अकाली-भाजपा: कौन बैल, कौन गाड़ी, Which Way Will Punjab Go?

अकाली-भाजपा या भाजपा-अकाली, या दोनों में से कोई भी नही? जब से पंजाब में यह सुगबुगाहट शुरू हुई है कि शिरोमणि अकाली दल और भाजपा फिर इकट्ठे आ सकते है यह चर्चा भी गर्म है कि इस गठबंधन की बैल-गाड़ी में इस बार बैल कौन और गाड़ी कौन होगा? 1997 से लेकर 2022 तक जो 6 चुनाव हुए हैं उनमें तीन बार शिअद ने भाजपा के साथ मिल कर सरकार बनाई है और हर बार बैल, अर्थात् सीएम, शिअद का ही रहा है। पंजाब को आतंकवाद के काले युग से निकालने में इस बैल-गाड़ी का बड़ा योगदान रहा है। भाजपा 117 में से केवल 23 चुनाव क्षेत्रों पर ही चुनाव लड़ती रही है। एक बार अवश्य प्रदेश भाजपा ने अपना विस्तार करने के लिए हाईकमान से गुज़ारिश की थी पर अरुण जेतली ने यह कह कर बैठा दिया कि ‘तुम्हारी औक़ात क्या है’? उसके बाद से प्रदेश भाजपा ख़ामोश ही रही है। अब तक। अब बहुत कुछ बदल चुका है। केन्द्र में भाजपा की सरकार है और वह लगातार प्रादेशिक चुनाव जीत रहें हैं। दूसरी तरफ़ शिअद का पतन नहीं रूक रहा। इसलिए अगर अब गठबंधन होता है तो भाजपा जूनियर पार्टनर बनने को तैयार नहीं है।

अकाली दल के लिए पिछला कुछ समय किसी दुःस्वप्न से कम नहीं रहा। हाल ही में सुखबीर बादल पर नांदेड़ में हमला हो कर हटा है। 2015 का बेअदबी प्रकरण उनका पीछा नहीं छोड़ रहा। 20 महीने पहले उन पर अमृतसर में स्वर्ण मंदिर के बाहर हमला हुआ था। तब वह अकाल तख़्त द्वारा दी गई ‘तनख़्वाह’ भुगत रहे थे। अकाली दल के प्रधान के लिए यह किसी धर्म संकट से कम नही। लोगों के बीच जाना उन की मजबूरी है क्योंकि पार्टी के वजूद का सवाल है। पर न मालूम भीड़ में कौन बदला लेने के लिए बैठा है? समस्या और भी है। शिअद को पंथक और सिख वोट के लिए दूसरी सिख पार्टियों से गम्भीर चुनौती मिल रही है जो शिअद के गिरते वोट से भी पता चलता है। 2024 के लोकसभा चुनाव में पंजाब की केवल नौ विधानसभा सीटों पर ही शिअद पहले नम्बर पर रहा है। सिख राजनीति में शिअद को खडूर साहिब से सांसद अमृतपाल सिंह की ‘वारिस पंजाब दे’ से गम्भीर चुनौती मिल रही है। सुखबीर बादल जरूर ‘वारिस पंजाब दे’ को ‘वायरस’ कहते हैं, पर जेल से ही अमृतपाल सिंह का जीतना बताता है कि उनका प्रभाव है।

अकाली दल का पतन पंजाब के लिए अच्छी खबर नहीं है। वह मॉडरेट अर्थात् नरम सिख पार्टी है। उनका अपना इतिहास है। पर परिवारवाद, भ्रष्टाचार और कई लापरवाहियों के कारण सिख अवाम उनसे दूर चला गया है। दोबारा प्रासंगिक बनने के लिए ही वह भाजपा के साथ गठबंधन के लिए हाथ पैर मार रहें है। कैप्टन अमरेंद्र सिंह और सुनील जाखड़ जैसे कांग्रेस से इम्पोर्ट किए नेता इस गठबंधन की वकालत कर रहें है। भाजपा के कई पुराने नेता भी इसके वकील हैं। उनका मानना है कि शिअद की सिख और पंथक वोटर में लोकप्रियता और भाजपा के शहरी समर्थन से प्रभावशाली गठबंधन बन सकता है। समस्या है कि शिअद की सिखों में लोकप्रियता संदिग्ध है और भाजपा का अपना आधार सीमित है। भाजपा हाईकमान क्या चाहता है कोई नहीं जानता पर केन्द्रीय नेतृत्व को यह ध्यान जरूर देना चाहिए कि यहां फिर उग्रवादियों के पैर न जम सकें। अतीत से यही सबक है कि पंजाब में एक बार भावनाओं को बेलगाम कर दिया जाए तो उन्हें नियंत्रित करना बहुत मुश्किल रहता है। भावनात्मक मुद्दे कोई ऑन -ऑफ बटन नहीं है जो चुनाव के आसपास इस्तेमाल किए जा सकतें हैं। कांग्रेस बहुत बड़ी क़ीमत चुका चुकी है।

दूसरी तरफ़ भाजपा छलाँग लगाने की तैयारी कर रही है, कम से कम यह प्रभाव दे रही है कि वह छलाँग लगाने जा रही है। पर यह होगा कैसे? क्या भाजपा के पास 117 उम्मीदवार भी हैं कि वह सरकार बनाने जा रहें हैं? यह पश्चिम बंगाल नहीं है जहां वोट का ध्रुवीकरण किया जा सकता है। कोई हिन्दू- मुस्लिम मुद्दा नहीं है। कोई घुसपैठियों का सवाल नहीं है। पंजाब के मुद्दे और हैं जिनमें किसानों के मुद्दे, ड्रग्स, पंथक मुद्दे, बेरोज़गारी और बदलती जनसंख्या का मुद्दा है। हमारा यूथ कनाडा, आस्ट्रेलिया क्यों भाग रहा है? यह सवाल भी उठता है कि इस केन्द्रीय सरकार ने पंजाब को क्या दिया है? जहाँ तक नशे का मामला है भाजपा के नेता कहतें हैं कि वह इसे ख़त्म कर देंगे पर जिस वक़्त बड़ी मात्रा में इसकी शुरूआत हुई थी तो अकाली दल के साथ भाजपा गठबंधन में शामिल थी। उन्होंने तब आवाज़ नहीं उठाई।

क्या भाजपा के पास पंजाब की समस्याओं का कोई इलाज है? वह लगातार दूसरी पार्टियों से सिख नेता आयात कर रहें हैं। प्रदेश अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों खुद कांग्रेस से लाए गए हैं। इससे पहले सुनील जाखड़ भी पूर्व कांग्रेसी है। क्या पार्टी के पास अपने नेतृत्व का दिवालियापन है कि दूसरी पार्टियों से लोगों को खींचा जा रहा है? अकाली दल का दूसरा रूप बनने की कोशिश में भाजपा बीच मँझधार गिर सकती है क्योंकि परम्परागत आधार विमुख हो सकता है। क्या लोग नहीं देख रहे कि जिन को इम्पोर्ट किया गया है उनका एकमात्र मक़सद दिल्ली की मदद से सत्ता के नज़दीक आना है? पंजाब के हित के लिए वह पार्टी नहीं बदल रहें।

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों ने नया शोशा छोड़ा है। वह पंजाब में महाराजा रणजीत सिंह की ‘सरकार-ए-खालसा’ की स्थापना चाहतें हैं। दुनिया एआई को लेकर आगे बढ़ रही है और यह सज्जन पंजाब को महाराजा रणजीत सिंह के जमाने में लेकर जाना चाहतें हैं। निःसंदेह महाराजा रणजीत सिंह महान महाराजा थे। उनके शासन में सब बराबर थे। दरबार में हिन्दू और मुसलमान सब मंत्री थे। उनका शासन अफ़ग़ानिस्तान में ख़ैबर दर्रे तक फैला हुआ था। लेकिन वर्तमान में कौन दूसरा महाराजा रणजीत सिंह इन्हें नज़र आ रहा है? न वह इतिहास है, न वह भूगोल है, न वैसा कोई व्यक्तित्व ही है।महाराजा रणजीत सिंह की राजधानी तो लाहौर थी। उनका शासन एक आज़ाद शासन था। क्या केवल सिंह ढिल्लों पंजाब में ऐसा आज़ाद शासन स्थापित करना चाहतें हैं? अगर वह कहें कि वह महाराजा रणजीत सिंह की तरह पक्षपातहीन और बराबरी का शासन क़ायम करना चाहतें है तो भी समझ आता है। पर यह ‘सरकार-ए-खालसा’ की स्थापना तो आपत्तिजनक है। क्या इसमें कोई ग़ैर सिख सीएम नहीं बन सकेगा? आख़िर महाराजा रणजीत सिंह का शासन था तो सिख शासन।

केवल सिंह ढिललों का सुझाव भारत के संविधान की उल्लंघना है। हमें तो अच्छी ‘सरकार-ए-संविधान’ चाहिए जिस ओर भाजपा को कदम उठाना चाहिए। यह भी याद रखिए कि महाराज रणजीत सिंह के देहांत के दस वर्ष में ही उनका साम्राज्य बिखर गया था और पंजाब अंग्रेजों का एक प्रांत बन गया था। लगता है ढिल्लों ने पंजाब के हाल के इतिहास से कुछ नहीं सीखा। पिछली बार जब धर्म और राजनीति का घालमेल किया गया था तो यह विनाशक रहा था। बेहतर होगा कि भाजपा इसमें कदम न रखे नही तो यह सवाल भी उठेगा कि भाजपा है क्या, हिन्दुत्व पार्टी, या पंथक पार्टी या सैक्युलर? क्या आपने संविधान के मुताबिक़ चलना है या नेताओं की मनमर्जी के मुताबिक़? और क्या आपके पास वर्तमान में बताने के लिए कुछ नहीं है कि आप पीछे महाराजा रणजीत सिंह के युग में जाना चाहते हो? यह भी उल्लेखनीय है कि चाहे भाजपा लगातार सिख मसलों को उठाती आ रही है लेकिन इससे इनका वोटर आधार नहीं बढ़ा। पिछले विधानसभा चुनाव में इन्हें केवल 2  सीटें और 6.6% वोट ही मिला था। लोकसभा चुनाव में वोट जरूर 18% हो गया पर सीट कोई नहीं मिली। क्या इसका कारण यह है कि पंजाबी राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा की नीतियों को पसंद नहीं करते?

जिस पार्टी को पिछली बार केवल 2 सीटें मिली थी वह इतनी छलांग कैसे लगाएगी कि बहुमत मिल जाए और महाराजा रणजीत सिंह जैसा शासन दे सकें? पंजाब की राजनीति  रोजमर्रा के मामलों पर केन्द्रित है। राजनीतिक विश्लेषक जगरूप सिंह सेखों ने भी कहा हैकि “लोग अब भावनात्मक मुद्दों पर वोट नहीं देते। उन्हें रोड मैप चाहिए और नतीजे चाहिए”।  

भाजपा की जो वैचारिक अस्पष्टता है उससे उसका नुक़सान होगा क्योंकि दोनो आप और कांग्रेस स्थिति का फ़ायदा उठाने को तैयार हैं। कांग्रेस को शासन विरोधी भावना का फ़ायदा हो सकता था पर प्रादेशिक नेतृत्व में जो गृह युद्ध चल रहा है उसने इनकी सम्भावना को सीमित कर दिया है। कई महीने से यह गृह युद्ध चल रहा है पर राहुल गांधी ने इसे समाप्त करने का कोई सार्थक प्रयास नहीं किया। राहुल गांधी का सारा ध्यान केन्द्रीय सरकार को कमज़ोर करने पर लगा हुआ है पंजाब पर तवज्जो देने के लिए समय नहीं है। यह भी उल्लेखनीय है कि प्रदेश कांग्रेस के शिखर पर चार पांच सिख नेता लड़ रहें हैं जबकि कांग्रेस सदैव शहरी हिन्दू वोट के बल पर जीतती है। हिन्दू वोट के प्रति काँग्रेस और भाजपा की बेरुख़ी को आप का नेतृत्व भाँप गया है। उनकी नज़र लगभग 38% हिन्दू वोट पर है जिसका 45 विधानसभा क्षेत्रों में प्रभाव है। पार्टी कई जगह ‘एक शाम भगवान शिव के नाम’ भजन संध्या का आयोजन कर चुकी है। और भी हिन्दू धार्मिक समारोह आयोजित किए जा रहें है। आप को यह भी फ़ायदा है कि सरकार के खिलाफ, या भगवंत मान के खिलाफ कोई बड़ा नकारात्मक नहीं है, जैसा पिछली कांग्रेस और अकाली-भाजपा सरकारों के खिलाफ था। पर अभी चुनाव में छह महीने है और कहा जाता है कि राजनीति में तो एक सप्ताह भी बहुत लम्बा समय होता है।

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Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.