पाकिस्तान में अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता अभी तक बेनतीजा है। इसका एक और प्रभाव भी है जिससे दुनिया चकित हैं और भारत नाखुश है, यह पाकिस्तान को मिली भूमिका है। पाकिस्तान के नेता विशेष तौर पर फ़ील्ड मार्शल असीम मुनीर बहुत सक्रिय हैं और दोनो अमेरिका और ईरान के बीच पुल का काम कर रहें हैं। डानल्ड ट्रम्प तो मुनीर को ‘माई फ़ेवरिट फ़ील्ड मार्शल’ कह चुकें हैं’। मुनीर एकमात्र सैनिक अधिकारी हैं जिसे व्हाइट हाउस में लंच के लिए आमंत्रित किया गया है। पर ईरान का नेतृत्व भी पाकिस्तान के कूटनीतिक प्रयास के बारे कृतज्ञता प्रकट कर चुका है। ईरानियन रैवलयूशनरी गार्ड के साथ मुनीर के घनिष्ठ सम्बंध है। पाक सेना के प्रमुख का महत्व बहुत बढ़ गया है और पाकिस्तान का नागरिक नेतृत्व पीछे पड़ गया है जिसके उस देश, और हमारे लिए, असुखद परिणाम हो सकते है।
इस वक़्त तो हैरानी इस बात की है कि पाकिस्तान जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद का प्रायोजक माना जाता था, शान्ति का प्रयास कर रहा है। इसी देश की एबटाबाद सैनिक छावनी में ओसामा बिन लादेन वर्षों छिपा रहा था। पहलगाम की घटना को मुश्किल से एक साल ही हुआ है पर दुनिया उसे भूल गई है और पाकिस्तान के कथित मध्यस्थता के प्रयास की प्रशंसा हो रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि दुनिया ने पाकिस्तान के आतंकी अतीत को भुला दिया है। पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान जो तीन साल से जेल में हैं और जिसके बारे बताया जा रहा है कि नज़र जा रही है, के बेटे सुलेमान इमरान खान ने कहा है कि, “इन्हें ग्लोबल समुदाय के सामने अपनी छवि को व्हाइट- वॉश करने के मौक़ा मिल गया है”।
दुनिया पहली बार पाकिस्तान को एक प्रकार के शान्ति दूत की भूमिका में देख रही है। यह नया अनुभव है। इस युद्ध से सब तंग है और जो भी इसे रोकने का प्रयास करेगा उसे प्रशंसा मिलेगी ही। पूर्व विदेश सचिव निरुपमा मेनन राव ने लिखा है, “पाकिस्तान की प्रासंगिकता वास्तविक है। उन्होंने अपने भुगोल, सम्बंधों, और राजनीतिक स्थिति का फ़ायदा उठाते हुए खुद को कूटनीति के केन्द्र में स्थापित कर लिया है…पर इनका प्रभाव सीमित है। वह इकट्ठा कर सकतें हैं, संदेशों का आदान प्रदान कर सकते हैं पर यह नहीं तय कर सकते कि नतीजा क्या हो”। वरिष्ठ पाकिस्तानी पत्रकार रज़ा रूमी ने भी लिखा है, “पाकिस्तान की भूमिका की सीमा स्पष्ट है… वह वार्ता करवा सकते हैं पर पालन नहीं करवा सकते”। पाकिस्तान मध्यस्थ कम संदेशवाहक अधिक है, पर वह इस संदेश वाहक की भूमिका से ही संतुष्ट है। आख़िर यह वही देश है जो कुछ वर्ष पहले तक जिसे ‘डॉग-हाउस’ कहा जाता है, में था। अचानक वह लाइमलाइट में आगया है।
यह मानना पड़ेगा कि उन्होंने कूटनीतिक फुर्ती दिखाई है। एक तरफ़ अमेरिका के राष्ट्रपति उनकी प्रशंसा कर रहे हैं तो दूसरी तरफ़ चीन के साथ उनकी ‘लौह-दोस्ती’ है। ईरान के साथ अच्छे संबंध हैं तो साऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता है कि एक पर हमला दूसरे पर हमला समझा जाएगा। पर पाकिस्तान की एक और हक़ीक़त भी है। वह फटेहाल है और उनका नेतृत्व कह चुका है कि ‘हम अंतरराष्ट्रीय भीखमंगे बन चुकें हैं’। जर्जर हालत के कारण मध्य पूर्व का संकट उन्हें बहुत परेशान कर रहा है। वहाँ जो पाकिस्तानी काम कर रहें हैं वह 20 अरब डालर भेजतें हैं। अगर युद्ध अधिक चला तो यह पैसा और लोगों का रोज़गार संकट में पड़ जाएगा। यूएई ने अपना 3 अरब डालर का क़र्ज़ा वापिस माँग कर संकट खड़ा कर दिया था पर पाकिस्तान की कूटनीतिक दक्षता ऐसी है कि सऊदी अरब ने तत्काल 5 अरब डालर का क़र्ज़ा दे कर पाकिस्तान को डूबने से बचा लिया है। पाकिस्तान को अपने पश्चिमी बार्डर की भी चिन्ता है जहां बलूच बाग़ी चुनौती दे रहें हैं और जहां से चीन- पाकिस्तान आर्थिक गलियारा गुजरता है। इसलिए भी वह चाहते हैं कि यह टकराव जल्द से जल्द ख़त्म हो जाए।
इस सारे घटनाक्रम का एक और पहलू भी है, वह हमारा अलगाव है। हमारे पड़ोस में टकराव चल रहा है जो हमारे हितों पर चोट पहुँचा रहा है पर हमारी कोई भूमिका नहीं है। मुरली मनोहर जोशी ने तो माना है कि ‘हम विश्वगुरु थे पर अब नही रहे’।यह क्यों हुआ? इज़राइल के साथ हमारे घनिष्ठ सम्बंध है। वह रक्षा पार्टनर है जबकि ईरान हमारी भुगौलिक हक़ीक़त है। चाहबहार के रास्ते हम मध्य एशिया से समबंध मज़बूत करना चाहते थे पर हम एक तरफ़ झुक गए और ईरान का विश्वास खो बैठे। जब अयातुल्ला खामेनेई की मौत हुई तो हमने शोक भी प्रकट नहीं किया। ऐसा प्रतीत होता था कि हम अमेरिका और इज़राइल को खुश रखना चाहतें हैं पर हमें मिला क्या? 50% टैरिफ़ और अब ट्रम्प ने भारत और चीन को ‘हैल-होल’ अर्थात् नरक- कुंड कह दिया है। ईरान पर हमले के बारे हमारी शुरुआती खामोशी ने बहुत नुक़सान किया है। मुनीर को गोद में बैठाते समय ट्रम्प ने हमारी भावनाओं की चिन्ता नहीं की। आशा है कि प्रधानमंत्री मोदी अब इस बदतमीज़ शक्स को ‘माई फ़्रेंड’ कहना बंद कर देंगे।वह किसी के दोस्त नहीं है, जो बात पाकिस्तान को नेतृत्व को भी पता लग जाएगा। ट्रम्प ‘यूज़ एंड थ्रो’ में विश्वास रखतें हैं।
एक और कारण है कि विश्व राजनीति की ज़मीन बदल गई है। पहले चीन के साथ अमेरिका का टकराव प्रमुख विवाद था जिसके लिए अमेरिका को हमारी ज़रूरत थी। क्वाड को इतना महत्व इसीलिए दिया गया था पर अचानक ट्रम्प की दिलचस्पी बदल गई। वह अगले महीने चीन जा रहें हैं और उनकी कोशिश है कि चीन के साथ व्यवहारिक रिश्ता क़ायम हो सके। चीन ने भी अपने पत्ते बहुत अच्छी तरह से खेलें है। ट्रम्प की कलाबाज़ियों के कारण चीन का प्रभाव बढ़ा है। जहां तक क्वाड का सवाल है, दो साल से शिखर सम्मेलन नहीं हुआ। यह भारत में होना है पर सम्भावना नज़र नहीं आती। किसी को इस संगठन में दिलचस्पी नही लगती। हडसन इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ विशेषज्ञ कैन मोरियासू ने लिखा है कि “क्वाड मर चुका है क्योंकि महाशक्तियों की स्पर्धा इंडो-पैसिफ़िक से हट चुकी है और यूरो-एशिया की तरफ़ चले गई है”।
भारत का महत्व ख़त्म नहीं हुआ पर इस समय यह कम हो गया है क्योंकि गेम बदल गई है। युद्ध को लेकर जो ज़बरदस्त कूटनीति चल रही है, उसमें हमारी कोई भूमिका नहीं है। पूर्व विदेश सचिव और राजदूत विवेक काटजू ने एक इंटरव्यू में कहा है कि, “हमे इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वह लम्हा जब टैरर सबकी प्राथमिकता थी, निकल गया है। पश्चिम के देशों को आतंकवाद से कोई ख़तरा नहीं है”।उनकी बात सही है। अल क़ायदा जैसे संगठन जो पश्चिमी देशों पर हमला करते थे, ख़त्म हो चुकें है। हमास, हिज़बुल्ला मध्य पूर्व तक सीमित हैं। पाकिस्तान ने भी सबक़ सीख लिया। वह हमारे ख़िलाफ़ आतंक जारी रखेगा पर पश्चिमी देशों को निशाना नहीं बनाएगा। वह यह रोना रो रहें हैं कि ‘हम तो खुद आतंक का शिकार हैं’।
इस सब का हमारे लिए क्या मायने है? एक, दुनिया को हमारी शिकायतों में दिलचस्पी नहीं रही। वह केवल यह चाहतें हैं कि भारत और पाकिस्तान का टकराव नियंत्रण से बाहर न निकल जाए क्योंकि दोनों परमाणु शक्तियाँ हैं। दुनिया युक्रेन और ईरान के युद्ध में व्यस्त है, हमें तवज्जो नहीं मिल रही। हमें नई नीति बनानी होगी और दुनिया को स्पष्ट करना होगा कि अगर हम पर आतंक का वार होता है तो हमें मजबूरन जवाब देना पड़ेगा। मोदी सरकार कह ही चुकी है कि हम पर आतंकी हरकत को ‘एक्ट ऑफ वॉर’ समझा जाएगा। और इसकी सम्भावना के रदद नहीं किया जा सकता। इतिहास को याद रखना चाहिए। 1971 में निक्सन के विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर चुपचाप पाकिस्तान से चीन गए थे जिसके बाद अमेरिका और चीन के सम्बंध बेहतर हो गए और पाकिस्तान को यह ईनाम मिला कि उसके परमाणु कार्यक्रम के प्रति पश्चिम ने आँखें मूँद लीं। उसी के बाद हमारे ख़िलाफ़ आतंकी घटनाओं की बाढ़ आ गई। इस बार पाकिस्तान अमेरिका और ईरान को आमने सामने लाने में सफल रहा है। देखना है कि इस बार उन्हें क्या ईनाम मिलता है?
एक दबंग पाकिस्तान हमारे लिए समस्या खड़ी कर सकता है। अमेरिका के पूर्व राजदूत कैनेथ जसटर ने कहा है, “अगर भविष्य में पाकिस्तान की तरफ़ से कोई आतंकी हमला होता है तो भारत को अपनी प्रतिक्रिया सीमित करनी पड़ सकती है क्योंकि पाकिस्तान के ट्रम्प की अमेरिका के साथ अच्छे हैं”। ट्रम्प के आशीर्वाद से पाकिस्तान अपना परमाणु ज़ख़ीरा बढ़ा सकता है। पाकिस्तान के खिलाफ अमेरिकी सहयोग की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। अपनी विदेश नीति और प्रासंगिकता को फिर से तय करने का समय आगया है। इस वर्ष भारत में ब्रिक्स सम्मेलन है पर वहां से भी अच्छे समाचार नहीं आ रहे कि हम बहुमत की राय से अलग हैं। हमारे लिए यह निर्णायक क्षण है। हमें अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को क़ायम रखना है और यह संदेश नहीं देना कि हमने अपनी पारम्परिक तटस्थता छोड़ दी हैं। दूसरा, यह भी निश्चित करना है कि हमारी खामोशी हमारे सिद्धांतों और आस्थाओं से अधिक ऊँची सुनाई न दे।