‘चिट्टा’: पंजाब की काली हकीकत, Chitta: The Black Reality of Punjab

यह एक घटना सारे पंजाब को सन्न छोड़ गई। यह तो सब जानते हैं कि नशा जिसे पंजाब में ‘चिट्टा’ कहा जाता है, पंजाब का यथार्थ है, हकीकत है। थोड़ा बहुत नशा तो हर समाज में प्राचीन काल से है, पर पंजाब में इसके लिए दरवाज़े 2007 में खोल दिए गए जब लाल बत्ती वाली कारों में भी नशा लाया जाता रहा। यह आरोप मुख्यमंत्री भगवंत मान ने भी लगाया है। उस समय पंजाब में अकाली-भाजपा गठबंधन सरकार थी। जब अमरेन्द्र सिंह की कांग्रेस सरकार बनी तो उन्होंने चार सप्ताह में नशा ख़त्म करने की शपथ ली थी पर किया कुछ नही। आप की सरकार ने भी नशा ख़त्म करने का वादा किया था। पंजाब में युद्ध नशेयां विरुद्ध’ चलाया गया पर नशा इतना फैल चुका है कि सम्भाला नहीं जा रहा। अंतर यह है कि नशे के व्यापार में बड़े लोगों की शमुलियत की वह शिकायत अब नहीं मिलती जो पहले मिलती थी। बताया जाता है कि 2025 में 2086 किलोग्राम हेरोइन पंजाब में पकड़ी गई थी जो देश में कुल पकड़ी गई हेरोइन का 58% है। यह बड़ी कामयाबी है पर ज़मीन पर कुछ नहीं बदला जो मानसा की दर्दनाक घटना से पता चलता है जहां नशे को रोकने का प्रयास में एक समाजिक कार्यकर्ता, परविंदर सिंह ‘झोंटा’ को अपनी जान गंवानी पड़ी। दिन दहाड़े हुई इस बेरहम हत्या ने पंजाब को झकझोर दिया और बता दिया कि नशे के खिलाफ कथित युद्ध कितना ख़तरनाक बन गया है।

परविंदर सिंह ‘झोंटा’ की ज़िन्दगी कई मायनों में प्रेरणादायक है। वह एक कबड्डी खिलाड़ी था जो जालंधर में कालेज के दिनों में खुद नशे में फँस गया था। बहुत संघर्ष के बाद वह इससे निकलने में सफल रहा और उसने अपने क्षेत्र में इसे रोकने के लिए नशे के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया। मानसा क्षेत्र में जो नशे का व्यापार करते थे या नशा बेचते थे, से वह सीधी टक्कर लेता चाहे कई बार वह क़ानून को हाथ में भी ले लेता। और लोग भी उससे जुड़ गए थे। वह युवाओं को उस ज़िन्दगी और उस लत से बचाना चाहता था जिसमें वह फँस कर बहुत मुश्किल से बाहर निकला था। उसका विशेष निशाना वह कैमिस्ट और मैडिकल स्टोर थे जो चिट्टा और दूसरे प्रतिबंधित नशा बेचते थे। मानसा में ऐसे ही एक कैमिस्ट के साथ टकराव के दौरान वह फ़ेसबुक पर लाईव चला रहा था कि टकराव खूनी बन गया। कैमिस्ट ने उसको गोली मार दी जिससे उसकी मौत हो गई।

इस कैमिस्ट के साथ उसकी 2023 से पुरानी रंजिश चल रही थी। वह बार बार उसे चेतावनी दे चुका था। एक बार तो कैमिस्ट को जूतों का हार डाल कर परविंदर सिंह झोटा ने बाज़ार में घुमाया था। कैमिस्ट यह अपमान नहीं भूला लगता इसीलिए इस बार जब परमिंदर सिंह उसकी दुकान पर आया तो नियंत्रण खोते हुए उस कैमिस्ट ने उसे गोली मार दी। ग़ुस्साए लोगों ने उसकी दुकान को आग लगा दी और प्रशासन ने उसके घर के एक हिस्से पर बुलडोज़र चला दिया। यह भी सवाल खड़े कर गया कि अगर लोग इस तरह क़ानून को हाथ में लेने लगें और प्रशासन आनन फ़ानन में बुलडोज़र चलाने लगे तो क़ानून के शासन का क्या होगा? पर अगर प्रशासन ने अपनी ज़िम्मेवारी निभाई होती तो यहां तक मामला पहुंचता ही नही।

यह कैमिस्ट सिलसिलेवार अपराधी रहा है। बताया जाता है कि पिछले चार साल में उसकी दुकान पर 10 बार छापा पड़ चुका है। तीन बार उसका लाईसेंस सस्पेंड हो चुका है पर इसे रद्द नहीं किया गया। 2023 में उसे जेल भी मिली थी पर लाइसेंस कैंसल नहीं किया गया। कौन मेहरबान था? किसे किसे ‘कट’ मिल रहा था? अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बार संसद में ठीक कहा था कि “अगर पहरा देने वाला कुत्ता न भौंके तो समझना चाहिए कि वह चोर को जानता है”!इतने आरोप होने के बावजूद उस कैमिस्ट को हथियार का लाइसेंस भी मिल गया। उसने अपनी लाइसेंस पिस्तौल से ही परविंदर सिंह को गोली मारी थी। यह भी पंजाब का एक प्रकार से ओपन सीक्रेट है कि हर शहर, क़स्बे और यहां तक कि गाँवों में कुछ मैडिकल स्टोर और कैमिस्ट की दुकानों में नशीली दवाएँ मिलती है। पंजाब में 8000 होलसेलर और 16000 रिटेल कैमिस्ट है। अधिकतर क़ानून का पालन करते हैं पर काली भेडें भी हैं। इंटरनेट,स्मार्ट फ़ोन और कैशलेस ने उनका धंधा आसान कर दिया है। लुधियाना में भी लोगों ने एक कैमिस्ट की दुकान पर प्रदर्शन किया और तोड़फोड़ की। लोगों का आरोप है कि वहां चिट्टा, नशीले इंजेक्शन और दवाईयां उपलब्ध हैं जिनकी लत लग जाती है। अगर लोगों को पता है तो जिनका काम रोकना है उन्हें क्यों नहीं पता?

अगर यहां धड़ल्ले से नशा बिक रहा है तो इसका सीधा कारण है कि बेचने वाले जानते हैं कि उन्हें बचाने वाले पावरफुल लोग हैं। प्रशासनिक जवाबदेही की कमी, राजनीतिक संरक्षण और समाजिक माँग ने मिल कर इस ख़तरे को विकराल रूप दे दिया है। परविंदर सिंह की हत्या के बाद मामला राजनीतिक बन रहा है। भाजपा विशेष तौर पर इसे चुनाव में भुनाना चाहती है। गृहमंत्री अमित शाह अपनी यात्राओं में इसे उठा रहें हैं। उनका कहना है कि जिस तरह नक्सलवाद को ख़त्म किया गया, उसी तरह इसे भी ख़त्म करेंगे। नक्सलवाद तो ख़त्म करना मोदी सरकार की बड़ी कामयाबी है पर इसमें वर्षों लग गए थे और लोग भी थक गए थे। नक्सलवाद करोड़ों रूपए का धंधा नहीं था जैसे चिट्टा है। जब लोगों के आर्थिक हित जुड़ जाएँ तो धंधा ख़त्म करना मुश्किल हो जाता है।

बड़ी समस्या तस्करी है। अगर यह समुद्र के रास्ते आता है या पाकिस्तान से ड्रोन आतें हैं तो इसे रोकना केन्द्रीय सरकार का काम है। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने कहा है कि अगर गुजरात की कांडला बंदरगाह पर3000  किलोग्राम सिंथेटिक ड्रग पकड़े गए तो यह पंजाब सरकार की ज़िम्मेवारी नहीं है। भगवंत मान का सवाल है कि, “सीमा पर बीएसएफ़ की 50 किलोमीटर की कार्यकारी सीमा है फिर भी पाकिस्तान से ड्रग्स आरहें है। बीएसएफ़ को कौन सम्भालता है”? यह भी कड़वी हकीकत है कि समुद्री रास्ते से गुजरात की बंदरगाहों के द्वारा ड्रग की तस्करी हो रही है। मुंद्रा पोर्ट का विशेष ज़िक्र होता है।  

 मामला बहुत जटिल है और राजनीतिक नहीं है। यह न केवल पंजाब बल्कि देश के युवाओं के भविष्य का है क्योंकि नशा केवल पंजाब में ही नहीं बिक रहा, यह सारे उत्तर भारत में फैल चुका है और दक्षिण में भी पैर पसार रहा है। हिमाचल जैसे शांत प्रदेश की भी ड्रग समस्या है। कुल्लू की लगवैली से समाचार है कि जब पुलिस ने दो चरस बेचने वालों को पकड़ लिया तो गाँव वासियों ने हमला कर उन्हें छुड़ा लिया। वह चरस भी छुड़ा गए। हमला करने वालों में महिला सरपंच भी थी। हरियाणा और दिल्ली में भी यह आम बिक रहा है। बेहतर होगा कि केन्द्र और पंजाब सरकार दोनों राष्ट्रीय हित में मिल कर इसका मुक़ाबला करें, पर यह होगा नहीं। भाजपा पंजाब जीतना चाहती है और आप अपने एकमात्र क़िले को बचाना चाहती है। इस राजनीतिक खींचातानी में समाज बिगड़ रहा है।

आख़िर में पंजाब को सम्भालना पंजाब सरकार की ज़िम्मेवारी है। परविंदर सिंह ‘झोंटा’ को क़ानून अपने हाथ में लेने की ज़रूरत न पड़ती अगर ड्रग इंस्पेक्टर और स्थानीय पुलिस ईमानदारी से अपना काम करते और मिल रही शिकायतों पर अमल करते। लोग तब ही क़ानून हाथ में लेते हैं जब वह समझने लगतें हैं कि सरकार उन्हें न्याय देने में नाकाम है या उदासीन और लापरवाह है। जब सिफारिशों पर नियुक्तियाँ होती हैं तो कर्मचारी लापरवाह हो जातें हैं। अगर राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन हो रहें हैं और हज़ारों सड़कों पर निकल चुकें हैं तो इसका कारण भी यही है कि लोग विश्वास खो बैठें हैं कि व्यवस्था न्याय देगी।  

पंजाब में बहुत नशा पकड़ा गया है पर जो इस धंधे में है उनको पकड़ने में रिकार्ड अच्छा नहीं है। अगर पकड़े जातें हैं तो सजा नहीं मिलती। राजनीतिक दबाव में छूट जातें हैं। पंजाब में बढ़ता गैंगस्टरवाद नई चुनौती है। विदेशी में बैठे गैंगस्टर यहां कारोबारियों की नींद हराम कर रहें है। कई तो पंजाब छोड़ने पर  मजबूर हो गए हैं। कइयों पर हमले हो चुकें हैं। बार बार सीमावर्ती क्षेत्र में पुलिस कर्मियों पर हो रहे हमले नई चुनौती है। पर गैंगस्टर वाद भी राष्ट्रीय समस्या है जो एक्टर टाइगर श्रॉफ पर हमले से पता चलता है। गुजरात के साबरमती जेल में बैठा एक गैंगस्टर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क कैसे चला रहा है?

चिट्टे का मामला केवल प्रशासनिक और लॉ एंड ऑर्डर का ही नही है। केवल सप्लाई को ही नहीं रोकना, माँग को भी ख़त्म करना है। यह मामला पारिवारिक और समाजिक भी है। परिवार की बड़ी भूमिका है। देखा गया है कि जिस परिवार में तनाव है या लापरवाही है, वहां बच्चे जल्द ग़लत रास्ते पर चल निकलतें है। इसे रोकने के लिए परिवारों, शिक्षा संस्थानों, पंचायतों और समाजिक कार्यकर्ताओं की मदद लेनी चाहिए नहीं तो इसी तरह नशा परिवार उजाड़ता रहेगा और परविंदर सिंह झोटा जैसे जुझारू अपनी जान खोते रहेंगे।

VN:F [1.9.22_1171]
Rating: 0.0/10 (0 votes cast)
VN:F [1.9.22_1171]
Rating: 0 (from 0 votes)
About Chander Mohan 838 Articles
Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.