क्या राजनीति बेमतलब हो रही है? Politics Becoming Irrelevant

यह असामान्य प्रदर्शन थे। देश के कई हिस्सों में स्कूल के बच्चे अपनी यूनिफ़ॉर्म में बेहतर सुविधा के लिए प्रदर्शन कर रहे थे। जैन-ज़ी के बाद जिसे जैन-एल्फा (2010 को बाद जन्मे) कहा जाता है, वह भी कुछ जगह सड़कों पर उतर कर अपने अपने स्कूल की बेहतरी के लिए प्रदर्शन कर रहे थे। उनकी शिकायत थी कि उनके स्कूलों में साफ़ टॉयलेट नहीं है, डेस्क नहीं है,पंखें नही हैं। पीने के पानी का प्रबंध नहीं है। पर्याप्त टीचर नहीं हैं। एक बच्ची बता रही थी कि इतनी गंदी हालत है कि वह बीमार हो सकतें हैं। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार और महाराष्ट्र से ऐसे समाचार मिल रहें हैं। उल्लेखनीय है कि सब कथित ‘डब्बल इंजन’ सरकारें हैं। भीषण गर्मी में बंद पंखों को लेकर ग़ुस्से में उत्तर प्रदेश के एक स्कूल के  छात्र-छात्राएँ बैनर लेकर सड़क पर निकल चुकें हैं। तब ही उन्हें आश्वासन दिया गया कि 24 घंटें में सुधार होगा।

सवाल है कि प्रशासन ने खुद यह क्यों नहीं देखा कि स्कूल के पंखे बंद पड़े हैं? बिहार में गया में गंदगी, बैंचों और पंखों की कमी को लेकर बच्चों ने स्कूल पर ताला लगा दिया और धरना दिया। आख़िर में कलेक्टर को वहां जाकर आश्वासन देना पड़ा। राजस्थान में तीन जगह बुनियादी सुविधाओं और टीचर की कमी को लेकर स्कूल की लड़कियां सड़क पर धरने पर बैठ गई। तब शिक्षा विभाग को 80 से अधिक टीचर वहां भेजने का आदेश देना पड़ा। टीचर के इतने पद ख़ाली क्यों थें? ऐसी नौबत ही क्यों आए कि आज़ादी के लगभग आठ दशक के बाद भी यहां ऐसे स्कूल हैं जहां टीचर नहीं, पंखे नहीं, टॉयलेट नहीं और प्रशासन की दिलचस्पी नहीं है। छोटे छोटे बच्चों को धरना क्यों देना पड़े?  

प्रशासन की लापरवाही और असफलता तो समस्या का एक पक्ष है, दूसरा सवाल है कि हमारे जनप्रतिनिधि किस मर्ज़ की दवा हैं? उन्हें क्यों नहीं पता था कि बच्चे तकलीफ में है? पार्षद, विधायक और सांसद क्या करते रहे? वह अपनी दुनिया में इतने मस्त क्यों हैं कि उन्हें मालूम नहीं कि ज़मीन पर स्थिति क्या है? हम वोट देते हैं, बार बार टैक्स देतें हैं, पर हमें मिलता क्या है? हमारे गाँव पिछड़े हैं और हमारे शहर गंदे हैं। सड़कें टूटी हैं और गार्बेज के ढेर हैं। पर्यावरण दूषित है। अपराध बढ़ रहा है और ड्रग्स हर जगह मिल रहे हैं। उतराखंड में देहरादून के पास टोंस नदी पर 16 करोड़ रूपए की लागत से बना पुल 16 दिन में मानसून की पहली बारिश मे बह गया। अंग्रेज़ों के समय के पुल अब तक क़ायम हैं। 4200 करोड़ रूपए की लागत से बने लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे में 13 दिन में जगह जगह सड़क बैठ गई है। मरम्मत को सुखाने के लिए पैडस्टल पंखे लगाए गए! बिहार में तो हर साल पुल बहते रहतें हैं। सामान्य है। जिस दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे का उद्घाटन प्रधानमंत्री ने खुद किया उस में कुछ ही समय के बाद गड्ढे पड़ गए। अगर प्रधानमंत्री द्वारा उद्घाटन की गई सड़क का यह हाल है तो बाक़ी हाईवे की स्थिति क्या होगी? हैरानी है कि इन सड़क ठेकेदारों को यह भी डर नहीं कि प्रधानमंत्री द्वारा उद्घाटित सड़क पर हल्का मैटीरियल लगाया तो कार्यवाही होगी। इस सरकार में जवाबदेही क्यों नहीं है, न मंत्रियों की, न  अधिकारियों की, न ठेकेदारों की।

व्यवस्था का शोचनीय हाल, सब चलता है की सरकारी संस्कृति, आज से नहीं हैं। दशकों की लापरवाही और उपेक्षा इस सरकार को विरासत में मिली है। अफ़सोस यह है कि इसे दुरुस्त करने के लिए नरेन्द्र मोदी सरकार ने पर्याप्त नहीं किया। जब मोदी प्रधानमंत्री बने तो गुजरात मॉडल की बहुत चर्चा थी। आशा थी कि वह प्रशासन की लगाम कसेंगे। पर बीच में यह काम छोड़ दिया लगता है। सारा ध्यान राजनीतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक मामलों पर चला गया। वंदे मातरम पर सख़्त क़ानून लाया गया। हाकी टीम की जर्सी भगवा कर दी गई। कई विपक्षी पार्टियां तोड़ी गईं। यह भी समझ लिया कि लोगों के खातों में पैसे डाल कर वोट मिल सकतें हैं तो व्यवस्था को सही करने पर माथा-पच्ची करने की क्या ज़रूरत है? पर जंतर मंतर ने सब कुछ उलट दिया। बिहार और झारखंड में यह दोहराया जा रहा है। पहली पीढ़ियों ने स्थिति से समझौता कर लिया पर नई पीढ़ी बेताब है, इंतज़ार करने को तैयार नहीं।

असली समस्या और भी बड़ी है। स्वीडन की वी-डेम इंस्टीट्यूट जो दुनिया में लोकतंत्र का अध्ययन करता है, का कहना है कि “भारत चुनावी निरंकुशता” की तरफ़ बड़ रहा है… बहुपार्टी व्यवस्था के बावजूद यहां असली लोकतंत्र का क्षरण हुआ है”। इस संस्था की टिप्पणी के बारे तो कहा जा सकता हैं कि विदेशी अनावश्यक बहक रहें हैं, आख़िर बहुत शांतिमय चुनाव हो कर हटें है। पर असली तकलीफ चुनावों से नहीं है। असली तकलीफ चुनाव के बाद जो हुआ उससे है। लोगों ने जो जनादेश दिया और आज संसद का जो स्वरूप है, में भारी अंतर है। पिछले चार महीने में जिस तरह पार्टियां तोड़ी गईं हैं उसने चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता को कमजोर कर दिया है। लोग एक पार्टी को वोट देतें हैं पर कुछ सासंद दबाव में या लालच में, दलबदल कर उस पार्टी में शामिल हो रहें हैं जिसके खिलाफ जनता ने वोट दिया था। वोट की शुद्धता ही खतरें में है। सब सिद्धांत रद्दी की टोकरी में डाल दिए गए हैं। सता ही एकमात्र सिद्धांत रह गई लगती है।

 ममता बनर्जी की टीएमसी और उद्धव ठाकरे की बची खुची शिवसेना को तोड़ा गया। राज्य सभा में आम आदमी पार्टी के सात सदस्य दलबदल कर भाजपा नें शामिल हो गएं है। पंजाब में तो भाजपा का सारा युनिट ही कांग्रेस से लिया लगता है। हैरानी नहीं कि पुराने टकसाली बग़ावत कर रहें हैं। यह सब क़ानूनी तौर पर सही है पर क्या यह नैतिक है? जनादेश से खिलवाड़ किया जा रहा है। भाजपा और आरएसएस के नेताओं को गम्भीरता से सोचना चाहिए कि देश को क्या संदेश दिया जा रहा है। यह कहना पर्याप्त नहीं कि कांग्रेस भी यह करती रही है क्योंकि भाजपा से बेहतर उम्मीद थी। यह निराशा में बदलती जा रही है।

 हमारी राजनीति का किस तरह लतीफ़ा बन रहा है वह नैशनल सिटिज़न पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीए) जिसमें तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसद शामिल हुए है, की स्थिति से पता चलता है। इस पार्टी का कोई अस्तित्व ही नहीं था। पश्चिम बंगाल में हावड़ा में एक छोटा सा दफ़्तर है। यह रजिस्टर्ड ज़रूर है पर मान्यता प्राप्त नही। कोई सांसद, विधायक या पार्षद आदि नहीं थे। पर बिल्ली के भागो छींका टूटा, तृणमूल कांग्रेस से दलबदल करवाने के लिए एक दल चाहिए था। एनसीपीए उपलब्ध थी और तृणमूल के 20 सांसदों को वहां शामिल करवा दिया गया। जिस पार्टी का दो महीने पहले तक कोई अस्तित्व नहीं था के अब लोकसभा में 20 सांसद हैं। क्या सौदेबाजी हुई होगी इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है। इन सांसदों को दलबदल करते वक़्त, जनादेश की धज्जियाँ उड़ाते समय, कोई शर्म नही आई? जनता की प्रतिक्रिया की कोई चिन्ता नही?

गांधीजी ने तो कहा था कि सिद्धांतों के बिना राजनीति पाप है पर हमने तो बापू को बिल्कुल भुला दिया। देश बहुत आगे बढ़ गया है, नैतिक ढलान की तरफ़। हो सकता है कि एनडीए लटक रहे परिसीमन बिल को पारित करवाने मे सफल हो जाए, पर किस क़ीमत पर ? पहले ही संसद नहीं चल रही। बड़ी संसद का अर्थ बड़ी अराजकता तो नहीं होगा? 46% सांसद हैं जिन्होंने बताया है कि उनके खिलाफ क्रिमिनल केस है। क्या और अपराधी ‘माननीय’ बन जाऐंगे? दुख यह है कि पार्टी विद -ए- डिफ़रेंस ग़ायब हो रही है। क्या सत्ता ही सब कुछ रह गई है, देश और समाज को सही दिशा देना इस सरकार की ज़िम्मेवारी नहीं रही? विशेषज्ञ राहुल वर्मा ने सही कहा है, “चुनावी दबदबे से राजनीतिक सत्ता मिलती है, पर यह राजनीतिक वैधता है जो सत्ता को क़ायम  रखती है”। यह वैधता कमजोर हो रही है।

एक और समस्या है कि उच्च संस्थाएं, मीडिया समेत, विश्वास खोती जा रही है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई क़ुरैशी ने कहा है कि चुनाव आयोग को विपक्ष का विश्वास जीतने का प्रयास करना चाहिए। पर ऐसी ज़रूरत ही क्यों पड़े? सबसे कष्टदायक समाचार हैदराबाद से है जहां की नालसार लॉ यूनिवर्सिटी के छात्रों ने युनिवर्सिटी के अधिकारियों से कहा है कि दीक्षांत समारोह में मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत को मुख्य अतिथि न बुलाया जाए। वह जंतर मंतर पर प्रदर्शन के दौरान मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणियों का विरोध जतला रहे थे। यह पहली बार है कि किसी मुख्य न्यायाधीश की उपस्थिति पर किसी को  आपत्ति हो।

जंतर मंतर,बिहार और झारखंड ने बता दिया कि युवा राजनीतिक वैधता पर सवाल उठा रहें हैं। वह देख रहे है, कि जिस व्यवस्था के बल पर वह आगे बढ़ना चाहते हैं वह अविश्वसनीय है, भ्रष्ट है,संवेदनशील नहीं है। सड़क से उठ रहे आंदोलन चाहे दिलली में हो या पटना में हों, या राँची में हो, बता रहें हैं कि राजनीतिक नेतृत्व पर युवा वर्ग का विश्वास उठ रहा। राजनीति बेमतलब बनती जा रही है। युवा पीढ़ी पढ़ी लिखी है, होशियार है, महत्वाकांक्षी है, पर आज हताश और बेचैन है। वह ठोस परिवर्तन चाहतें है, रेवड़ी नही। इस आज़ादी दिवस पर इस पीढ़ी का विश्वास फिर से हासिल करना सबसे बड़ा ध्येय होना चाहिए।

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About Chander Mohan 828 Articles
Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.