दो अंतहीन युद्ध, Wars With No End In Sight

अमेरिका के राष्ट्रपति डानल्ड ट्रंप ने एक बार फिर ईरान पर प्रस्तावित हमले को रोक दिया है। उनका कहना है कि ऐसा उन्होंने मध्य पूर्व के साथी देशों और ईरान के अनुरोध पर किया है। ईरान इस बात का प्रतिवाद करता है कि उन्होंने ऐसा कोई अनुरोध किया है। पर खाड़ी के देश निश्चित तौर पर चाहतें हैं कि युद्ध ख़त्म हो जाए या कम से कम और न भड़के। मामला होर्मुज को खोलने और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगाने पर अड़ा हुआ है। दूसरी तरफ़ रूस-युक्रेन युद्ध अब छठे साल में प्रवेश कर गया है जो प्रथम विश्व युद्ध से भी अधिक लम्बा चल चुका है। ट्रम्प की ही तरह पुतिन भी ग़लतफ़हमी का शिकार हो गए कि युद्ध कुछ ही दिनों में ख़त्म हो जाएग। रूस का अपना बहुत आर्थिक और जानी नुक़सान हो चुका है पर बंद करने का रास्ता नहीं मिल रहा।

 मध्य पूर्व के युद्ध से अमेरिका में भारी आर्थिक टैंशन है। तेल की क़ीमतें बहुत बढ़ चुकीं हैं।  नेतन्याहू के उकसावे में आकर (जो बात उन्होंने स्वीकार भी की है) इस युद्ध में कूदते समय डानल्ड ट्रंप का कहना था कि युद्ध कुछ ही दिनों में समाप्त हो जाएगा। यह अब छठे महीने में प्रवेश कर रहा है और कोई अंत नज़र नही आ रहा। ईरान तो वैसे ही तबाह हो चुका है। सारा इन्फ़्रास्ट्रक्चर बर्बाद हो चुका है। भारी तबाही के बावजूद दोनों ही युद्ध का अंत नज़र नहीं आ रहा। दुनिया के लिए सबक है कि उत्तेजना मे आ कर युद्ध शुरू करना आसान है,समाप्त करना मुश्किल। इसी कारण मैंने सदैव आपरेशन सिंदूर के बाद युद्ध विराम का समर्थन किया है जबकि कई कहते रहे कि हमें पाकिस्तान के युद्ध विराम के अनुरोध को स्वीकार नहीं करना चाहिए था। पाकिस्तान जो एक परमाणु ताक़त है, कि साथ लम्बा युद्ध हमारे हित में नही है। इज़राइल लड़ सकता है क्योंकि उसे अमेरिका का अंधा समर्थन प्राप्त है।

दोनों ही युद्ध मे बड़ी समस्या है कि यह नेताओं की ईगो से जुड़ा है। डानल्ड ट्रंप, नेतन्याहू, मोजतबा खामेनेई,पुतिन और जेलंसकी सब अपनी अपनी जीत चाहतें हैं। वह जानतें हैं कि बिना कुछ हासिल किए अगर वह युद्ध विराम के लिए सहमत हो गए तो बड़ी राजनीतिक क़ीमत चुकानी पड़ेगी। नेतन्याहू और ट्रम्प को तो आगे चुनावों का भी सामना है। जो राजनयिक दोनों तरफ़ से समझौता करवाने में लगे हुए हैं उनके लिए सबसे बड़ी समस्या है कि ऐसा समझौता कहाँ से लाएं कि दोनों पक्ष जीत का दावा कर सकें?  न्यूयार्क टाइम्स ने लिखा है, “अमेरिका और ईरान जो दोनों न युद्ध में पूरी तरह जीत सके न ही पराजित हुए, को समझौते की बहुत जरूरत है। पर उन्हें ऐसा समझौता चाहिए जिसे वह अपने अपने देश के कट्टरपंथियों को संतुष्ट कर सकें”। प्रयास हो रहा है पर इस समस्या के कारण न युद्ध -न शान्ति की स्थिति बन गई है। पर ऐसा बहुत देर तो चल नहीं सकता।

जो मध्यस्थ है वह चेतावनी दे रहें हैं कि युद्ध जितना लम्बा खींचा गया उतना शान्ति का प्रयास कठिन होता जाएगा। कुछ पर्यवेक्षक तो चेतावनी दे रहें हैं कि यह युद्ध प्रथम विश्व युद्ध से पहले जैसी स्थिति का संकेत दे रहा है जब दूसरे देशों को शामिल होना पड़ा। साऊदी अरब, जार्डन, यूएई, कुवैत, मिस्त्र को भी मजबूरन इसमें शामिल होना पड़ सकता है। साऊदी अरब विशेष तौर पर धैर्य खो रहा है। पहली बार अमेरिका के साथ मिल कर उन्होंने इराक़ में ईरान समर्थक मिलिशिया पर हमला किया है। दूसरी तरफ़ अपने सहयोगी मिलिशिया की मदद से ईरान ने जार्डन और  मिस्त्र तक पर हमला कर दिया है। युद्ध का दायरा बढ़ता जा रहा है। ईरान ने इस युद्ध की बहुत समय से तैयारी की लगती है। वह जानते हैं कि इज़राइल और नेतन्याहू उन्हें तबाह करना चाहतें हैं। उसने सारे मध्यपूर्व में बाग़ियों का नेटवर्क खड़ा किया हुआ है जिसके द्वारा वह इज़राइल और खाड़ी के देशों पर हमले करवाता रहता है। कोशिश है कि खाड़ी के देश अमेरिका पर समझौता करने के लिए दबाव डालेंगे, जो हो भी रहा है। ईरान के एक प्रमुख अधिकारी महदी मुहम्मद ने कहा है कि, “युद्ध के नियम बदल रहें हैं और दोबारा लिखें जा रहें हैं। हम युद्ध में नई स्थिति बना रहें हैं”।

पहले केवल होर्मुज की समस्या थी अब ईरान समर्थक हूती बाग़ियों द्वारा बाब-अल-मंदेब (लाल सागर) जलमार्ग और स्वेज नहर के मुहाने पर स्थित दमियाता बंदरगाह पर हमले से दुनिया के तीन प्रमुख समुद्री मार्ग खतरें में पड़ गए हैं। होर्मुज से दुनिया का 20% तेल -गैस और स्वेज और लाल सागर मार्ग से दुनिया का 10-15 %  समुद्री व्यापार होता है। इन तीनों समुद्री मार्गों पर ख़तरे से दुनिया की अर्थव्यवस्था अस्त व्यस्त हो जाएगी। पहले से प्रभावित हमारा देश और प्रभावित होगा। परिस्थिति बहुत ख़तरनाक मोड़ ले रही है। चीन के बारे भी समाचार है कि वह अमेरिका की चेतावनी के बावजूद, ईरान को कई सौ मिसाइल भेज रहा है। चीन और रूस ने ईरान की सैनिक सहायता बढ़ा दी है। दूसरी तरफ़ यह समाचार भी है कि अमेरिका में एयर डिफेंस सिस्टम में कमी आ रही है क्योंकि जिस रफ़्तार से ईरान पर मिसाइल दागी जा रही उस रफ़्तार से पूर्ति नहीं हो रही। ईरान की तरफ़ से भी मिसाइल दागने की रफतार कुछ कम हुई है पर इन्हें रोकने वाले अमेरिका के इंटरसैप्टर की संख्या भी कम हो रही है।

यह भी अफ़सोस की बात है कि जब दुनिया इतने संकट में है तो अमेरिका की बागडोर डानल्ड ट्रंप जैसे अस्थिर व्यक्ति के हाथ है जो सुबह कुछ कहतें हैं,शाम को कुछ और। ईरान का नेतृत्व भी गर्म दल और नरम दल में बँटा हुआ है। गर्म दल हर हालत में जीत चाहता है जबकि नरमपंथी समझतें हैं कि समझौता कर लेना चाहिए नहीं तो बहुत तबाही होगी।

इन दो युद्ध के बीच भारत फँसा हुआ है। जब युक्रेन में युद्ध शुरू हुआ तो भारत का रवैया तटस्थता का था कि युद्ध क्षेत्र बहुत दूर है, हमें असर नहीं होगा। हमें रूस से सस्ता तेल भी मिल रहा था। लेकिन इसी को लेकर अमेरिका ने दबाव डालना शुरू कर दिया तो भारतीय कूटनीति के लिए समस्या खड़ी हो गई। रूस सैनिक सामान का हमारा सबसे बड़ा सप्लायर है। रूस से प्राप्त  S-400 मिसाइल सिस्टम और ब्रह्मोस मिसाइल के बल पर हम आपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान को पराजित करने में सफल रहे। ब्रह्मोस को हम निर्यात भी कर रहें हैं।रूस तेल हमारी तेल की हमारी आधी जरूरत पूरी करता है। मध्य पूर्व की जो स्थिति बनती जारहा है उसके बाद रूस का तेल और भी महत्व रखता है। लेकिन अमेरिका फिर रूस से तेल ख़रीदने वाले देशों पर 100% टैरिफ़ लगाने की धमकी दे रहा है।

मध्य पूर्व की स्थिति और जटिल है। युद्ध हमारे मित्र इज़राइल के नेतन्याहू ने शुरू किया। इस युद्ध से हमारा भारी नुक़सान हुआ है। पर क्योंकि अतीत में इज़रायल हमारी मदद करता रहा है इसलिए हम ख़ामोश हैं पर जैसे पूर्व विदेश सचिव निरूपा मेनन राव ने लिखा है, “इज़रायल के साथ हमारे संबंध गहरें हैं और उनके द्वारा मिली सहायता के लिए हम कृतज्ञ है…लेकिन क्या यह बिना आलोचना के उनके साथ जुड़े रहने का आधार होना चाहिए…विदेश नीति को आभार व्यक्त करने की प्रक्रिया नहीं बनाना चाहिए”। हमारे यूएई के साथ भी गहरें सम्बंध हैं। इज़राइल द्वारा शुरू किए इस युद्ध से उन्हें सबसे अधिक नुक़सान हुआ है। दुबई तो बुरी तरह से हिट है। उसका आकर्षण ही आधा रह गया क्योंकि वह पहले जैसी हर तरह से सुरक्षित जगह नही रही। अमेरिका ने ईरान की चाहबहार बंदरगाह पर हमला किया है जिसे बनाने में हमने पिछले नौ बरसों में लगभग एक हजार करोड़ रूपए ख़र्च किए हैं। इसके द्वारा हम अफ़ग़ानिस्तान और केन्द्रीय एशिया के देशों के साथ पाकिस्तान की रूकावट के बिना सीधा रास्ता निकाल रहे थे।अभी तक अमेरिका मे चाहबहार को छुआ नहीं था। क्या अब इसका इन्फ़्रास्ट्रक्चर तबाह कर हमें भी संदेश भेजा जा रहा है? भारत की तटस्थ नीति पर चोट की जा रही है?

बहरहाल मध्य पूर्व में अनिश्चित शान्ति की स्थिति है। कहतें हैं कि छोटे लोगों की ग़लतियों की चिन्ता नहीं क्योंकि उसके नतीजे मामूली होतें हैं, पर बड़े लोगों की ग़लतियों के नतीजे भी बड़े होतें हैं। दुनिया बड़े लोगों की ग़लतियों का ख़ामियाज़ा भुगत रही है। अमेरिका और इज़राइल ने समझा था कि वह ईरान के इस्लामिक रिपब्लिक को नष्ट कर देंगे। ईरान तबाह हो चुका है। उसका सैनिक और औद्योगिक आधार बहुत क्षतिग्रस्त हो चुका है पर गर्म दलीय रैवलयूशनरी गार्ड पहले से अधिक जम गया है। युद्ध से पहले होर्मुज खुला था पर अब ईरान उसे नियंत्रित करना चाहता है। यह डानल्ड ट्रंप की मूर्ख नीति का परिणाम है कि जो पहले खुला था उसे खुलवाने के लिए अरबों डालर बर्बाद किए जा रहें हैं। अमेरिका के पूर्व राजनयिक डैनिस रौसा ने कहा है, “बहुत बड़ी सैनिक सफलता मिली हैं, पर स्थाई लाभ कुछ नही है”। अमेरिका अब वहां से निकलना चाहता है पर रास्ता नहीं मिल रहा। ईरान ने फँसा दिया है। ईरान और इज़रायल एक दूसरे को अपने अस्तित्व के लिए ख़तरा समझतें है। इनके टकराव में खाड़ी के देश फँस गए है। हमें अतिरिक्त नुक़सान हो रहा है और होता रहेगा। बड़ी कूटनीतिक चुनौती है। स्थाई शान्ति की उम्मीद बहुत कम है।

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About Chander Mohan 827 Articles
Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.