क्या हमने जल्दबाज़ी दिखाई ?, Deal: Time To Reconsider?

अमेरिका के राष्ट्रपति डानल्ड ट्र्मप को भारी झटका देते हुए वहाँ की सुप्रीम कोर्ट ने उनके द्वारा दुनिया भर पर लादे गए टैरिफ़ को 6-3 के बहुमत से रद्द कर दिया। अदालत का कहना है कि उनका संविधान टैरिफ़ लगाने का अधिकार उनकी कांग्रेस (संसद) को देता है, कार्यपालिका को नहीं। अमेरिका के तीसरे राष्ट्रपति और उस देश के संस्थापकों में से एक थॉमस जैफरसन ने कहा था, “अगर हम सत्ताधारी लोगों को शरारत करने से रोकना चाहतें हैं तो उन्हें संविधान की ज़ंजीरों में बाँध देना चाहिए”।आदत के अनुसार ट्रम्प ख़ूब भड़क रहें हैं और यहाँ तक कह दिया कि यह फ़ैसला ‘शर्मनाक’ है और जजों ने देशहित के खिलाफ काम किया है। बड़ा मसला रिफंड का बनता है जिसका आँकलन 130-142 अरब डॉलर से 175 अरब डॉलर तक बताया जा रहा हैं। अदालत ने इसके बारे कोई फ़ैसला नहीं दिया। मामला वर्षों उलझा रहेगा। आग बबूले ट्रम्प ने सब पर पहले 10% और फिर 15% टैरिफ़ ठोक दिया है। संविधान उन्हें 150 दिन तक 15% तक टैरिफ़ लगाने का अधिकार देता है।

पर दुनिया को अभी राहत नहीं मिलेगी। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहें हैं कि ट्रम्प अपनी ताक़त दिखाने के लिए कोई न कोई रास्ता निकालने की कोशिश करेंगे। वह संसद में जा सकते है पर अमेरिका में टैरिफ़ की अलोकप्रियता को देखते हुए इसकी सम्भावना कम है। पर जैसे युरोपियन पॉलिसी सैंटर के वार्ग फोल्कमैन ने भी कहा है, “इससे विश्व व्यापार में भारी अनिश्चितता आएगी क्योंकि सब यह तय करने की कोशिश करेंगे कि अमेरिका की नीति क्या होगी”। ट्रम्प सरकार ने फ़ैसले के बहुत पहले संकेत दिए थे कि ज़रूरत पड़ने पर वह टैरिफ़ लगाने के और रास्ते निकाल लेंगे। लेकिन यह देखने की बात होगी। इस वक़्त तो अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट ने बता दिया है कि आप चाहे कितने भी बड़े हो संविधान और क़ानून आपसे बड़ा है। सारी दुनिया की संवैधानिक अदालतों को संदेश दिया गया है कि वह भी सत्ता के सामने सच बताने का साहस रखें। फ़्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने कहा है कि “अदालत का फ़ैसला बताता है कि लोकतांत्रिक देशों में शक्ति का संतुलन अच्छा रहता है”।

लेकिन इस समय तो वह देश, भारत समेत, जिन्होंने दबाव मे आकर अमेरिका के साथ डील की थी सब आँकलन कर रहें हैं कि क्या सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला उन्हें नई सौदेबाज़ी का मौक़ा देता है या नहीं? ऐसा करते वक़्त सब ट्रम्प के स्वभाव और उनके बदला लेने की प्रवृत्ति को भी ज़हन में रखेंगे। जहां तक भारत का सवाल है, ट्रम्प ने पहले सम्वाददाता सम्मेलन में ही घोषणा कर दी कि भारत के साथ डील जस की तस रहेगी, कोई बदलाव नहीं होगा। एक बार फिर प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ करते हुए उनका कहना था कि, “पहले स्थिति उलटी थी लेकिन हमने पलट दिया…अब हम उन्हें टैरिफ़ नहीं दे रहे जबकि वह हमें टैरिफ़ दे रहें हैं”। अर्थात् अमेरिका के राष्ट्रपति  चेतावनी दे रहें कि दोबारा सौदेबाज़ी करने की कोई गुंजाइश नहीं है। भारत सरकार की तरफ़ से अभी तक एक सपाट ब्यान आया है कि हम स्थिति का अध्ययन कर रहें हैं पर भारत सरकार के लिए भी असुखद स्थिति बन गई है। बड़ा सवाल तो है कि अमेरिका के साथ उस समय समझौता क्यों किया गया जबकि मालूम था कि वहाँ सुप्रीम कोर्ट फ़ैसला सुनाने वाला है? सुनवाई के दौरान यह संकेत मिलने शुरू हो गए थे कि अदालत टैरिफ़ पर रोक लगा सकती है। हमारे अपने कई पूर्व डिप्लोमैट भी सावधान कर रहे थे कि फैसले का इंतज़ार करो। फिर जल्दी क्यों की गई?

अगर हम दो तीन सप्ताह इंतज़ार कर लेते तो 50% टैरिफ की जो तलवार उपर लटक कही थी वह हट जाती और हम बराबरी पर आ जाते। रूसी तेल रोकने या कृषि क्षेत्र को आंशिक तौर पर खोलने की जो रियायतें दी गईं है, वह देने की ज़रूरत न पड़ती। यह भी समझ नहीं आती कि हम उन्हें टैरिफ ( अब कम हो कर 15%) क्यों दे रहे हैं जबकि वह हमें ज़ीरो टैरिफ दे रहें है, जो बात बड़े फ़ख़्र से ट्रम्प कह भी रहें है? जो रियायतें हमसे अमेरिका ने खींच ली है, उनका क्या बनेगा? सब से चिन्ताजनक है कि जो समझौता द्विपक्षीय है उसमें तीसरे पक्ष, रूस, को भी घसीट लिया गया है। हम पर रूस से तेल लेना बंद करने की शर्त लगा दी गई है। ट्रम्प कह चुकें हैं कि वह नज़र रखेंगे कि  हम रूस से तेल ले रहें है या नहीं? इस समझौते का सबसे विवादित मामला रूसी तेल है।

अभी से संकेत है कि हमने रूस से सस्ता तेल लेना कम कर दिया है जिसका फ़ायदा चीन उठा रहा है। 50% टैरिफ़ कम करने के लिए हमें यह करना पड़ा। अमेरिका के राजदूत सरजियो गोर ने तो साफ़ साफ़ कहा है कि “भारत ने अमेरिका के साथ डील में रूसी तेल के बारे वचनबद्धता की है जिसके बाद भारत ने उर्जा लेने के अपने स्त्रोत बदल दिए हैं”।  दूसरी तरफ़ रूस की नज़र भी इस डील पर है। रूस के उप विदेश मंत्री सरजी रयाबकोव का कहना है कि “आशा है कि भारत- अमेरिका डील से रूस के साथ सम्बंध को धक्का नहीं पहुँचेगा”। इस कथन में रूस की चिन्ता भी छिपी है और चेतावनी भी कि रूस के साथ सम्बंध ख़राब हो सकते है। न्यूयार्क टाइम्स ने टिप्पणी की है कि अमेरिका के साथ डील “मोदी के लिए बड़ी सरदर्द बन गई है”। अख़बार ने साथ यह भी जोड़ा है कि,”ट्रेड और विदेश नीति में भारत को जो क़ीमत चुकानी पड़ सकती है वह लगातार बढ़ रही है”। हमारे लोगो को इसका अहसास है जो दो मंत्रियों की प्रतिक्रिया से पता चलता है।

आम तौर पर देखा गया है कि जब भी किसी देश के साथ बड़ा समझौता होता है तो मंत्री श्रेय लेने के लिए दौड़ लगाते हैं पर हैरान करने वाली बात है कि अमेरिका के साथ कथित डील से मंत्री पल्ला झाड़ रहें है। जब विदेश मंत्री एस जयशंकर से इसके बारे पूछा गया तो उनका जवाब था कि यह उनके अधिकार क्षेत्र मे नहीं आता, इसका जवाब वाणिज्य मंत्री दे सकते है क्योंकि वह ही अमेरिका के ट्रेड प्रतिनिधि से बात कर रहे हैं। पर जब वाणिज्य मंत्री पीयुष गोयल से रूसी तेल के बारे सवाल किया गया तो उनका जवाब था कि, “विदेश मंत्रालय इस मामले को देखता है…समय समय पर उन्होंने इस मामले पर लोगों को ब्रीफ़ किया है। इसलिंए आप उनसे बात कर सकते हैं”। अर्थात् दोनों मंत्री गेंद दूसरे के पाले में फेकने की कोशिश कर रहे थे जिस पर शशि थरूर ने कटाक्ष किया है कि ‘दोनों पिंग पांग खेल रहे हैं’। पर मामला किसी खेल से बहुत अधिक गम्भीर है।

रूस से तेल रोकने की देश में बहुत आलोचना हो रही है। ट्रम्प के दबाव में हम उसे बहाल नही कर सकते पर  इसके गम्भीर दुष्परिणाम निकल सकतें हैं। और भी विवादास्पद मामले हैं। हम उन्हें टैरिफ दे रहे हैं पर वह हमें टैरिफ़ नहीं देंगे। यह कैसे जायज़ है? यह समाचार है कि हमने अगले पाँच वर्ष में अमेरिका से 500 अरब डालर का सामान ख़रीदने का वादा किया है। बाद में ज़रूर इसे ‘इरादा’ कहा गया है। इस वक़्त हम वहां से 41.5 अरब डालर का आयात करते है। इतनी बढ़ौतरी कैसे होगी? इसके अतिरिक्त कृषि क्षेत्र को आंशिक तौर पर अमेरिका के लिए खोले जाने से किसान संगठन बेचैन है। उनको आशंका है कि इस  क्षेत्र में घुसपैंठ की शुरूआत हो रही है। अब भारत सरकार ने अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद मामला लटका दिया है। जिस प्रतिनिधि मंडल ने वहाँ जाना था वह नहीं जा रहा। सरकार को फ़िलहाल राहत मिल गई है पर डानल्ड ट्रम्प ख़ामोश नहीं रहेंगे। वह बहुत अस्थिर और सनकी इंसान है उनके साथ कोई डील करना बहुत मुश्किल है।

भारत सरकार ने पहले ईयू, आस्ट्रेलिया, ओमान, यूके, न्यूज़ीलैंड और यूएई के साथ विवाद रहित समझौते किए है। यूई के साथ समझौते का बहुत स्वागत किया गया है। अनुमान है कि 2030 तक योरूप को हमारे कपड़ा  निर्यात में पाँच गुना की भारी बढ़ोतरी होगी।इन्हीं पाँच वर्षों में योरूप को इंजीनियरिंग के माल का निर्यात तीन गुना बढ़ जाएगा। इसी तरह बाक़ी देशों के साथ हमारे व्यापार में भारी वृद्धि होगी जो रोज़गार बढ़ाएगा।फ़्रांस जैसे कई देश हमारे स्टूडेंट्स के लिए अपनी यूनिवर्सिटियों के दरवाज़े खोल रहें हैं। पर समस्या डानल्ड ट्रम्प के अमेरिका से है। पहले हमने 50% टैरिफ़ के दबाव में झुकने से इंकार कर दिया था तो दुनिया में हमारी बहुत प्रशंसा हुई थी। कैनेडा के उर्जा मंत्री ने तब कहा था, “जो भारत ने ईयू के साथ किया है …वह एक प्रकार का संदेश है हम उस दुनिया में नहीं रहना चाहते जिसमें माइट इज़ राइट है”। पर वर्तमान समझौते ने यह दबंग छवि बदल दी है। रूस को नाराज़ करने की बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ सकती है। अब उनके सुप्रीम कोर्ट द्वारा टैरिफ़ रद्द करने के बाद हमें मौक़ा है कि हम सारे मामले पर दोबारा से विचार करें। ईयू ने अमेरिका के साथ समझौते की पुष्टि की प्रक्रिया को टाल दिया है। याद रखना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में कोई ‘गुड फ्रैंड’ नहीं होता। जैसे अहमद फ़राज़ ने कहा है,

          अपनी अपनी बेवफाओं ने हमें यकजा (एक) किया,

         वरना मैं तेरा न था, तूं मेरा न था!

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Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.