Simla mein 200 saal

शिमला में 200 साल

शिमला में जिलाधीश के कार्यालय की स्थापना के 200 साल हो गए। पहले भारतीय अफसर जो जिलाधीश रहे वह केवल सिंह चौधरी थे जो आईसीएस थे और 1947 से 1948 के बीच जिलाधीश रहे। अर्थात् 1815-1947 के बीच ब्रिटिश जिलाधीश ही रहे। शिमला अंग्रेजों की ग्रीष्म राजधानी भी थी इसलिए भी प्रशासनिक नियंत्रण उन्होंने अपने हाथ रखा था। इस ऐतिहासिक क्षण को याद रखने के लिए समारोह में मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने वायदा किया कि सभी ऐतिहासिक हैरीटेज इमारतों का नवीकरण किया जाएगा। गेयटी थिएटर हो चुका है अगली बारी जिलाधीश कार्यालय की है। यह सभी इमारतें देश के इतिहास का हिस्सा हैं। अफसोस है कि कैनेडी हाउस तथा पीटर हॉफ जैसी कई पुरानी इमारतें अग्नि की भेंट चढ़ चुकी हैं पर जरूरत केवल इन इमारतों के रख-रखाव की ही नहीं जरूरत तो शिमला शहर के अपने रख-रखाव की भी है। राजधानी होने के कारण इस शहर पर अत्याधिक दबाव है जो अब वह झेल नहीं सकता ऊपर से गर्मियां हैं जिस कारण टूरिस्ट ‘फुट फॉल’ बहुत बढ़ गया है। यह बढऩा भी चाहिए क्योंकि टूरिस्ट से प्रदेश की अर्थव्यवस्था को बहुत बढ़ावा मिलता है लेकिन इस दबाव को संभालने की कार्ययोजना की जरूरत है। रोजाना 4000 टूरिस्ट वाहन शिमला में प्रवेश करते हैं इनकी पार्किंग की जगह ही नहीं है। बड़ी-बड़ी बसें आ रही हैं इन्हें खड़ा करने की जगह नहीं है। शहर में 80,000 रजिस्टर्ड वाहन हैं जबकि 1000 की ही जगह है। बाकी इधर उधर पड़े रहते हैं जिससे रास्ते तंग हो रहे हैं। पिछले शनिवार को पर्यटकों के सैलाब के कारण सड़कें जाम हो गईं और ओल्ड बस स्टैंड से लेकर 10 किलोमीटर दूर तारादेवी तक जाम लग गया। ढली से लेकर कुफरी तक पर्यटक फंस गए।
अब हाईकोर्ट ने दखल देते हुए आदेश दिया कि वाहन खरीदने से पहले शहरवासी को यह प्रमाणपत्र देना पड़ेगा कि उसके पास वाहन को पार्क करने की जगह है। हाईकोर्ट का यह दखल ठीक समय पर आया है क्योंकि न केवल कार्ट रोड बल्कि अंदरूनी सड़कें भी खड़े वाहनों के कारण इतनी तंग हो गई हैं कि जरूरत पडऩे पर एम्बूलैंस या फायर ब्रिगेड जैसे वाहन वहां से निकल नहीं सकेंगे। नेपाल में आए भूचाल के बाद और चौकस हो जाना चाहिए। हिमाचल के मंत्री सुधीर शर्मा कह ही चुके हैं कि अगर शिमला में भूचाल आ गया तो यह शहर ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा। शिमला में खुली जगह नहीं रही जहां भूचाल की स्थिति में लोग भाग सकें न ही वह रास्ते रहे जहां एमरजेंसी वाहन जा सके। अनियंत्रित निर्माण तथा पर्यावरण से खिलवाड़ के कारण शिमला की जलवायु भी बदल रही है। माल रोड की कई दुकानों में एसी आ गए। घर में पंखे पहुंच गए। इससे आखिर में शिमला अपना आकर्षण खो बैठेगा। यह भी चर्चा रही कि शिमला को ‘यूनेस्को विश्व विरासत स्थल’ का दर्जा दिया जाएगा पर जैसे हाईकोर्ट ने भी टिप्पणी की है, ‘क्या इस शहर को इस हालत में विरासत का दर्जा मिल सकता है जब कब्जाधारियों के मज़े हैं और सड़कें पूरी तरह से ठप्प हैं?’
शिमला की समस्या केवल ट्रैफिक ही नहीं है शहर पर हर तरह के दबाव के कारण नागरिक सुविधाएं चरमरा गई हैं। पानी की बड़ी कमी है। टूरिस्ट सीज़न के कारण मांग 42-43 एमएलडी की है जबकि पूर्ति 38-39 एमएलडी की है। गर्मियों में शहर में पानी राशन किया जाता है। सैनिटेशन की अपनी अलग समस्या है। मॉल रोड से नीचे के क्षेत्र बहुत सालों से म्युनिसिपिल लापरवाही का शिकार हैं। बहती नालियों का पानी लोगों के सिरों पर गिरता है। कूड़ा-कर्कट का निपटारा बहुत मुश्किल काम है। जगह की तंगी है इसलिए इसे बायपास के इर्दगिर्द फेंका जाता है जहां बहुत दुर्गंध रहती है। अर्थात् शिमला का संकट बहुआयामी है नगर निगम इससे निबटने में असमर्थ है जो बात वह स्वयं स्वीकार करते हैं इसलिए हिमाचल सरकार को शिमला के पतन को रोकने के लिए दखल देना चाहिए जिसमें फिलहाल नया निर्माण रोक दिया जाना चाहिए और उस पर सख्ती से अमल होना चाहिए। मेरा शिमला से भावनात्मक रिश्ता है क्योंकि पाकिस्तान से उजड़ कर परिवार ने वहां आश्रय लिया था। पहली बार मैं वहां 1948 में दो वर्ष की आयु में गया था जब सचिवालय के पास डिम्पल काटेज हमारा घर था। तब से लेकर अब तक शिमला बहुत बदल गया और बदलना चाहिए भी लेकिन इस तरह नहीं बदलना चाहिए जैसा आज बदल रहा है। एक ही व्यक्ति हैं जो इसका वैभव फिर से कायम करवा सकते हैं। वह शिमला के सबसे पुराने तथा वफादार नागरिकों में से हैं जिनका अपना बंगला ‘हॉली लॉज’ शिमला का सबसे खूबसूरत बंगला है। मेरा अभिप्राय हिमाचल के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह से है जिनका शिमला के साथ अटूट रिश्ता है। उन्हें अपने इस कार्यकाल में शिमला को उसका पुराना वैभव लौटाने की जिम्मेवारी उठानी होगी। यह काम केवल वह ही कर सकते हैं।
शिमला पर दबाव कम करने के लिए हिमाचल सरकार अब सक्रिय हो गई है। रोपवे बनाए जा रहे हैं और नए पार्किंग स्थल की कार्ययोजना तैयार की जा रही है। शिमला को रिंग रोड की बहुत जरूरत है ताकि ऊपर का ट्रैफिक बाहर से ही निकल जाए। हिमाचल स्विट्जरलैंड के बराबर खूबसूरत है। यहां अनेक खूबसूरत स्थल हैं। पर्यटकों को दूसरी जगह डाइवर्ट करने की भी जरूरत है। इस बीच रोहतांग दर्रे पर जाने वाली टैक्सियों को लेकर गतिरोध जारी है। मामला रोजगार से सम्बन्धित भी है और यह बात भी सही है कि वाहन प्रदूषण ग्लेशियर के पिघलने का एकमात्र कारण नहीं है पर रोहतांग पर पहुंचते टूरिस्ट तथा धुआं उड़ाते वाहनों के कारण उसका पर्यावरण प्रभावित हो रहा है जो नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की बड़ी चिंता है। कई टन कचरा वहां बिखरा होता है। पर्यावरण तथा पर्यटन की जरूरत के बीच तालमेल चाहिए। वाहन के अतिरिक्त रोहतांग तक पहुंचने के रोपवे जैसे और भी रास्ते हो सकते हैं। स्विटजरलैंड में ज़रमैट जैसी कई जगह हैं जहां वाहन ले जाने की मनाही है केवल बैटरी वाले वाहन चलते हैं जो प्रदूषण तथा आवाज पैदा नहीं करते। छोटे छोटे रेल के डिब्बे वहां पहुंचाते हैं। अर्थात् पर्यटकों को पहुंचाने के लिए नए ढंग तलाशने होंगे। हमारे लोगों को भी समझना चाहिए कि कुछ उनकी भी जिम्मेवारी है। वह हर जगह कचरा नहीं फेंक सकते, शिमला में भी यही समस्या है और रोहतांग पर भी है। लोगों के पास पैसा आ गया, वाहन आ गए लेकिन पर्यटन-संस्कृति अभी भी हम पैदा नहीं कर सके। जयपुर के महान अमेर किले की दीवार पर जब ‘गौरव लवज़ प्रियंका’ लिखा देखा तो आंसू बहाने को दिल चाहा। हमें तमीज़ कब आएगी?

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Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.