हम,भारत के लोग, From Chori In Ram Mandir To Uncertainty About Passport: Season Of Disquiet

मेरा पासपोर्ट नवम्बर 2017 में जारी हुआ था। अगले साल इसकी अवधि समाप्त हो रही है। इसमें मेरी नैशनैलिटी अर्थात् राष्ट्रीयता ‘इंडियन’ लिखी हुई है। इसी पासपोर्ट के आधार पर मुझे वीजा मिलता है। विदेशी हवाई अड्डों पर भी मुझे इसलिए प्रवेश मिलता है क्योंकि मैं भारत का नागरिक हूँ। पर अब हमारे विदेश मंत्रालय ने स्वेच्छा से यह स्पष्टीकरण जारी किया है कि पासपोर्ट नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं है और यह महज़ एक ‘ट्रैवल डॉक्यूमेंट’ या यात्रा दस्तावेज है। एक झटके में हमारे विदेश मंत्रालय ने हम करोड़ों भारतीयों का यह भ्रम तोड़ दिया कि हमारे हाथ में जो नीले रंग का पासपोर्ट है वह हमारी भारतीय नागरिकता का प्रमाण है। यह भी समझ नहीं आया कि अचानक यह स्पष्टीकरण देने की जरूरत क्या थी? जो दशकों से सही चल रहा था पर सवाल क्यों लगाया जा रहा है? किसी ने राष्ट्रीयता का सवाल नहीं उठाया, न किसी दूसरे देश ने ही मामला उठाया। पर हमें बताया जा रहा है कि पासपोर्ट तो मात्र यात्रा दस्तावेज है। यह सरकार ऐसे मुद्दे क्यों उठाती रहती है जो परेशानी पैदा करतें हैं? क्या बाक़ी मसले हल हो गए? सरकार अपने लोगों को अविश्वास से क्यों देखती है?

पासपोर्ट जारी करते समय बहुत जाँच होती है। कई दस्तावेज चैक होतें है। पुलिस की तहक़ीक़ात से गुज़रना पड़ता है। मेरे जैसे जिनके पास दशकों से पासपोर्ट हैं, की भी नए पासपोर्ट के लिए पुलिस जाँच होती है। जावेद अख़्तर ने कहा है, “अगर सरकार को इस बात का विश्वास नहीं है कि आवेदक भारतीय नागरिक है, तो उसे पासपोर्ट जारी कैसे हो रहा है”? ‘आधार’ के बारे तो सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका है कि यह नागरिकता का प्रमाण नहीं है मात्र पहचान और निवास का प्रमाण है। यह सही भी है, पर पासपोर्ट तो सघन जाँच के बाद जारी होता है। इसे नागरिकता का प्रमाण क्यों न समझा जाए जबकि सरकार पहले यह स्वीकार कर चुकी है? सरकार कहती है कि ग़ैर-नागरिकों को भी अस्थायी पासपोर्ट जारी होता है। पर इनके कारण जो वास्तव मे भारत के नागरिक हैं उन्हें अनावश्यक टेंशन क्यों दी जा रही है? पासपोर्ट बनाते समय नागरिकता के प्रमाण लिए जातें हैं पर बाद में कहा जाता है कि यह दस्तावेज़ आपकी नागरिकता का प्रमाण नहीं हैं! शशि थरूर ने सही इसे “बेतुका क़ानूनी विरोधाभास’ कहा है।

 देश में घुसपैठ की समस्या है जिसका निपटारा होना चाहिए। लेकिन इससे निपटने के लिए जहां समस्या है वहां केन्द्रित होना चाहिए, न कि करोड़ों भारतीयों को सरकारी चक्रव्यूह में फँसाया जाए। अगर पूर्व में घुसपैंठ हैं तो सारे देश में एसआईआर अभियान क्यों चलाया जा रहा है? कुछ को पकड़ने के लिए करोड़ों को बाबुओं की मर्ज़ी पर क्यों छोड़ा जा रहा है? हमारे जैसे देश में करोड़ों गरीब, अनपढ, प्रवासी, महिलाएँ या विस्थापित हैं जिनके पास या तो दस्तावेज़ नहीं हैं, या गुम हो गए हैं। कईयों के नाम बदल गए, कईयों का निवास बदला गया। बड़ी संख्या के पास जन्म प्रमाणपत्र नहीं है। उनका क्या बनेगा? जो समृद्ध हैं उनके पास जायदाद के दस्तावेज हैं, दशकों के टैक्स रिटर्न हैं, स्कूलों के सर्टिफ़िकेट हैं पर जो दलित हैं, आदिवासी हैं, प्रवासी मज़दूर हैं, और जो समाज के हाशिये पर हैं, उन्हें तो अपना वजूद सिद्ध करना ही चुनौती होगी कि, वह है। सरकार हमें चक्करों में क्यों डाल रही है? जैसे पहले चल रहा था वैसे क्यों नही चल सकता? सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे की तल्ख़ टिप्पणी है कि, “भारत सरकार को लिए 145 करोड़ लोगों का कोई अस्तित्व नही जब तक कि वह खुद यह साबित न करें कि वह भारतीय हैं”।

एक नागरिक की ज़िन्दगी आसान बनाने की जगह उसे और जटिल और उलझी क्यों बनाई जा रही है? अगर आम आदमी से पूछा जाए कि सबसे विश्वसनीय दस्तावेज़ कौन-सा हो तो वह पासपोर्ट का नाम लेगा फिर सरकार इसका अवमूल्यन क्यों करने की कोशिश कर रही है? अगर कानूनन हमारे पास कोई और प्रमाणपत्र नहीं है तो कम से कम तब तक इसे क्यों नहीं माना जा सकता, जैसे पहले माना जाता था ? पूर्व उपकुलपति फयजन मुस्तफ़ा का सुझाव अच्छा है कि जिसका भारत में जन्म हुआ है उसे भारत का नागरिक माना जाना चाहिए और पासपोर्ट और वोटर कार्ड को इसका प्रमाण माना जाना चाहिए। अमेरिका में वहां जन्मा नागरिक माना जाता है। डानल्ड ट्रंप ने इसे बदलने का प्रयास किया था पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक दिया। भारत में इससे आम आदमी की चिन्ता ख़त्म हो जाएगी कि वह कौन है? भारत सरकार को शान्ति से समाधान ढूँढना चाहिए कि एक आम नागरिक अपनी राष्ट्रीयता साबित कैसे करे?  हमारे संविधान की उद्देशिका इन शब्दों से शुरू होती है, ‘हम, भारत के लोग’। अर्थात् संविधान भारत पर भारत के लोगों के स्वामित्व के सिद्धांत से शुरू होता है, पर हालत यह बन गई है कि हमें ही मालूम नहीं कि हम हैं क्या? हम हैं कौन?

महाराष्ट्र में शिक्षकों की टीआईटी परीक्षा पेपर लीक होने के बाद स्थगित हो गई। यह कैसी बेकार व्यवस्था है जहां बार बार पेपर लीक हो रहें है?  नीट पेपर लीक के बाद सबको सावधान हो जाना चाहिए था विशेष तौर पर जबकि उसके तार महाराष्ट्र से जुड़े हुए हैं पर नही, वही चाल बेढंगी जो पहले थी वह अब भी है! क्या इसका कारण यह है कि महाराष्ट्र में सारा ध्यान उद्धव ठाकरे की बची खुची पार्टी को तोड़ने पर था और अच्छा शासन चलाना प्राथमिकता नहीं है? मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव पर आरोप लग रहा है कि उनके परिवार और रिश्तेदारों ने उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद उज्जैन में 167 एकड़ के 137 प्लॉट ख़रीदे हैं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार यह ज़मीनें पहले वहाँ ख़रीदी गईं जहां विकास होना था और जो उज्जैन के मास्टर प्लान में थीं। इसी अख़बार की ख़बर है कि केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण मंत्री भगीरथ चौधरी ने अपने ही मंत्रालय से अपने खीरा फ़ार्म के लिए 99.60 लाख रूपए की सब्सिडी प्राप्त की है। यह अपराधिक मामला नहीं है, नैतिक है। ‘कंफलिक्ट ऑफ इंटरैस्ट’, हितों के टकराव का है। क्या एक मंत्री खुद को सब्सिडी दे सकता है? यह तो पुराने कांग्रेस शासन की याद ताज़ा करता है। उपर ढील नज़र आनी शुरू हो गई है। अगर पहिए से हाथ हट जाता है तो दुर्घटना हो सकती है।

सबसे बड़ी दुर्घटना अयोध्या में हो गई है। वहाँ का राम मंदिर एक सामान्य मंदिर नहीं है। वह सामूहिक भाव की अभिव्यक्ति है। करोड़ों की आस्था का प्रतीक है। 500 वर्ष इसके लिए संघर्ष किया गया और अख़िर में ‘वहीं’ भव्य मंदिर बनाया गया जिस पर हम सब गर्व कर सकते हैं। इसीलिए देश और विदेश में इसे लेकर इतना उत्साह है। दुनिया भर से इसके लिए चढ़ावा आया है पर अब बताया जा रहा है कि चढ़ावे में भारी सेंध लग गई है। 8 लोगों को गिरफ़्तार किया गया है और दो प्रमुख पदाधिकारी चम्पत राय और अनिल मिश्र इस्तीफ़ा दे गए हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ का कहना है कि कोई बचेगा नहीं। यह तो बाद में देखने की बात है, पर सवाल तो है कि यह हो कैसे गया? अमानत में इतनी भयंकर खयानत कैसे हो गई? और क्या यह मामला केवल निम्न कर्मचारियों का ही है, जिनका काम निगरानी रखना था वह क्या करते रहे?

विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष अलोक कुमार ने माना है कि मंदिर अभियान की विश्वसनीयता को धक्का पहुँचा है और जो हुआ है वह शर्मनाक है। उन्होंने ईमानदारी दिखाई है और इधर उधर की फ़िज़ूल बयानबाज़ी नहीं की। पर हिन्दू समाज इस घोर विश्वासघात से स्तब्ध है। एक गिरफ़्तार व्यक्ति तो चम्पत राय के ड्राईवर है। उसे मंदिर के प्रबंधन में दखल देने का अधिकार कैसे मिल गया? कौन यह विश्वास करेंगा कि छोटों छोटे कर्मचारी करोड़ों रूपए का ग़बन कर गए? एक और गिरफ़्तार लवकुश यादव के दादा ने कहा है कि उनका पोता तो मामूली कर्मचारी है जिसे फँसाया गया है जबकि “सारी मैनेजमैंट जिम्मेवार है”। एफ़आइआर में भी इन आठ के अतिरिक्त ‘अदर्ज़’ अर्थात् दूसरों का ज़िक्र है। यह ‘अदर्ज़’ कौन हैं ? सिंधी समाज ने 2021 में राम मंदिर को एक-एक किलो की 200 चाँदी की ईंटें दान की थी। उस समय इन ईंटों की क़ीमत 1.5-2 करोड़ रूपए थी। पहले इस समाज का कहना था कि यह ईंटें ग़ायब हो गईं हैं पर अब बताया जारहा है कि ऐसा नहीं है। इस समाज के प्रतिनिधि डा.वी मनवानी ने कहा है वह संतुष्ट हैं “पर हैरानी की बात है कि जब 2021 में यह दी गईं तो कोई रसीद वगैरह नही दी गई जबकि दुनिया में जहां भी दान दिया जाता है वहां रसीद दी जाती है, और यह मामूली रक्म नहीं थी”। ऐसी व्यवस्था क्यों थी?

कई लोग इसके राजनीतिक फैलाव की चर्चा कर रहें हैं।मैं समझता हूँ कि यह मामूली बात है कि उत्तर प्रदेश में अगली सरकार किस की बनती है, किसकी नहीं बनती। मामला भाजपा-सपा-कांग्रेस आदि से बहुत बड़ा है। मामला आस्था में विश्वासघात का है। आस्था में भ्रष्टाचार का है। आस्था में घोटाले का है। विश्वास में सेंध लगा दी गई। यह मामला आसानी से दबने वाला नहीं है। गली-गली में, गाँव -गाँव में इसकी चर्चा है। अगर बड़ी मच्छलियों को बचाने की कोशिश की गई तो लोग माफ़ नहीं करेंगे। पूरी जवाबदेही तय होनी चाहिए। न्याय होना चाहिए और न्याय होता नज़र आना चाहिए।

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About Chander Mohan 824 Articles
Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.