परिसीमन में उलझा महिला आरक्षण, Women’s Reservation Stuck In Delimitation Quagmire

महिला आरक्षण से जुड़ा संशोधन विधेयक 54 वोट की कमी से लोकसभा में गिर गया। जब से मोदी सरकार क़ायम हुई है यह दूसरी बड़ी हार है। पहली हार तब हुई जब कृषि सम्बंधित तीन क़ानून निरस्त करने पड़े थे।  दोनों बहुत अलग विषय है पर एक समानता है। दोनों के लिए आम सहमति पैदा करने का प्रयास नहीं किया गया। विपक्ष के साथ बैठ कर मामला तय किया जाना चाहिए था। दक्षिण के प्रदेश लोकसभा चुनाव क्षेत्रों के परिसीमन के प्रयास से बेचैन है। उनकी आपत्तियों का निपटारा होना चाहिए था। उनकी आपत्ति महिला आरक्षण को लेकर नहीं है। कृषि सम्बंधित क़ानून पर तो फिर भी मतभेद थे, पर महिला आरक्षण को लेकर तो सभी दलों में आम सहमति है। आख़िर इसी संसद ने 2023 में महिलाओं के लिए संसद और विधानसभाओं में 33% आरक्षण को सर्वसम्मति से स्वीकृति दी थी। अगर उस क़ानून को लागू कर दिया जाता तो यह बखेड़ा खड़ा ही नहीं होता। पर इसे तीन साल लटकाए रखा गया।

असली समस्या महिला आरक्षण को परिसीमन के साथ जोड़ने को लेकर है। ताज़ा जनगणना शुरू हो चुकी है जो 2029 तक पूरी होगी। सरकार का कहना है कि 2029 तक महिला आरक्षण या परिसीमन के लिए इंतज़ार नहीं कर सकते इसलिए इसे 2011 की जनगणना से जोड़ दिया गया। साथ ही सरकार ने लोकसभा की सीटें 50% बढ़ाने का फ़ैसला सुना दिया। पर इतने बड़े कदम उठाते वक़्त, जो देश के संघीय ढांचे को बदल देगा, सम्बंधित पक्षों से वार्ता नहीं की गई। संसद में प्रधानमंत्री और गृहमंत्री दोनों ने आश्वासन दिए कि किसी से भेदभाव नहीं होगा पर ऐसे महत्वपूर्ण कदम केवल आश्वासनों के बल पर उठाए नहीं जाते। इन्हें लिखित रूप में दिया जाना चाहिए था। परिणाम यह है कि परिसीमन और सीटों को बढ़ाने के मामले को लेकर बवाल में महिला आरक्षण का मसला फंस गया। सारा ध्यान किस प्रदेश की कितनी सीटें बढ़ेंगी पर चला गया।

सरकार ने इस वक़्त यह बिल पेश क्यों किया जबकि वह जानती थी कि बहुमत नहीं है? क्या सोचा था कि वह विपक्षी सांसदों को तोड़ सकेगी? या मध्य पूर्व के युद्ध में पाकिस्तान को जो कूटनीतिक महत्व मिल रहा है, उससे ध्यान हटाने का प्रयास हो रहा था? भाजपा  के लिए यह समस्या है कि अब प्रमुख मुद्दे नहीं रहे जिनसे वोटर को आकर्षित कर सकें। धारा 370 निरस्त हो चुकी है। अयोध्या में भव्य मंदिर बन चुका है। सीएए जैसे मुद्दे ख़त्म हो चुकें है। हिन्दू-मुस्लिम बहुत हो चुका। अब राजनीतिक लाभ नहीं हो रहा उलटा इससे विदेशों में छवि ख़राब हो रही है। क्या इसलिए अब महिला आरक्षण का जो क़ानून 2023 में पारित हो चुका है को फिर उठा लिया गया, यह जानते हुए कि यह गिर सकता है ?अब विपक्ष, विशेष तौर पर कांग्रेस, को महिला विरोधी कहने और खुद को महिला –चैम्पियन जतलाने का प्रयास किया जाएगा। प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम संबोधन में इसकी शुरुआत कर ही दी है।  कह दिया है कि महिलाएँ ‘इस पाप’ को माफ़ नहीं करेंगी।

अर्थात् अब 2029 के चुनाव के लिए मुद्दा पकड़ लिया गया है। महिला वोटर पर राजनीति केन्द्रित हो सकती है। पहले से महिलाओं के लिए योजनाएँ लाई जा रही है अब इनमें तेज़ी आएगी। पर दिलचस्प है कि टीएमसी को छोड़ कर सब राजनीतिक दल पुरूष प्रधान है। ममता बनर्जी की 38% लोकसभा सांसद महिलाएँ हैं। भाजपा में महिला सांसदों की संख्या उनके कुल का 13% के क़रीब बनता है। लगभग यही 13% अनुपात कांग्रेस में महिला सांसदों का है।सपा का अनुपात 14% है। यह बड़ी पार्टियाँ जो महिला आरक्षण को लेकर सबसे अधिक मुखर हैं, पहले खुद यह अनुपात सही क्यों नहीं करती? यह वादा तो किया जा सकता है कि जब तक कानून नहीं बनता वह 1/3 चुनाव क्षेत्रों से महिला उम्मीदवार खड़ा करेंगी। अगर इच्छा शक्ति हो तो 2023 का महिला आरक्षण क़ानून जो 16 अप्रैल को नोटीफाइड भी हो चुका है, को लागू किया जा सकता है और वर्तमान सांसद संख्या में अगले चुनाव में एक तिहाई महिलाओं को दी जा सकती है। महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ने से पेचीदगी पैदा हो गई है। दोनों बहुत अलग मसले हैं। दक्षिण में इसे लेकर बहुत संशय है। वह समझतें है कि उनकी सीटें कम हो जाएँगी जिस से  भारत संघ में उनका प्रभाव कम हो जाएगा। अभी तक जो आँकड़े सामने आए हैं उनके मुताबिक़ उत्तर भारत में 104 और दक्षिण में 66 सीटें बढ़ सकती है। यह जो अंतर है यह विवाद की जड़ है। तमिलनाडु और तेलंगाना के मुख्यमंत्रियों ने  केन्द्र पर संघीय ढाँचे को ज़बरदस्ती बदलने की कोशिश का आरोप लगाया है।

सबसे उग्र प्रतिक्रिया तमिलनाडु के मुख्यमंत्री मंत्री एमके स्टैलिन की रही है। उन्होंने 1960 के दशक में वहाँ हुए हिन्दी विरोधी आन्दोलन जैसे आन्दोलन की धमकी दी है। दक्षिण के प्रदेश कह रहें हैं कि उन्हें परिवार नियोजन और बेहतर आर्थिक मापदंड का दंड दिया जा रहा है। उनका कहना है कि तमिलनाडु,तेलंगाना, कर्नाटक, केरल और आंध्र प्रदेश ने सोच समझ कर ऐसी राजनीति अपनाई है जिससे जनसंख्या स्थिर हो गई है, सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा और मानवीय विकास बेहतर हुआ है। इसी कारण दक्षिण के प्रदेशों की भारत की प्रगति में योगदान उत्तर भारत के प्रदेशों से अनुपातिक कहीं अधिक है। तमिलनाडु में प्रति व्यक्ति आय बिहार से तीन गुना है। देश का फरटिलिटी रेट (प्रजनन दर)1.9 है, जबकि केरल का उससे भी कम 1.5 है और बिहार का लगभग दोगुना 2.8 है। उत्तर प्रदेश का 2.6 है। बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ दे कर दक्षिण के प्रांतों ने अपनी जनसंख्या कम कर दी वहीं उत्तर भारत के प्रदेशों की चाल अभी बेढंगी है। विकास की जगह कई राज्य साम्प्रदायिक और जातीय राजनीति कर खुश हैं।

हमारी विभिन्नताएँ हमारी ताक़त है। स्थानीय भावनाओं और चिन्ताओं का ध्यान रखने की ज़रूरत है। पर दक्षिण भारत के बारे भी शिकायत आ रही है,जिस तरफ़ शशि थरूर ने भी ध्यान खींचा हैं, कि समृद्धि का फल बहुत असामान्य है। केरल को छोड़ कर बाक़ी प्रदेशों में अमीर और गरीब के बीच खाई कम होने की बजाए बढ़ी है। शासन कमजोर हुआ है। बैंगलुरु जैसा शहर, जहां मैं यह लेख लिख रहा हूँ, तो लगता ही नहीं कि किसी विकसित प्रदेश की राजधानी है। एक समय इसे बागों, झीलों और अच्छी जलवायु वाला शहर माना जाता था। आज वह दिल्ली और मुम्बई के बराबर गर्म है। अनियंत्रित निर्माण, टूटी सड़कें और अराजक ट्रैफ़िक देश की आईटी कैपिटल को शोभा नहीं देता। तीन वर्षों में यहाँ 1करोड़ टू-व्हीलर हो जाएँगे क्योंकि सार्वजनिक परिवहन कमजोर है। जिनका काम स्थिति को दुरुस्त करना है, मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री, उनका सारा ध्यान कुर्सी क़ायम रखने या उसे खींचने पर लगा रहता है।

वर्तमान विवाद के बावजूद परिसीमन का मामला भी महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र ‘एक व्यक्ति,एक वोट,एक मूल्य’ के सिद्धांत पर चलता है। पर यहाँ केरल के एक व्यक्ति की वोट का मूल्य उत्तर प्रदेश के एक व्यक्ति के वोट से बहुत अधिक है। उत्तर प्रदेश की एक लोकसभा सीट में औसत 30 लाख के क़रीब वोटर हैं जबकि केरल के एक चुनाव क्षेत्र में औसत 18 लाख वोटर हैं। यह बहुत बड़ी असमानता है।पिछला परिसीमन 2002 के क़ानून के अंतर्गत किया गया था पर इसमें भी प्रांतों की सीटों में कोई परिवर्तन नहीं किया गया। इसलिए कुछ परिवर्तन की ज़रूरत तो है। पर परिवर्तन का सर्वमान्य फ़ार्मूला क्या हो यह ढूँढना पड़ेगा। बेहतर होगा कि समन्वय क़ायम किया जाए, पर इसके लिए बहुत दयानतदारी और समझदारी की ज़रूरत है। अगर समन्वय नहीं बनता तो बेहतर है कि सीटों को यहाँ ही फ़्रीज़ कर दिया जाना चाहिए। वैसे भी अगर लोकसभा की संख्या 543 से बढ़ा कर 800+ कर दी जाए, तो अंतर क्या होगा? क्या बेहतर बहस होगी? क्या शोरगुल कम हो जाएगा? आजकल तो अधिकतर विधेयक बिना बहस और बिना जाँच के पारित हो रहें हैं। सांसद विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के सदस्य बन चुकें है। वह पब्लिक सरवेंट तो रहे ही नहीं। लगभग 300 और विशेषाधिकार प्राप्त सांसदों को करदाता पर लाद कर देश का क्या भला होगा? यह सोचने की बात है। सबके पास अपनी हूटर बजाती एसयूवी और सिक्योरिटी होगी और जिनकी औलाद सब पर रौब जमाती फिरेगी, ‘तुम जानते नहीं मैं कौन हूँ’?

 जहां वर्तमान मामलों को लेकर बहुत बहस हो रही है याद रखना चाहिए कि एक साल पहले 22 अप्रैल को पहलगाम की बैसरन घाटी में आतंकी हमले में हमारे 26 लोग मारे गए थे। हिन्दू पुरूषों को अलग कर उनकी पत्नि और बच्चों के सामने गोली मार दी गई थी। 2008 के मुम्बई हमले के बाद यह सबसे भयंकर आतंकी हमला था। तीन संदिग्ध आतंकी पिछले साल जुलाई में मारे गए थे। विडंबना यह है कि जिस पाकिस्तान पर हमने हमले का आरोप लगा कर उसके आतंकी केन्द्रों को ‘आप्रेशन सिंदूर’ में नष्ट किया था, आज मध्यपूर्व में शान्ति के लिए मध्यस्थता कर रहा है। इस प्रयास के केन्द्र में फ़ील्ड मार्शल असीम मुनीर हैं जिसे हम आतंक का प्रायोजक मानते है। हमारा अंतराष्ट्रीय प्रभाव डगमगा गया है। हमारे लिए यह नई चुनौती है। मध्य पूर्व के संकट का हमारी अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ रहा है। सूरत रेलवे स्टेशन के वह चित्र बहुत परेशान करने वाले हैं जहां गैस की कमी से पैदा संकट के कारण हज़ारों प्रवासी वापिस घर लौट रहे हैं। पर इनकी चिन्ता किए बिना हम फिर एक और चुनावी-राउंड में व्यस्त हैं।

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About Chander Mohan 815 Articles
Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.