futbaal men bharat kahan

फुटबाल में भारत कहां?

ब्राजील में खेला जा रहा फीफा विश्वकप फुटबाल आज समाप्त हो जाएगा। जहां दुनिया में इसे लेकर पागलपन की हद तक जनून रहा है वहां भारत में भी इसे लेकर अत्याधिक दिलचस्पी रही। लोग आधी रात को उठ कर मैच देखते रहे। लोकसभा में राहुल गांधी को आई नींद का भी यही कारण बताया जा रहा है कि फुटबाल देखते हुए देर रात भर जागते रहे। लेकिन अफसोस की बात है कि भारत विश्व फुटबाल में 154वें स्थान पर है। हमारा पड़ोसी पाकिस्तान 169वें स्थान पर है। पिछले साल तो हम दक्षिण ऐशिया फुटबाल चैम्पियनशिप में अफगानिस्तान से भी हार गए थे। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हम कहीं भी नहीं। छोटे-छोटे देश जैसे हुंड्रास, नाईजीरिया तथा कोस्टा रीका भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर की फुटबाल खेल रहे हैं। अंग्रेजों ने भारत में फुटबाल की खेल 1850 के आसपास शुरू की थी ब्राजील में यह तीस वर्ष के बाद शुरू की गई। विशेष तौर पर पश्चिम बंगाल तथा कोलकाता में इसका क्रेज रहा। मोहन बगान क्लब 1889 में शुरू हो गया था लेकिन फिर भी हम आज तक अंतर्राष्ट्रीय स्तर का एक खिलाड़ी तैयार नहीं कर सके। हमने शुरूआत ही गलत की थी। 1948 के ओलंपिक खेलों में हम नंगे पैर खेले थे। 1952 की ओलंपिक खेलों के बाद ही हमने जूते डालने शुरू किए थे।  पिछले चार दशकों में ऐशिया स्तर के फुटबाल में हमें बुरी पराजय सहनी पड़ी थी। 1970 के ऐशियाई खेलों में हमें फुटबाल का कांस्य पदक जरूर मिला था लेकिन उसके बाद से हम गिरते चले गए।
क्या हुआ? और फुटबाल को भारत में अंतर्राष्ट्रीय स्तर का खेल बनाने के लिए क्या किया जा सकता है? क्या हुआ का जवाब है कि इस क्रिकेट क्रेज़ी देश में किसी और खेल की गुंजायश ही नहीं रही। स्कूली बच्चे भी बैट-बॉल से खेलना पसंद करते हैं, फुटबाल से नहीं। क्रिकेट का पैसा, उसका ग्लैमर तथा उसमें मिली सफलता ने बाकी सभी खेलों को दबा दिया है। पूर्व फुटबाल कप्तान बाईचुंग भुटिया का कहना है कि अनुमान है कि अगले 10-15 वर्षों में भारत विश्व कप के लिए क्वालिफाई कर जाएगा ‘जो एक क्रिकेट क्रेज़ी देश के लिए बहुत आशावादी अनुमान हैं।’ अर्थात् भुटिया को तो यह भी नहीं लगता कि अगले 10-15 वर्षों में हम विश्व कप में खेल भी सकेंगे। क्रिकेट के बारे उल्लेखनीय है कि केवल 10 टीमें ही खेलती है। इन 10 टीमों के सरताज बन हम खूब इतरा रहें हैं जबकि क्रिकेट पैसे तथा समय के मामले में बहुत खर्चीला खेल है। यही कारण है कि टैस्ट क्रिकेट में दिलचस्पी कम हो रही है और लोग एक दिवसीय या टी-20 जैसे फटाफटा क्रिकेट में दिलचस्पी दिखा रहे हैं।  क्रिकेट में उस तरह रोमांच नहीं जैसे फुटबाल या हाकी में हैं। यह खेले हमारी परिस्थितियों के अनुकूल भी है क्योंकि कम खर्च होता है। यह भी उल्लेखनीय है कि इंग्लैंड तथा ऑस्ट्रेलिया भी क्रिकेट खेलने वाले देश है लेकिन दोनों की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मज़बूत फुटबाल टीमें हैं। इंग्लैंड का वेयन रूनी तो विश्व के शीर्ष खिलाडिय़ों में गिना जाता है।
क्या एक दिन हम फुटबाल में भी चमकेंगे? इसके लिए क्रिकेट की ग्रस्तता छोड़ कर दूसरी खेलों की तरफ ध्यान देना होगा। हमारा इतना विशाल समुद्र तट है इतनी नदियां है हमने एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर का तैराक पैदा क्यों नहीं किया? इसका जवाब भी वहीं है कि राष्ट्रीय दिलचस्पी नहीं है। हम क्रिकेट खिलाडिय़ों को पैसों से लाद कर खुश है। खेल फेडरेशन भी बेकार है। अगर दूसरी खेलों ने यहां अपनी जगह बनानी है तो उन पर पैसा लगाना होगा। बेहतर अकादमी चाहिए। स्कूली स्तर पर दूसरी खेलों को प्रोत्साहित करना चाहिए ताकि प्रतिभाशाली खिलाड़ी इनकी तरफ आकर्षित हो। बेहतर इंफ्रांस्टक्चर चाहिए। कोलकाता में स्टेडियम है लेकिन फिर भी पश्चिम बंगाल अंतर्राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी नहीं बना सका। खेलों में पंजाब के पतन से भी बहुत नुकसान हुआ है। विशेष तौर पर हाकी में तबाही के पीछे पंजाब में खेलों के प्रति दिलचस्पी कम होना है। संतोष यह है कि अब उत्तरपूर्व के प्रदेश खेलों में उभर रहे हैं। दोनों बाईचुंग भुटिया तथा वर्तमान फुटबाल कप्तान सुनील छेतरी उत्तर पूर्व से हैं। संतोष ट्राफी इस साल मिजोरम ने जीती है। फीफा के अध्यक्ष ने भारत को फुटबाल का ‘निंद्रा में जायंट’ कहा है। क्या हम निंद्रा से जागेंगे? अच्छी खबर है कि कई मशहूर लोग, सचिन तेंदुलकर, रणबीर कपूर, जॉन इब्राहिम अब देश के अंदर फुटबाल लीग को समर्थन दे रहें हैं। इनके प्रयास से अधिक दर्शक स्टेडियम में आएंगे और अधिक टीवी के आगे बैठेंगे। अर्थात् देश के अंदर फुटबाल की खेल में जान डालने का प्रयास शुरू हो गया है। इससे हम अंतर्राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी पैदा कर सकेंगे जो रफ्तार तथा चुस्ती में मैसी या रनाल्डो या मूलर की बराबरी कर सकेंगे।
आखिर में सब कुछ राष्ट्रीय रूझान पर निर्भर करता है। जितना पैसा, समय या खुशामद हम क्रिकेट के खिलाडिय़ों पर निवेश करते हैं, उसका अगर दस प्रतिशत भी हम फुटबाल तथा दूसरी खेलों पर निवेश करना शुरू कर दे तो भारत खेलों का महान् खिलाड़ी बन जाएगा।

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Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.

1 Comment

  1. Hon’ble Sir
    I have gone through your inspiring article on India’s position on football and other games. Sir, despite the fact we are the second largest population country in the world we still lack behind in these games and if small amount is spent to promote these games we will get players in the class of Pele, Messi ….

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