मत बहको इतना पीके

मत बहको इतना पीके

मैंने पीके देखी है। अच्छी तरह से निर्मित फिल्म है। अदाकारी अच्छी है। फिल्मांकन, संगीत सब अच्छे हैं पर निश्चित तौर पर फिल्म हिन्दू धर्म का उपहास उड़ाती है और बाकी धर्मों को एक प्रकार से बख्श देती है। ठीक है बाबाओं तथा लोगों को ठगने के उनके तरीकों को नंगा किया गया है। आडम्बर के खिलाफ संदेश है। इसकी तो सदा ही जरूरत रहेगी लेकिन इसके साथ हिन्दू देवी-देवताओं का भी मज़ाक उड़ाया गया। हिन्दुओं के असम्मान के आरोपों को खारिज करते हुए निर्देशक राजकुमार हिरानी का कहना है कि फिल्म में मानवता का पाठ पढ़ाया गया है और यह महात्मा गांधी तथा संत कबीर के आदर्शों पर आधारित है। यह सही नहीं है। महात्माजी ने कभी भी इस तरह मज़ाक नहीं उड़ाया और कबीर ने प्रेमभाव से समाज की कमजोरियों पर चोट की थी। मिसाल के तौर पर भगवान शिव को दूध चढ़ाने का विरोध किया गया और कहा गया कि यह दूध बच्चों को बांटना चाहिए। यह तर्क हो सकता है पर हर धर्म के प्रति आस्था तर्क से ऊपर होती है केवल हिन्दू धर्म पर ही क्यों चोट की गई है? ऐसे तो हर धर्म के स्थल को अनाथ आश्रम या शिक्षा संस्थान या अस्पताल में बदल देना चाहिए। मिसाल के तौर पर वेटिकन पर जितना खर्च होता है उसे अगर बचा लिया जाए तो छोटी मोटी सरकार चल सकती है। यह हिरानी को क्यों नज़र नहीं आया? आमिर खान को केवल शिव, गणेश और लक्ष्मी माता के लापता होने वाले पोस्टर लगाते दिखाया है क्या बाकी धर्मों के ईष्ट मौजूद हैं यहां? एमएफ हुसैन ने भी हिन्दू देवियों के ही अर्धनग्न चित्र बनाए थे अपने मज़हब की हस्तियों को छुआ तक नहीं। अपनी मां की तस्वीर बनाई तो सिर से पैर तक ढकी हुई थी। ‘कला की यह स्वतंत्रता’ एक पक्षीय क्यों है? पीके में यह भी दिखाने की कोशिश की गई कि मंदिर जाने वाले लोग भगवान के डर से वहां जाते हैं। क्या ऐसा मस्जिद या चर्च या दूसरे धर्मस्थलों के बारे नहीं होता? अगर मूर्ति पूजा सही नहीं तो पोप और ईसाई भी तो ईसा की मूर्ति को चूमते हैं। इस पर आपत्ति क्यों नहीं? बाकी धर्मों के प्रति हिरानी तथा आमिर खान इतने उदार क्यों रहे हैं?
बहुत सवाल किए जा सकते हैं। हज यात्रा पर ही जाने की क्या जरूरत है? चर्च के अंदर बहुत कुछ गलत चलता रहा है जिस पर किताबें लिखी गई हैं। बच्चों के यौन शोषण से लेकर समलैंगिक बलात्कार की शिकायतें हो चुकी हैं जिसे लेकर एक पूर्व पोप माफी मांग चुके हैं। इन पर खामोश क्यों? हर धर्म में अपने भक्तों को साथ रखने के लिए कुछ न कुछ ऐसा है जो तर्क की कसौटी पर खरा नहीं उतरेगा। बुद्ध के जीवन में भी कई चमत्कार का जिक्र है जिन्हें आज मानना मुश्किल है। जो आज के विचारों से अतीत को परखने की कोशिश करेंगे उन्हें बहुत कुछ गलत नज़र आएगा पर ऐसा केवल हिन्दू धर्म में ही नहीं है। अंतर केवल यह है कि बाकी धर्मों की अवमानना करने की हिम्मत नहीं होती। लेकिन इस सबके बावजूद मैं इस फिल्म पर पाबंदी या इसके खिलाफ किसी तरह की हिंसा के विरुद्ध हूं। हमारा धर्म बहुत महान है, बहुत विशाल है। कई क्रूर हमलावर कुछ नहीं बिगाड़ सके तो एक मामूली फिल्म क्या बिगाड़ लेगी? पंजाब में भी पहले कुछ फिल्मों पर पाबंदी लग चुकी है क्योंकि सिखों को इन पर ऐतराज था। फिल्म ‘विंची कोड’ पर कुछ राज्यों में पाबंदी लगाई गई क्योंकि ईसाइयों को इस पर ऐतराज था। यह भी जायज़ नहीं। वैसे भी सब बड़े धर्म इतने प्राचीन हैं और इनकी जड़ें इतनी गहरी हैं कि एक फिल्म इनका कुछ बिगाड़ नहीं सकती। दूसरा, एक बार सैंसर बोर्ड ने इसे पारित कर दिया फिर किसी भी हिंसा या विरोध की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। अगर उसके बाद भी शिकायत है तो अदालत का दरवाजा खटखटाया जा सकता है। जिस देश में कानून का राज्य हो वहां हिंसा नहीं होनी चाहिए। तीसरा, देर से इन प्रदर्शनों से लाभ क्या होगा? हिरानी साहिब तो अपने करोड़ों बना चुके हैं क्योंकि यह फिल्म जबरदस्त हिट रही है। प्रदर्शन कर आप तो फिल्म को मुफ्त प्रचार दे रहे हो। जिसने नहीं देखनी वह भी देखने जाएगा। आखिर में मामला दर्शक के विवेक पर छोड़ दिया जाना चाहिए। जो नहीं देखना चाहे, वह न देखे। जिन्हें पसंद आई है वह भी पूजा-पाठ नहीं छोड़ेंगे। पंजाब में डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम की फिल्म ‘एमएसजी’ को लेकर सिखों तथा डेरा प्रेमियों के बीच टकराव हो रहा है। यह भी अनुचित है। यह फिल्म भी सैंसर बोर्ड द्वारा पारित है।
हर मामले में लाठी उठा लेना या विरोधियों को गालियां देना उचित नहीं है। हम एक सभ्य लोकतंत्र हैं लेकिन कुछ संगठन यह प्रभाव दे रहे हैं कि वह किसी भी प्रकार का विरोध बर्दाश्त नहीं करते। सांसद साक्षी महाराज ने नत्थू राम गोडसे को ‘देशभक्त’ कह दिया। तूफान उठने पर बाद में माफी मांग ली। हिन्दू महासभा गोडसे के मंदिर बनाना चाहती है। हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय महासाचिव ने टीवी कार्यक्रम में गोडसे द्वारा गांधीजी की हत्या को न्यायोचित ठहरा दिया है। उसका कहना था कि किसी ‘उद्देश्य’ के लिए हत्या करना अपराध नहीं है। पेशावर में बच्चों की हत्या करने वाला तालिबान भी तो यही औचित्य देता है? जब एंकर ने पूछा कि क्या उनके व्यवहार के कारण दूसरों को उनका गला दबाने का अधिकार मिल जाता है तो वह खामोश हो गए। पर हिन्दू महासभा मेरठ में गोडसे के मंदिर के लिए भूमि पूजन कर चुकी है। क्या यह लोग पागल हो गए हैं? मुख्यधारा से खुद को बिलकुल अलग कर लेना है क्या? जिसने राष्ट्रपिता की हत्या कर दी वह देशभक्त हो गया? जिस महात्मा का विदेशों में भी इतना आदर है कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के कमरे में चित्र लटका हुआ है, उसके हत्यारे की यहां मूर्ति बनेगी? अगर हम इस तरह गलतियां ढूंढते रहे तो कोई भी महापुरुष नहीं बचेगा। गांधीजी ने सही कहा था कि ड्रेन इंस्पेक्टर को गंदगी ही नज़र आएगी। हिन्दू महासभा की करतूत को देश में कहीं समर्थन नहीं है लेकिन ये ‘हिन्दू’ परिभाषा को बदनाम कर रहे हैं। जिस महामानव ने आजादी की लड़ाई लड़ी और जिसका अहिंसा का सिद्धांत आज तक दुनिया को रोमांचित कर रहा है कि काहिरा, हांगकांग जैसी जगहों में आजादी तथा लोकतंत्र के लिए आंदोलन उनसे प्रेरित थे और इमरान खान ने भी पाकिस्तान में नवाज शरीफ की सरकार के खिलाफ ‘धरना’ दिया, उसी महात्मा के हत्यारे को इस देश में महिमामंडित किया जाएगा? इस देश से उसके आदर्श को छीन कर एक हत्यारे को आदर्श प्रस्तुत करने का प्रयास निंदनीय और शर्मनाक है। इस करतूत पर तो गांधीजी का यह कथन याद आता है, ‘पाप तो इतिहास के आरंभ काल से चला आ रहा है लेकिन उसकी उपासना हमने अभी शुरू की है।’

VN:F [1.9.22_1171]
Rating: 10.0/10 (3 votes cast)
VN:F [1.9.22_1171]
Rating: +4 (from 4 votes)
मत बहको इतना पीके, 10.0 out of 10 based on 3 ratings
About Chander Mohan 564 Articles
Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.

2 Comments

  1. समाज की कमजोरियों पर चोट करने के बहाने एक धर्म विशेष को ही निशाना बनाना फिल्म निर्माताओं की नीयत में खोट को साबित करता है और सैंसर बोर्ड पर भी सवाल खड़े करता है, फिर भी हिंसात्मक विरोध को किसी भी प्रकार उचित नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट में अपील या दर्शकों का विवेक ही सही रास्ता है। यू.पी. में इस फिल्म को टैक्स फ्री करना तो किसी भी प्रकार ज़ायज नहीं है, यह तो सरकारी पैसे का दुरुपयोग तथा फिल्म निर्माताओं को सरकारी खज़ाने का सीधा लाभ है।
    गाँधी के आदर्शों का बखान और उसके हत्यारे का मन्दिर – यह दोहरा चरित्र हिंदुत्व की छवि को धूमिल करता है।
    डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम का सन्त के तौर पर नौटंकी में उतरना सन्त के नाम पर धब्बा, अनुयायियों के साथ छलावा तथा सन्त परम्परा का घोर अपमान है।

    VA:F [1.9.22_1171]
    Rating: 5.0/5 (1 vote cast)
    VA:F [1.9.22_1171]
    Rating: +1 (from 1 vote)
  2. A satire on Islam……… can get one killed
    A satire on Hinduism…….fetches 300+ crores……..

    I wonder what if it was not just a cartoon ……..but nude paintings of the holy persona associated with Islam………..
    what would have happened ?

    Only in a Hindu majority India can M F Hussain paint nude Hindu gods & goddesses…….& petty political figure like Owasis threaten Hindus with obliteration and mass massacres………..

    We are a creed who are non violent ………but our non violent proclivity………should be considered as a sign of meekness or weakness by those creeds who ……..expand and perpetuate by violence and politics of terror, threat, coercion and conversion……..

    VA:F [1.9.22_1171]
    Rating: 0.0/5 (0 votes cast)
    VA:F [1.9.22_1171]
    Rating: 0 (from 0 votes)

Comments are closed.