कोरोना काल में सरकार और विपक्ष , Government and Opposition in Covid Times

आजाद भारत में इस महामारी से पहले बड़ा राष्ट्रीय संकट 1962 की सर्दियों में आया था जब चीन के हाथों हमें मार पड़ी थी। यह शिकस्त हमें बड़े सबक़ सिखा गई पर तब के घटनाक्रम में लोकतन्त्र के लिए भी सबक़ छिपा है। देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने निश्चित किया कि संसद में घटनाक्रम पर पूरी बहस हो। बहस के दौरान वह पूरा समय सदन में मौजूद रहे यह जानते हुए भी कि उनसे कड़वे और असुखद सवाल पूछे जाएँगे। वह महसूस करते थे कि वह देश के नेता हैं इसलिए जो कुछ हुआ सबसे अधिक उनकी जवाबदेही बनती है। विपक्ष ने सरकार और विशेष तौर पर नेहरू पर ज़बरदस्त हमला किया। उन्होने ख़ूब बेइज़्ज़ती सही। अगर वह चाहते तो बहाना बना सकते थे कि युद्ध की स्थिति में संसद में बहस हमारे प्रयासों को प्रभावित कर सकती हैं लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री ने ख़ुद बहस को आमंत्रित किया। लोकसभा में 165 सांसदों ने बहस में हिस्सा लिया। जिस बात की आज कल्पना भी नही की जा सकती, उनकी अपनी पार्टी के कुछ सांसदों ने सरकार की ख़ूब आलोचना की पर किसी को पार्टी से निकाला नही गया। असम के सांसदों ने तो अपशब्द तक कहे। जनसंघ के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा कि ‘आप महान पाप के भागी बने हो’। नेहरू चुपचाप सब सुनते रहे और सहते रहे। याद आता है के एम मुंशी ने 1984 में संविधान सभा में कहा था कि ‘सरकार की आलोचना लोकतन्त्र का निचोड़ है’।

नेहरू नियमित तौर पर पत्रकार सम्मेलन करते थे जो परम्परा डा.मनमोहन सिंह तक चलती रही। उन्हे अहसास था कि उन्होंने इस युवा गणराज्य के लिए स्वस्थ परम्पराओं की नींव डालनी है। आज वह हालत नही। अधिकतर महत्वपूर्ण बहस से मोदी दूर रहतें हैं। लद्दाख में चीनी घुसपैंठ पर मानसून अधिवेशन में बहस के समय वर्तमान प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री सदन में नही आए।  विपक्ष की आवाज़ को भी शोर से दबाने की कोशिश की जाती है। इस प्रवृत्ति से न केवल देश का नुक़सान होता है बल्कि सरकार के लिए भी हानिकारक है क्योंकि सच्चाई छिपी रहती है। स्वस्थ आलोचना से नुक़सान नही होता। पूर्व प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव ने एक बार कहा था कि राजनीति में रहने के लिए मोटी चमड़ी चाहिए। नरेन्द्र मोदी ने भी बहुत नाजायज़ अपशब्द सुने हैं, लेकिन सत्तापक्ष और विपक्ष का टकराव कहीं तो ख़त्म होना है। विशेषतौर पर इस आपातकालीन स्थिति में जरूरी हैं कि सतापक्ष और विपक्ष सहयोग करें लेकिन सरकार मामूली विरोध भी बर्दाश्त नही कर रही। दिल्ली में प्रधानमंत्री मोदी के ख़िलाफ़ पोस्टर लगाने वाले 20 लोगों को गिरफ़्तार कर लिया गया जिसमें औटो वाला भी शामिल है और पोस्टर चिपकाने वाले भी। परिणाम है कि जिन लोगों को नही भी पता था उन्हे पता चल गया कि ऐसे पोस्टर लगें हैं। जिन्होंने इस कार्यवाही का आदेश दिया उन्होंने प्रधानमंत्री की छवि का अहित किया है। प्रधानमंत्री मोदी ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को फ़ोन कर जिस तरह उनकी सरकार कोविड से निबटी है इसके लिए बधाई दी जबकि स्थानीय भाजपा उस सरकार का विरोध कर रही है। एक लोकतन्त्र में ऐसी उदारता की अपेक्षा है न कि उस सरकार की जो पोस्टर भी बर्दाश्त नही कर सकती। कितने अफ़सोस की बात है कि दिल्ली पुलिस उन लोगों से पूछताछ कर रही है जो दूसरों की मदद करतें रहें हैं। क्या इस घोर विपत्ती में दूसरों की मदद करना भी अपराध बन गया?क्या सोनू सूद से भी पूछताछ होगी?

ऐसी ही ज़िद्द दिल्ली में सेंट्रल विस्टा को लेकर दिखाई जा रही है। मैं इस योजना के पक्ष में हूँ क्योंकि मेरा मानना है कि दिल्ली में जो कुछ भव्य है वह या तो मुग़ल बना गए या अंग्रेज़ छोड़ गए। आजाद भारत ने अपना राजधानी में कुछ नया भव्य नही बनाया। पर इसका टाईमिंग बिलकुल ग़लत है। कोरोना के बीच जब करोड़ों रोजगार छूट गए, लाखों मारे जा चुकें हैं, दवाई और आक्सिजन की कमी से अभी भी लोग मर रहें हैं (गोवा), ऐसे समय में इस योजना पर 20-25 हज़ार करोड़ रूपए ख़र्च करना पैसे की घोर बर्बादी लगती है। यही पैसा सबको मुफ़्त टीका लगाने के लिए पर्याप्त होना चाहिए। देश का माहौल अत्यन्त गमगीन है ऐसे वक़्त पर इस चमकते निर्माण पर तो यही कहा जासकता है,

इस दौर-ए-तरक़्क़ी के अन्दाज़ निरालें हैं

ज़हनों में अंधेरा है,सड़कों पे उजालें है

इस  संकट में जरूरी है,जो बात ख़ुद प्रधानमंत्री ने भी कही है,कि कोरोना से जुड़े आँकड़ो के बारे पूरी पारदर्शिता रखी जाए। सरकारी आँकड़े और ज़मीन से तस्वीरें मेल नही खाती। भाजपा के  नेता राम माधव का भी कहना है, “ थोड़ी अधिक पारदर्शिता, राजनीतिक नेतृत्व का जनता के साथ थोड़ा अधिक संवाद, सकारात्मक आलोचना के प्रति थोड़ेखुलेपन से…सरकार के प्रयासों को अधिक मदद मिलती है”। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि, “बीते कुछ समय में देशवासियों ने जो कष्ट सहा है और जिस दर्द से वह गुज़रें हैं, वह मैं भी उतना ही महसूस कर रहाँ हूं”। प्रधानमंत्री की बात पर विश्वास है पर यही बात कहने में उन्हे तीन सप्ताह क्यों लग गए? जिस दौरान लोग अपने प्रियजन को बचाने के लिए इधर उधर भटक रहे थे, उनकी लम्बी ख़ामोशी बहुत ग़लत संदेश छोड़ गई है। देशबड़े दर्द में है ज़ख़्मों पर मरहम लगाने की बहुत ज़रूरत है। न ही उन्होंने अभी तक माना है कि उनकी सरकार से कुछ ग़लतियाँ हुई हैं, कुछ कमज़ोरियाँ रह गई हैं। अपनी ग़लती मानने से नेता कमज़ोर नही होता उलटा इंसानियत और विनम्रता झलकती है। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि “ पहली लहर के बाद हम लोग ज़रा गफ़लत में आ गए। क्या जनता, क्या शासन, क्या प्रशासन”।

इस स्वीकृति से मोहन भागवत का क्या घटा ? उलटा इज़्ज़त बढ़ी पर सरकार में कोई भी ऐसी ‘गफलत’ स्वीकार करने को तैयार नही। पहले दूसरी डोज़ के लिए चार सप्ताह का समय कहा गया, फिर आठ सप्ताह और अब 12-16 सप्ताह कहा जा रहा है। मेरे जैसे जो चार सप्ताह के बाद दूसरी डोज़ लगवा चुकें हैं, वह अब कंफयूज़ड है कि हममें पर्याप्त मात्रा में एंटी-बॉडी हैं या नही? इसी तरह कोई स्पष्टता नही कि वैक्सीन ख़रीदेगा कौन? इसे अब राज्यों पर डाला जा रहा है जबकि चाहिए कि ख़रीद केन्द्र करे और वितरण राज्य करें। प्रभाव यह मिल रहा है कि केन्द्र अपनी ज़िम्मेवारी से पल्ला झाड़ रहा है और इसे राज्यों पर फेंक रहा है। इससे केन्द्र और राज्यों में टकराव बढ़ेगा। रोज़ाना  निर्णय बदले जा रहें हैं, जिस पर ग़ालिब का यह लिखा याद आता है,

रोज़ इस शहर में इक हुक्म नया होता है,

कुछ समझ नही आता कि क्या होता है

140 करोड़ के देश को टीका लगाना, मैडिकल सुविधा पहुँचाना, आसान काम नही है। इतनी भीमकाय चुनौती के सामने कोई भी सरकार लड़खड़ा जाती। इनकी ग़लती है कि यह प्रभाव देते रहे कि वह सब कुछ सम्भाल सकतें हैं इसलिए असफलता के लिए भी इन्हें ही ज़िम्मेवार ठहराया जा रहा है।  अब इस सरकार को पूर्ण सहयोग मिलना चाहिए। विपक्ष का अधिकार है कि वह सरकार की आलोचना करे पर कभी लॉकडाउन का विरोध कर तो कभी लॉकडाउन की माँग करना अच्छी राजनीति हो सकती है पर यह देश हित में नही है। सरकार को भी विपक्ष के सुझाव यह कह कर रद्द नही करने चाहिए कि वह ‘नकारात्मकता फैला रहें हैं’ और विपक्ष को भी समझना चाहिए कि डूबेगी किश्ती तो डूबेंगे सारे! पर प्रमुख ज़िम्मेवारी सरकार की है कि वह सब को साथ लेकर चलने का प्रयास करे।

हमारा इतिहास देश हित में सरकार और विपक्ष के सहयोग के उदाहरणों से भरा पड़ा है।पी वी नरसिम्हा राव और अटल बिहारी वाजपेयी, एक प्रधानमंत्री और दूसरा विपक्ष का नेता, पक्के दोस्त थे। जब मार्च 1994 में कश्मीर को लेकर भारत को जिनेवा में मानव अधिकार आयोग में पाकिस्तान की तरफ़ से गम्भीर चुनौती मिल रही थी और यह सम्भावना बन रही थी कि हमारे ख़िलाफ़ मतदान हो जाएगा,तो भारत का पक्ष रखने कि लिए प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने विपक्ष के नेता वाजपेयी के नेतृत्व में वहां प्रतिनिधि मंडल भेजा जिसमें फ़ारूख अब्दुल्ला और सलमान ख़ुर्शीद भी शामिल थे। वाजपेयी ने इंकार नही किया जबकि सम्भावना थी कि हम हार जाऐंगे। लेकिन हम जीत गए और राव ने जीत का श्रेय वाजपेयी और  प्रतिनिधि मंडल को दिया। जब 1996 में वाजपेयी प्रधानमंत्री बने तो राष्ट्रपति भवन में शपथ ग्रहण समारोह में राव ने उन्हे चुपचाप एक चिट पकड़ा दी जिस पर लिखा था, “अब मेरे अधूरे काम को पूरा करने का समय है”। जो काम नरसिम्हा राव पूरा नही कर सके वह पोखरन में परमाणु परीक्षण करना था। पहली बार तो वाजपेयी यह कर न सके पर दूसरी बार जब 1998 में वह प्रधानमंत्री बने तो दो परमाणु परीक्षण कर दिए गए। देश हित में दोनों की जुगलबंदी ने इतिहास बदल दिया।

मैंने शुरूआत 1962 के घटनाक्रम से की थी। नेहरू की सबसे सख़्त आलोचना वाजपेयी करते थे लेकिन एक बार नेहरू ने वाजपेयी का विदेशी महमानों से परिचय यह कहते हुए करवाया था कि ‘यह युवक भावी प्रधानमंत्री हैं’। कटुता का कोई अंश नही। और जब मई 1964 को नेहरूजी का देहांत हुआ तो वाजपेयी ने उनकी तुलना भगवान राम से करते हुए कहा था, “एक सपना टूट गया,एक गीत ख़ामोश पड़ गया, एक ज्योति अनन्त में समा गई। आज भारत माता दुखी है, उसने अपना सबसे प्रिय राजकुमार खो दिया…आम आदमी की आँखों की रोशनी चले गई”। कहां गए वो लोग? कहां है ऐसी उदारता?

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About Chander Mohan 565 Articles
Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.