पाकिस्तान से बीतचीत होनी चाहिए?, Talks For Talk’s Sake ?

अगर कोई और यह बात कहता तो तत्काल उसे पाकिस्तान जाने के लिए कह दिया जाता। उसे एंटी- नैशनल करार दिया जाता। सोशल मीडिया की तोपों के द्वारा उसके ख़िलाफ़ ज़बरदस्त अभियान चलाया जाता। पर यहाँ तो संघ के वरिष्ठ अधिकारी दत्तात्रय होसबाले कह रहे थे कि पाकिस्तान की पुलवामा जैसी हरकतों का जवाब देते हुए भी “हमें दरवाज़े बंद नहीं करने चाहिए। हमें सदा बातचीत के लिए तैयार रहना चाहिए”। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पाकिस्तान की तरफ़ पहल को एक मिसाल कहा कि बार बार उत्तेजना के बावजूद उन्होंने संवाद जारी रखा। दत्तात्रय होसबाले भूल गए कि अटलजी की लाहौर यात्रा के दौरान ही पाकिस्तान ने कारगिल की चोटियों पर क़ब्ज़ा करना शुरू कर दिया था। फिर भी होसबाले का सुझाव असमान्य है क्योंकि वह संघ के बड़े अधिकारी हैं और यह लोग अचानक ऐसे सुझाव नहीं देते। हर बात को सोच समझ कर, नाप तोल कर कहा जाता है। राम मंदिर में ग़बन पर भी होसबाले ने ही संघ की प्रतिक्रिया व्यक्त की है, पर काफ़ी दिनों के बाद, सोच समझ कर, नाप तोल कर।

इस समय अचानक होसबाले ने यह ग़ुब्बारा क्यों उड़ा दिया? देश तो प्रधानमंत्री मोदी के इन शब्दों से बंधा हैं कि ‘टैरर एंड टाल्कस’ आतंक और बातचीत, इकट्ठे नहीं चल सकते। हैरानी है कि होसबाले ने यह भी कहा कि अगर पाकिस्तान पुलवामा जैसे ‘पिन प्रिक्स’ देता रहें तो हमें स्थिति के मुताबिक़ जवाब देना चाहिए। पुलवामा में हमारे 40 जवान शहीद हुए थे और संघ के वरिष्ठ अधिकारी इसे मामूली सूई की चुभन कह रहें हैं ! वह पहलगाम को  भूल गए। बाद में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी उनकी बात का समर्थन कर दिया। क्या सरकार की तरफ़ से लोगों की प्रतिक्रिया जानने के लिए यह ट्रायल बलून उड़ाया गया? क्या कोई खिचड़ी पक रही है? यह भी उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान में होसबाले के बयान का स्वागत किया गया है और इसे ‘सकारात्मक कदम’ कहा है। पाकिस्तान के विदेश विभाग के प्रवक्ता का कहना था कि “उन्हें आशा है कि विवेक की जीत होगी”।

जो आतंकवाद का प्रायोजक है वह ही पीड़ित को विवेक की सलाह दे रहा है ! संघ के लोग कह रहें हैं कि होसबाले का बयान ‘पाकिस्तान के लोगों के लिए हैं पाकिस्तान की सरकार के लिए नहीं’। यह बेमतलब की बात है। पाकिस्तान का अवाम मायने नहीं रखता। वास्तव में तो सरकार भी मायने नहीं रखती, मायने केवल वहाँ की ताकतवार सेना रखती है और कोई संकेत नहीं कि भारत प्रति उनकी दुष्मनी कम हुई है।  भारत और पाकिस्तान पर अमेरिका एक्सपर्ट स्टीफ़न कोहन ने कहा है कि “पाकिस्तान की विदेश नीति वास्तव में उनकी सेना की विदेश नीति बन गई हैं”। पर वह एक और दिलचस्प बात कहतें हैं कि “पाकिस्तान की सेना आतंकवाद और कश्मीरी अलगाववादियों को समर्थन देते हुए भी नहीं चाहती कि ऐसी स्थिति पहुँच जाए कि भारत के साथ सीधा टकराव हो”। इसीलिए, होसबाले की भाषा में, ‘पिन प्रिक्स’ देते रहतें हैं। पुलवामा, उरी, पठानकोट, पहलगाम, यह सब सीमित उत्तेजना है। कारगिल जैसा बड़ा दुःसाहस दोबारा नहीं किया गया।

इस समय होसबाले ने यह धमाका क्यों किया ? क्या देश को ‘आतंक और बातचीत इकट्ठे नहीं चल सकते’ की नीति पर पुनर्विचार के लिए तैयार किया जा रहा है? जो पहल खुद अभी सरकार नहीं उठाना चाहती, वह संघ की मार्फ़त उठाई जा रही है? यह भी दिलचस्प है कि होसबाले का यह सुझाव उनकी अमेरिका यात्रा के तत्काल बाद आया है। क्या वहाँ से कोई दबाव  है? क्या इस प्रयास के पीछे अमेरिका का हाथ है? ट्रम्प प्रशासन का पाकिस्तान के प्रति रवैया बहुत ममता भरा है। ट्रम्प मुनीर की तारीफ़ करते नहीं थकते और उपराष्ट्रपति वैंस ने  हाल में कहा है कि ‘वी लव पाकिस्तान’। जिस देश ने दशकों ओसामा बिन लादेन को अपनी एबटाबाद छावनी में छिपाए रखा था अगर उसके लिए वैंस का लव उमड़ रहा है तो उन्हें मुबारक, पर हमारे लिए तो समस्या है। अभी तक जितने भी भारत के प्रधानमंत्री रहें हैं, वर्तमान प्रधानमंत्री समेत, सबने पाकिस्तान की तरफ़ हाथ बढ़ाया है और सबके हाथ झुलस गए। यही कारण है देश में पाकिस्तान के साथ संवाद शुरू करने के प्रतिक्रिया बहुत अच्छी नहीं रही।  

वरिष्ठ वकील और विपक्षी नेता कपिल सिब्बल ने होसबाले के सुझाव को वाहियात कहा है। उनका कटाक्ष है कि अगर वह यह बात कहते तो उन्हें देश विरोधी कहा जाता, पर क्योंकि होसबाले कह रहें हैं तो ठीक हैं। पर देश में एक राय ज़रूर है जो बातचीत के पक्ष में है। दोनों देशों की 117 हस्तियों (61 भारत से और 55 पाकिस्तान से) ने प्रधानमंत्री मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ को पत्र लिख कर बातचीत शुरू करने और रिश्ते सुधारने की वकालत की है। लिखने वालों में फारूक अब्दुल्ला और पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री ख़ुर्शीद महमूद कसूरी शामिल हैं। पर जम्मू कश्मीर के भाजपा अध्यक्ष रविन्द्र राणा का कहना है कि फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ़्ती को पहले जम्मू कश्मीर में मारे गए बेक़सूरों की बात उठानी चाहिए थी। राणा की बात ग़लत भी नहीं, पर यही होसबाले को बताने की हिम्मत उन्होंने क्यों नहीं उठाई ? डा.मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार संजय बारू ने कहा है कि, “जब ज़रूरत हो तो उन्हें खूब हिट करो पर उनके साथ बातचीत के चैनल खुले रखो ताकि उनके व्यवहार में परिवर्तन का फ़ायदा उठाया जा सके”। पर क्या उनके व्यवहार में परिवर्तन का कोई संकेत है? यह भी चर्चा है कि कोलम्बो में दोनों देशों के बीच अनिधिकृत ‘ट्रैक टू’ वार्ता हो कर हटी है जिसमें पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल नरवणे भी शामिल हुए थे। सरकारी क्षेत्र उसका प्रतिवाद करतें हैं पर होसबाले के बयान ने चर्चा ज़रूर शुरू कर दी है।

पाकिस्तान की तरफ़ से भारत के साथ वार्ता शुरू करने की कई मजबूरियाँ है। आंतरिक स्थिति बेहद ख़राब है। सिंगापुर के वरिष्ठ राजनयिक बिलहारी कौसिकन ने कहा है कि “वह देश बर्बादी के कगार पर है”।बार बार दूसरे देशों के पास भीख का कटोरा लेकर जाना पड़ता है, जो बात शाहबाज़ शरीफ़ ने स्वीकार भी की है। अब तो पीओके की स्थिति भी ख़राब हो रही है। ईरान के संकट से जो कूटनीतिक बढत मिली है वह स्थाई नहीं रहेगी जो बात पाकिस्तान जानता है। यही कारण है कि शाहबाज़ शरीफ़ ने तपाक से होसबाले के बयान का समर्थन कर दिया। अगर सम्बंध सामान्य हो जाते हैं तो हमें भी लाभ होगा। दोनों देशों के बीच एयरस्पेस खुल जाएगी और पश्चिम की तरफ़ जाने वाले हमारे विमानों को लम्बा सफ़र नहीं करना पड़ेगा। ईंधन और समय दोनों की बचत होगी। अगर अटारी-वाघा सीमा से व्यापार शुरू हो जाता है तो पंजाब को विशेष फ़ायदा होगा। भारत और पाकिस्तान बीच तनाव का जो फ़ायदा अमेरिका और चीन उठातें है वह भी कम हो जाएगा।

लेकिन यह बहुत कुछ पाकिस्तान के रवैये पर निर्भर करता है। एनआईए ने पहलगाम आतंकी घटना में लश्करे तोयबा के मुखी हाफ़िज़ सईद के खिलाफ चार्ज शीट दाखिल की है। यह शख़्स पाकिस्तान में है।यह चर्चा है कि पहलगाम का मास्टर माईंड और लश्करे तोयबा का कमांडर सैफ़ुल्लाह कसूरी पाकिस्तान में खुला घूम रहा है। यह भी सवाल है कि क्या भारत की जनता सम्बंध सामान्य करने के लिए तैयार है? असली बात है कि भारत सरकार क्या चाहती है? सतिन्दर कुमार लाम्बा जो पाकिस्तान में राजदूत भी रह चुकें हैं और उस देश के साथ गुप्त वार्ता में बहुत लम्बे समय लगे रहें हैं, ने अपनी किताब इन परसूट ऑफ पीस में लिखा है कि, “पाकिस्तान के साथ वार्ता कूटनीतिक नहीं राजनीतिक निर्णय होगा”। पर उनका मानना था कि, “पड़ोस में अस्थिरता के अप्रत्याशित परिणाम हो सकते हैं। उस पड़ोसी से बात न करना जिसकी भारत के प्रति दुष्मनी है, जिसका परमाणु भंडार बढ़ रहा है और जिसकी आंतरिक स्थिति बिगड़ रही है, समझदारी की बात नहीं है”।

सतिनदर कुमार लाम्बा अब रहें नहीं। तब से लेकर बहुत कुछ घट चुका है। भाजपा के नेताओं ने खुद एंटी-पाकिस्तान मूड को बढ़ावा दिया है पर अब अचानक ठहरे हुए पानी में होसबाले ने पत्थर उछाल दिया है। शीत युद्ध के दौरान भी अमेरिका और रूस में बातचीत होती रही। पर पहलगाम के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि ‘हर आतंकी घटना युद्ध की कार्रवाई समझा जाएगी’। अगर यह सिद्धांत है तो जब तक पाकिस्तान ‘आतंकी घटना’ नहीं छोड़ देता तब तक उनसे बात कैसे होगी?रणनीतिक विशेषज्ञ अजय साहनी ने सवाल किए हैं, “ क्या वहाँ जेहादी इंफ़्रास्ट्रक्चर को नष्ट करने की का कोई संकेत है? क्या रावलपिंडी ने प्राक्सी युद्ध बंद कर दिया? ऐसे किसी परिवर्तन के कोई संकेत नहीं हैं”। उनकी बात सही है। पाकिस्तान कोई संकेत नहीं दे रहा कि वह बंदा बन रहा है। शाहबाज़ शरीफ़ के बड़े भाई साहिब नवाज शरीफ़ भी अच्छी अच्छी बातें करते रहे। लाहौर में उन्होंने और वाजपेयी ने खूब जप्फी डाली। वहाँ अटलजी ने जज़्बात से भरा भाषण भी दिया कि “आप मित्र बदल सकतें हैं, पड़ोसी नहीं”। पर पड़ोसी कारगिल कर गया।

स्थाई दुश्मनी हमारे हित में नहीं है पर अच्छे आचरण का प्रमाण तो पड़ोसी ने देना है। जब तक वह ऐसा प्रमाण नहीं देते तब तक बातचीत के लिए बातचीत निरर्थक रहेगी। देश की जनता भी अभी इसके तैयार नहीं है। याद रखिए यह धुरंधर का ज़माना है, वीर ज़ारा का नहीं।

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Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.