एक बेमतलब,बेमक़सद युद्ध में विराम, Cease Fire In Aimless Pointless War

ईरान युद्ध में दो सप्ताह का विराम हो गया है। हमले रूक रहें हैं और होर्मुज का जलमार्ग खुल जाएगा। यह शुभ समाचार है। मार्च के पहले सप्ताह में मैंने इस युद्ध को ‘बेमतलब, बेमक़सद’ कहा था। बात वही है। इतनी तबाही से मिला क्या? ट्रम्प ने ‘रिजीम चेंज’ और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रद्द करने का लक्ष्य बताया था। 40 दिन की बमबारी के बाद वहाँ वही शासन है और ईरान का एनरिच्ड यूरेनियम उन्हीं के पास है। अब फोक्स हार्मुज पर है। युद्ध से पहले यह जलमार्ग खुला था। इस युद्ध ने इसका नियंत्रण ईरान को दे दिया। ईरान के पास वह हथियार आगया जो परमाणु अस्त्रों से भी अधिक घातक है। जैसे अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ फरीद ज़कारिया ने कहा है, “अमेरिका ने ईरान को वह हथियार दे दिया है जिससे वह जब चाहें तेल की सप्लाई रोक सकता है”। ईरान तो हर जहाज़ के गुजरने का 2 मिलियन डालर फ़ीस लेना चाहता है। अगर यह बात मान ली गई तो ईरान फ़ारस की खाड़ी में साऊदी अरब के बाद दूसरा सबसे रईस देश बन जाएगा। जो ईरान को तबाह करने निकले थे वह ही उसके उपकारी बन गए!

इस समय तो ईरान विजेता नज़र आता है। उन्होंने युद्ध शुरू नही किया। वह वह तबाही सह गए जो शायद ही कोई देश सह सकता। सारी टॉप लीडरशिप मार डाली गई। उनका सारा इंफ़्रास्ट्रक्चर तबाह हो गया पर उन्होंने झुकने से इंकार कर दिया। जिस कट्टर शासन को ट्रम्प और नेतन्याहू ख़त्म करने निकले थे वह और मज़बूत हो गया है। अगर कल को हार्मुज पर नियंत्रण छोड़ना भी पड़े तो वह कह सकतें हैं कि यह तो पहले से खुला था। अभी भी वह कह रहें हैं कि यह युद्ध विराम है, युद्ध का अंत नहीं। युद्ध जो अदावत और कड़वाहट पैदा कर गया है वह बहुत देर तक रहेगी। विशेष तौर पर ईरान और इज़राइल के रिश्ते ख़राब रहेंगे। नेतन्याहू कह रहें हैं कि युद्ध विराम ट्रम्प का निर्णय है जिसका वह समर्थन कर रहें है। वह खुश नज़र नहीं आ रहे क्योंकि उनके राजनीतिक लक्ष्य अधूरे युद्ध से पूरे नही हो रहे। उन्होंने घोषणा की है यह युद्ध विराम लेबनान पर लागू नहीं होगा। अर्थात् अभी नेतन्याहू की विनाश की प्यास नहीं बुझी।

सबसे अधिक नुक़सान अमेरिका और उसके राष्ट्रपति का हुआ है। वहाँ लोगों ने युद्ध विराम का स्वागत किया है पर पूछा जा रहा है कि जनाब, वहाँ करने क्या गए थे? ईरान से अमेरिका को कोई सीधा ख़तरा नहीं है फिर अरबों डालर क्यों बहा दिए? एक दिन पहले ट्रम्प ने घोषणा की थी कि ‘रात भर में ईरानी सभ्यता मिटा देंगे’। ऐसी भाषा तो कोई असंतुलित व्यक्ति ही इस्तेमाल कर सकता है। वह ईरान और उसके नेतृत्व को भद्दी गालियाँ निकाल चुकें हैं क्योंकि निकलने का सम्मानजनक रास्ता नहीं मिल रहा था। अब किसी तरह उन्होंने खुद को इस दलदल से निकाल लिया है लेकिन विश्वसनीयता ज़ीरो हो गई है। अमेरिका की नैतिक हार हुई है और उनकी पावर की सीमा दुनिया ने देख ली है। राष्ट्रपति के शब्दों और कदमों का लम्बे समय में क्या नुक़सान होगा, इसका आँकलन अभी बाक़ी है। बाक़ी दुनिया का अमेरिका के प्रति नज़रिया बदल रहा है। जिस देश को स्थिरता की शक्ति समझा गया था उसी ने विश्व व्यवस्था को अस्थिर कर दिया। विभिन्न राजधानियों में अब नई विश्व व्यवस्था पर चर्चा शुरू होगी। ट्रम्प ने हर अंतरराष्ट्रीय संस्था को तबाह कर दिया है।

फ़िलहाल तो युद्ध विराम हो रहा है जो हमारे लिए अच्छी खबर है। तेल की क़ीमतें नीचे आना शुरू हो गईं है। शुक्रवार को पाकिस्तान में दोनों पक्षों में सीधी वार्ता हो सकती है। फरीद ज़कारिया ने युद्ध विराम को ‘नाज़ुक’ कहा है। आशा करनी चाहिए कि यह अस्थाई नहीं रहता क्योंकि हमारी अर्थव्यवस्था प्राकृतिक तौर पर फ़ारस की खाड़ी से जुड़ी हुई है,जो बात पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल अरुण प्रकाश ने भी हमें याद करवाई है। हमारे 16 जहाज़ अभी उधर रूकें हुए हैं। गैस की हालत चिन्ताजनक है। कतर और यूएई से हमारी 53 % गैस आती है। हम 85% तेल आयात करते हैं यह हमारी बड़ी कमजोरी है क्योंकि जब भी कोई वैश्विक संकट खड़ा होता है तो हमारा आयात बाधित हो जाता है। 55-60 % तेल खाड़ी देशों से आता है जिसका 40% हार्मुज से निकलता है। तेल की बढ़ती क़ीमतों से हमारी अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। चीन के पास 1.4 अरब बैरल तेल का भंडार है जबकि हमारा भंडार केवल 10 करोड़ बैरल का है। इसे बढ़ाने की ज़रूरत है। गैस की कमी के कारण बड़ी संख्या में प्रवासी गाँव लौटना शुरू हो गए थे क्योंकि ढाबे और छोटे उद्योग या तो बंद हो गए हैं या पूरी क्षमता से काम नहीं कर रहे। जो रसोई गैस पर चलती हैं वह भी कमी महसूस कर रही है। हमें तो खुद गैस बुक किए एक महीने से उपर हो गया है। नम्बर आगया है, सिलेंडर कब आएगा, पता नहीं।

मामला केवल गैस या तेल का ही नही खाड़ी के देश हमारी अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग है। इस युद्ध का असर हमारे निर्यात पर पड़ रहा है। दुनिया में भारत दूसरा सबसे बड़ा खाद का खपतकार है। 72% यूरिया वहां से आता है। सप्लाई की कमी का ख़रीफ़ की फसल पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। अभी तक सरकार ने तेल की क़ीमतें बढ़ने नहीं दी। देखते हैं पाँच विधानसभा के चुनाव होने के बाद क्या होता है?आशा करनी चाहिए कि क़ीमतें बढ़ाने की नौबत नहीं आएगी।

यह अच्छी बात है कि सरकार अब संतुलन क़ायम करने की कोशिश कर रही है। देर से ही सही ईरान के साथ रिश्ता जोड़ने की कोशिश हो रही है। पूर्व विदेश सचिव निरुपमा मेनन राव ने लिखा है, “ईरान भारत के लिए महत्वहीन नहीं है…हाँ, हमें खाड़ी में अपने लोगो का ध्यान रखना है। हाँ, हमने उधर से उर्जा का बंदोबस्त करना है। पर हमें ईरान के साथ काम करने वाले संबंध रखने है। यह हमारी रणनीतिक ज़रूरत है। अगर भारत एक पक्ष का समर्थक बन जाए तो हमारे विकल्प सीमित हो जातें हैं। हम वह देश हैं जिसके चारों तरफ़ हित हैं”। इस युद्ध ने यह बात और भी स्पष्ट कर दी। ईरान भी अब मध्य पूर्व में बड़ा खिलाड़ी बन गया है। ट्रम्प ने ईरान के साथ बातचीत के लिए हमें नहीं पाकिस्तान को चुना है। उन्होंने युद्ध विराम में चीन की भूमिका को स्वीकार किया है। हमारे लिए बड़ा संदेश है कि सारी विदेश नीति पर गौर करने की ज़रूरत है। हमें एक तरफ़ नहीं झुकना चाहिए और अपनी बात साफ़ कहनी चाहिए। तब ही दुनिया हमें गम्भीरता से लेगी।

इस बीच पाकिस्तान की ‘मध्यस्थता’ को लेकर बहुत चर्चा है। भारत में विशेष तौर पर विपक्ष इसे सरकार की असफलता कह रहा है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा है कि ‘हम दलाली नही करते’। हैरानी है कि जयशंकर जैसा वरिष्ठ राजनयिक ऐसी अकूटनैतिक भाषा का इस्तेमाल कर रहा है। मध्यस्थता करनी दलाली नही होती। हमने भी कई बार प्रयास किया है। जवाहरलाल नेहरू ने 1950 में कोरिया युद्ध में मध्यस्थता की थी। 1956 के स्वेज़ नहर के विवाद को हल करने में भी हमारी भूमिका रही है। कारगिल युद्ध में बिल क्लिंटन ने नवाज़ शरीफ़ को बुला कर बंदा बनने को कहा था जिसके बाद युदद ख़त्म हो गया। याद रखिए मुम्बई की सबसे महत्वपूर्ण सड़क ‘दलाल स्ट्रीट’ है जिस पर बाम्बे स्टॉक एक्सचेंज स्थित है।

पाकिस्तान को दलाल कह कर हमने खुद को अनावश्यक आलोचना के लिए छोड़ दिया कि हम कोप भवन में हैं क्योंकि पाकिस्तान को पूछा गया पर हमें नहीं पूछा गया। डानल्ड ट्रम्प ने प्रधानमंत्री मोदी को फ़ोन ज़रूर किया पर इसे डैमेज कंट्रोल ही कहा जा सकता है।हमारे प्रधानमंत्री ने अमेरिका के साथ सम्बंध सुदृढ़ करने में बहुत प्रयास किया है पर जब निर्णायक क्षण आया तो ट्रम्प नें पाकिस्तान के सेना प्रमुख को महत्व दे दिया। भारत और अमेरिका के रिश्तों की कमजोरी उजागर हो गई है जो बुरी बात भी नहीं। ट्रम्प जैसे से तो दूरी बनाकर रखना बेहतर है। हमारे लिए यह असुखद ज़रूर है क्योंकि इस युद्ध का सबसे अधिक हम पर प्रभाव पड़ा है। इस क्षेत्र में भारत सबसे बड़ी ताक़त है पर हमारे पड़ोस में चल रहे टकराव में हमारी कोई भूमिका नहीं है। पर पाकिस्तान भी वाहक है, वार्ता का शिल्पकार नहीं है। हाँ,पाकिस्तान को अपनी छवि बेहतर करने का मौक़ा मिल गया है। बड़े सालों के बाद वह फिर प्रासंगिक बन गए हैं।

यह वह देश है जिसने ओसामा बिन लादेन को वर्षों छिपाए रखा था। जिसका हर बड़ी आतंकी घटना में हाथ है। मुनीर शान्ति का प्रयास कर रहा है तो उसका देश अफ़ग़ानिस्तान पर बम बरसा रहा है। पाकिस्तान के बारे हम यह प्रभाव दे रहें हैं कि हमें शान्ति की कम, पाकिस्तान को मिली अस्थाई बढ़त की अधिक चिन्ता है। मैं अस्थाई इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि ट्रम्प किसी के सगे नहीं है। पाकिस्तान तो वैसे भी इस्तेमाल करने की वस्तु है। समय समय पर उन्होंने अमेरिका, साऊदी अरब और चीन को अपना इस्तेमाल करने दिया है।

हमारा हित इसमें है कि युद्ध विराम स्थाई रहे। इसका अभी कोई यक़ीन नहीं। पाकिस्तान तो साइड शो है। वह देश हमारे बराबर है ही नहीं, न जाने हम उनके साथ बहस में क्यों पड़तें है? हमें बड़े आश्वस्त देश की तरह बर्ताव करना चाहिए, ‘धुरंधर’ को फ़िल्म तक ही सीमित रहने देना चाहिए।

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About Chander Mohan 811 Articles
Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.