हमारी ज़िन्दगी कब सुधरेगी?, When Will Our Lives Improve?

निर्मला जी ने एक और बजट पेश कर दिया। यह उनका लगातार 9वां बजट था। उनसे अधिक केवल मोरारजी देसाईं ने 10 बजट पेश किए थे, पर वह लगातार नहीं थे। मैं अर्थ शास्त्री नही हूँ इसलिए बजट के गुण दोष पर टिप्पणी नहीं कर रहा। यह नोट किया गया है कि वर्तमान वित्त वर्ष में अर्थव्यवस्था 7.4% की अच्छी दर से तरक़्क़ी करेगी। हम चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था हैं और कुछ सालों में जर्मनी को पछाड़ कर हम तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने जा रहे हैं। यह उस देश के लिए मामूली उपलब्धि नही है जो कभी अपने लोगों का पेट भरने के लिए अमेरिका से PL-480 कार्यक्रम के अधीन अनाज के लिए निर्भर था। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने कहा है कि दूसरे देशों से ‘भीख माँगते’ उनका सर झुक जाता है और उन्हें शर्म आती है। भारत की वह हालत नही बनी। यह आज़ादी से लेकर अब तक हमारे नेतृत्व की सही सोच का परिणाम है।

वर्तमान मोदी सरकार ने लगभग 12 सालों में देश को स्थिरता दी है जिस कारण भी देश तरक़्क़ी कर रहा है। हाल ही में हम ई-यू से बड़ी डील कर हटें है और डानल्ड ट्रम्प ने भी डील की घोषणा की है पर इसका ब्यौरा अभी स्पष्ट नहीं। देश मज़बूती से 2047 में ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य की तरफ़ चल रहा है,ऐसा हमें बताया गया है। यह सब तो ठीक है, संतोष जनक है, पर ज़मीनी हक़ीक़त तो यह है कि इन आँकड़ों से अलग आम भारतीय की ज़िन्दगी भी है जिसमें कोई सुधार नहीं हुआ। हम प्रदूषित शहरों में रहते है, जहां क्राइम बढ़ रहा है, सड़कें टूटी हुई है,कूड़ा कचरा के ढेर हैं,पर कोई परवाह करने वाला नहीं क्योंकि चुनाव रोज़मर्रा के मसलों पर नही, भावनात्मक मुद्दों पर लड़े जाते हैं। धर्म पर बाँटनें के बाद जाति पर बाँटने का भी प्रयास होता रहता है। दुख की बात है कि यूजीसी जैसी उच्च संस्था  जिसकी ज़िम्मेवारी बच्चों का भविष्य संवारने की है, ने ही ऐसे नियम बना दिए जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने ‘विभाजनकारी’ और ‘ख़तरनाक’ करार दिया। नियम ऐसे थे कि कैम्पस के अंदर जातिगत बँटवारा हो सकता था। बड़ी अदालत ने रोक तो लगा दी पर सवाल तो उठता है कि प्रयास ही क्यों किया गया?

यह लेख मैं दिल्ली में लिख रहा हूँ। चार दिन पहले मैं जालंधर से यहाँ सड़क के रास्ते आया था। विभाजन से पहले इसे कभी सड़क-ए-आज़म कहा जाता था। अंग्रेजों ने इसे जी टी रोड का नाम दिया और आज़ाद भारत में यह शेरशाह सूरी मार्ग बन गई। आजकल यह NH-1 कही जाती है। इसका आकार बढ़ चुका है। दोनों तरफ़ तीन तीन लेन है।  नितिन गड़करी को ऐसी हाईवे बनाने का जायज़ श्रेय दिया जाता है। देश भर में हाईवे और सुपर हाईवे का जाल बिछ गया है लेकिन यह नहीं देखा जाता कि मैटेरियल कैसा लगता है, या हाईवे की मेनटेनेस कैसी है? जालन्धर से दिल्ली तक अब इस हाईवे पर झटके मिलतें हैं। लालू प्रसाद यादव ने एक बार कहा था कि सड़कें एक प्रसिद्ध अभिनेत्री (नाम नहीं लूँगा, क्योंकि वह सही नहीं है) के गाल जैसे मुलायम होंगी। पर अब तो गाल मे गड्डे पड़ गए है! असली समस्या है कि देश में वर्क कलचर में सुधार नहीं हुआ। जिनका काम देखना है, वह ज़िम्मेवारी सही नहीं निभा रहे। बाबुओं की मानसिकता नहीं बदली। बाक़ी तबाही भ्रष्टाचार ने पूरी कर दी।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था, ‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैकसिमम गवर्नस’। अर्थात् सरकार बढ़िया शासन देगी। पर वह भी काम करने का संस्कृति को बदल नहीं सके जिसका दुष्परिणाम आम आदमी भुगत रहा है। मैं पिछले महीने मलेशिया की राजधानी कौलालम्पुर में था। सड़कें सचमुच उस अभिनेत्री की गाल की तरह मुलायम थी। कहीं कोई हार्न नहीं बजाता, कहीं पुलिस वाला नज़र नहीं आता। वातावरण भी साफ़ सुथरा था जबकि दिल्ली में आते ही प्रदूषण आपको पकड़ लेता है। गला ख़राब हो गया, नाक बहने लगा। देश की राजधानी, दिल्ली, दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर है। बीमारी का घर है। बाहर से लोग आने से घबराते है। कोई इलाज भी नहीं। यह कैसी गवर्नेस है कि राजधानी में ही लोगों को बीमार होने और कईयो को मरने के लिए छोड़ दिया गया है क्योंकि प्रदूषण को कम करना सरकारी प्राथमिकता में नहीं है? जिस संसद नें 150 साल पुराने वंदे मातरम पर एक दिन बहस में लगाया, उसके पास प्रदूषण पर बहस के लिए कोई समय नहीं था जबकि हर सर्दियों में बड़ी संख्या में नागरिक मरीज़ बन रहें हैं।

और अगर आप बीमार हो गए तो किधर जाओगे? सरकारी अस्पतालों की जो शोचनीय हालत है, वह सबके सामने है। ठिठुरती सर्दी में देश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल एम्स, के बाहर खुले में मरीज़ों के सम्बंधी सोने के लिए मजबूर हैं। ऐसे चित्र प्रकाशित हो चुके हैं पर शासन को परवाह नहीं है। सरकार इलाज के बहुत से खर्चे कम कर रही है पर क्योंकि सरकारी अस्पतालो की हालत नहीं सुधरती इसलिए, नीति आयोग के आँकड़ों के अनुसार, 60% लोग प्राइवेट अस्पतालों में महँगा इलाज करवाने के लिए मजबूर है। बात वहीं आती है कि वर्क कलचर कब संवेदनशील, कार्य कुशल और भ्रष्टाचार मुक्त बनेगी? दिल्ली में राजपथ को ‘कर्तव्य पथ’ का नाम दे दिया गया है, पर कर्तव्य के प्रति भावना कब पैदा होगी? बार बार नव निर्मित पुल यहाँ क्यों गिरते हैं? बिहार में तो बरसात में एक दर्जन पुल बह गए पर जनता ने उसी अक्षम सरकार को भारी बहुमत से निर्वाचित कर दिया। इंदौर को कई वर्षों से सबसे स्वच्छ शहर घोषित किया जा रहा है पर वहाँ ही लगभग दो दर्जन लोग पानी पीने से मारे गए क्योंकि पानी और सीवरेज मिल गए थे। सरकारी स्कूलों की हालत सब जानते हैं। केवल दिखावा होता है पर बेहतर करने का कोई ठोस प्रयास नहीं किया जाता। शायद इसलिए क्योंकि जिन की ज़िम्मेवारी इन्हें ठीक करना है उनके बच्चे सरकारी स्कूलों में नही पढ़ते।

 कुछ वर्ष पहले मुम्बई के पॉश इलाक़े में रहने वाले अभिनेता हृथिक रोशन ने प्रेस में शिकायत की कि उनके नल में भूरे रंग का पानी आ रहा है। वहाँ भी पानी में सीवरेज मिल गया था। हर बरसात में हमारे बड़े शहर, दिल्ली, मुम्बई, बैंगलोर  पानी में डूब जातें हैं। इसे प्रदूषण की तरह सामान्य समझा जाता है इसलिए स्थाई समाधान ढूँढने की कोशिश नहीं की जाती। बैंगलोर को कभी गार्डन सिटी कहा जाता था, पर अब वह खचाखच भरे ट्रैफ़िक और चरमरा रहें इंफ़्रास्ट्रक्चर का शहर बन चुका है। सुध लेने वाला कोई नहीं क्योंकि सीएम और डिप्टी सीएम कुर्सी की खींचातानी में लगे हुए हैं। हमारे शहर गारबेज, गड्डों और ट्रैफ़िक के दुःस्वप्न हैं। टिकाऊ सड़कों से किसी की जेब नहीं भरती इसलिए खुदाई होती रहती है, टेंडर होते रहतें है, सड़कें फिर बनाई जाती है।  पहली बरसात में गड्डे पड़ जाते हैं।

 जनवरी की धुँध में ग्रेटर नोएडा में सॉफ़्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की कार पानी से भरे निर्माणाधीन गड्डे मे गिर गई। सावधान करने के लिए न कोई बोर्ड था, न कोई बाड़ या चहारदीवारी इसलिए वह सीधा पानी में चले गए। और डूब गए। पिता को अंतिम फ़ोन में उसने कहा, “मैं मरना नहीं चाहता”। नोएडा तो ‘स्मार्ट सिटी’ घोषित है।पर किसी अफ़सर ने नहीं देखा कि खुला असुरक्षित गड्डा है और हादसा हो सकता है?  बिल्डर भी समंझतें  हैं कि रिश्वत से उनका काम चल जाएगा, इसलिए नियमों का पालन नहीं करते। हर प्रदेश में अवैध खनन हो रहा है। सब कुछ ड्रोन से नज़र आ सकता है पर रूकता क्यों नहीं? अरावली के जंगलों को बचाने के लिए सुप्रीम को दखल क्यों देनी पड़ी? सरकार ने तो नियम बदल दिए थे जिनका सहारा ले कर कटान चलता रहता और दिल्ली का अस्तित्व ही खतरें में पड़ जाता।

नई समस्या बढ़ता क्राइम है। हर शहर में गैंग बन गए हैं जो लूटपाट करते हैं। मुम्बई में फिलम निर्माता रोहित शेट्टी के घर पर फायरिंग हो कर हटी है। पंजाब में यह सामान्य बन चुका है। विदेश में बैठे या जेल में बंद गैंगस्टर फरौती की माँग करते हैं और न मिलने पर हिंसा का रास्ता अपना रहे हैं। कई परिवार तो इनके आतंक के कारण देश छोड़ने पर मजबूर हैं। इसके बारे कोई राष्ट्रीय नीति बनाने की ज़रूरत है। आशा है गृहमंत्री अमित शाह इस तरफ़ ध्यान देंगे। सरकार की पहली ज़िम्मेदारी नागरिक को सुरक्षा देना है। हमारे शहर असुरक्षित बनते जा रहे हैं।

हम जो टैक्स देतें है, उन्हें सरकार की तरफ़ से क्या मिलता है? हवा साफ़ नहीं, पानी साफ़ नहीं, रिश्वत अभी भी चलती है, शहर गंदे हैं। क्राइम और ड्रग्स बढ़ते जा रहें है। सुरक्षा नहीं है। निर्मला जी का कहना है कि सरकारी ख़र्चा बढ़ाने के लिए वह टैक्स का जाल और बढ़ाएँगी पर क्या इससे हमारी ज़िन्दगी में सुधार आएगा? जो भारतीय विदेश चला जाता है वह लौटना नहीं चाहता क्योंकि बाहर “क्वालिटी ऑफ लाइफ़’ बेहतर बताई जाती है। हमारी तो राजधानी रहने योग्य नहीं रही। सरकार ने स्मार्ट सिटिज़ बनाई हैं पर क्या एक भी शहर उस मायने में स्मार्ट है? हमारी क्वालिटी ऑफ लाइफ़ कब इम्प्रूव करेगी? क्या समय नहीं आ गया कि इस तरफ़ ध्यान दिया जाए ताकि टैक्स देने वाला नागरिक महसूस कर सके कि उसे भी बदले में कुछ मिलता है। या ऐसा ही होता रहेगा? बजट आएँगे, बजट जाऐंगे पर हमारी ज़िंदगी ऐसा ही बेढंगी चलती जाएगी?

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Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.