नेपाल का घटनाक्रम और भारत, Nepal’s Uprising And India

हो जाते हैं जिन पे अंदाज़े खुदाई पैदा

               हमने देखें हैं वह बुत तोड़ दिए जातें हैं

हमारे पड़ोस में एक के बाद एक ऐसे बुत तोड़े जा रहें हैं। 2022 में गम्भीर आर्थिक संकट के बाद श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे देश छोड़ भाग गए थे। एक और पूर्व राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे और 5 पूर्व मंत्रियों को जेल की सजा सुनाई गई थी। कई नेताओं के घर जला दिए गए। लगभग एक साल पहले बांग्लादेश में ऐसा ही विद्रोह हुआ था जब ढाका में हिंसक प्रदर्शनों के बीच शेख़ हसीना को भागना पड़ा था और भारत ने उन्हें शरण दी थी। उनका भी घर जला दिया गया था।  वहाँ 90 दिनों में चुनाव होने थे पर बिना चुनाव लड़े मोहम्मद युनस सत्ता सम्भाले हुए हैं जिससे फिर असंतोष उभर रहा है। पाकिस्तान, मालदीव, म्यांमार और अफ़ग़ानिस्तान की हालत पहले ही अस्थिर है और अब नेपाल में लगभग-क्रान्ति हो कर हटी है। कुछ सामान्यता लौट आई है और सुशीला कार्की सेना के हस्तक्षेप से प्रधानमंत्री बन गई है। संसद को भंग कर दिया गया है और 6 महीने में चुनाव करवाने का वायदा किया गया है पर नेपाल का घटनाक्रम, हमारे पूर्व राजदूत रणजीत राय के अनुसार, बांग्लादेश से भी अधिक ख़तरनाक है।

प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को इस्तीफ़ा देना पड़ा। 70 के क़रीब लोग सेना या पुलिस की फ़ायरिंग में मारे गए हैं। काठमांडू विश्वविद्यालय के दिनेश काफले ने इसे “ओली की अश्लील क्रूरता” कहा है। इन मौतों के बाद कई मंत्रियों के घर जला दिए गए। पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर दोउबा और उनकी पत्नि की सार्वजनिक पिटाई हो चुकी है। एक और पूर्व प्रधानमंत्री झलानाथ खनाल की भी पिटाई की गई और उनकी पत्नि को आग लगा दी गई। उनके घर को भी आग लगा दी गई। ओली समेत कई मंत्रियों और पूर्व मंत्रियों को सेना ने हैलीकाप्टरों द्वारा बचाया है। और भी गम्भीर है कि संसद भवन, प्रधानमंत्री निवास, सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति भवन को आग लगा दी गई। पाकिस्तान में ऐसा हो चुका है जब इमरान खान के समर्थकों ने सेना के संस्थानों पर हमले कर दिए थे। पाकिस्तान में एक बड़ा वर्ग सेना को देश के दुर्भाग्य के लिए ज़िम्मेवार ठहराता है। नेपाल के युवा जिन्हें ‘जेन ज़ैड’(18 से 25 वर्ष की पीढ़ी) कहा जा रहा है, समझता है कि सारा राजनीतिक वर्ग ही भ्रष्ट है और उनके दुर्भाग्य के लिए ज़िम्मेवार है। संसद भवन और सुप्रीम कोर्ट को जलाने के प्रयास  बताते हैं कि युवाओं का लोकतांत्रिक व्यवस्था से भरोसा उठ गया है। सिर्फ़ ओली सरकार को ही नही राजनीतिक और प्रशासनिक सत्ता के प्रतीकों को ही विध्वस्त कर दिया गया। वह समझतें हैं कि वोट के द्वारा वही बदनाम नेता बार बार सत्ता में आ रहें है बदलाव कुछ नहीं होता, इसलिए सोशल मीडिया पर लगाई पाबंदी के बाद भड़क गए और नियंत्रण से बाहर हो गए।

नेपाल में सत्ता त्रिमूर्ति, पूर्व प्रधानमंत्री ओली,नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर दोउबा और माओवादी चीफ़ प्रचंड के हाथ में रही है। म्यूज़िकल चेयर्स की तरह पिछले 15 वर्षों में वह तीनो बारी बारी सत्ता में आते रहें है। बहुत फ्रैंडली कल्ब है !तीनो एक दूसरे का ध्यान रखतें थे जिस कारण जनता की आवाज़ दबी रहती थी जिसका अब विस्फोट हुआ है। 17 साल में 14 बार सरकार बदली है क्योंकि जन प्रतिनिधियों की वफ़ादारियाँ ख़रीदना मुश्किल नहीं है। अर्थव्यवस्था बिलकुल खोखली है। जेन ज़ैड अपना भविष्य अंधकारमय देख रही है। नेपाल की जनसंख्या का 8 प्रतिशत देश से बाहर नौकरी करता है। अधिकतर भारत में है जिसके साथ नेपाल का 1700 किलोमीटर का खुला बार्डर है। बाक़ी यूएई और मलेशिया जैसे देशों में है जहां वह अधिकतर लेबर की नौकरी करते है। बहुत कम है जो प्रोफेशनल हैं। देश के अंदर 15-25 वर्ष के युवाओं में बेरोज़गारी की दर वर्ल्ड बैंक के अनुसार भयानक 20.8 % है। नेपाल की जीडीपी का 33.1 % विदेशों से नेपालियों द्वारा घर भेजा गया पैसा है। लोग इससे भी समझौता कर लेते अगर व्यवस्था संवेदनशील और जवाबदेह होती। वहाँ व्यवस्था कितनी निष्ठुर है यह एक घटना से पता चलता है।

7 सितंबर को सुबह 7 बजे के क़रीब 11 वर्ष की ऊषा सुनुवार अपने स्कूल जा रही थी कि एक जीप जिसमें मंत्री राम बहादुर मगर सवार थे, उस से टक्कर मार कर निकल गई। लड़की बुरी तरह से घायल हो गई और सारे नेपाल ने देखा कि किस प्रकार असंवेदनशील मंत्री का क़ाफ़िला रूके बिना वहाँ से निकल गया। नेपाल में इसकी भारी प्रतिक्रिया हुई। हालत शायद सम्भल भी जाते पर प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की टिप्पणी कि यह ‘सामान्य दुर्घटना है’ और उनका केवल यह वायदा कि सरकार बच्ची के अस्पताल का खर्चा उठाएगी, ने लोगों को और क्रोधित कर दिया। एक प्रकार से यह वह तिनका था जिसने ऊँट की कमर तोड़ दी। पोखारा यूनिवर्सिटी के प्रो.योग राज लमीछाने के अनुसार “उस क्षण जो निठुराई दिखाई गई से बचा खुचा भरोसा भी ख़त्म हो गया। अगर एक मंत्री का वाहन स्कूल की छात्रा से टक्कर मार निकल सकता है और प्रधानमंत्री इसे सामान्य कह सकतें हैं तो यह हम सबको क्या संदेश देता है”? काठमांडू की त्रिभुवन यूनिवर्सिटी की छात्रा मीरा थापा की प्रतिक्रिया सारे नेपाली युवाओं की थी कि, “उन्होंने केवल एक बच्ची के दर्द की ही अनदेखी नहीं की। उन्होंने हम सब को बता दिया कि उनकी नज़रों में हमारी औक़ात क्या हैं”।

युवा पहले ही भ्रष्टाचार,परिवारवाद ,और बेरोज़गारी से निराश और हताश थे। मंत्रिमंडल और दूतावास जिन्हें ‘नेपो किड्स’ अर्थात् बड़े लोगों की औलाद कहा जाता है, से भरे हुए हैं। सुशील पयाकुरेल जो राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन के अधिकारी रहें है के अनुसार “आम लोग टुकड़ों के लिए संघर्ष कर रहें हैं”। जिसे ईलीट या उच्च वर्ग कहा जाता है उनके उड़ाऊँ लाइफ़ स्टाइल से युवाओं में ग़ुस्सा और भर गया। आर्थिक नीतियाँ एक विशिष्ट वर्ग को और समृद्ध बनाती गई। लोकतंत्र में बताया यह जाता है कि यह जनसेवक पैदा करता है पर हम अपने देश में भी देखतें है कि वह शासक बन बैठतें है और वही घमंड आजाता है। नेपाल में 2008 में राजाशाही हटा दी गई थी पर लोगों को बाद में पता चला कि नए राजा उनके सर पर बैठ गए हैं। जैसे एक नेपाली पत्रकार ने लिखा है, “यह केवल भ्रष्टाचार या परिवारवाद या सोशल मीडिया बैन का मामला ही नहीं है। यह हमारे लोकतान्त्रिक अधिकारों और हमारी इन्सानियत को बचाने का संघर्ष है”।

नेपाल की घटनाओं का भारत पर क्या असर होगा? नहीं, भारत में ऐसा कुछ नहीं होने वाला जैसा कुछ समझ रहें हैं और कुछ आशा भी कर रहें हैं। भारत बड़ा और विविधता वाला देश है यहां एक नैरेटिव पर सरकार बदली नहीं जा सकती। न ही वैसी कोई स्थिति है। भारत की तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था आशा देती है कि वह सुबह कभी तो आएगी ! हमारी युवा पीढ़ी उस तरह नाउम्मीद नहीं जैसे श्रीलंका, बांग्लादेश या नेपाल में हैं। लेकिन हमें सावधान रहना चाहिए क्योंकि पड़ोस की घटनाओं का असर होता है। हमारे यहाँ भी बेरोज़गारी है। हमारे यहाँ भी बेचैन जैन-जैड है। हमारे यहाँ भी ग़ैर-बराबरी एक बड़ी समस्या बनती जा रही है। आर्थिक संसाधनों के कुछ बड़े हाथों में इकट्ठा होना तनाव पैदा करेगा। देश को एक ही दिशा की तरफ़ धकेलने का प्रयास भी संकट पैदा कर सकता है। एक तरह की विचारधारा थोपने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। वन नेशन-वन इलेक्शन जैसे विचार जो हमारी विभिन्नता के विपरीत हैं, को त्याग देना चाहिए।

लोग वर्तमान संवैधानिक स्थिति से संतुष्ट हैं। नहीं चाहते कोई बड़ी छेड़खानी हो। बिहार में एसआईआर के दौरान छेड़खानी उलटी पड़ी और चुनाव आयोग को कई कदम वापिस लेने पड़े। इंडिया टुडे के ‘मूड ऑफ द नेशन’ सर्वेक्षण में जहां बताया गया है कि प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता बरकरार है वहाँ यह भी बताया गया है कि लोग लोकतांत्रिक संस्थाओं को लेकर चिन्तित है। 48% ने कहा है कि लोकतंत्र ख़तरे में है जबकि केवल 39% ने कहा है कि लोकतंत्र को कोई ख़तरा नहीं है। यह संतोष जनक स्थिति नहीं है। जिस तरह गवर्नर के आफ़िस का प्रादेशिक सरकारों पर दबाव रखने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है उससे सुप्रीम कोर्ट भी अप्रसन्न है। एक गवर्नर प्रदेश सरकार के निर्णयों को अनिश्चित तौर पर लटकाने का प्रयास क्यों करें? जिसे गोदी मीडिया कहा जाता है, उसकी भूमिका निन्दनीय है। अगर मामले दबाए गए या छिपाए गए तो विस्फोट होता है। नेपाल हमें बता कर हटा है।

दोनों देशों में बहुत साँझ है। सुषमा स्वराज ने इसे ‘रोटी-बेटी का रिश्ता’ कहा था। नेपाल के जेन-जैड के नेता कहतें हैं कि वह गांधी-भगत सिंह से प्रेरित है। वैश्विक राजनीति के देखते हुए भी नेपाल हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। चीन और हमारे बीच यह बफ्फर स्टेट है। यहाँ राजनीतिक स्थिरता हमारे लिए बहुत जरूरी है। अतीत में कई बार आपसी सम्बंध तनावपूर्ण रहे हैं पर इस बार भारत सरकार बहुत सोच समझ कर कदम उठा रही है। हमें नेपाल की पूरी मदद करनी चाहिए जैसे हमने श्रीलंका और मालदीव की है। हम नेपाल को अपने हाल पर नहीं छोड़ सकते। लेकिन इस से भी ज़रूरी है कि वहाँ के घटनाक्रम से उचित सबक़ लिया जाए। काठमांडू में हिस्ट्री के ग्रेजुएट बिबेक अधिकारी का कहना है, “हम लोकतंत्र की कहानियाँ पढ़ पढ़ कर बढ़े हुए हैं पर हम मंत्रियों की राजाशाही में रह रहें हैं”।हमने उस तरफ़ नहीं जाना। 

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About Chander Mohan 810 Articles
Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.