Gurdaspur ke baad Udhampur ke baad

गुरदासपुर के बाद ऊधमपुर के बाद

गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने पुष्टि कर दी है कि गुरदासपुर जिले के दीनानगर पर हमला करने वाले तीनों आतंकवादी पाकिस्तान से आए थे। खुफिया एजेंसियां लश्कर-ए-तोयबा, जैश-ए-मोहम्मद तथा हिजबुल मुजाहिद्दीन का नाम लेती हैं। पाकिस्तान भारत के आरोप का प्रतिवाद करता है। ऐसी उनकी आदत है। ऊधमपुर में पकड़े गए नावेद के बारे भी अजमल कसाब की ही तरह यह कहना था कि हमें सबूत दो जबकि उनकी अपनी जांच एजेंसी एफएआई के पूर्व प्रमुख तारिक खोसा ने मुम्बई पर हमले के बारे लिखा है, ‘क्या एक राष्ट्र के तौर पर हमारे पास यह हिम्मत है कि हम असुखद सच्चाई का सामने कर सकें?’ दोनों देशों के रिश्ते लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। बचाव यह है कि दीनानगर के पास रेल ट्रैक पर लगे बम फटे नहीं, अगर कोई रेलगाड़ी उड़ जाती तो हालात नाजुक बन जाते। लेकिन एक बात पर पाकिस्तान का मीडिया सहमत है कि इन घटनाओं का भारत-पाक रिश्ते पर नकारात्मक असर पड़ेगा। एक्सप्रैस ट्रिब्यून अखबार ने दीनानगर के हमले के बाद लिखा है कि ‘जो भी इसके लिए जिम्मेवार हो, इससे आपसी विश्वास का जो घाटा है वह स्वयं ही बढ़ जाएगा और दोनों देशों के बीच शांति की संभावना और कम होगी।’ भारत सरकार यहां फंस गई है। लोकराय को संतुष्ट करने के लिए उसे पाकिस्तान के प्रति सख्त रवैया अपनाना होगा। चुनाव अभियान के दौरान नरेन्द्र मोदी पाकिस्तान की शरारत का तगड़ा जवाब देने का वायदा भी कर चुके हैं पर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की मांग है कि भारत पाकिस्तान से वार्ता करता रहे। रूस के ऊफ शहर में दोनों प्रधानमंत्रियों ने वार्ता आगे बढ़ाने का फैसला भी किया था इसीलिए इस महीने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के स्तर की बैठक होगी पर इससे हासिल कुछ नहीं होगा। केवल दिखावा होगा। पंजाब पुलिस के पूर्व प्रमुख केपीएस गिल ने सही कहा है कि ‘जहां तक वार्ता का सवाल है यह एक लगातार चल रहा तमाशा है जो हमें कहीं नहीं पहुंचाएगा…दशकों से वार्ता चल रही है और दशकों से वार्ता में विघ्न पैदा किया जा रहा है।’
पाकिस्तान की भूगौलिक स्थिति ऐसी है और उसके पास आतंकवादियों का जो भंडार है उसके कारण बाकी देश उसे अलग थलग नहीं कर रहे। चीन के साथ उसके रिश्ते और घनिष्ठ हो गए हैं क्योंकि पाकिस्तान अब चीन का मुवक्किल देश बन चुका है। उनकी नीति कितनी सफल है यह इस बात से पता चलता है कि न केवल चीन बल्कि अमेरिका भी उनकी अरबों रुपए की सहायता कर रहा है। हमारे विकल्प कम हो रहे हैं क्योंकि दुनिया ने फैसला कर लिया है कि पाकिस्तान कुछ भी कर ले उसे डूबने से बचाना है। मध्य पूर्व में आईएस के बढ़ते कदम तथा अफगानिस्तान में उसकी दस्तक के कारण भी पाकिस्तान के सहयोग का महत्व बढ़ गया है। इसलिए जहां तक भारत का सवाल है पाकिस्तान बेपरवाह है। नवाज शरीफ तो केवल एक मुखौटा हैं। वह चाहे भारत के साथ बेहतर सम्बन्ध चाहते हों क्योंकि पाकिस्तान के खुद फटेहाल हैं, पर पाकिस्तान स्टेट की नीति तो यह लगती है कि हम तो डूबे हैं सनम, तुम्हें भी ले डूबेंगे! पाकिस्तान भारत के बढ़ते प्रभाव तथा आर्थिक ताकत से आशंकित है इसीलिए हमें बार-बार उत्तेजित कर रहा है। पंजाब के अंदर हमला करने का यह बड़ा मकसद है। चिंता यह है कि और गुरदासपुर भी हो सकते हैं। उनकी रक्षा विशेषज्ञ आयशा सद्दीका ने लिखा है, ‘इससे पता चलता है कि आतंकी गुटों की भारत के अंदर कहीं भी हमला करने की क्षमता तथा इरादा है…पूर्वी पंजाब में कमजोरी ढूंढने की उनकी क्षमता है जिसका बाद में इस्तेमाल हो सकता है।’ 2012 से जम्मू कश्मीर में हिंसा बढ़ रही है जिससे यह एहसास होता है कि टकराव गर्म हो रहा है जैसा 1965 की लड़ाई से पहले भी था। पहले कश्मीर, फिर जम्मू और अब पंजाब पर हमला कर पाकिस्तान उत्तेजना बढ़ा रहा है ताकि नरेन्द्र मोदी के तेज़ विकास के लक्ष्य को पटरी से उतारा जा सके। पंजाब में खालिस्तान के स्लीपर सैल को संदेश देना भी एक मकसद हो सकता है।
नरेन्द्र मोदी की सरकार की पाकिस्तान नीति भी कलाबाजी खा रही है। कभी वह हुर्रियत वालों की पाक उच्चायुक्त से बातचीत के बाद वार्ता रद्द कर देते हैं तो अब दीनानगर तथा ऊधमपुर में आतंकी हमले के बावजूद वार्ता जारी रखी जा रही है। भारत सरकार पाकिस्तान के लोकतांत्रिक नेताओं को ताकत देने के लिए उनसे बातचीत जारी रहेगी पर ‘नॉन-स्टेट एक्टर्ज’ का बराबर जवाब दिया जाएगा। यह नीति कितनी कारगर होगी यह समय बताएगा। मुझे इसके अधिक कारगर होने की संभावना नज़र नहीं आती क्योंकि एक, पाक सेना शरारत से बाज नहीं आएगी तथा दूसरा, अगर सीमा पर इसी तरह टकराव तथा देश के अंदर आतंकवादी घटनाएं जारी रहीं तो लोकराय इस वार्ता के खिलाफ हो जाएगी, जैसा मनमोहन सिंह सरकार के समय भी हुआ था। प्रमुख रक्षा विशेषज्ञ मारूफ रजा ने तो सुझाव दिया है कि भारत को सीधा पाक सेना से बात करनी चाहिए क्योंकि चाबी तो उनके हाथ में है। तो क्या यह ही समाधान है? नरेन्द्र मोदी की बड़ी समस्या है कि उनकी छवि उस व्यक्ति की है जो आतंक के खिलाफ दृढ़ है और समझौता नहीं करेगा। अगर पाकिस्तान से आतंकी हमले जारी रहे और भारत सरकार इनके प्रति कमजोर रही तो जो लोग नरेन्द्र मोदी के जयकारे लगाते थे वही आलोचना करना शुरू कर देंगे। ऐसे ही सिलसिला चलता रहा तो इन पर आरोप लगेगा कि वह भी आतंकियों को बिरयानी खिलाते हैं। खतरनाक आईएस से भी चुनौती आ सकती है। सरकार की कश्मीर नीति तथा मुफ्ती मुहम्मद सईद के साथ गठबंधन करने की नीति भी फेल हो रही है। लगातार छठे सप्ताह हम श्रीनगर के मध्य में पाकिस्तानी झंडे लहराते देख रहे हैं। अब आईएस के झंडे भी आ गए हैं। क्या इसलिए हम सब ने पागलों की तरह भाजपा को वोट दिया था कि कश्मीर में देश विरोधी तत्वों का प्रसार हो? बरसों बाद जवाहर टनल के दक्षिण में हमला हुआ है। यह गंभीर स्थिति है। जम्मू कश्मीर की सरकार मूकदर्शक है। गठबंधन साथियों के मतभेदों के कारण वह अपनी भूमिका नहीं निभा रही यहां तक कि मध्य मई के बाद मुख्यमंत्री मुफ्ती मुहम्मद सईद ने मंत्रिमंडल की बैठक भी नहीं बुलाई। कुशासन तथा रुके विकास ने कश्मीर की समस्या को और गंभीर बना दिया है। मोदी सरकार यहां भी बेबस और फंसी नज़र आती है। जिस तरह आतंकी वारदातों के बावजूद वह पाकिस्तान के साथ वार्ता के लिए मजबूर है उसी तरह वह मुफ्ती मुहम्मद सईद का बोझ ढोने के लिए मजबूर है क्योंकि इस समय उस सरकार से हटने से स्थिति और खराब होगी। मुफ्ती भी यह समझते हैं इसलिए परवाह नहीं कर रहे। लेकिन भारत सरकार तो अब लोकराय के कटघरे में खड़ी है। उन्होंने देश को अधिक सुरक्षित करने का वायदा किया था। अब इस वायदे की परीक्षा हो रही है।

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Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.