प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाजपा के नए अध्यक्ष नितिन नबीन को अपना बॉस कहा है। भाजपा में कौन ‘बॉस’ है यह सब जानते है, पर यह तो मानना पड़ेगा कि 45 वर्ष के नितिन नबीन को अध्यक्ष बना कर भाजपा के हाईकमान ने एक बार फिर प्रदर्शित कर दिया कि वह लगातार पार्टी का नवीनीकरण करते जातें हैं। पार्टी पुराने घिसे पिटे नेताओं के बल पर आश्रित नहीं रहती, जैसे कांग्रेस है या कई प्रादेशिक पारिवारिक पार्टियाँ हैं। झोले से अचानक ऐसा नाम निकाला जाता है कि लोग दंग रह जातें हैं। वह पाँच बार विधायक चुने जा चुके हैं और नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल में मंत्री रहे हैं। उनके चुनाव से संदेश है कि भाजपा मेरिट को डाइनेस्टी पर तरजीह देती है। हरियाणा, मध्यप्रदेश, राजस्थान, उतराखंड,दिल्ली जैसे प्रदेशों में पहले ही भाजपा नए चेहरे प्रस्तुत कर चुकी है। सब सफल नहीं है, पर संदेश तो है कि पार्टी किसी परिवार की जागीर नहीं है।
नितिन नबीन के आगे भी बहुत चुनौती है। केरल,असम, बंगाल, पुदुच्चेरी और तमिलनाडु के विधानसभा चुनाव जीतने है। बंगाल और तमिलनाडु में स्थानीय भावनाओं से जूझना है। केरल में कुछ प्रगति हुई है पर पैर नहीं जमे जबकि असम में दस साल के बाद भाजपा सरकार को एंटी-इंकमबंसी, शासन विरोधी भावना, का सामना करना पड़ सकता है। नितिन नबीन ने अपने बिहार में देखा होगा कि चाहे अच्छे बहुमत से सरकार बन गई है पर आँकड़े बहुत संतोषजनक नहीं है। राष्ट्रीय जनता दल और भाजपा का वोट लगभग उतना ही है जितना पिछली बार था। राजद को 23% तो भाजपा को 20%। सरकार बनी तो नितिन कुमार की जदयू और दूसरी छोटी पार्टियों के समर्थन से। चुनाव से पहले महिलाओं को 10000 रूपए खाते में डालना भी बताता है कि पूरी तरह आश्वस्त नहीं थे। पश्चिम बंगाल में चुनाव से ठीक पहले ईडी की चहलक़दमी भी बताती है कि कहीं आत्म विश्वास की कमी है।
बिहार चुनाव एक बात और प्रदर्शित कर गए कि कभी सबसे बड़ी पार्टी रही कांग्रेस, का भी कुछ सुधर नहीं रहा। वह 61 सीटें लड़े और केवल 6 में विजय हुए। आख़िर तक वह फ़ैसला नहीं कर सके कि तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाना है कि नही? सब निर्णय राहुल गांधी और उनकी मंडली लेती है जिस तक पहुँचना सबके लिए आसान नहीं है। पिछले साल दिसम्बर में उड़ीसा से कांग्रेस के पूर्व विधायक मुहम्मद मकूम ने सोनिया गांधी को पत्र लिख कर शिकायत की थी कि बार बार प्रार्थना करने के बावजूद उन्हें तीन साल राहुल गांधी से मिलने का समय नहीं दिया गया। उनकी शिकायत है कि नेतृत्व और आम कार्यकर्ता के बीच संवाद नही है। उड़ीसा में पार्टी छह बार लगातार हार चुकी है पर फिर भी राहुल गांधी के पास पूर्व विधायक को मिलने का समय नहीं था।
राहुल गांधी के बारे यह शिकायत कई नेता कर चुकें है। गुलाम नबी आज़ाद, पृथ्वी राज चौहान, शशि थरूर सब राहुल गांधी के व्यवहार से आहत हैं। आज़ाद तो पार्टी ही छोड़ गए। असम के मुख्यमंत्री हिमंत विस्वा सरमा ने बताया था कि जब वह कांग्रेस में थे और राहुल गांधी को मिलने गए तो राहुल उनसे बात करने की जगह अपने कुत्ते से खेलते रहे। सरमा 22 वर्ष के बाद कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में चले गए जहां असम में मुख्यमंत्री बन उन्होंने अपनी पुरानी पार्टी के क्षेत्र से पैर ही उखाड़ दिए। राहुल का बार बार विदेश चले जाना भी बताता है कि वह फ़ुल टाइम राजनेता नहीं है, और शायद न ही बनना चाहतें हैं। उनके चरित्र में भी अजब विरोधाभास है। एक तरफ़ वह साथियों से दूर रहतें हैं तो दूसरी तरफ़ आम लोगों में घुलमिल जाते है जैसा हमने उनकी दो यात्राओं में देखा था। अब भी वह इंदौर में उन परिवारों के मिलने पहुँच गए जिनके प्रियजन ज़हरीला पानी पीने से मारे गए थे। यह व्यक्तिगत संवेदनशीलता दिखाता है पर राजनेता के तौर पर वह बार बार असफल हो रहें है। कोई भी तीर निशाने पर नहीं पड़ रहा। वह होमवर्क करतें हैं। मुद्दे उठाते हैं पर कहीं लोगों के साथ ‘डिस्कनेक्ट’ है जिसकी मुहम्मद मकूम ने भी शिकायत की थी। इस समय कांग्रेस केवल तीन प्रदेशों, हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में अपने बल पर सत्ता में है। महाराष्ट्र के स्थानीय चुनावों में कांग्रेस 3/4 स्थान पर रही है। इलाज क्या है?
क्या प्रियंका गांधी वाड्रा कांग्रेस में नई जान फूंक सकतीं हैं? हाल ही में प्रियंका गांधी को लेकर अंग्रेज़ी का शब्द ‘बज़’ बहुत इस्तेमाल किया जा रहा है। अर्थात् उनको लेकर कोलाहल बहुत है। विशेष तौर पर जिस तरह संसद में प्रियंका ने वंदे मातरम और मनरेगा को लेकर भाषण दिए, उसे लेकर बहुत चर्चा रही है। वह सहज हैं। अपनी बात कहते वक़्त कटुता का इस्तेमाल नहीं करती जैसी कई बार राहुल गांधी के भाषणों में नज़र आती है। राहुल वन-ट्रैक है। अड़ गए तो अड़ गए। बार बार देश की अर्थव्यवस्था को ‘डैड इकानिमी’ कह रहें हैं। क्या मतलब है? शब्दों से कई बार दूसरों के प्रति नफ़रत भी टपकती है। दूसरी तरफ़ प्रियंका हैं जो स्पष्ट बात कहते हुए भी मर्यादा को कभी पार नहीं करती। हिन्दी पर भी अधिक अधिकार है। संसद में उनकी भाषण शैली को देख कर यह माँग बढ़ रही है कि पार्टी में उनकी भूमिका बढ़ाई जाए।
कई वर्ष पहले एक मुलाक़ात में लालकृष्ण आडवाणी ने प्रियंका गांधी के बारे मेरे सवाल के जवाब में कहा था कि “हाँ,वह एक चुनाव जीत सकती हैं”। उस समय बहुत चर्चा थी कि शक्ल, हाव भाव इंदिरा गांधी जैसा है। उन्हें कांग्रेस का ट्रम्प कार्ड या ब्रह्मास्त्र समझा गया। पर प्रियंका की राजनीति में शुरुआत अच्छी नहीं रही। 2020 में उन्हें उत्तर प्रदेश का महासचिव बनाया गया। ‘लड़की हूँ लड़ सकती हूँ’ का नारा उन्होंने दिया पर वह शानदार तरीक़े से असफल रही। बाद में पुलवामा हमले के बाद बालाकोट स्ट्राइक ने कांग्रेस का सफ़ाया कर दिया। केवल सोनिया गांधी रायबरेली जीत सकीं। राहुल गांधी खुद अमेठी हार गए। प्रियंका गांधी ने भी उत्तर प्रदेश से किनारा कर लिया और अब केरल में वायनाड से सांसद हैं। लेकिन अब बदलाव आया है। हम प्रियंका गांधी का संस्करण -2 देख रहें हैं। वह पहले से अधिक मैच्योर है, अधिक विश्वस्त नज़र आतीं हैं, खुद को अच्छा सांसद भी साबित कर रहीं है, और अपनी ज़िम्मेदारी अच्छी तरह से निभाने की कोशिश कर रहीं हैं।
कांग्रेस की समस्या अधिक मूलभूत है। कांग्रेस अभी भी एक सामंती पार्टी है जिसे एक परिवार चला रहा है। मल्लिकार्जुन खड़गे तो केवल दिखावा है पार्टी के सभी निर्णय, ग़लत -सही, राहुल गांधी लेते हैं। नेतृत्व पुराने चले हुए वफ़ादार कारतूसों के बीच खुश नज़र आता हैं। भाजपा ने नई पीढ़ी को आगे कर दिया पर कांग्रेस बदलने को तैयार नहीं। उदयपुर के चिन्तन शिविर में फ़ैसला लिया गया कि कार्यकारिणी में कम से कम आधे लोग युवा होंगे। पर आज भी 85 सदस्यों वाली कार्यकारिणी में केवल 12 ही 50 साल से कम उम्र के हैं। इसी का परिणाम है कि कभी सचिन पायलट नाराज़ हो जातें हैं तो आजकल शशि थरूर बिदक रहें हैं। जो युवा प्रतिभाशाली है वह समझ गए है कि राहुल के कारण उनका उपर का रास्ता बंद है। इसलिए हताशा बढ़ रही है। कई तो ज्योतिरादित्या सिंधिया की तरह पार्टी ही छोड़ गए हैं।
कांग्रेस के पतन का एक कारण ज़रूरत से अधिक केन्द्रीयकरण है। भाजपा भी अब काडर- बेस्ड पार्टी की जगह पर्सनैलिटी-बेस्ड पार्टी बनती जा रही है पर वहां यह ढका है क्योंकि नेतृत्व चुनाव जीतने की क्षमता रखता है। कांग्रेस में संगठन को चुस्त बनाने का कोई प्रयास नहीं किया जा रहा। राहुल गांधी का कहना है कि “कांग्रेस केवल एक राजनीतिक दल नहीं है, भारत की आत्मा की आवाज़ है”। खड़गे जी का कहना है कि “कांग्रेस एक विचारधारा है और विचारधारा कभी नहीं मरती”।यह सज्जन किस ग़लत फ़हीमी में हैं ?जब पार्टी एक परिवार के इर्द गिर्द लिपट गई तो विचारधारा कहाँ बची? परिवार का हित पार्टी का हित बन गया। स्थानीय नेतृत्व को उभरने नहीं दिया जाता।
जदयू के सांसद मनोज झा ने बहुत सही बात कही है, “हमारे पास चुनाव की आज़ादी तो है पर कोई अर्थपूर्ण विकल्प नहीं है”। अपनी लाख कमज़ोरियों के बावजूद इस विकल्प का केन्द्र कांग्रेस ही हो सकती है। पर विपक्ष को साथ लेने के लिए नेतृत्व में दूरदर्शीता और उदारता चाहिए जो राहुल गांधी की कांग्रेस में नज़र नहीं आ रही। इसीलिए भी प्रियंका गांधी की चर्चा अधिक हो रही है। कांग्रेस के सांसद इमरान मसूद ने तो माँग भी की है कि प्रियंका को पार्टी की बागडोर सम्भाल दी जाए। बहुत और नेता भी यह महसूस करते हैं पर चुप है। जिस तरह राहुल अचानक ग़ायब हो जातें हैं उससे प्रियंका की माँग और बढ़ गई है। लोग राहुल गांधी के नेतृत्व से उब गए हैं। वह नया चेहरा और नई सोच चाहतें हैं। क्योंकि पार्टी ने परिवार के इर्द-गिर्द ही घूमना है इसलिए यह चेहरा प्रियंका ही हो सकती हैं। उन्हें नेतृत्व का मौक़ा मिलना चाहिए। पर क्या का मिलेगा? सोनिया गांधी मानेंगीं? आने वाले विधानसभा चुनावों में केरल से सांसद प्रियंका को केरल की जगह दूर असम का प्रभारी बना दिया गया है। क्या संदेश है ?