भारत-पाक: दो संदेशों से संदेश, India -Pakistan: Message From Two Messages

शाहबाज़ शरीफ़ एक बार फिर लड़खड़ाती पाकिस्तान की सरकार के वज़ीर-ए-आज़म बन गए है। इससे पहले वह अप्रैल 2022 में पीएम बने थे। तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें जो बधाई का संदेश भेजा था और जो अब भेजा है उसकी भावना और शब्दावली में जो अंतर है, वह ही स्पष्ट करता है कि हमारी सरकार उस देश से बेहतर रिश्तों के बारे कितनी नाउम्मीद है। अप्रैल 2022 को भेजे अपने संदेश में नरेन्द्र मोदी ने कहा था, “ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री चुने जाने पर ‘हिज़ एकसिलैंसी’(महामहिम) मियाँ मुहम्मद शाहबाज़ शरीफ़ को बधाई। भारत ऑतंकवाद से मुक्त इस क्षेत्र में शान्ति और स्थिरता चाहता है ताकि हम विकास की अपनी चुनौतियों से जूझ सकें और अपने लोगोँ के कल्याण और समृद्धि को निश्चित कर सकें”।  इस बार जो संदेश भेजा गया वह बिल्कुल सपाट और कोरा था, “@CM शहबाज़  को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की शपथ लेने पर बधाई”। न हिज़ एकसिलैंसी, न पूरा नाम, सिर्फ़ उनके ट्विटर अकाउंट @CMShehbaz पर उन्हें शपथ लेने पर बधाई। न कहा कि भारत शान्ति और स्थिरता चाहता है, न लोगों के कल्याण और समृद्धि की कामना। केवल एक  लाईन का औपचारिक बधाई संदेश जिसका अपना संक्षेप में संदेश है कि भारत सरकार को पाकिस्तान की नई सरकार से अधिक आशा नहीं है इसलिए भावना में बहने की ज़रूरत भी समझी नहीं गई।  भारत वेट ऐंड वॉच पर है। इसके अनेक कारण है।

 एक कारण तो यह भी है कि हम खुद चुनाव में जा रहे हैं और जब तक मई-जून में यह समाप्त नहीं हो जाते तब तक भारत सरकार पाकिस्तान पर तवज्जो नहीं देने वाली। जब इंग्लैंड से लौटकर भी नवाज शरीफ़ वहाँ प्रधानमंत्री नहीं बने, और गठबंधन साथी पीपीपी के आसिफ़ ज़रदारी राष्ट्रपति तो बन गए हैं पर उनकी पार्टी सरकार में शामिल नहीं हुई, तो दूसरों से आशा नहीं करनी चाहिए कि वह खुले दिल से नई सरकार का स्वागत करेंगे। जिस तरह का अवैध जनादेश पाकिस्तान की सरकार को मिला है और जिस तरह बेशर्म धांधली से ज़बरदस्ती इस सरकार का गठन किया गया है, उसके बाद तो शायद ही कोई होगा जो आशा कर रहा होगा कि शाहबाज़ शरीफ़ की सरकार लम्बी चलेगी।

इमरान खान जिनकी लोकप्रियता चकित करने वाली है, को हटाने के लिए पाकिस्तान की सेना ने जो खेल खेला वह उल्टा पड़ गया है। ‘फ़्री एंड फ़ेयर इलेक्शन नेटवर्क’ के अनुसार उनकी संसद की 266 सीटों के लगभग 30 फ़ीसदी पोलिंग स्टेशन पर धांधली के सबूत हैं। सब पर्यवेक्षक कह रहें हैं कि अगर निष्पक्ष चुनाव होते तो इमरान खान के समर्थकों को बहुमत मिलता। इमरान खान को जेल में बंद कर दिया गया। उनकी पार्टी पीटीआई की मान्यता रद्द कर दी गई पर फिर भी आज़ाद लड़ रहें उनके समर्थकों को सबसे अधिक 93 सीटों मिली जबकि नवाज़ शरीफ़ की पीएमएल-एन को 75 मिलीं। अगर घांधली नहीं होती तो इमरान की सरकार बनती। इस्लामाबाद से एक रिपोर्ट के अनुसार एक समय तो लाहौर से खुद नवाज शरीफ़ इमरान खान के उम्मीदवार से पिछड़ गए थे। पराजय देखते हुए निराश नवाज शरीफ़ अपनी पार्टी के दफ़्तर से घर लौट गए थे। फिर सेना ने दखल दिया और आठ घंटे मतगणना रुकवा कर नतीजा पलट दिया। ऐसा कई जगह हुआ। इमरान खान की अनुपस्थिति में उनकी पार्टी के चेयरमैन, बैरिस्टर गौहर अली का कहना है कि ‘रात को हम जीत रहे थे पर सुबह हुई तो नतीजा पलट दिए’। कितनी सीटों पर ऐसा हुआ निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता पर सारा पाकिस्तान जानता है कि ऐसा हुआ है।

नई पाकिस्तान की सरकार की वैधता पर ही बड़ा सवाल लग गया है। विरोध में कई जगह प्रदर्शन हुए और गोली तक चल चुकी है। पाकिस्तानी मूल की लेखिका आयशा सद्दीका का कहना है, “लोग बहुत ख़फ़ा हैं…पाकिस्तान कष्टदायक अराजकता में प्रवेश कर सकता है… सेना का नेतृत्व चुनौती का सामना करने के लिए परिपक्व नहीं है”। और यह पाकिस्तान की सबसे बड़ी समस्या है। सेना जो समझती है कि वह समाधान है, वास्तव में पाकिस्तान की समस्या है क्योंकि बालीवुड के पुराने डायलॉंग की तरह सेना न पाकिस्तान को जीने दे रही है,न मरने दे रही है! इमरान खान को लीजिए, उसे पाकिस्तान की सेना ने नवाज शरीफ़ को हटाने के लिए खड़ा किया था और अब इन्हीं नवाज शरीफ़ को लंडन से बुला कर इमरान खान को हटाने का प्रयास किया गया। केवल इस बार ऐसे अनाड़ी ढंग से किया गया कि सेना खुद ही लोगों के आक्रोष का टार्गेट बन गई है।

पाकिस्तान के बारे उनके एक व्यंग्यकार ने कहा था, “पाकिस्तान में मौजां ही मौजां, चारों तरफ़ फ़ौजां ही फौजां”। इस बेचारे को जेल में फेंक दिया गया था पर यह हक़ीक़त है कि 1958 में अयूब खान दवारा मार्शल लॉ लगाने के बाद से ही वहाँ फ़ौज प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष ढंग से सत्ता को कंट्रोल करने की कोशिश करती रही है। और यह भी हक़ीक़त है कि फ़ौज के दखल के कारण पाकिस्तान का निरंतर पतन होता गया है। एक भी निर्वाचित सरकार को अवधि पूरी करने नहीं दी गई। वर्तमान चुनाव पाकिस्तान की फ़ौज के दबदबे की पोल खोल गए हैं क्योंकि लोगों ने जिसे ‘इसटैबलिशमैंट’ अर्थात् व्यवस्था -सेना कहा जाता है के खिलाफ वोट दिया है। चाहे इस वक़्त सेनाध्यक्ष असीम मुनीर किसी तरह शाहबाज़ शरीफ़ की हुकूमत बनवाने में कामयाब हो गए हैं पर यह भी हक़ीक़त है कि फ़ौज अपना वर्चस्व खो रही है। पाकिस्तान में रहे हमारे राजदूत टी सी ऐ राघवन ने लिखा है, “ चुनाव परिणाम… इस बात की पुष्टि करता है कि ज़मीनी स्तर पर छिपी हुई फ़ौज विरोधी भावना है और राजनीतिक सफलता उनको मिलती है जो इस भावना का फ़ायदा उठाते है”। न्यूयार्क टाइम्स ने लिखा है, “ इमरान खान की सफलता हाल के इतिहास में पहली बार प्रदर्शित कर गई हैं कि फ़ौज द्वारा सत्ता पर पकड़ रखने की रणनीति रास्ते से भटक गई है”। 9 मई को इमरान खान समर्थकों ने खुलेआम सेना के दफ़्तरों पर हमले किए थे, ऐसी विस्फोटक स्थिति फिर दोहराई जा सकती है।

पाकिस्तान की जर्जर आर्थिक हालत के कारण लोगों का ग़ुस्सा कभी भी फूट सकता हैं। विकास सिंकुड रहा है। मुद्रा स्फीति 40 प्रतिशत है। विदेशी ऋण 130 अरब डालर है जबकि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार जून 2024 तक पाकिस्तान के पास मात्र 9 अरब डालर का ही विदेशी मुद्रा रिज़र्व है। क़र्ज़ा वापिस करने के लिए और क़र्ज़ा लेना पड़ेगा और बहुत सम्भावना है कि वह देश क़र्ज के जाल में फँस जाए। शाहबाज़ शरीफ़ अपनी संसद को बता चुकें हैं कि जितनी सरकारी आय है उससे अधिक क़र्ज़े की अदायगी है इसलिए क़र्ज़ा अदा करने के लिए और उधार लेना पड़ रहा है। उनके अनुसार सरकार चलाना ही मुश्किल हो रहा है। उन्होंने सांसदों को बताया कि उनकी तनख़्वाह और भत्ते भी क़र्ज़ ले कर दिए जा रहे हैं। ऐसी असंतोषजनक स्थिति अनिश्चित काल के लिए नहीं चल सकती। एक न एक दिन नाराज़ लोग सड़कों पर उतरेंगे। जो संस्थाओं और देश मदद करते हैं उनका धैर्य भी ख़त्म हो रहा है क्योंकि पाकिस्तान सुधरने को तैयार नही। और शाहबाज़ शरीफ़ के पास गम्भीर सुधार करने की न योग्यता है न वैधता।

अगर पाकिस्तान ने डूबने से बचना है तो उन्हें अपने साधनों के अनुसार चलने की कोशिश करनी होगी।  इसके लिए पहला कदम रक्षा बजट में कटौती होना चाहिए जिसके लिए पहली ज़रूरत है कि वह भारत के साथ सम्बंध सामान्य करें। और यह उनका धर्म संकट है। वह जानते है कि भारत के साथ सम्बंध सामान्य करने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं है लेकिन राजनीतिक मजबूरी में ऐसे फँसे हैं कि कर नहीं सकते। जुलाई 2023 को शाहबाज़ शरीफ़ ने कहा था कि, “हमने सबक़ सीख लिया है। हम भारत के साथ शान्ति से रहना चाहते हैं बशर्ते कि हम अपनी समस्याओं का समाधान निकल सकें”। पाकिस्तान के पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल बाजवा ने भी स्वीकार किया था कि पाकिस्तान की सेना के पास भारत के साथ लड़ने की क्षमता नही है। उन्होंने तो यहाँ तक कहा था कि “समय आगया कि अतीत को दफ़ना कर आगे बढ़ा जाए”। लेकिन क्या पाकिस्तान इसके लिए तैयार भी है? अपने पहले ही भाषण में शाहबाज़ शरीफ़ ने कश्मीर का मामला उठा लिया और इसकी तुलना ग़ाज़ा से कर दी जबकि भारत स्पष्ट कर चुका है कि धारा 370 हटाए जाने के बाद भारत कश्मीर पर बात करने को भी तैयार नही। लाहौर यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर रसूल बक्श के अनुसार, “मुझे रुख़ में बदलाव या बातचीत शुरू होने की सम्भावना नज़र नहीं आती…पाकिस्तान बातचीत शुरू होने से पहले शर्त रखने की स्थिति में नहीं है। समय के साथ भारत मज़बूत हो गया और पाकिस्तान कमजोर”।क्या पाकिस्तान की लड़खड़ाती  नई सरकार जिसने जनादेश चुराया है, कड़वा घूँट पीने को तैयार होगी? क्या वह आतंकवाद पर रोक लगाएगी और कश्मीर का रोना बंद करेगी?

उन्हें समझना चाहिए कि न केवल मोदी सरकार बल्कि भारत की कोई भी सरकार धारा 370 हटाए जाने के कदम को वापिस नहीं लेगी। झेलम-रावी-चेनाब नदियों में बहुत पानी बह चुका है। सत्ता का संतुलन बिल्कुल भारत की तरफ़ झुक चुका है। पाकिस्तान हमारी प्राथमिकता में नहीं रहा क्योंकि हम चीन पर केन्द्रित है और केवल यह चाहते हैं कि फ़रवरी 2021 से क़ायम सीमा पर शान्ति रहे। हमारी जीडीपी पाकिस्तान से 10 गुना है। हमारा विदेशी मुद्रा का भंडार 625 अरब डालर है। खाड़ी के देशों के पाकिस्तान के मित्र साऊदी अरब और यूएई अब हमारे बैसट फ्रैंड हैं। पाकिस्तान के अन्दर बुरे आतंकी हमले हो रहें है।  हमारे लिए उनके साथ रिश्ते सामान्य करने की कोई मजबूरी नहीं है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ सी.राजा मोहन के अनुसार पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय प्रयास ‘उच्च लागत निम्न नतीजे’ वाला प्रयास होगा। यही कारण है कि भारत सरकार की प्रतिक्रिया इतनी ठंडी है। ठंडा संदेश भेज कर बता दिया गया है कि हमें कोई ग़लतफ़हमी नहीं कि जमी बर्फ़ पिघलने वाली है।

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About Chander Mohan 706 Articles
Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.