुआ घटनाक्रम अब संसद भवन के नजदीक केजरीवाल के धरने तक पहुंच गया है। मुख्यमंत्री एक पुलिस अधिकारी तथा तीन थानेदारों के निलंबन की मांग कर रहे हैं। दिल्ली के उपराज्यपाल ने यह मांग मानी नहीं इसलिए अब आधी दिल्ली को रोक कर वह धरने पर बैठे हैं। उन्होंने अपनी सरकार का कामकाज तो ठप्प किया ही है उन्होंने केंद्रीय सरकार के काम में भारी खलल डाला हैं। लाखों लोगों को परेशानी हुई है। धरना स्थल के आसपास सरकारी कार्यालयों में भी कामकाज ठप्प हो गया है। असली बात है कि केजरीवाल समझ गए है कि वह दिल्ली की सरकार नहीं चला सकते। जो वायदे किए गए है वह पूरे नहीं होंगे इसलिए धरना देकर शहीद बनने की कोशिश में है ताकि कांग्रेस समर्थन वापिस ले और उनकी मुक्ति हो।  आने वाले दिनों में वहां अधिक लोग इकट्ठा करने तथा अराजक स्थिति बनाने का प्रयास किया जाएगा। इस देश में भीड़ इकट्ठा करना कभी भी मुश्किल नहीं रहा। कांग्रेस, भाजपा, बसपा, सपा आदि पार्टियां आप से भी कहीं अधिक भीड़ इकट्ठी कर सकती हैं लेकिन एक सभ्य तथा परिपक्व लोकतंत्र में जिसकी भीड़ उसी की भैंस सिद्धांत स्वीकार नहीं किया जा सकता।
दिल्ली पुलिस के प्रति जनता और केजरीवाल की शिकायतें सही हो सकती है लेकिन इन शिकायतों को लेकर मुख्यमंत्री आंदोलन नहीं चला सकते। वह धरने पर नहीं बैठ सकते। सड़क पर बैठने से पहले बेहतर होता कि वह इस्तीफा दे देते। साफ है कि उन्हें तमाशों में विश्वास है सही तरीके से सरकार चलाने में नहीं। पर उन्हें अधिक भीड़ में विश्वास नहीं रखना चाहिए। याद रखना चाहिए कि कुछ दिनों में भीड़ अन्ना हज़ारे को भी छोड़ गई थी। केजरीवाल तो राजधानी में जंगलराज को आमंत्रित करते नज़र आते हैं। दिल्ली कोई आम शहर नहीं। देश की राजधानी है दुनिया की नज़रें यहां लगी हुई है। यहां पैदा की जा रही अराजकता की जितनी भी निंदा की जाएं उतना कम है। कुछ ही दिनों के बाद गणतंत्र दिवस है। सारे क्षेत्र को सेना अपने कब्ज़े में लेती है। क्या केजरीवाल इस राष्ट्रीय पर्व में भी रूकावट डालना चाहते हैं सिर्फ इसलिए कि चार पुलिस अफसरों के निलंबन की उनकी मांग स्वीकार नहीं की गई? वह 10 दिन के धरने की तैयारी कर आए हैं। अर्थात् 26 जनवरी को भी लपेटने का इरादा हैं।
दिल्ली में स्थिति दिल्ली सरकार बनाम केंद्रीय सरकार तथा दिल्ली के मुख्यमंत्री बनाम केंद्रीय गृहमंत्री स्थिति बनती जा रही है। दिल्ली के मुख्यमंत्री धमकी दे रहे हैं कि सुशील कुमार शिंदे को काम नहीं करने देंगे। शिंदे उस देश के गृहमंत्री है जिसे माओवादियों से लेकर जेहादियों से खतरा है। क्या उन्हें काम नहीं करने दिया जाएगा इसलिए कि उन्होंने जांच से पहले चार पुलिस कर्मियों को निलंबित नहीं किया? यह भी वास्तविकता है कि दिल्ली पर देश सबसे अधिक खर्च करता है। जैसी दिल्ली है वैसा कोई शहर नहीं फिर भी दिल्ली की समस्याएं हैं। कई मामलों विशेषतौर पर पुलिस, को लेकर दिल्ली सरकार का नियंत्रण नहीं हैं। यह संवैधानिक स्थिति हैं। इसका इलाज संसद ही कर सकती है, धरना नहीं कर सकता। सड़कों से इतनी जटिल समस्या का समाधान नहीं निकल सकता। अगर केजरीवाल का रास्ता दूसरे भी अपनाने लगे तो हर प्रदेश का मुख्यमंत्री धरने पर बैठ जाएगा। आखिर सबकी कोई न कोई समस्या है, कोई न कोई मांग है। केजरीवाल ने तो पुलिसवालों से भी कहा है कि वह वर्दी उतार कर उनके आंदोलन में शामिल हो जाए। वह तो बगावत को आमंत्रित करते लगते हैं। अव्यवस्था कायम करना चाहते हैं। इस बीच जिस सरकार के वह मुख्यमंत्री है वह लावारिस हो गई है। ठीक है कुछ लोग उनके धरने को समर्थन दे रहे हैं लेकिन आम आदमी तो इस तमाशे को नापंसद करता है। भारत की जनता ने कभी भी अव्यवस्था या अराजकता को पसंद नहीं किया। जनता पार्टी की अराजक स्थिति के कारण जिस इंदिरा गांधी को उन्होंने गुस्से में सत्ता से हटाया था उन्हें ही अढ़ाई वर्ष के बाद वह सत्ता में वापिस ले आए।
अरविंद केजरीवाल ने देश के इतिहास से कुछ नहीं सीखा। जंगलराज कभी लोकप्रिय नहीं हो सकता। भीड़तंत्र स्वीकार नहीं। कल को कोई भी अपनी मांगों को लेकर  कानून को एक तरफ रख गुंडागर्दी से अपनी मांगे मनवाने का प्रयास करेगा। यह खतरनाक खेल है जिस पर तत्काल रोक लगनी चाहिए। इस अराजक स्थिति के लिए कांग्रेस पार्टी की भी जिम्मेवारी बनती है क्योंकि यह तमाशाई सरकार कांग्रेस के समर्थन से चल रही है। बहरहाल दिल्ली के मुख्यमंत्री ने जो तमाशा खड़ा किया है वह अस्वीकार्य ही नहीं निंदनीय भी हैं। उन्हें राजधर्म निभाना है राजधरना नहीं देना। यह संवैधानिक संकट की शुरूआत है। केंद्र को कदम राजनीतिक लाभ-हानि को देखे बिना उठाना चाहिए। केजरीवाल कोई बिगड़ा बच्चा नहीं है वह एक स्पष्ट नीति के अनुसार अव्यवस्था फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। इसे और बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। जरूरत पड़े तो वहां राष्ट्रपति शासन लागू करना चाहिए।

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Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.

1 Comment

  1. I call Kejriwal’s rag-tag motley -” bourgeois naxalites”
    These” Maoists in disguise” don’t know that people want stability & security along with good governance. . ” common people” don’t want anarchy , lawlessness and mayhem…
    This nascent political group is born out of a protest movement but when they are at the helm of affairs ………they are expected to deliver…..not resort to agitation & protest movement ……..putting the life of “common citizens” out of gear…
    Kejriwal is fond of quoting the popular poet, Dushyant Kumar
    ” हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं …” he often asserts……
    But his actions have shown that the opposite is true of him & his ‘anarchic group’…
    ” सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद है ….”

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