ख्वाब-ए-सहर देखा तो है

ख्वाब-ए-सहर देखा तो है

जो सरकार पांच वर्ष चलनी है उसके पहले 100 दिन क्या मायने रखते हैं? ‘हनीमून पीरियड’ या ‘100 दिन’ यह सब मीडिया की देन है। प्रधानमंत्री मोदी तो खुद मान चुके हैं कि वह तो ‘आउटसाइडर’ हैं दिल्ली को समझने में उन्हें समय लगेगा। लेकिन इसके बावजूद क्योंकि मामला उठा है इसलिए पहले 100 दिन की कारगुजारी पर नज़र दौड़ाई जा सकती है। विपक्ष व्यंग्य कर रहा है कि अच्छे दिन कहां हैं जबकि अरुण जेटली का कहना है कि हालात सुधरने लगे हैं। 2014-15 की पहली तिमाही में आर्थिक विकास की दर 5.7 रही है। यह पिछले दो सालों में सबसे अधिक है और पहला संकेत है कि अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट रही है। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अर्थव्यवस्था में विश्वास लौट रहा है। हमारा भी और विदेशियों का भी। उनकी अति सफल जापान यात्रा से यही संदेश है। फैसला लेने की रफ्तार तेज हुई है। मामले लटकाए नहीं जाते। पिछली सरकार के समय तो कई सौ परियोजनाएं पर्यावरण-अनुमति के कारण लटक गई थीं। इन्हें अब इज़ाज़त मिल रही है।
उपचुनावों में भाजपा को वह सफलता नहीं मिली जो लोकसभा चुनावों में मिली थी। उत्तराखंड के तीनों उपचुनाव भाजपा हार गई। बिहार में लालू-नीतीश कुमार गठबंधन अधिक सफल रहा। कर्नाटक में बेल्लारी में भाजपा को धक्का पहुंचा तो ‘सेफ’ मध्यप्रदेश में भी कांग्रेस तीन में से एक उपचुनाव जीतने में सफल रही। राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस को रद्द करने के बाद प्रादेशिक उप चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन बुरा नहीं रहा। इसका क्या मतलब है? इसका यह मतलब है कि जरूरी नहीं कि प्रादेशिक स्तर पर भी वही होगा जो राष्ट्रीय स्तर पर हुआ है। भाजपा को वह विश्वास मत नहीं मिल रहा जो मोदी को मिला था। इस पर चिंतन की जरूरत है क्योंकि हरियाणा तथा महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव सिर पर हैं। भाजपा में पीढ़ी परिवर्तन हो गया है। लालकृष्ण आडवाणी तथा मुरली मनोहर जोशी को ‘मार्गदर्शक’ बना दिया गया लेकिन शायद ही कोई उनसे रास्ता पूछे! बेहतर होता कि वह पहले दीवार पर लिखा पढ़ लेते। विशेषतौर पर लालकृष्ण आडवाणी जरूरत से अधिक अड़ते रहे। मैंने खुद लिखा था कि आडवाणीजी को कृष्ण बनना चाहिए, अर्जुन नहीं। गृहमंत्री राजनाथ सिंह जो मंत्रिमंडल में दो नम्बर पर हैं और जो जरूरत पडऩे पर प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति में मंत्रिमंडल की बैठक की अध्यक्षता करेंगे, को ऊंची आवाज में कहना पड़ा कि वह तथा उनका पुत्र निर्दोष हैं तथा उनके खिलाफ साजिश की जा रही है और उलटी खबरें प्रकाशित करवाई जा रही हैं। राजनाथ सिंह को कौन ठिकाने लगाने की कोशिश कर रहा है?
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सब एक मजबूत नेता तथा प्रशासक समझते हैं। उन्होंने भी ऐसी स्थिति क्यों आने दी कि उन्हें अपने गृहमंत्री के पक्ष में बयान देना पड़ा? प्रधानमंत्री की ही तरह भाजपा अध्यक्ष भी ‘आउटसाइडर’ हैं। दोनों को सावधान हो जाना चाहिए क्योंकि दिल्ली बिलकुल निर्मम जगह है। यह तो सदियों से साजिशों की राजधानी रही है जिसके बारे शायर ने सही कहा है,
पगड़ी अपनी संभालिएगा मीर,
और बस्ती नहीं यह दिल्ली है!
मामला खत्म नहीं हुआ यह इस बात से पता चलता है कि अब फिर खबर लीक कर दी गई कि प्रधानमंत्री ने गृहमंत्री के नागा वार्ताकार के सुझाव को ठुकरा दिया है। एक सरकार में यह सामान्य प्रक्रिया है लेकिन छपवाया ऐसा गया कि जैसे राजनाथ सिंह की फिर फजीहत हुई है। दो सप्ताह चुप रहने के बाद प्रकाश जावडेकर भी कह रहे हैं कि नहीं, उन्हें जीन्स तथा टीशर्ट डाल कर जाने पर प्रधानमंत्री की फटकार नहीं पड़ी।
इस सारे प्रकरण से धारणा यह बन रही है कि सरकार के शिखर में कुछ गड़बड़ है। इस पर तत्काल रोक लगाई जानी चाहिए क्योंकि बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी! ऐसी धारणा का कोई प्रमाण नहीं होता लेकिन जब यह फैल जाए तो बहुत नुकसान करती है। मुझे मालूम नहीं कि वास्तव में सरकार के अंदर से कोई ऐसी शरारत कर रहा है या नहीं, पर अगर ऐसा हो रहा है तो उस पर लगाम लगनी चाहिए क्योंकि आज राजनाथ सिंह को निशाना बनाया गया तो कल को दूसरों को भी निशाना बनाया जा सकता है। प्रधानमंत्री को भी।
आखिर में सब कुछ एक व्यक्ति पर आकर ठहर जाता है, नरेन्द्र मोदी। यह उनकी सरकार है जिस तरह पिछली सरकार मनमोहन सिंह की नहीं थी जिसकी कीमत उन्हें तथा देश दोनों को चुकानी पड़ी। संतोष यह है कि प्रधानमंत्री नेतृत्व दे रहे हैं जो 10 वर्ष के बाद एक नया अनुभव है।  वह बदल रहे भारत की जरूरत को समझ रहे हैं। सर्वेक्षण भी बता रहे हैं कि उनकी लोकप्रियता पहले से बढ़ी है। उन्हें यह भी फायदा है कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस पीछे हट रही है। राहुल इस परिस्थिति में नेतृत्व देने को तैयार नहीं हैं। उनकी नेपाल तथा जापान की यात्राएं सफल रहीं। पाकिस्तान के साथ विदेश सचिव स्तर की वार्ता रद्द करने के सरकार के कदम की कुछ नाजुक दिल वालों ने आलोचना की है लेकिन इस्लामाबाद में जो घमासान चल रहा है वह सिद्ध करता है कि अभी पाकिस्तान के साथ वार्ता का समय नहीं है। एक तरफ सभी के बैंक खाते खुलवा कर तथा दूसरी तरफ घर-घर में शौचालय पर जोर देकर प्रधानमंत्री इस सुस्त समाज को बदलने की भी कोशिश कर रहे हैं। समाज को उसकी बदसूरत शकल का आइना दिखाया जा रहा है। ‘न खाऊंगा न खाने दूंगा’ एक बड़ा संदेश है। जो इसे नहीं समझते वह अपने लिए मुसीबत को आमंत्रित कर रहे हैं क्योंकि यह प्रधानमंत्री साबित कर चुके हैं कि वह सख्त कदम उठाने की क्षमता रखते हैं। वह यह भी कह चुके हैं कि अगर आप 12 घंटे काम करोगे तो मैं 13 घंटे करूंगा। दिल्ली में मंत्रियों तथा सरकारी बाबुओं के कामकाज में परिवर्तन नज़र आ रहा है। कईयों की नींद उड़ रही है।
लेकिन प्रधानमंत्री मोदी का इन 100 दिनों में योगदान इस सबसे विशाल है। उनके कारण देश का आत्मविश्वास लौट रहा है। पिछले पांच वर्षों में हम सब लडख़ड़ा गए थे। अब देश का मिज़ाज सकारात्मक है, आशावादी है। लोगों को उम्मीद है। इसी से बदलाव आएगा, बेहतरी होगी। तस्वीर बदलेगी। इतनी जल्दी सफलता नहीं मिल सकती थी लेकिन बरसों बाद उम्मीद जगी है इसलिए बाकी 1625 दिनों की इंतज़ार कर रहा यह देश आज संतोष से यह कह तो सकता है :
कुछ नहीं तो कम से कम ख्वाब-ए-सहर देखा तो है
जिस तरफ देखा न था अब तक, उधर देखा तो है!

VN:F [1.9.22_1171]
Rating: 10.0/10 (1 vote cast)
VN:F [1.9.22_1171]
Rating: +1 (from 1 vote)
ख्वाब-ए-सहर देखा तो है, 10.0 out of 10 based on 1 rating
About Chander Mohan 537 Articles
Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.