परमाणु विनाश के कगार पर दुनिया?, Near Nuclear Armageddon ?

“अपनी आक्रामक रूस विरोधी  नीति में पश्चिम के देश सभी सीमाएँ लांघ गए हैं। जो मैं कह रहा हूँ वह कोरी धमकी नहीं है। जो परमाणु हथियारों के साथ हमें ब्लैकमेल करना चाहते हैं उन्हें समझ लेना चाहिए कि हवा का रूख बदल सकता है और उनकी तरफ़ मुड़ सकता है”।

यह सख़्त शब्द कह कर रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने एक बार फिर परमाणु विनाश की सम्भावना  दुनिया के सामने पेश कर दी। यह धमकी वह पहले भी दे चुकें हैं पर इस बार उनके द्वारा ‘परमाणु’ शब्द के इस्तेमाल से दुनिया दहल उठी। कारण यह कि पुतिन के लिए यूक्रेन में युद्ध सही नहीं चल रहा। एक के बाद एक धक्का लग रहा है। ऐसी स्थिति में हताश रूसी राष्ट्रपति कोई अविवेकपूर्ण  कदम उठा सकतें हैं। पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन जैसे कई विशेषज्ञ तो कह रहें हैं कि रूस यूक्रेन की लड़ाई हार चुका है। योजना यह थी कि यूक्रेन पर तेज़ी से हमला कर राजधानी कीव पर क़ब्ज़ा कर और राष्ट्रपति जेलेंस्की की सरकार को अपदस्थ कर वहाँ रूस समर्थक सरकार की स्थापना की जाएगी। शुरू में  एक रूसी जनरल ने टीवी पर कहा था कि आदेश है कि चार दिन में सारा अभियान पूरा कर लिया जाए। लेकिन इसके उलट रूसी सेना अगले मोर्चे से पीछे हट रही है।

इस अभियान को सात महीने से उपर हो गए और रूस पूरी तरह से युक्रेन की दलदल में फँस चुका है, ठीक जैसे कभी अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान में फँसा था। न रूस ने और न ही युक्रेन के पश्चिमी मित्रों ने सोचा होगा कि युक्रेन ऐसा ज़बरदस्त मुक़ाबला करेगा। ठीक है कि अमेरिका और पश्चिमी देशों ने भरपूर मदद की है। अमेरिका अकेला छ: अरब डालर की मदद दे चुका है पर ज़मीन पर तो युक्रेन की सेना और लोग लड़ रहें हैं। अपने राष्ट्रपति वोलोदीमीर जेलेंस्की,जो हमारे भगवंत मान की तरह कॉमेडियन रहें हैं, के नेतृत्व में युक्रेन युद्ध का पासा पलटने में सफल रहा है। उनकी सेना रूसियों को बुरी तरह से खदेड़ रही है। उनका दावा है कि  वह लगभग 2500 किलोमीटर का क्षेत्र वापिस लेने में सफल रहे हैं। रूस को इतनी क्षति पहुंची कि पुतिन को यह घोषणा करनी पड़ी कि रूस 300000  सैनिकों की अतिरिक्त भर्ती करेगा।  इसके बाद नया तमाशा शुरू  गया। जिन्हें भर्ती का डर था वह पड़ोसी देशों, जहां रूसियों को वीज़ा की ज़रूरत नहीं, की तरफ़ भागने लगे। कई सीमाओ पर भीड़ इकट्ठी होनी शुरू हो गई। रूस के 35 शहरों में युद्ध के खिलाफ प्रदर्शन हो चुकें हैं और 800 लोग गिरफ़्तार हो चुकें हैं। सरकार की खुली आलोचना हो रही है यहं तक कि सरकारी टीवी पर भी हो चुकी है।

नवीनतम झटका तब मिला जब रूस को क्रीमिया प्रायद्वीप से जोड़ने वाले एकमात्र पुल का कुछ हिस्सा विस्फोट से उड़ा दिया गया।योरूप का सबसे लम्बा यह पुल 19 किलोमीटर लम्बा है। इसका 2018 में पुतिन ने उद्घाटन किया था। इस पुल पर हुआ विस्फोट रूस की प्रतिष्ठा को नवीनतम धक्का है। इसके बाद रूस ने युक्रेन के दस शहरों पर मिसाईलों से मौत और तबाही की वर्षा की पर उस देश का मनोबल नही तोड़ सके।

पुतिन के पास विकल्प सीमित रह गए हैं। वह बम और मिसाईल बरसा सकतें हैं पर वह देश समर्पण को तैयार नहीं। अंतिम विकल्प परमाणु है।  अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह युद्ध बहुत अलोकप्रिय है। इसके कारण विश्व अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही है। योरूप विशेष तौर पर भयंकर महंगाई के दौर से गुजर रहा है।समरकंद में प्रधानमंत्री मोदी ने भी पुतिन से कहा था कि ‘यह युद्ध का युग नही है’। बात तो दोनों के बीच पहले भी होती रही है पर यह पहली बार है कि मोदी ने सार्वजनिक तौर पर रूस के नेता को चेताया है। इसके बराबर महत्व पुतिन की यह टिप्पणी है जो उन्होंने समरकंद में चीन के राष्ट्रपति शी जीनपिंग से मुलाक़ात के दौरान की। पुतिन ने स्वीकार किया कि युक्रेन युद्ध के बारे शी जीनपिंग के ‘सवाल और चिन्ता’ है। यह पहला संकेत है कि भारत की तरह चीन भी रूस की युक्रेन में कार्यवाही से खुद को अलग कर रहा है नहीं तो अभी तक दोनों देश कह रहे थे कि ‘उनकी दोस्ती की कोई सीमा  नही है’। चीन ने स्पष्ट कर दिया कि दोस्ती की सीमा है। एशिया और योरूप में बेलारूस को छोड़ कर सब देश रूस की कार्यवाही से परेशान है क्योंकि वह समझते हैं कि यह विशाल देश अगर जीत गया तो कल को हमें भी परेशान करेगा।

युद्ध की बन रही स्थिति और पुतिन की परमाणु धमकी पर अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने जो कहा उससे दुनिया में और घबराहट फैल गई। बाइडेन का कहना था कि दुनिया विश्व युद्ध और विनाश के कगार पर पहुँच गई है और 1962 में रूस द्वारा अमेरिका के निकट क्यूबा में मिसाईले तैनात करने के बाद ख़तरा उच्चतम स्तर पर है। बाइडेन के मुताबिक़ हार की बेचैनी में पुतिन परमाणु हथियारों का इस्तेमाल कर सकते हैं। बाइडेन ने बाइबिल के न्यू टैसटामैंट में इस्तेमाल ‘आर्मागेडन’  का ज़िक्र किया है जो अच्छाई और बुराई में अंतिम युद्ध होगा जो दुनिया और मानवता को ख़त्म कर जाएगा। बाइडेन ने अपनी बात और स्पष्ट करते हुए यह भी कहा, ‘पुतिन सामरिक परमाणु या जैविक या रिसायन हथियारों के इस्तेमाल की बात करतें है तो वह मज़ाक़ नहीं है’।

 2000 में जब वह पहली बार राष्ट्रपति बने, के बाद पुतिन की स्थिति कभी भी इतनी कमजोर नहीं थी। यह स्वीकार करना कि वह ग़लत थे या असफल हैं, कोई विकल्प नहीं है। कौन राजनेता अपनी गलती मानता है? पर युक्रेन के तीखे हमलों ने रूसी व्यवस्था की पोल खोल दी है। ऐसी स्थिति में परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की धमकी एक मात्र विकल्प रह गया है पर यह ‘आर्मागेडन’  वाली स्थिति अभी नहीं है।  अभी तक रूस ने अपने परमाणु हथियार हिलाए नही, न यह ही संकेत दिया है कि वह इसकी तैयारी कर रहा है। पर यह युद्ध जीतना पुतिन के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है। वास्तव में यह दोनों अमेरिका और रूस के नेतृत्व की प्रतिष्ठा का प्रश्न है जिसमें युक्रेन तबाह हो रहा है। पहली चाल अमेरिका की थी जो नाटो का विस्तार रूस की सीमा तक लेजाना चाहता है। वह जानते हैं  कि रूस इस उत्तेजना का प्रतिरोध करेगा। दूसरी तरफ़ पुतिन युक्रेन पर हमला कर फँस गए हैं। वापिसी का रास्ता नज़र नहीं आता। दोनों की ईगो का सवाल है। शुरू में समझौते की सम्भावना बन सकती थी, पर अमेरिका और नाटो ने युक्रेन को भारी हथियार दे कर  ऐसा फँसाया है कि अगर वह रूस की सेना को खदेड़ भी देते हैं तो उनका देश इस तरह तबाह हो चुका होगा कि पुनर्निर्माण में कई दशक लग सकतें हैं। जेलेंस्की को एक प्रकार से कह दिया गया है कि ‘चढ़ जा बच्चा सूली पर भगवान  भली करेंगे’!

युद्ध को ख़त्म करने के लिए ज़रूरी है कि पुतिन को इज़्ज़त बचाने का रास्ता दिया जाए लेकिन अमेरिका नाक रगड़ाना चाहता है।  इसमें कोई दो राय नहीं है कि घटनाक्रम के खलनायक पुतिन है। उन्होंने छोटे पड़ोसी मुल्क पर हमला कर दिया। अगर रूस जीत जाता है तो बहुत ग़लत परम्परा क़ायम हो जाएगी। चीन का दुःसाहस बढ़ सकता है जो हमें परेशान कर सकता है। इस वकत तो जो गत रूस की बन रही है उसे देखते हुए चीन भी सहम गया है कि पश्चिम की ताक़त को कम आंकना ख़तरनाक होगा। पर अगर रूस पराजित हो जाता है तो वह चीन का जूनियर  पार्टनर बन जाएगा और  आर्थिक और सामरिक तौर पर चीन पर निर्भर हो जाएगा। यह हमारे लिए अच्छी खबर नहीं। अगर भविष्य में भारत और चीन में टकराव होता है तो कमजोर रूस सकारात्मक दखल नहीं दे सकेगा।

हमारी कूटनीति के लिए यह बड़ी चुनौती है क्योंकि रूस इसका अभिन्न अंग रहा है। पर अब उन्होंने अपने पाँव पर कुल्हाड़ा चला लिया है। हम अभी तक गुटनिरपेक्ष रहे हैं पर यह लगातार मुश्किल हो रहा है। यह भी निश्चित नहीं है कि रूस हमें पहले की तरह सैनिक सामान देने की स्थिति में है भी या नहीं? पश्चिम की आपत्ति के बावजूद भारत रूस से सस्ता तेल ख़रीद रहा है पर इससे पश्चिम के साथ कुछ तनाव नज़र आने लगा है। पिछले बीस महीने से नई दिल्ली में अमेरिका का राजदूत नहीं है। इससे भी हैरान करने वाली बात है कि भारत में अमेरिकी वीज़ा के लिए इंटरव्यू का समय  औसत 500 दिन है जिसका अर्थ है कि अगर आप अब आवेदन दो तो मुलाक़ात का समय 2024 में मिलेगा। बीजिंग में इंटरव्यू का समय दो दिन है। जर्मनी के विदेश मंत्री ने  कश्मीर का मुद्दा उठा लिया है।  लगता है योरूप और  अमेरिका  संदेश दे रहे हैं कि हमारी तटस्थ नीति उन्हें पसंद नहीं। 

 भारत को अपना हित  देखना है और पुतिन की बेवक़ूफ़ी हमारे हित में नहीं।  भारत सरकार की नीति में  परिवर्तन आया है जो मोदी द्वारा पुतिन से अपना रोष सार्वजनिक प्रकट करने से पता चलता है। उनकी एक पंक्ति ‘यह युद्ध का युग नही है’, की गूंज दुनिया भर में सुनी गई। इसके बाद मोदी ने जेलेंस्की से भी बात की है। जेलेंस्की का कहना था कि परमाणु डरावा केवल उनके लिए ही नहीं दुनिया के लिए ख़तरा है। उल्लेखनीय है कि भारत के प्रधानमंत्री ने इससे सहमति प्रकट की है। रूस के साथ दोस्ती ठीक है,  पर विश्व शान्ति की क़ीमत पर नहीं।  हम युद्ध का अंत चाहतें हैं। हमें बिना किसी हिचकिचाहट के परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की धमकी की निन्दा करनी चाहिए। लेकिन प्रयास करना चाहिए कि जहां वह फँस गया है, वहां से रूस को निकलने का सम्मानजनक रास्ता दिया जाए ताकि परमाणु कगार से दुनिया की वापिसी हो सके।

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Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.