चुनाव आयोग के आंतरिक कामकाज पर इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्टर रीतिका चोपड़ाकी विस्फोटक रिपोर्ट के तीन दिन के बाद चुनाव आयोग ने बैठक कर प्रेस रिलीज़ द्वारा कुछ स्पष्टीकरण देने का प्रयास किया है जिससे नए सवाल उठ खड़े हुए हैं। बेहतर होता कि आयोग के तीनों सदस्य संयुक्त तौर पर पत्रकार सम्मेलन कर सभी शंकाओं को दूर करने का प्रयास करते पर ऐसा नहीं किया गया। उलट यह प्रभाव जा रहा है कि आयोग रक्षात्मक है। लोकतंत्र चुनाव प्रक्रिया की स्वतन्त्रता और चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर आधारित है। पार्टियां जीतती रहेंगी, हारती रहेंगी पर अगर वह उच्च संस्था जो चुनाव करवाती है, अपनी विश्वसनीयता खो बैठती है तो सारी चुनाव प्रक्रिया शंका के घेरे में आजाएगी। चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था जरूर है पर यह निरंकुश नहीं है। यह संविधान के उपर नहीं है। यह जनता के प्रति जवाबदेह है। सरकार किसी बनेगी यह तय करने का अधिकार जनता का है, किसी संस्था का नही।
चुनाव आयोग की इस देश में बहुत इज़्ज़त रही है। जिस तरह चुनाव करवाए जाते रहे लोग इससे संतुष्ट थे। अब तक। पिछले कुछ वर्षों से ऐसी मनमानी की गई है कि लोगों में बेचैनी है। लोकतंत्र में एक एक वोट का मतलब होता है पर चुनाव आयोग ने तो 13 करोड़ लोगों को काट दिया। कई जगह राज्य चुनाव अधिकारी चीखते चिल्लाते रहे पर उनकी एक नही सुनी गई। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार दो चुनाव आयुक्तों विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधु ने 10 महीनों में 14 बार आयोग के एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) के बारे आपत्ति जताई कि अहम फैसलों में उन्हें शामिल नहीं किया गया। पर मुख्य आयुक्त ने इन्हें नजरंदाज कर दिया। अब अवश्य कहा जा रहा है कि सारे फ़ैसले सर्वसम्मति से लिए गए पर जो आपत्तियाँ दर्ज की गई इनका क्या हुआ? इसके साथ यह सवाल भी उठता है कि अगर इन दो चुनाव आयुक्तों को इतनी आपत्ति थी तो उन्होंने पूरे आयोग की बैठक बुला कर मुख्य आयुक्त के आदेशों को निरस्त क्यों नहीं किया ?
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार तीनों चुनाव आयुक्तों ने चार महीने कोई बैठक नहीं की जबकि नियम के अनुसार हर सप्ताह दो बैठकें होनी चाहिए। लम्बे अर्से के बाद अब 26 सितंबर को बैठक हुई है। आयोग ने इस बात का प्रतिवाद नहीं किया कि इतने महीने पूरे आयोग की बैठक नहीं हुई पर अगर बैठक नहीं हुई तो ‘सर्वसम्मति’ कैसे हो गई? क्या मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ही चुनाव आयोग थे? क़ानून कहता है कि आयोग के निर्णय सर्वसम्मति से होने चाहिए नहीं तो बहुमत से होने चाहिए। पर यहां तो लगता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ही निरंकुश फ़ैसले ले रहे थे। अब अख़बार की रिपोर्ट के बाद आयोग यह प्रभाव दे रहा है कि वह सही रास्ते पर चलेगा। बैठक से पहले एजेंडा सबको भेजा जाएगा। बैठक ख़त्म होने के बाद मिनेट्स तैयार किए जाएँगे। इसमें यह स्वीकृति भी छिपी है कि पहले ऐसा नहीं हो रहा था। हर संस्था, हर सोसाइटी नियमों का पालन करती है पर इतने बड़े चुनाव आयोग में एजेंडा नहीं भेजा जा रहा था? मिनेट्स तैयार नहीं हो रहे थे?
दूसरा बड़ा मसला फ़ार्म 6 में परिवर्तन को लेकर है। इस फ़ार्म के द्वारा नए वोटर कार्ड बनते हैं। संविधान के अनुसार जो बालिग़ है और भारत का नागरिक है वह वोटर बन सकता है। सवाल नागरिकता को लेकर है कि यह कैसे साबित की जाए? भारत जैसे देश में जहां अत्यंत ग़रीबी है, अनपढ़ता है यह शर्तें आसान से आसान होनी चाहिए। यहाँ करोड़ों प्रवासी हैं जिनके पास पर्याप्त दस्तावेज़ नहीं हैं। ज़मीन के कोई काग़ज़ात नहीं है। जन्म प्रमाणपत्र नही है। अब तक तो उनकी मजबूरी का ध्यान रखा गया था पर इस चुनाव आयोग ने ऐसी शर्तें लगा दीं कि बेचैनी फैल गई। अगर आपके पास आधार कार्ड है, वोटर कार्ड है तो ज़रूरी नहीं कि आपको वोट का अधिकार स्वत: ही मिल जाएगा। आपको सिद्ध करना पड़ेगा कि आप नागरिक हो। नई शर्त यह है कि आवेदन देते समय दादा-दादी, माता-पिता के बारे जानकारी देनी होगी। करोड़ों युवाओं के पास अपने पुरखों के काग़ज़ात नहीं हैं, क्या उन्हें वोट के अधिकार से वंचित रखा जायेगा? फ़ार्म 6 में किसने यह महत्वपूर्ण परिवर्तन किया क्योंकि चुनाव आयुक्त संधु तो इस परिवर्तन को अनधिकृत और ग़ैर क़ानूनी कह चुकें हैं। और परिवर्तन किस मंशा से किया गया?
वोटर लिस्ट का पुनरीक्षण जायज़ है, जैसे सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है पर ऐसा करते वक़्त झुकाव लोगों को शामिल करने की तरफ़ होना चाहिए न कि उन्हें बाहर निकालने की तरफ़। वोट का अधिकार संविधान ने दिया है। जनता वोट के लिए भीखमंगे नहीं हैं। अगर ज़्यादती होती रही तो हालत नियंत्रण से बाहर निकल जाएँगे, जैसे धर्मेंद्र प्रधान के समय हुआ था। चुनाव आयोग सरकारी अहंकार का प्रदर्शन कर रहा है कि ‘हम ही फ़ैसला करेंगे कि कौन नागरिक है, कौन नही। हमसे कोई सवाल नहीं कर सकता क्योंकि हम संवैधानिक संस्था हैं’। पश्चिम बंगाल की मिसाल है। सुप्रीम कोर्ट को चुनाव आयोग ने बताया कि बंगाल चुनाव के बाद जिन एक लाख से अधिक अपीलों का निपटारा किया गया में से 93% को ग़लत ढंग से बाहर निकाला किया गया।37 लाख अपील अभी लंबित हैं। इनके निपटारे में 12 साल लग सकतें है। क्या तब तक यह वोट के अधिकार से वंचित रहेंगे। यह कितनी बडी ज़्यादती है? शशि थरूर ने कटाक्ष किया है कि “लोगों द्वारा सरकार का चुनाव करने की जगह सरकार चुनाव आयोग के माध्यम से वोटर का चुनाव करेगी”। पूर्व चुनाव आयुक्त एसवाई क़ुरैशी और अशोक लवासा ने खुलेआम एसआईआर की निष्पक्षता पर सवाल उठाए है। क़ुरैशी की तो कड़वी टिप्पणी है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ही चुनाव आयोग नहीं है। साफटवेयर भी ऐसा बनाया गया कि जो नागरिक पर बोझ डालता है कि वह सिद्ध करे कि वह नागरिक है। पासपोर्ट जिसके आधार पर आपको विदेशी वीजा मिलता है, आपको विदेशों में प्रवेश मिलता है, भी पर्याप्त नहीं है।
दिलली का समाचार तो बिल्कुल मज़ाक़िया है। आधे से अधिक मौजूदा वोटर (54.4%) या तो काट दिए गए हैं या उन्हें चुनाव आयोग द्वारा नोटिस जारी किए गए हैं। इनमें विदेश मंत्री एस जयशंकर, मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जैसे शामिल हैं। यह तो बड़े लोग हैं जो अपना अधिकार वापिस ले लेंगे पर जो आम नागरिक है जिसे नोटिस भेजा गया है कि तुम्हें क्यों हटाया न जाए, वह कहां जाएगा? जो दिहाड़ी कमाते हैं वह सरकारी बाबुओं के चक्कर लगाएँगे? महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश से दो-दो करोड़ मतदाता हटाए गए हैं, पश्चिम बंगाल में 1.74 करोड़। यह भी दिलचस्प है कि यह वोटर पुनरीक्षण की प्रक्रिया बिहार, बंगाल, केरल और तमिलनाडु के चुनावों से ठीक पहले शुरू की गई जबकि स्पष्ट था कि पूरा करने के लिए पर्याप्त समय नहीं है। अब कहा जा रहा है कि बीएलओ लोगों के घरों में जा कर दस्तावेज़ इकट्ठे करेंगे। यह संवेदना पहले दिखाई जाती तो सारे देश में विस्फोट न होता।
संविधान के अनुच्छेद 361 के अनुसार राष्ट्रपति और राज्यपालों को अपने कार्यकाल के दौरान किसी भी तरह की अदालती या आपराधिक कार्यवाही से इम्यूनिटी (खुली छूट) है। प्रधानमंत्री या किसी मंत्री या किसी सासंद को ऐसी छूट नहीं है। पर 2023 में सरकार ने संसद में विपक्ष की अनुपस्थिति में क़ानून पारित कर तीनों चुनाव आयुक्तों को आजीवन किसी भी प्रकर की अदालती या आपराधिक कार्यवाही से मुक्ति प्रदान कर दी है। संविधान इन्हें ऐसी इम्यूनिटी नहीं देता। केवल उन्हें आसान तरीक़ा से निकाला नहीं जा सकता। पर सवाल दूसरा है। चुनाव आयुक्तों को वह आजीवन अभयदान क्यों है जो राष्ट्रपति को भी नहीं है? कपिल सिब्बल ने कड़वा सवाल किया है कि “क्या सरकार को मालूम था कि अगर इनका राजनीतिक इस्तेमाल होना है तो इनको यह सुरक्षा चाहिए”?
क्या यही कारण है कि आयोग और विशेष तौर पर मुख्य आयुक्त अपने रास्ते से भटक गए और अपने को किसी भी जवाबदेही से उपर समझने लगे? अब इस अभय दान को लेकर एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। आशा है कि बड़ी अदालत यह नियम फिर तय करेगी कि आप कितने भी बड़े हो क़ानून और संविधान आप से उपर है। सुप्रीम कोर्ट अभी तक आयोग के प्रति अधिक उदार रहा है। शायद इसी कारण वह इतने दबंग बन गए हैं। सुप्रीम कोर्ट को तो स्वयं इस मामले का संज्ञान लेना चाहिए था कि करोड़ों लोग अपने विशेषाधिकार से वंचित हो रहें हैं। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस दीपक गुप्ता ने लिखा है, “इस परिस्थिति में जब सारी एसआईआर प्रक्रिया संदिग्ध और अविश्वसनीय बन रही है…चुनाव आयोग खुद शंका के घेरे में है …समय आ गया है कि सुप्रीम कोर्ट दखल दे और आम नागरिक चुनाव आयोग की दया पर आश्रित न रह जाए”।
वोट का अधिकार लोकतंत्र का आधार है। इसके बारे यह धारणा बन गई कि यह भी ‘पिक एंड चूज़’ है तो अनर्थ हो जाएगा। ठीक है आयोग की स्वायत्तता पर आँच नहीं आनी चाहिए पर अगर इस स्वायतता का निरंकुश इस्तेमाल होने लग जाए तो सुप्रीम कोर्ट जो हमारे अधिकारों का संरक्षक है, को लोगो के हित में हस्तक्षेप करना चाहिए। चुनाव आयोग के लिए भी जरूरी है कि उसकी विश्वसनीयता क़ायम रहे। इसके लिए भी सुप्रीम कोर्ट को दखल देना चाहिए। यह मामला सरकार बनाम विपक्ष का नहीं है। इसका सीधा सम्बंध ‘हम भारत के लोग’ के संवैधानिक अस्तित्व का है।