मन न रंगाए, रंगाए जोगी कपड़ा!

मन न रंगाए, रंगाए जोगी कपड़ा!

हैरानी है कि देश की ज्वलंत समस्याओं को छोड़ कर संसद में विपक्ष के कुछ नेता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा रमज़ान के दौरान इफ्तार पार्टी न दिए जाने का मामला उछाल रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा काठमांडू के प्राचीन पशुपतिनाथ मंदिर में पूजा करने के मामले का जिक्र करते हुए तृणमूल कांग्रेस के सांसद की शिकायत थी कि उन्होंने देश को ईद की मुबारिक नहीं दी जिस बात का संसदीय मामलों के मंत्री वैंकेया नायडू ने तत्काल प्रतिवाद कर दिया कि 29 जुलाई को बाकायदा प्रधानमंत्री द्वारा ईद की बधाई दी गई। मामला व्यक्तिगत आस्था का है। नरेन्द्र मोदी हिन्दू हैं। उन्हें अपने धर्म का अपनी इच्छा अनुसार पालन करने का अधिकार है। कल को अगर कोई मुसलमान भारत का प्रधानमंत्री बनता है और वह हज पर जाना चाहता है तो किसी को आपत्ति नहीं होगी। अमेरिका में राष्ट्रपति बाइबल पर हाथ रख शपथ ग्रहण करते हैं। किसी ने आपत्ति नहीं की कि वह कुरान या गीता या दूसरे धार्मिक ग्रंथों पर हाथ क्यों नहीं रखते? कई अमेरिकी राष्ट्रपति रविवार को नियमित परिवार सहित चर्च जाते रहे हैं। किसी ने आपत्ति नहीं की फिर प्रधानमंत्री मोदी के पशुपतिनाथ मंदिर में पूजा करने या गंगा आरती पर आपत्ति क्यों हो? वह दूसरों को तो नहीं कह रहे कि आप भी यही करो या आप अपने धर्म का पालन न करो?
अफसोस की बात है कि इस देश में धार्मिक आस्था भी तमाशा बनती जा रही है। जैसे संत कबीर ने भी कहा था,
मन न रंगाए, रंगाए जोगी कपड़ा!
ऐसी ही हालत हमारे कथित सैक्युलरिस्टों की है। खुद को धर्मनिरपेक्ष तथा मुस्लिम हितैषी साबित करने के लिए मुस्लिम टोपी डालना या इफ्तार पार्टी देना जरूरी समझा जाता है। प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू से बड़ा कोई धर्मनिरपेक्ष नेता नहीं रहा उन्होंने कभी इफ्तार पर पार्टी देने की जरूरत नहीं समझी। गांधी टोपी के अलावा सिर पर कुछ भी नहीं डाला। यही स्थिति प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की भी रही। दुख की बात है कि आजकल धर्म भी नाटकीय बनता जा रहा है। सब कुछ दिखावा है। नरेन्द्र मोदी ने मुस्लिम टोपी डालने से इन्कार कर दिया था जिस पर बहुत बवाल मचा था। शिवराज सिंह चौहान ने पिछली बार इफ्तार पर टोपी डाली थी लेकिन इस बार जब एक बच्चे ने उन्हें टोपी पेश की तो इन्कार कर दिया। चौहान में यह बदलाव क्यों आया? अगर पहले टोपी डाली थी तो इस बार क्यों परहेज़?
‘सैक्युलरिस्ट’ मीडिया का मानना है कि अगर प्रधानमंत्री मोदी इफ्तार पार्टी देते तो मुसलमान आश्वस्त हो जाते। यह भी क्या फिज़ूल तर्क है। क्या मुसलमानों को सुरक्षा और रोजगार तथा तरक्की की जरूरत है या उन्हें इफ्तार पार्टी की तस्वीरें देखने की जरूरत है? उत्तर प्रदेश के पिता-पुत्र मुलायम सिंह यादव तथा अखिलेश यादव दोनों इफ्तार पार्टी देते हैं और मुस्लिम टोपी डालते हैं पर अपने प्रदेश में मुसलमानों को सुरक्षा देने में बिलकुल नाकामयाब रहे हैं जो मुजफ्फरनगर के दंगों से भी पता चलता है। वहां के उजड़ गए मुस्लिम परिवारों को सुरक्षा चाहिए या इफ्तार पार्टी? जो इफ्तार पार्टी देना चाहे या टोपी डालना चाहे वह उसका व्यक्तिगत मामला है लेकिन जो नहीं देना चाहे उस पर आपत्ति नहीं होनी चाहिए। आखिर संविधान में कहां लिखा है कि देश के प्रधानमंत्री की जिम्मेदारियों में इफ्तार पार्टी देना भी शामिल है? और अगर इफ्तार पार्टी जरूरी है तो फिर क्रिसमस पर क्यों नहीं? दीवाली पर भी सरकारी कार्यक्रम होना चाहिए तथा गुरुपर्व भी मनाया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी कह चुके हैं कि उनका ऐसे दिखावे में विश्वास नहीं। इसके लिए उनका सम्मान होना चाहिए। वह दूसरों से अधिक ईमानदार हैं। वह अपने धर्म में विश्वास रखते हुए किसी और को तो रोक नहीं रहे।
रक्षा बंधन के दिन अमरनाथ की यात्रा सम्पन्न हो गई लेकिन अफसोस की बात है कि एक और यात्रा शुरू होने से पहले वहां के अलगाववादी नेताओं की घृणित सोच का शिकार हो गई। मैं दक्षिण कश्मीर के कुलगाम में पीर पंजाल पहाडिय़ों की तलहटी में स्थित कौसरनाग यात्रा का जिक्र कर रहा हूं। कश्मीर में मिलिटैंसी से पहले 1980 के दशक तक यहां तीर्थ यात्रा होती थी। इस बार फिर उसे शुरू करने का प्रयास किया गया लेकिन कश्मीर के विभिन्न हिस्सों में इसके खिलाफ हिंसक प्रदर्शन करवा दिए गए। आदत के अनुसार मीर वायज़ उमर फारुख तथा सईद अली शाह गिलानी ने आग उगली और आदत के ही अनुसार उमर अब्दुल्ला की सरकार ने समर्पण कर दिया। जो सरकार एक सप्ताह पहले इस यात्रा के पक्ष में थी तथा उसके प्रबंध में जुटी हुई थी ने अलगाववादियों के प्रदर्शनों के बाद सुर बदल लिया और अनुमति रद्द कर दी।
शिकायत क्या है जो इतना बड़ा बावेला मचाया गया है? गिलानी का कहना था कि यात्रा का गंतव्य कौसरनाग झील कश्मीर का नाज़ुक पर्यावरण तथा स्वच्छ पानी के साधन नष्ट कर देगा। प्रभाव यह दिया गया कि जैसे हज़ारों भक्तजन इस नाज़ुक क्षेत्र पर धावा बोलने वाले हैं। लेकिन वास्तविक स्थिति क्या है? जिन भक्तों को ऊपर जाने से रोका गया उनकी संख्या 30 से अधिक नहीं थी। पूजा भी केवल चार दिन ही की जानी थी। ठीक है पर्यावरण की चिंता होनी चाहिए आखिर कोई नहीं चाहता कि इस स्वच्छ झील की हालत भी श्रीनगर की डल झील की तरह हो जाए पर दिलचस्प है कि पर्यटन मंत्री गुलाम अहमद मीर तथा कुलगाम से मार्कसी विधायक तारीगामी ने हाल ही में यह प्रस्ताव दिया था कि कौसरनाग झील क्षेत्र को पर्यटन क्षेत्र घोषित किया जाए। अर्थात् अगर पर्यटक वहां आएं तो ठीक है पर्यावरण को कोई खतरा नहीं पर अगर हिन्दू वहां जाकर सीमित पूजा करें तो सारे पर्यवरण को गंभीर खतरा उत्पन्न हो जाएगा?
यह यात्रा जम्मू कश्मीर की साम्प्रदायिक राजनीति की भेंट हो गई। गिलानी का बाद में कहना था कि यात्रा का एकमात्र मकसद कश्मीर पर सांस्कृतिक हमला है। जनसंख्या का अनुपात बदलने की साजिश कहा गया। अब आई बिल्ली थैले के बाहर! जो यात्रा आदिकाल से चली आती है उसे फिर से शुरू करना ‘सांस्कृतिक हमला’ है! यह वही मानसिकता है कि जिसने अमरनाथ यात्रा की अवधि कम करने तथा भक्तों की संख्या को कम करने का दबाव बनाया था। इन्हीं के दबाव में यात्रा के रास्ते में श्रद्धालुओं के लिए अस्थाई शैल्टर भी नहीं बनने दिए गए। तब भी शोर मचाया गया कि सरकार हजारों फुट की ऊंचाई पर जहां सर्दियों में कोई रह नहीं सकता, हिन्दुओं को बसाने की साजिश कर रही है।
साफ तरह से कहा गया कि ‘कोई भी हिन्दू सांस्कृतिक हमला बर्दाश्त नहीं किया जाएगा क्योंकि इससे वादी के मुस्लिम बाहुल्य चरित्र को खतरा पैदा हो जाएगा।’ यह असली बात है, ‘वादी का मुस्लिम चरित्र।’ अलगाववादी तथा कश्मीरी मुस्लिम राजनेता इस मामले में मिले हुए हैं। किसी भी हालत में, किसी भी तरह कश्मीरी पंडितों की वापिसी बर्दाश्त नहीं की जाएगी, यह स्पष्ट संदेश है। जब से नरेन्द्र मोदी की सरकार कायम हुई है वहां के मुस्लिम क्षेत्रों में अधिक बेचैनी है क्योंकि मोदी सरकार ज्यादतियों को खत्म करना चाहती है। देखते हैं कि देश के साम्प्रदायिक, सांस्कृतिक तथा सामाजिक ढांचे को लगातार बढ़ रहे इस खतरे से मोदी सरकार किस तरह निपटती है?
अंत में : कल 15 अगस्त को वर्षों के बाद लाल किले से वह नेता देश को सम्बोधित करेगा जिसे जनादेश प्राप्त है। आशा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बाबुओं का लिखा भाषण नहीं पढ़ेंगे जैसे पिछले कुछ प्रधानमंत्री करते रहे हैं। लाल किले से लोग उनके दिल की बात सुनना चाहते हैं। स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई!

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Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.

1 Comment

  1. Appreciate your in-depth analysis……
    The people of India have already shown the pseudo-secularists their place in the Lok Sabha polls.
    Secularism as preached & practised by a large number of political entities in India has metamorphosed into minority-tokenism. The outer symbolic display of minorityism has been accompanied by no change in reality in the socio-economic condition of the minorities. It is time for these myopic political groups to rethink their vote garnering strategies.
    The message to these groups should be loud & clear……..
    STOP TREATING MINORITIES AS VOTE BANKS ………..TREAT THEM AS HUMANS ………

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