दशहत में युवा और युवाओं से दहशत (Challenges Before The Young)

आजकल परीक्षण परिणाम निकलने का मौसम है।  बच्चों के जितने नंबर आ रहें हैं उन्हें देख कर हमारी पीढ़ी तो दंग है। 499/500 कैसे संभव है? एक स्कूल की प्रिंसीपल ने बताया कि उनके 20 टॉपर में से  18 विदेश जा रहे हैं। हम फिर ब्रेन ड्रेन देख रहे हैं। यह रुक गया था और उलटा ब्रेन बैक शुरू हो गया था क्योंकि भारत में अचानक अवसर नज़र आने लगा था लेकिन अफसोस देश के अंदर अफरा-तफरी का माहौल देख कर एनआरआई ने अब लौटना कम कर दिया है। उलटा प्रतिभा का पलायन तेजी से है जिसके बारे विभिन्न सरकारें बेखबर है।

लेकिन आज मैं दूसरी बात कर रहा हूं। इस युवा प्रतिभा को संभालने की जरूरत है क्योंकि कई प्रकार के गलत प्रभाव  बच्चों को गुमराह और पथ भ्रष्ट कर रहे हैं। हमारा युवा पीढ़ी को जो चुनौतियां मिल रही हैं उससे वह भी विचलित है और उनके अभिभावक, अध्यापक सब घबराए हुए हैं। बच्चे तनाव और दबाव में है जिस कारण उनकी प्रतिक्रिया कई बार अत्यंत असुखद शकल अपना लेती है। जालंधर के एक स्कूल की छात्रा ने इस कारण आत्महत्या कर ली क्योंकि मैथ्स के टीचर ने उसे डांटा था। अपने सुसाईड नोट में वह अपनी मौत के लिए जहां टीचर को जिम्मेवार ठहरा गई वहां पिता के बारे भी लिख गई कि “आप अब शिकायत नहीं करोगे कि मैं स्कूटर मांगती रहती हूं। ”बस इतनी सी बात और उसने अंतिम कदम उठा लिया। अध्यापक को जेल हो गई जिस पर बाकी अध्यापक पूछ रहें हैं कि हमें बताएं कि हम सख्ती करें या न करें?

ऐसी असंख्य मिसाल मिल रही है। सबसे भयावह हैदराबाद की खबर है जहां तेलंगाना बोर्ड ऑफ इंटरमीडियट एजुकेशन के गलत परिणाम के कारण 25 विद्यार्थियों ने आत्महत्या कर ली। यह सभी होनहार छात्र थे लेकिन परिणाम के मूल्यांकन के समय गफलत के कारण इन्हें फेल कर दिया गया। बाद में परिणाम सही किए गए पर  बच्चे तो जान दे चुके थे। यह समाज की यह कितनी बड़ी असफलता है कि बच्चों  ने रीवैल्यूएशन की इंतजार नहीं की और फंदा लगा लिया? भारत में हर घंटे के बाद एक छात्र आत्महत्या कर रहा है। कोटा जहां कोचिंग क्लास की भीड़ है वहां से अकसर आत्महत्या की खबरें मिलती हैं। बड़ा कारण पारिवारिक दबाव है। बड़े-बड़े पैकेज की खबरें सुन कर मां-बाप अपने बच्चों को उस तरफ धकेलते हैं पर कई रास्ते में टूट जाते हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि बच्चों  में चिंता, विषाद तथा बेदिली को संभालने की जरूरत है। कई बार असफलता या मां-बाप की आकांक्षाओं पर खरे न उतरने से बच्चे ऐसी जगह पहुंच जाते हैं जहां से वह वापिस नहीं लौट सकते।

युवाओं की हताशा तथा अवसाद कई बार ऐसा उग्र रूप धारण कर जाता है जिसका भयावह रूप भी हम तेजी से देख रहे हैं। युवाओं का एक वर्ग हिंसक हो रहा है। हरियाणा में फतेहाबाद में दीवाली के दिन पटाखे फोड़ने से रोकने पर एक 15 वर्ष के लड़के ने अपने चाचा को गोली मार दी। गुड़गांव के प्राईवेट स्कूलों में हुई दो घटनाओं के बाद अध्यापक समुदाय ने पुलिस में अपनी सुरक्षा की गुहार लगाई। एक मामले में एक छात्र ने अपनी अध्यापिका और उसकी बेटी से बलात्कार की धमकी दी और एक और छात्र ने अपनी अध्यापिका को कैंडल लाईट डिनर के लिए आमंत्रित किया। मुक्तसर में डांटने पर एक आठवीं के छात्र ने अपने अध्यापक के सर पर ईंट से हमला कर दिया। लड़कियों पर कमैंट रोकने पर सोनीपत में एक छात्र ने लैक्चरार पर गोलियां चला कर उसकी हत्या कर दी। उससे दो महीने पहले एक 18 वर्ष के छात्र ने अपने स्कूल प्रिंसीपल की अपने पिता के लाईंसैंस रिवाल्वर से हत्या कर दी। वडोदरा में एक दसवीं की कक्षा के एक छात्र ने अपने से जूनियर की इसलिए हत्या कर दी क्योंकि वह स्कूल में पड़ी डांट का बदला लेना चाहता था और स्कूल बंद करवाना चाहता था। इस लड़के की मारे गए लड़के के साथ कोई दुश्मनी नहीं थी, वह तो उसे जानता भी नहीं था। इससे पहले गुड़गांव के एक स्कूल में एक छात्र अपने से जूनियर की इसलिए हत्या कर चुका है क्योंकि वह आने वाली परीक्षा तथा पैरेंट-टीचर मीटिंग रद्द करवाना चाहता था।

बस इतनी सी बात के लिए एक जान ले ली गई? हमारे समाज में कैसे दानव पैदा हो रहे हैं? एक अनाम मां ने एक अखबार में लेख लिखा है कि उनका 15 वर्ष का लड़का जब उसकी नजायज मांग पूरी नहीं होती तो उन्हें तथा अपने पिता को पीटता है। इस मां को यह डर है कि एक दिन यह सुर्खी न बन जाए कि ‘मां को बेटे ने मार डाला।’ कितनी दहशत है। उत्तराखंड के एक गांव में पोर्न देखने के बाद पांच अव्यस्क लड़कों ने एक 8 साल की मासूम से गैंगरेप किया। रेप के मामले में भी अव्यस्कों में नाम अधिक संख्या में बाहर आ रहे हैं। निर्भया के साथ गैंगरेप में भी एक अव्यस्क अपराधी था।

यह बच्चे  इस तरह क्यों गलत रास्ते पर चल रहे हैं? इसके कई कारण हैं। अधिकतर मामले बिगड़े हुए घर के माहौल की तरफ संकेत करते हैं। संयुक्त परिवार टूट चुके हैं। कई बार मां-बाप का अपना व्यवहार सही नहीं होता इसलिए बच्चे भी वही ग्रहण करते। कई बार मां-बाप जरूरत से अधिक नरम और उदार बन जाते हैं। बच्चों को खुश रखने के लिए वह समझौते किए जाते हें जो आगे चल कर महंगे साबित होते हैं। कई परिवारों में बच्चों  से संवाद टूट रहा है। दिल्ली के एम्स के डाक्टर राजेश सागर सही शिकायत करते हैं कि  “पहले परिवारों में पूरा अनुशासन रहता था लेकिन अब मां-बाप उनकी मांगों को पूरा कर देते हैं क्योंकि उनके पास खुद बच्चों के लिए समय नहीं है।” बच्चों को खुश रखना अब मजबूरी है। कई अभिभावक यह कहने में गर्व महसूस करते हें कि वह अपने बच्चे के  ‘फ्रैंडस’ हैं। यह बड़ी भूल है। मां-बाप को मां-बाप ही रहना चाहिए और बच्चों के आगे वह मिसाल कायम करनी चाहिए जो उन्हें सही रास्ते पर रखे।

आज के बच्चों के सामने एक बड़ा खतरा है जो हमारे समय नहीं था, सोशल मीडिया। इतने सैक्स अपराध भी इसलिए हो रहे हैं क्योंकि इंटरनैट और मोबाइल के माध्यम से बच्चों को वह खुली जानकारी मिल रही है जो पहले वर्जित समझी जाती थी। क्योंकि मां-बाप के पास समय कम है और युवाओं के पास आई-पैड या मोबाइल उपलब्ध हैं इसलिए वह सोशल मीडिया पर अधिक से अधिक समय व्यतीत कर रहे हैं। मोबाइल पर व्लूव्हेल जैसी आत्महत्या को प्रेरित करने वाली गेम भी उपलब्ध है। नौ साल की बच्ची ने मुझे दिखाया कि उसकी फ्रैंड ने उसे एक वीडियो भेजा है जिसके अंत में ब्लेड से कलाई काटना सिखाया गया है। आज सब खुला फोन पर उपलब्ध है इस पर नियंत्रण करने की तत्काल जरूरत है। अब तो वैब सीरीज़ शुरू हो गई है जिन पर किसी का नियंत्रण नहीं, कोई सैंसर नहीं।

समय आ गया है कि एक समाज के तौर पर हम अपने बच्चों की सुरक्षा के मामले को प्राथमिकता से ले। दिल्ली में 8 साल के बच्चे ने डांट के बाद अपना गुस्सा एक साल के बच्चे को पत्थर से मार कर उतारा। परिवार परिवार के तौर पर इकट्ठे नहीं बैठते। एक छात्रा ने बताया कि जब वह घर पहुंचती है तो मां  ‘रिमोट से चिपकी’  रहती हैं। बच्चों को वह प्यार, देखभाल, अनुशासन तथा मार्ग दर्शन नहीं मिलता जो पहले मिलता था। संस्कारों के पतन की बड़ी कीमत सब चुका रहे हैं। वह प्रभाव बेकाबू है जो गलत दिशा की तरफ धकेलते हैं। नेतागण भी बहुत गलत मिसाल कायम कर रहे हें। गुुरु भी असल में गुरु नहीं रहे। बहुत खौफनाक हालत बनती नज़र आ रही है।

गुलज़ार ने लिखा है कि  ‘हमने ही छीना है उनका बचपन। उनके हाथों में टीवी-मोबाइल थमाया किसने? हमने…बच्चों के उपर मत डालिए कुछ। यह कसूर कर कौन रहा है। ये मैं कर रहा हूं।’  गुलज़ार की बात सही है। हमने ही उनसे बचपन छीन लिया और उन्हें समय से पहले व्यस्क बना दिया। कई बार इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है।

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Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.