बच्चों को उनका बचपन लौटा दो, Reclaim Their Bachpan For Our Children

यूएई पहला अरब देश है जिसने 15 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया देखने पर पाबंदी लगा दी है। यह बैन विश्व व्यापी चिन्ता के बीच लगाया गया है कि सोशल मीडिया का बच्चों में बढ़ रहा आकर्षण घातक बनता जा रहे है। कई और देश पहले ही यह बैन लगा चुकें हैं। शुरुआत आस्ट्रेलिया ने की थी। आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री का कहना था कि सोशल मीडिया बच्चों में व्याकुलता पैदा करता है और कई बार वह ऑनलाइन भक्षकों के शिकार हो जातें हैं। 13-17 साल के 95% बच्चे सोशल मीडिया पर है। कई दिन में घंटों इस पर लगे रहतें हैं। चीन में 2021 से 14 वर्ष से कम बच्चों को दिन में 40 मिनट से अधिक देखने की इजाज़त नहीं है। मलेशिया ने हाल ही में 16 वर्ष से कम आयु वाले बच्चों के सोशल मीडिया जिसमें फ़ेसबुक,टिक-टॉक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब शामिल हैं, देखने पर पाबंदी लगी दी है। ब्राज़ील, इंडोनेशिया, ब्रिटेन, फ़्रांस,स्पेन,डेनमार्क, कनाडा, थाईलैंड और डेनमार्क जैसे देश या तो पाबंदी लगा चुकें हैं, या लगाने पर विचार कर रहें हैं। बहुत देशों ने स्कूलों में फ़ोन के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी है।

फ़्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने भारत सरकार से कहा है कि वह भी पाबंदी लगाने पर विचार करे। डिजिटल ख़तरे को देखते हुए कर्नाटक सरकार ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया देखने पर बैन लगा दिया है। आंध्र प्रदेश में यह पाबंदी 13 साल से कम उम्र के बच्चों पर है। भारत सरकार ने इस मामले में कोई कदम नहीं उठाया पर इस पर सोच जरूर शुरू हो गई है। 2025-26 के आर्थिक सर्वेक्षण में सरकार से आयु के हिसाब से सोशल मीडिया पर पाबंदी लगाने की सिफारिश की गई है। सर्वेक्षण में ‘डिजिटल लत’ के खिलाफ चेतावनी दी गई है।

बच्चों में यह डिजिटल लत कितनी बढ़ गई है, यह बताने की जरूरत नहीं है। माँ बाप भी इसे रोकने में बेबस नज़र आतें हैं। ग़ाज़ियाबाद की तीन बहनों का क़िस्सा रोंगटे खड़े करने वाला है। वहाँ की एक हाउसिंग सोसाइटी में रहने वाली 16,14,12 वर्ष की तीन बहने नौंवी मंज़िल से कूद गईं। वह किसी कोरियन लव गेम को फ़ॉलो कर रही थीं। पिता ने जब फ़ोन ज़ब्त कर लिए तो यह लिख कर कि वह ‘कोरियन से अलग नहीं हो सकती’ तीनों ने छलांग लगा दी। देश में बढ़ रहे रेप का कारण भी सोशल मीडिया पर परोसी जा रही पोर्नोग्राफी या अश्लीलता है। यही कारण है कि फाँसी जैसी कड़ी सज़ा के प्रावधान के बावजूद रेप की घटनाएँ कम नहीं हो रही। लाखों ऐसी साइट हैं जो बच्चों को पोर्नोग्राफी परोस रहीं है। इससे विकृति पैदा हो रही है। सर्वेक्षण के अनुसार 90% यूज़र ने महीने में कम से कम एक बार ‘पोर्न’ शब्द सर्च किया है। चीन, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, जापान और पाकिस्तान जैसे 45  देशों में पोर्नोग्राफी पर प्रतिबंध है। पाकिस्तान पिछले साल 8 लाख वेबसाइटों को बंद कर चुका है। भारत में चाइल्ड पोर्नोग्राफी पर पाबंदी है पर एडल्ट पोर्न साइट धड़ल्ले से चल रही है जब कि मालूम है कि दुष्कर्मी अधिकतर वयस्क होतों है। भारत पीछे क्यों है?

अमेरिका में एक अदालत ने यूट्यूब और इंस्टाग्राम की कम्पनियों को एक युवती को 56 करोड़ रूपए जुर्माना देने का आदेश दिया है। इस युवती की शिकायत है कि 6 साल की उम्र से वह सोशल मीडिया से जुड़ी है और इन पर घंटों बिताने से यह आदत लत में बदल गई जिससे वह मानसिक तौर पर परेशान रहने लगी और यहां तक कि खुद को नुक़सान पहुँचाने के बारे सोचने लगी। पर यहां हम केवल इन कम्पनियों को ही दोषी नहीं ठहरा सकते। इस युवती के मामले में माँ बाप बराबर लापरवाह रहें होंगे जिन्होंने छ: साल की बच्ची को सोशल मीडिया पर जाने की अनुमति दे दी। पर इस बात से तो इंकार नही किया जा सकता कि सोशल मीडिया का बच्चों पर बहुत ग़लत मानसिक प्रभाव पड़ता है। छोट बच्चों में माइग्रेन की शिकायत पहले नहीं सुनी जाती थी, पर अब सुनाई दे रही है।

मनोवैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि बच्चे जितना सोशल मीडिया की काल्पनिक दुनिया में व्यस्त रहेंगे उतना वह असली दुनिया से कटते जाएँगे। कई बच्चे इतने चिड़चिड़े हो जाते हैं कि अवसाद उन्हें घेर लेता है। बचपन के जो दिन खेलने कूदने के होतें हैं वह बंद कमरे में स्क्रीन पर गुज़ारे जातें हैं। बच्चों की ज़िन्दगी खेल आधारित कम और इंटरनेट आधारित अधिक बनती जा रही है। कई मनोवैज्ञानिक चेतावनी दे रहें हैं कि मोबाइल की लत ड्रग लत जितना घातक हो सकती है। डाक्टर बता रहें हैं कि उनके पास इंटरनेट-लत की शिकायत वाले बच्चों की तादाद बढ़ती जा रही है। भोपाल से मनोवैज्ञानिक डा.सत्यकांत त्रिवेदी कहतें है, “एक बार लत लग गई तो इसके इस्तेमाल को लेकर इतनी तीव्र इच्छा होती है कि शराबियों या ड्रगी की तरह बच्चे भी अड़ जाते हैं। वह अहंकारी, हिंसक और खुद को क्षति पहंचा सकतें हैं”। कई पैरेंट्स बताते हैं कि अगर मोबाइल न दो तो बच्चा चिल्लाने लगता है, नाराज़ हो जाता है ,छोटी छोटी बात पर रोना या झगड़ना शुरू हो जाता है। कईयों में मोटापा बढ़ रहा है।

अमेरिका की सैन डियागो स्टेट यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर जीन टवेंगे ने बताया है कि “अत्याधिक स्क्रीन टाइम बच्चों में एकाग्रता समाप्त कर रहा है। बच्चों में सीखने और समझने की क्षमता कम हुई है। पढ़ाई में दिलचस्पी कम होती है”। अध्यापक शिकायत करते हैं कि क्लास रूम कमजोर पड़ रहें हैं। माँ बाप शिकायत करतें हैं कि बच्चे अड़ियल हो रहें हैं। कई पब्लिक स्कूलों में कॉसलर रखे गए हैं ताकि बच्चों को गाइड किया जा सके। एक कॉसलर ने बताया कि छोटे छोटे बच्चे भी अपनी बात कहने के लिए उनके पास आ रहें है। सरकार ने बच्चों के लिए जो हैल्प लाइन बनाई है उस पर कॉल करने वाले बहुत से बच्चे छठी से आठवीं क्लास के हैं। हमारे ज़माने में न तो स्कूलों में कॉसलर थे न ऐसी हैल्प लाईन थी। अब क्यों जरूरत पड गई?

इसका कारण है कि समाज बदल गया। मां बाप खुद इतने व्यस्त हो गए कि बच्चों की तरफ़ पूरा ध्यान नहीं रहा। छोटों छोटे बच्चों को बहलाने के लिए फ़ोन दे दिया जाता है। कई माँ बाप पढे लिखें नहीं हैं जिस कारण नहीं जानते कि बच्चा क्या देख रहा है। उनकी लापरवाही या अज्ञानता भी समस्या पैदा कर रही है। स्टेटस के लिए भी फ़ोन दिया जाता है। संयुक्त परिवार टूट रहें हैं और कई बार बच्चा अकेला घर में रह जाता है और लत में फँस जाता है। खेल कूद से ध्यान हट रहा है। पारिवारिक जीवन अस्त व्यस्त हो रहा है। एक ही घर में कईं अजनबी बनते जा रहें हैं। देश के अंदर बड़ी राय है जो सोशल मीडिया पर पाबंदी नहीं तो कम से कम, सख़्त निगरानी की वकालत करती है। कई पेरंटस जो खुद अपने बच्चों के अनुशासित नहीं कर सकते, चाहतें हैं कि सरकार यह काम करे। कम्पनियाँ खुद को दुरुस्त नहीं कर रही। उनका लक्ष्य तो वैसे भी पैसा कमाना है, वह सोशल वर्क में तो हैं नहीं।

सार्थक सवाल है कि ऐसा बैन व्यवहारिक भी है? अगर बड़ी कम्पनियों पर पाबंदी लग गई तो क्या बच्चे इंटरनेट के अनियंत्रित कोनों में तो नहीं पहुँच जाएँगे जहाँ और भी अधिक ख़तरा है? जिसे ‘डार्क वेब’ कहा जाता है वह और भी अधिक ख़तरनाक है क्योंकि वह गुप्त है। यह हिंसा और अश्लीलता से भरा हुआ है। क्या यह बैन बैकफायर तो नहीं कर जाएगा? बच्चे होशियार होतें हैं वह अपना रास्ता ढूँढ लेंगे। पर सोशल मीडिया के अनियंत्रित इस्तेमाल की इजाज़त नहीं दी जा सकती। भारत सरकार पूर्ण बैन पर सहमत नहीं लगती। 8-12, 12-16, 16-18साल की तीन श्रेणियां बनाने पर विचार हो रहा है। सीमा तय होगी कि शाम या रात को बच्चे सोशल मीडिया न देख सकें। भारत पश्चिम के देशों से भिन्न है। यहां बहुत बच्चे कमजोर परिवारों से भी हैं। सोशल मीडिया बाक़ी दुनिया से उनके सम्पर्क और सूचना प्राप्त करने का एकमात्र साधन है। उनकी यह खिड़की पूरी बंद करना अन्याय होगा। बीच का रास्ता क्या है?

आख़िर में सुधार सरकार, शिक्षा संस्थाओं, टैक कम्पनियों और माँ बाप, सबके सहयोग से ही हो सकेगा। स्कूलों के लगभग सब प्रिंसिपल बैन पर सहमत होंगे क्योंकि वह रोज़ के संघर्ष से बच जाएँगे। हर स्कूल में रोज़ाना मोबाइल ज़ब्त हो रहें हैं फिर भी बीमारी ख़त्म नहीं हो रही। इस मामले में राष्ट्रीय बहस की ज़रूरत है। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश ने पहल की है, उनके परीक्षण पर नज़र रखी जानी चाहिए। अगर वह सफल रहतें हैं तो भारत सरकार को क़दम उठाना चाहिए। ठीक है, पूरी पाबंदी लगाना आज के युग में सम्भव नहीं है। युवा पीढ़ी बहुत चुस्त है वह रास्ता खोज लेगी। फिर भी हाथ पर हाथ रख बैठा तो नहीं जा सकता। यह बड़ी समाजिक चुनौती बनता जा रहा है। बच्चों को उनका बचपन लौटाने की जरूरत है। जैसे एक माँ ने मुझे बताया कि अगर यह बैन 30-40 % भी सफल रहता है तो भी यह लगाने लायक़ है। जितना भी हो सके। आख़िर में बहुत कुछ परिवार पर निर्भर करता है। क़ानून बने या नही, माँ बाप को हिम्मत दिखानी होगी और घर में मोबाइल के इस्तेमाल को नियंत्रित करना होगा। वह सारी ज़िम्मेवारी सरकार या कम्पनियों पर नहीं डाल सकते। बच्चा बिगड़ेगा तो क़ीमत परिवार को ही चुकानी पड़ेगी।

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About Chander Mohan 824 Articles
Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.