अमेरिका के नागरिक दिलजीत दोसांझ की फ़िल्म ‘सतलुज’ को लेकर पंजाब में काफ़ी सनसनी फैल गई है। तीन साल यह फ़िल्म सेंसर बोर्ड में फँसी रही फिर इसे 2 जुलाई को ओटीटी पर रिलीज़ कर दिया गया। दो दिन के बाद सरकार ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए इसे हटवा दिया। सरकार का यह अनाड़ीपन है जिसने फ़िल्म के प्रति पंजाब में भारी उत्सुकता पैदा कर दी है। गाँवों और गुरुद्वारों में इसकी स्क्रीनिंग हो रही है। गुरुद्वारों में स्क्रीनिंग सामान्य नहीं है। अगर फ़िल्म को हटाना ही था, तो इसे ओटीटी पर रिलीज़ क्यों किया गया? क्या इस सरकार का बायाँ हाथ नहीं जानता कि दायाँ क्या कर रहा है? या इसके पीछे कोई और प्लानिंग है, आख़िर अगले साल पंजाब में चुनाव हैं? अभिव्यक्ति की आज़ादी की दुहाई देते हुए शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने इसे गुरुद्वारों में स्क्रीनिंग की इजाज़त दे दी है। उनका कहना है कि सत्य बाहर आना चाहिए। जहां तक ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ का सवाल है, यही संस्था अतीत में कई फ़िल्मों पर बैन लगवा चुकी है।
‘सतलुज’ की कहानी मानवीय अधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा पर आधारित है जिसे सितंबर 1995 में उनके कबीर पार्क अमृतसर स्थित निवास से उठा लिया गया और बाद में उनकी हत्या कर दी गई। जिस समय खालड़ा का अपहरण हुआ वह पुलिस के साथ कथित मुठभेड़ों में मारे गए लोगों और लावारिस शवों की जाँच कर रहे थे। दावा था कि 25000 के क़रीब लावारिस शवों को पुलिस द्वारा जला दिया गया। यह बहुत बड़ा आँकड़ा है जिस पर विश्वास करना मुश्किल है। खालड़ा ने खुद 2000 मामलों की जाँच का दावा किया था। एक ही व्यक्ति अकेले इतने सारे मामलों की जानकारी कैसे हासिल कर सकता है? उनके पास कोई संस्था तो नहीं थी जो ऐसी जानकारी हासिल कर सके। लेकिन अगर संख्या कम भी है तो भी यह मामला गम्भीर है। खालड़ा का अपहरण और उनका बाद में लापता होना बराबर गम्भीर मामला है।
इस सारे प्रकरण को पंजाब में आतंकवाद को ख़त्म करने के लिए पुलिस द्वारा अपनाए गए ग़ैर-क़ानूनी तरीक़ों का प्रमाण माना जा रहा है। 1991 में पंजाब को डिस्टर्ब्ड स्टेट घोषित किया गया जिस दौरान स्थिति से निपटने के लिए पुलिस को व्यापक अधिकार मिल गए थे। कई ज़्यादतियाँ हुईं। वह अदालतों की अनुमति के बिना भी किसी को हिरासत में ले सकते थे। पुलिस को यह अधिकार शायद इसलिए दिया गया क्योंकि आतंकवादियों के डर से अदालतों ने काम करना बंद कर दिया था। कई जज और मैजिस्ट्रेट तो उस दिन अदालत से ग़ैर हाज़िर हो जाते थे जिस दिन किसी आतंकवादी का केस लगा होता था। जालंधर में एक जज को गोली मार दी गई थी इसका असर सारी ज्यूडीशरी पर पड़ा था। क्या ऐसी स्थिति में सामान्य पुलिस तरीक़ों से आतंकवाद ख़त्म हो सकता था? यह भी याद रखना चाहिए, जो बात कैप्टन अमरेंद्र सिंह ने भी कही है, कि इस दौरान 1800 पुलिस कर्मी भी मारे गए थे। यह मामूली संख्या नहीं है। इससे यह भी पता चलता है कि कैसा भीषण टकराव था। पूर्व डीजीपी के पी एस गिल की बहुत आलोचना हो रही है कि उन्होंने स्थिति से निपटने के लिए ग़ैर क़ानूनी तरीक़े अपनाए। पर क्या आतंकवाद सामान्य क़ानूनी तरीक़ों से ख़त्म हो सकता था?
1981-1993 के बीच हजारों लोग मारे गए जिनमें आम नागरिक, आतंकवादी, पुलिस वाले और दूसरे सरकारी अधिकारी शामिल है। आख़िर में जब पंजाब नियंत्रण में आया तो बहुत तबाही हो चुकी थी। हम आज तक उस त्रासदी से नहीं उभरे। एक बहादुर मुख्यमंत्री सरदार बेअंत सिंह की सचिवालय के बाहर हत्या हो चुकी थी। और अब यह फ़िल्म आगई है जिसे लेकर फिर वैचारिक मतभेद है क्योंकि यह फ़िल्म केवल एक पक्ष, सरकार की ज़्यादती, का वर्णन करती है। इस बात का जवाब नहीं देती कि पुलिस को यह असाधारण कदम क्यों उठाने पड़े? मैंने यह फ़िल्म नहीं देखी लेकिन जो कुछ इसके बारे छपा है वह एक पक्षीय है जबकि पंजाब की त्रासदी बहुआयामी है। एक पक्ष खलनायक और दूसरा हीरो नहीं था। दिलजीत दोसांझ की ‘सतलुज’ के उस पार एक और ‘सतलुज’ भी थी, जो लहुलुहान थी, जिस पर गोलियाँ और बम बरसाए गए। क्या दिलजीत दोसांझ उस ‘सतलुज’ पर फ़िल्म बनाएँगे?
पुलिस की कथित ज़्यादतियों के बारे तो फ़िल्म बन गई पर जो हज़ारों नागरिक, हिन्दू और सिख, खालिस्तानी आतंकवादियों के हाथों मारे गए उस कहानी का कम वर्णन क्यों हो रहा है? पंजाब ने दो दशक आतंकवाद झेला है। 1994 की ह्यूमन राइट्स वॉच रिपोर्ट जहां सुरक्षा बलों द्वारा मानवाधिकारों के उल्लंघन का वर्णन करती है, वहां विस्तार से 1981-1993 के बीच आतंकवादियों द्वारा हत्या, अपहरण और रेप की घटनाओं का भी वर्णन करती है। लोगों को उनके घरों में,दुकानों पर,गाँव में, धार्मिक स्थलों पर, बसों और ट्रेनों से निकाल कर मारा गया। पुलिस वालों के रिश्तेदारों को निशाना बनाया गया। हमलों के द्वारा भय पैदा करने और ग़ैर सिखों को पंजाब से निकालने का प्रयास किया गया। पंजाब में इज़्ज़त और निर्भयता से रहने के उनके अधिकार को छीनने का प्रयास किया गया।
स्कूलों तक को छोड़ा नहीं गया। दिसंबर 1990 को राजपुरा में सरकारी स्कूल की प्रिंसिपल निर्मल कांता को स्कूल के बच्चों के सामने गोली मार दी गई। उनका क़सूर था कि वह आतंकवादियों द्वारा निर्धारित समय सीमा में गरीब बच्चों पर ड्रेस कोड लागू नहीं कर सकीं। हमारे अपने वीर प्रताप कार्यालय में पार्सल बम विस्फोट में दो कर्मचारी मारे गए। मैंने अपनी किताब (सह-लेखिका ज्योत्सना मोहन) प्रताप ए डिफायंट न्यूज़पेपर में इसका वर्णन किया है कि यह घटना “वह ज़ख़्म छोड़ गई जो आजतक नहीं भरा”। पंजाब केसरी के लाला जगत नारायण और रमेश चंद्र की हत्या कर दी गई। यह सारे प्रयास हिन्दुओं को पंजाब से निकालने का था। सबसे वीभत्स 15 जून 1991 की घटना थी जब सतलुज के किनारे बसे लुधियाना के नज़दीक दो ट्रेनों को रोक कर हिन्दुओं को सिखों से अलग कर अंधाधुंध फ़ायरिंग कर दी गई। उस रात 100 लोग मारे गए थे,इनमें बच्चे और महिलाएँ भी थीं। इससे पहले कई बसों को रोक कर इसी तरह एक समुदाय के लोगों को अलग कर गोली मार दी गई थी। क्या इन लोगों के ह्यूमन राइट नहीं थे? यह कथित मानवाधिकार संस्थाएं तब क्यों ख़ामोश रही जब हिन्दू टार्गेट थे? आज भी जब कोई इन घटनाओं का ज़िक्र करता है तो उसे ख़ामोश करने की कोशिश की जाती है, जैसे रवनीत सिंह बिट्टू के साथ हो रहा है। वह तो केवल बदसूरत सच्चाई बता रहे हैं जो कुछको अप्रिय लग रही है। ‘सतलुज’ इन घटनाओं का कोई ज़िक्र नहीं करती। नई पीढ़ी जिसने वह काला समय नहीं झेला, को आधी सच्चाई नहीं दिखानी चाहिए। सच्चाई है कि अगर आतंकवाद न होता तो इतने घर बर्बाद न होते।
पंजाब की त्रासदी की कहानी पूरी नहीं होगी जब तक उस समय के एक राजनीतिक नेतृत्व की शरारत और दूसरे राजनीतिक नेतृत्व की बुज़दिली का वर्णन न किया जाए। कांग्रेस के नेतृत्व ने भिंडरावाले को खड़ा किया ताकि अकालियों को चुनौति दी जा सके। वह हाथ से निकल गया और इतनी बड़ी त्रासदी का केन्द्र बन गया। अकाली नेतृत्व की कमजोरी रही कि वह भिंडरावाले द्वारा शुरू की गई उग्रवाद की लहर को रोक नहीं सके। उन्होंने समर्पण कर दिया और स्थिति दिल्ली, चंडीगढ़ और अमृतसर तीनों के हाथ से निकल गई और यहां तक पहुँच गई कि हमारे अति पवित्र स्थान, श्री हरमंदिर साहिब, में टैंक भेजे गए। कड़वी सच्चाई है कि अगर भिंडरावाले को अकाल तख़्त पर जाने से रोक लिया जाता तो इतनी बड़ी त्रासदी बच जाती। पर इसकी बात कौन करेगा? शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी जो सत्य दिखाने की बात करती है को इस सत्य का भी जवाब देना चाहिए कि उन्होंने उस समय अपनी ज़िम्मेवारी क्यों नहीं निभाई?
उस समय का सबसे विश्वसनीय वर्णन मार्क टल्ली और सतीश जैकब की किताब अमृतसर मिसिस गांधीज़ लास्ट बैटल में दिया गया है। कांग्रेस द्वारा भिंडरावाले के खड़ा करने के बारे वह लिखतें हैं, “सरकार ने खुद वह राक्षस खड़ा कर दिया जिसका प्रभाव श्रीमती गांधी के अंतिम दिनों पर पड़ा और उनकी हत्या तक परछाई की तरह पीछा करता रहा”। पंजाब में उग्रवाद के जन्म देने के लिए कांग्रेस के नेतृत्व को जिम्मेवार ठहराते हुए लेखक सिख नेतृत्व की भूमिका के बारे भी बेरहम है। आपरेशन ब्लू स्टार के बारे लिखतें हैं, “सिख नेतृत्व भी उस तबाही के लिए उतना ही जिम्मेवार था जितना सरकार थी”। एक जगह वह और लिखतें हैं, “अकाली त्रिमूर्ति भी ज़िम्मेवारी से बच नहीं सकती। बादल और लोंगोवाल में उस फ़ोर्स के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत नहीं थी जिसे वह दुष्ट समझते थे। टोहरा ने उसे अपने हित में इस्तेमाल करने का प्रयास किया”।
दक्षिण पश्चिम तिब्बत में मानसरोवर झील के पास से निकल कर सतलुज हिमाचल प्रदेश से गुजरते पंजाब में दाखिल होती है। यहां यह लगभग 400 किलोमीटर सफ़र तय कर चेनाब के साथ मिलकर पाकिस्तान में सिंधु नदी में शामिल हो जाती है। इस नदी ने बहुत कुछ दिया है, बहुत कुछ देखा है, बहुत कुछ बर्दाश्त किया है। विभाजन की त्रासदी देखी तो पंजाब में आतंकवाद की गवाह बनी। सतलुज अब शांत बह रही है, इसे अशांत करने का प्रयास नहीं होना चाहिए।