मक्का समझौता’ और भारत, Mecca Pact And India’s Splendid Isolation,

तीन इस्लामी देशों, साऊदी अरब-तुर्किये-पाकिस्तान, के बीच इस्लाम के पवित्र शहर मक्का में हुऐ रक्षा समझौते ने पहले से अस्थिर मध्य पूर्व में और हलचल पैदा कर दी है। पश्चिम में इसे ‘इस्लामिक नाटो’ कहा जा रहा है। इस समझौते के तहत किसी भी एक देश पर हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। ऐसा ही लगभग नाटो का सिद्धांत है। इसे ‘इस्लामिक नाटो’ कहना सही नहीं है क्योंकि यह तीन सुन्नी देशों का गठबंधन है जो शिया ईरान की बढ़तीं महत्वाकांक्षा और यहूदी इज़रायल की आक्रामकता से आतंकित हैं। फ़रवरी में शुरू हुई जंग से मध्य पूर्व में जो उथल पुथल हो रही है उसी ने इस गठबंधन को प्रेरित किया है। अमेरिकी हमले के जवाब में ईरान और उसके हूती सहयोगियों ने खाड़ी के उन देशों को निशाना बनाया जहां अमेरिकी अड्डे हैं। साऊदी अरब और यूएई विशेष तौर पर निशाने पर रहें है।

यह तीन देश देख रहें हैं कि ईरान न हार्मुज पर अपना नियंत्रण छोड़ रहा है और न ही अपना परमाणु कार्यक्रम ही त्यागने को तैयार है। इस गठबंधन के पीछे न केवल ईरान के बढ़ते रुतबे की चिन्ता है बल्कि यह भावना भी है कि अमेरिका अब भरोसेमंद ताक़त नहीं रहा और वह उस क्षेत्र में सुऱक्षा देने में असमर्थ है इसलिए अपनी हिफ़ाज़त खुद करनी है। साऊदी अरब अमेरिका की सुरक्षा छतरी के नीचे है पर इसके बावजूद वह देश अपने महत्वपूर्ण इन्फ़्रास्ट्रक्चर जिसमें तेल और गैस उत्पादन शामिल है, को ड्रोन और मिसाइलों की मार से नहीं बचा सका। पूर्व राजदूत गौतम बमबावाला ने लिखा है, “खाड़ी के साऊदी अरब जैसे देश वाशिंगटन द्वारा उनकी रक्षा करने के बारे संदेहपूर्ण हैं…अमेरिका को उस क्षेत्र में प्रमुख शक्ति नहीं देखा जाता जो सुरक्षा की गारंटी दे सके। इसलिए अंकारा, रियाद और इस्लामाबाद… अपनी गारंटी तैयार कर रहें है”।

पाकिस्तान और तुर्किये का सहारा लेकर साऊदी अरब यह संदेश दे रहा है कि क्षेत्रीय शक्तियां अपने क्षेत्र को सम्भाल सकती हैं। साऊदी अरब, जो इस गठबंधन की प्रेरणा लगता है,देख रहा है कि अरब देशों की तेल-दौलत के बावजूद इस क्षेत्र में तीन ग़ैर अरब देशों, इज़रायल, ईरान और तुर्किये का प्रभाव बढ़ रहा है। साऊदी अरब ख़ुद को मुस्लिम जगत का लीडर समझता रहा है, आख़िर वह पवित्र मुस्लिम धार्मिक स्थानों के संरक्षक है। मुस्लिम जगत के चौधरी पद को लेकर उनमें और तुर्कियों में खटपट रही है। कि अब साऊदी अरब को तुर्किये के साथ गठबंधन करना पड़ रहा है ही बताता है कि खाड़ी के संकट से वह किस कदर विचलित है। पिछले साल साऊदी अरब ने पाकिस्तान के साथ रक्षा समझौता किया था पर उसे पर्याप्त नहीं समझा गया इसलिए तुर्किये को शामिल किया गया है।

 दशकों से साऊदी अरब और पाकिस्तान में सैनिक सांझेदारी है। पाकिस्तान साऊदी अरब सेना को ट्रेनिंग देता है और शाही परिवार की सुरक्षा को देखता है पर जब 2015 में साऊदी अरब और यमन के बीच युद्ध हुआ और साऊदी ने सैनिक सहायता माँगी तो पाकिस्तान संसद ने युद्ध में तटस्थ रहने का प्रस्ताव पारित कर दिया। तब से लेकर अब तक पाकिस्तान की हालत बदतर हुई है। उनकी अर्थव्यवस्था दूसरी सरकारों की भीख पर आश्रित है। पिछले साल साऊदी अरब ने पाकिस्तान को 3 अरब डालर दिया था। इस साल फिर 3 अरब डालर दे कर उस देश को डूबने से बचाया गया। इसके अतिरिक्त साऊदी अरब से प्रवासी पाकिस्तानी वार्षिक 10अरब डॉलर घर भेजतें हैं। यह सब साऊदी अरब को पाकिस्तान की नीति प्रभावित करने का हथियार देता है।

इस समझौते में साऊदी अरब का आर्थिक वजन सबसे अधिक है। उनके पास तेल और गैस की सम्पदा है। तुर्कियों को पास आधुनिक टेक्नोलॉजी, बड़ी सेना और उन्नत ड्रोन और रक्षा उद्योग है। वह नाटो के सदस्य हैं। पाकिस्तान मुस्लिम जगत का एक मात्र परमाणु हथियार सम्पन्न देश है। दिलचस्प है कि तीनों का कोई साँझा दुष्मन नहीं है। साऊदी के लिए ईरान है, पाकिस्तान के लिए भारत और अफ़ग़ानिस्तान और तुरकिये के लिए ग्रीस और आर्मीनिया। लेकिन इससे भी अधिक उन्हें इज़राइल का भूत सता रहा है जिसने मध्य पूर्व में आतंक फैलाया हुआ है। वह अघोषित परमाणु ताक़त भी है। कल को अगर वह साऊदी अरब पर हमला करता है या तुर्किये पर हमला करता है, तो क्या दूसरे दो देश इज़राइल के खिलाफ सैनिक कार्रवाई करेंगे यह जानते हुए कि वह बराबर बदला लेगा?

इस्लाम और यहूदी राज्य सदा से ही एक दूसरे के जानी दुश्मन हैं। मिस्त्र पहले ही इसराइल से समझौता कर चुका है इसलिए उस कथित इस्लामी नाटो मे शामिल नहीं हुआ। पाकिस्तान की भूमिका दिलचस्प है। वह कंगाल देश हैं। डानल्ड ट्रंप ने जरूर उनका प्रभाव बढ़ा दिया है और आसिम मुनीर को अपना ‘फेवरेट फ़ील्ड मार्शल’ कहा है पर पाकिस्तान मध्य पूर्व में समझौता करवाने में असफल रहा है। दूसरा, जो भी अस्थायी अंतराष्ट्रीय प्रतिष्ठा मिली है वह आंतरिक क्षय को छिपा नहीं सकती। पाकिस्तान को सदा ही माई-बाप की तलाश रहती है जो उसे डूबने से बचाए। पर उनकी कूटनीतिक दक्षता माननी पड़ेगी कि इस वक़्त वह अमेरिका और चीन दोनों की गुड़ बुक्स में हैं। और अब इस नए क़रार से उसको और महत्व मिल गया है। पूर्व जनरल सैयद अता हसनैन ने सही कहा है कि “पाकिस्तान अपनी राजनीतिक हैसियत से ऊँचा दर्जा चाहता है…यह समझौता उसे दक्षिण एशिया में सुरक्षा ढाँचे में भूमिका प्रदान करता है”।

इस समय पाकिस्तान बलूचिस्तान और खैबर पख़्तूनखवा में बाग़ियों से निबट रहा है। पीओके में चुनाव में धांधली और इस्लामाबाद के कठोर नियंत्रण के कारण कई सप्ताह से आंदोलन चल रहा है। सैनिक कार्रवाई में 80-90 लोग मारे जा चुकें हैं। लोगों में अंसंतोष बढ़ रहा है पर मुनीर अपना प्रभाव बढ़ाने में लगे हैं जिस पर जमात-ए-उलमा के चीफ़ मौलाना फजलुर रहमान ने चेतावनी दी है कि लगातार दमन, खून खराबा और संसदीय शक्तियां एक सैनिक व्यक्ति में केन्द्रित करने से 1971 जैसे हालात बन सकते हैं। ईरान ने भी इस मक्का समझौते को पसंद नहीं किया। प्रमुख ईरानी अख़बार केयहान ने पाकिस्तान की आलोचना करते हुए लिखा है कि उसकी ईरान और अमेरिका के बीच ईमानदार मध्यस्थ की भूमिका संदिग्ध है।  

भारत के लिए इस मक्का समझौते का क्या मतलब है? इसको लेकर राय विभाजित है। एक बात तो साफ़ है कि यह हमारे ख़िलाफ़ नहीं है। यह इज़राइल और ईरान को सीमित करने के लिए किया गया है। यह भी उल्लेखनीय है कि अंतिम बार जब आपसी समझौते के कारण किसी देश ने दूसरे पर हमला किया था वह 1939 में था जब जर्मनी द्वारा पोलैंड पर हमले के बाद ग्रेट ब्रिटेन ने हिटलर की जर्मनी पर हमला कर दिया था। साऊदी अरब के साथ हमारे अच्छे सम्बंध हैं। वह देश भारत में लगातार निवेश कर रहा है। सामरिक विशेषज्ञ सी. राजा मोहन का तो मानना है कि पाकिस्तान साऊदी अरब का पार्टनर कम और चाकर अधिक है। वहां 25 लाख भारतवासी रहते हैं जो उनकी अर्थव्यवस्था को गति देतें हैं। भारत के साथ उनका कोई टकराव भी नहीं है। पर यह देखने की बात होगी कि अगर कल को पाकिस्तान की तरफ़ से किसी आतंकी हमले के जवाब में भारत आपरेशन सिंदूर जैसी कार्रवाई करता है तो साऊदी अरब का रवैया क्या होगा?

लेकिन यही तुर्किये के बारे निश्चित नहीं कहा जा सकता। उनके राष्ट्रपति रेसेप एदरोगन का हमारे प्रति रवैया विरोधी रहा है। कश्मीर के बारे भी वह आगे आकर पाकिस्तान का पक्ष लेते रहें हैं। इसलिए किसी भावी भारत-पाकिस्तान टकराव में वह पाकिस्तान की तरफ़ से दखल दे सकतें हैं। आपरेशन सिंदूर के दौरान भी तुर्किये और चीन ने पाकिस्तान को ड्रोन और दूसरे हथियार सप्लाई किए थे। अब भी समाचार है कि उस देश से पाकिस्तान को लगातार ड्रोन सप्लाई हो रहें हैं। हमारे लिए यह भी चिन्ता का समाचार है कि बांग्लादेश भी इस मक्का गठबंधन में शामिल होने की सोच रहा है, जो उनके प्रधानमंत्री के सलाहकार हमायूं कबीर ने कहा भी है। हमारा असुविधा डानल्ड ट्रंप नें भी बढ़ा दी है जिन्होंने इस मक्का समझौते का स्वागत किया है। इससे पाकिस्तान और दुस्साहसी हो सकता है। पूर्व नौसेना अध्यक्ष एडमिरल अरुण प्रकाश ने कहा है कि “मक्का समझौते ने इस उपमहाद्वीप में शक्ति संतुलन को अस्थिर कर दिया है। इससे इस्लामाबाद में बैठे गर्म ख्याली प्रेरित हो सकते हैं।“

 यह समझौता हमारे पड़ोस में हो रहा है जिसमें हमारे हित जुड़े हैं। इन्हीं समुद्री रास्तों से हमारा व्यापार होता है। यह भी आभास है इस वक़्त भारत का इज़राइल को छोड़ कर कोई मित्र नहीं है। रूस अपना फँसा हुआ है और ट्रंप का अमेरिका अविश्वसनीय है। भारत में अमेरिका के राजदूत ने ज़रूर कश्मीर को ‘भारत का अहम हिस्सा’ कहा है पर कल को ट्रंप क्या पैंतरा बदलतें हैं कोई नहीं कह सकता। यह भी उल्लेखनीय है कि उन्होंने कश्मीर को ‘भारत का अभिन्न अंग’ नहीं कहा, जो परिभाषा हमें पसंद है। इन तीन देशों को पीछे चीन भी है जो नहीं चाहता कि भारत तरक़्क़ी करे। भारत इस समय असामान्य तौर पर अकेला खड़ा है। हमें अपनी सुरक्षा का इंतज़ाम ख़ुद करना है क्योंकि हम किसी सैनिक गठबंधन में शामिल होने को तैयार नहीं। हमें आधुनिक टेक्नोलॉजी पर ज़ोर देना चाहिए जिसमें हम अभी पीछे हैं। ध्यान में रखना चाहिए कि देश की आर्थिक हैसियत और आंतरिक हालत भी उतना ही महत्व रखती है जितना सैनिक ताक़त रखती है। अगर बाहर की चुनौतियों का सामना करना है तो देश के अंदर जो घमासान मचा है इसे सम्भालना बहुत ज़रूरी है।

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Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.