दोराहे पर बांग्लादेश, India-Bangladesh Relations Need A Reset

बांग्लादेश नैशनल पार्टी के नेता और पूर्व प्रधानमंत्री ख़ालिदा जिया के पुत्र तारिक रहमान, जो बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री बने है का कहना है कि उनकी पार्टी की विदेश नीति बांग्लादेश के हितों पर आधारित होगी। हाल के चुनाव में उनकी बीएनपी को दो तिहाई से अधिक बहुमत मिला है और मुख्य विपक्षी पार्टी जमात ए इस्लामी काफ़ी पीछे रह गई है। पाकिस्तान से अलग बांग्लादेश की सेना ने चुनाव में दिलचस्पी नहीं दिखाई और न ही यह प्रभाव दिया कि वह किसी विशेष उम्मीदवार का समर्थन करते हैं। रहमान की जीत पर भारत को राहत होगी क्योंकि हम कट्टरपंथी जमात ए इस्लामी को पसंद नहीं करते। प्रधानमंत्री मोदी ने तारिक रहमान को तत्काल बधाई दे दी है। तारिक रहमान ने भी भारत के साथ अच्छे सम्बंध रखने के संकेत दिए हैं। बांग्लादेश में हमारी पूर्व राजदूत वीणा सिकरी ने कहा है कि,”हम तारिक रहमान से भारत के साथ सम्बंधों को सकारात्मक तौर पर संजीव करने के संकेत देख रहें हैं”।

 जब शेख़ हसीना की सरकार के पतन के बाद अमेरिका से पैराशूट के द्वारा ढाका में मुहम्मद युनस उतारे गए, तब से उनका रवैया भारत विरोधी रहा है। इन 18 महीने बांग्लादेश ने भयंकर स्तर अराजकता देखी है। बांग्लादेशी राजनीतिक विश्लेषक अल्ताफ़ परवेज लिखतें हैं, “ अंतरिम अवधि में मॉब हिंसा से समाजिक संबंधों को भारी चोट पहुँची है…इस वातावरण में सशस्त्र उग्रवाद के बीज नज़र आने लगे हैं”।  हसीना के शासन को उखाड़ने के लिए छात्र क्रान्ति का इस्तेमाल किया गया। पर जैसा ऐसे प्रयासों से होता है, नियंत्रण हाथ से निकल गया। शेख़ हसीना तो वहाँ से भाग कर भारत आ गई पर देश मॉब हिंसा और धार्मिक कट्टरवाद का शिकार हो गया। हिन्दुओं के खिलाफ व्यापक स्तर पर हिंसा हुई जो अभी तक रूकी नही। मंदिरों को तोड़ा गया। प्रमुख हिन्दू समुदाय को भारी आर्थिक, राजनीतिक और समाजिक चोट पहुंची है। अनुमान है कि हिन्दुओं पर 2000 से अधिक हमले हुए और 60 से अधिक मौतें हुईं पर युनस सरकार ने इन्हें रोकने का गम्भीर प्रयास नहीं किया।

 इस चुनाव में शेख़ हसीना की अवामी लीग को हिस्सा नहीं लेने दिया गया। यह समझदारी का कदम नहीं था। अगर जिस पार्टी ने वहाँ 15 साल शासन किया हो उसे चुनाव में हिस्सा नहीं लेने दिया जाएगा तो आप शुरू में ही विरोधियों की जमात खड़ी कर लोगे। शेख़ हसीना ने भी तानाशाह की तरह शासन किया और विरोधियों को कुचल दिया था। तारिक रहमान खुद 17 साल निर्वासन भुगत कर लौटें हैं। पर जब तक शेख़ हसीना रहीं उन्होंने भारत के हितों की रक्षा की। हमारे पूर्वी प्रांतों के उग्रवादियों को बांग्लादेश में शरण देना बंद कर दिया।  दोनों देशों के बीच उच्च स्तर का सहयोग देखा गया। इस स्थिति को युनस ने उलटाने का प्रयास किया। वह तो निर्वाचित भी नहीं थे फिर भी विदेश नीति के मामले में बड़े कदम उठाए, जो सब भारत विरोधी थे।

दशकों के बाद बांग्लादेश के दरवाज़े पाकिस्तान के लिए खोल दिए गए। 2024 तक हम व्यापार में बांग्लादेश के सब से बड़े पार्टनर थे पर युनस के आने के बाद पाकिस्तान के साथ उनके व्यापार में एक साल में  27% की भारी वृद्धि की गई। आईएसआई जिसकी बांग्लादेश की आज़ादी के समय बहुत कुटिल भूमिका रही थी, को भी ढाका में आमंत्रित किया गया। ऐसा प्रभाव दिया गया कि जैसे दो बिछड़े भाई मिल रहें हों। हमें चिढ़ाने के लिए युनस ने यहाँ तक कह दिया कि हमारे उत्तर पूर्व के राज्य बांग्लादेश की मेहरबानी पर आश्रित हैं। यह बात उन्होंने चीन में कहीं और साथ ही चीन को निवेश के लिए आमंत्रित भी किया। युनस की सोच अजब थी। भारत ने उस दिश को तीन तरफ़ से घेरा हुआ है। हम जब चाहें उनका हुक्का पानी बंद कर सकतें हैं। जहां तक पाकिस्तान का सवाल है वह तो खुद भिखमंगे है जो बात शाहबाज़ शरीफ़ ने भी स्वीकार की है, वह बांग्लादेश की क्या मदद कर सकते है?

भारत सरकार ने बहुत धैर्य दिखाया है। उस तरफ़ से उकसाने का पूरा प्रयास किया गया। हर दूसरे तीसरे दिन किसी न किसी हिन्दू की हत्या का समाचार मिलता रहा है जिसकी यहाँ बहुत प्रतिक्रिया हुई है। वहाँ इस्लामीकरण का भी ख़तरा है। बड़ी समस्या शेख़ हसीना को लेकर है। उन्होंने भारत में शरण ली हुई है जहां से वह लगातार बयान दाग रहीं हैं। बांग्लादेश बार बार उनके प्रत्यर्पण की माँग कर रहा है। अभी तक तो हम कहते रहे कि जो सरकार निर्वाचित नहीं उसकी माँग स्वीकार करने के लिए हम बाध्य नहीं है, पर अब अगर निर्वाचित सरकार भी प्रत्यर्पण की माँग करने लग पड़ी तो हमारे लिए मुश्किल हो जाएगा। यह एक प्रकार का धर्म संकट होगा। हम नई सरकार के साथ अच्छे रिश्ते चाहतें हैं पर शेख़ हसीना को उन्हें सौंप नहीं सकते।

भारत और बांग्लादेश का साँझा इतिहास रहा है। हमने भी उनकी आज़ादी के लिए खून बहाया था। इस कारण हमारे देश में बहुत लोग हैरान हैं कि इस देश ने उस पाकिस्तान का हाथ पकड़ लिया था जिसने वहाँ लाखों लोगों का कत्ल किया था। कितनी महिलाओं से बलात्कार हुआ उसकी गिनती ही नहीं है। लेकिन हमें भी समझ लेना चाहिए कि समय बदल गया। जिस पीढ़ी ने शेख़ हसीना के खिलाफ प्रदर्शन किया उसने 1971 का नरसंहार नहीं देखा था। उन्होंने तो आज़ादी की लड़ाई के प्रतीकों को भी जला दिया। तारिक रहमान के सलाहकार हुमायूँ कबीर ने कहा है, “बांग्लादेश भारत के साथ सम्बंधों को फिर से स्थापित करना चाहता है। दायित्व अब भारत पर है कि वह बांग्लादेश में बदली हुई राजनीतिक हक़ीक़त को स्वीकार करे”। ढाका से सईद मुनीर खुसरो लिखतें हैं, “बांग्लादेश में बहुत लोग शिकायत करते हैं कि भारत ने शेख़ हसीना से दोस्ती की, वहां के लोगों से नही।

 भारत को भी इस बात से राहत मिली होगी कि बीएनपी और जमात ए इस्लामी के बीच शेख़ हसीना के समय का जो गठबंधन था, वह शेख़ हसीना के हटने के बाद टूट गया है। चुनाव के बाद जमात ने तारिक रहमान को बधाई का जो संदेश भेजा था वह वापिस ले लिया गया है। अब जमात शिकायत कर रही है कि 32 चुनाव क्षेत्रों में धांधली हुई है। हमारे हित में हैं कि तारीक रहमान की सरकार स्थिर रहे। उनकी माता ख़ालिदा जिया के समय रिश्ते अच्छे नहीं थे। हमारी भी कमजोरी रही कि हमने शेख़ हसीना की टोकरी में सारे अंडे डाल दिए। उनके हटने के बाद उस देश पर भारत विरोधियों का क़ब्ज़ा हो गया था। लेकिन जैसे हमांयू कबीर ने भी कहा है, समय बदल गया। तारिक रहमान के पास 2/3 से अधिक बहुमत है। जमात के साथ गठबंधन टूट चुका है। भारत के लिए मौक़ा है। अतीत और इतिहास का महत्व है, पर वह आज की परिस्थिति में वह सार्थक नही रहे। हमें भावुकता को छोड़ कर व्यवहारिक नीति अपनानी होगी।

अब वहाँ एक नई सरकार क़ायम हो गई है जो उदारवादी प्रतीत होती है। हमें सम्बंधो को सकारात्मक मोड़ देने का पूरा प्रयास करना चाहिए। अपने पूर्वोत्तर को सुरक्षित रखने के लिए हमें उनका सहयोग चाहिए जैसे उन्हें अपनी प्रगति के लिए भारत का सहयोग चाहिए। दोनो की आपस में निर्भरता है। विदेश से जो इलाज के लिए भारत आतें हैं उनका 50-60% बांग्लादेश से हैं। वह देश भारत से 1160 मैगावाट बिजली ख़रीदता है। दोनों देशों को बीच रेल और बस सर्विस है। और सबसे महत्वपूर्ण है कि दोनों के बीच 4000 किलोमीटर की लम्बी सीमा है। यह वह हक़ीक़त है जिसे न भारत मिटा सकता है, न बांग्लादेश।युनस की सरकार महामूर्ख थी जो समझती थी कि पाकिस्तान भारत की जगह ले सकता है। लेकिन तनाव के कई बिंदु है। बड़ा मामला शेख़ हसीना का है। हम उन्हें बांग्लादेश को सौंप तो नहीं सकते पर बेहतर होगा कि उन्हें ख़ामोश कर दिया जाए। उनके ब्यान आने बंद होने चाहिए।

एक और बड़ा मामला घुसपैंठियों का है जिसे असम और पश्चिम बंगाल के चुनाव को देखते हुए भाजपा ज़ोर शोर से उठा रही है। इससे तनाव पैदा होता है। तीसरा बड़ा मुद्दा साम्प्रदायिक है। वहां हो रही हिन्दुओं की हत्याऐं विचलित कर रही है। हाल ही में यहाँ कुछ कट्टरपंथी लोगों के शोर मचाने पर बांग्लादेशी खिलाड़ी मुस्ताफिजुर रहमान को आईपीएल से निकाल दिया गया। उसके बाद बांग्लादेश ने टी20 वर्ल्ड कप से हटने का फ़ैसला कर लिया। यह सब तब हुआ जिस समय भारत वहाँ के नए राजनीतिक वर्ग से दोस्ती करने का प्रयास कर रहा था। खेद है कि हम अपने उग्रवादियों के आगे झुक गए। अगर ऐसे लोग विदेश नीति तय करेंगे तो देश का भला नहीं होगा। इस मामले में सबसे निन्दनीय असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का एआई से बनाया वीडियो है जहां मुख्यमंत्री को दो अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों पर गोली चलाते दिखाया गया है। इसे भाजपा की असम इकाई ने अपने आधिकारिक हैंडल पर पोस्ट किया था। बाद में जब मुस्लिम देशों के साथ सम्बंध ख़राब होने की सम्भावना बन गई तो इसे हटा दिया गया। पर उल्लेखनीय है कि हाईकमान ने सरमा के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। आगे असम के चुनाव है इसलिए सरमा ध्रुवीकरण की कोशिश कर रहे थे। पर क्या वोट की ख़ातिर देश की मर्यादा समाप्त कर दी जाएगी? और याद रखना चाहिए कि जो देश के अंदर होगा उसकी प्रतिक्रिया बाहर ज़रूर होगी।

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About Chander Mohan 806 Articles
Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.