ब्रिक्स और बेहाल दुनिया, BRICS And Troubled World

नई दिल्ली के भव्य भारत मंडपम में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में सर्वसम्मति से घोषणा पत्र अपनाया गया। लगता है कि जो लज़ीज़ शाकाहारी भोजन परोसा गया वह काम कर गया! रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में भीषण टकराव, भारत और चीन के बीच मतभेद, यूएई और ईरान के बीच ड्रोन और मिसाइल हमले, और व्हाइट हाउस में बैठे डानल्ड ट्रंप की चिढ़ के बीच आम सहमति बनाना भारतीय कूटनीति की बड़ी सफलता है। वैसे हैरान भी नहीं होना चाहिए क्योंकि हमारा सदियों का कूटनीतिक अनुभव है। बड़ा संदेश अमेरिका के लिए है कि मनमाने टैरिफ़ और प्रतिबंध का विरोध हो रहा है। विश्व व्यवस्था में पश्चिम का विकल्प भी खड़ा हो सकता है।

140 पैराग्राफ़ वाले साँझे बयान में पिछले साल अप्रैल में पहलगाम में हुए आतंकी हमले की निन्दा की गई और कहा गया कि ‘देश समर्थित सीमा-पार आतंकवाद’ को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह न केवल पाकिस्तान बल्कि चीन जिसने ओपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान की हर मदद की थी,के लिए संदेश है। पश्चिम एशिया पर कई सदस्यों के गम्भीर मतभेदों के बावजूद संगठन ने एक आवाज में ‘अत्याधिक संयम’ और कूटनीतिक प्रयासों की वकालत की है।   

सबसे असुखद स्थिति इज़रायल की बनी है जिसे एक प्रकार का अंतरराष्ट्रीय खलनायक समझा जा रहा है। इज़रायल द्वारा ईरान पर हमले से 48 घंटे पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इज़राइल में थे। हवाई अड्डे पर उनका बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया गया। उन्हें और इज़रायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू को जप्फी डाले देखा गया। प्रधानमंत्री के वहां से लौटते ही इज़रायल ने ईरान पर हमला कर दिया गया और उनके सुप्रीम लीडर आयतुल्ला खामेनेई की हत्या कर दी गई। भारत अपने पड़ोसी देश पर इस हमले के बारे शुरू में ख़ामोश रहा। देश में आलोचना के बाद भारत सरकार कुछ जागी। धीरे धीरे यह अहसास भी हो रहा है कि हमले के बारे प्रधानमंत्री मोदी को अंधेरे में रख कर इजराइली प्रधानमंत्री ने धोखा किया है।

इसीलिए मध्यपूर्व पर भारत की नीति बदल रही है। किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में एससीओ शिखर सम्मेलन में भी प्रधानमंत्री मोदी की उपस्थिति में भारत ने चुपचाप उस घोषणापत्र पर हस्ताक्षर कर दिए जिसमें ईरान पर हमले की निन्दा की गई थी। ईरान के प्रति भारत का रवैया बदला है। दिल्ली सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ईरान के राष्ट्रपति पेजेशिकयान का हाथ पकड़ कर चल रहे थे। पेजेशिकयान एकमात्र महमान है जिनकी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ मुलाक़ात करवाई गई। खुद को अमेरिका-इज़रायल कैम्प का सदस्य बना कर भारत ने ग्लोबल साउथ में अपनी नैतिक आवाज़ खो दी थी। नेतन्याहू के धोखे और ट्रंप के अहंकार ने हमारी कूटनीतिक आँखें खोल दी हैं। जिस प्रकार अब अमेरिका ने ‘मिस्टर सिंह’ पोस्टर निकाल कर सिख ट्रक ड्राईवरों को निशाना बनाया है उससे समझ आ जानी चाहिए कि जब तक डानल्ड ट्रंप व्हाइट हाउस में हैं, कोई आशा नहीं है। हम अमेरिका के विरोधी नहीं बनने वाले क्योंकि अमेरिका के बिना गुज़ारा नहीं है। हम ब्रिक्स को अमेरिका विरोधी संगठन भी नहीं बनने देना चाहते। पर हम पहले से अधिक तटस्थ बन रहे हैं। हम बहुपक्षीय कूटनीति पर चलते हैं जबकि पुतिन अमेरिका को लताड़ना चाहतें हैं और शी जिनपिंग चीन को अमेरिका का बराबर दिखाना चाहतें है।

रूस के राष्ट्रपति बलाडीमीर पुतिन ने दिल्ली में कहा है कि पिछले पांच वर्षों में वैश्विक जीडीपी में ब्रिक्स का योगदान 40% है और पश्चिम के संगठन जी- 7 का 29% है। भारत ऐसी तुलना से दूर रहता है।  अमेरिका हमारा दूसरा सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है जिसके साथ व्यापार का संतुलन 58.4 अरब डालर हमारी तरफ़ झुका हुआ है। दोनों चीन और रूस के साथ हमारा भारी ट्रेड घाटा है। चीन के साथ यह 112 अरब डालर है तो तेल की भारी ख़रीद के कारण रूस के साथ यह 59 अरब डालर है। चीन के साथ व्यापार घाटा कम होने की जगह हर साल बढ़ता जा रहा है जो हमारी बड़ी असफलता है। रूस निर्मित माल का बड़ा बाज़ार है। वह चीन से 100 अरब डालर का आयात करतें हैं पर भारत के माल को उस स्तर का नहीं समझा जाता। पुतिन और शी जिनपिंग दोनों के साथ यह घाटा कम करने पर बात जरूर हुई होगी।  

प्रधानमंत्री मोदी ने पुतिन और शी जिनपिंग के साथ हँसते हुए अपना चित्र अपलोड किया है। पर यह गर्मजोशी भारत और चीन के रिश्तों की हकीकत को नहीं बदल सकती। समापन सत्र में प्रधानमंत्री ने खुद कहा कि “तकनीक और महत्वपूर्ण खनिजों को हथियार बनाने की प्रवृत्ति साँझा प्रगति और समृद्धि में बाधा बन सकती है”। यह बयान सीधा चीन की आलोचना है क्योंकि वह महत्वपूर्ण खनिज और उन्नत तकनीक साँझा करने का बिल्कुल अनिच्छुक है। ब्रिक्स में भारत की सबसे बड़ी समस्या चीन है।चीन के विदेश मंत्री वॉग यी ने जरूर कहा है कि नरेन्द्र मोदी और शी जिनपिंग ने तय किया है कि दोनों देश पार्टनर बनेगे। पर कहने और करने में बहुत फ़र्क़ है। भारत और चीन के बीच तीन बड़ी समस्या है। एक, पाकिस्तान। आपरेशन सिंदूर के दौरान जिस तरह चीन ने पाकिस्तान की मदद की वह हम भूले नहीं। शी जिनपिंग ने जरूर कहा है कि आतंकवाद की शून्य बर्दाश्त होगी पर यह बेमतलब है क्योंकि वह खुद पाकिस्तान के संरक्षक हैं। पाकिस्तान के साथ किसी भावी टकराव में चीन फिर उनकी मदद कर सकता है चाहे सीधी दखल की कोई सम्भावना नहीं है।

दूसरा मामला व्यापार का है। चीन व्यापार का घाटा कम करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहा। वह चाहता है कि भारत उनके लिए अपना बाज़ार खोल दे पर वह खुद क्रिटिकल मिनरल्स, इलेक्ट्रिक वाहनों, सोलर एनर्जी जैसे क्षेत्रों में भारत को सहयोग नहीं दे रहा। जैसे चीन में हमारे पूर्व राजदूत गौतम बमबावाले ने भी बताया है, “हमारी जो विशेषताएं हैं, फार्मास्युटिकल और सॉफ़्टवेयर को चीन के बाज़ार में प्रवेश नहीं मिल रहा”। यह मामला चीन से बार बार उठाया जा रहा है पर नतीजा नहीं निकलता।

सबसे बड़ी समस्या सीमा विवाद है। जून 15, 2020 को पूर्वी लद्दाख की गलवान वादी में भारत और चीन के बीच खूनी टकराव हुआ था जिस में हमारे 20 और चीन के 4 सैनिक मारे गए थे। यह हमला बिना किसी उत्तेजना के हुआ था और महाबलीपुरम में नरेन्द्र मोदी और शी जिनपिंग के बीच अच्छी बातचीत के कुछ ही महीनों के बाद किया गया। यह किस मक़सद के लिए किया गया? क्या भारत को संदेश दिया जा रहा था कि अगर अमेरिका के नज़दीक गए तो ऐसा हो सकता है? कई बैठकों के बावजूद चीन सीमा विवाद हल करने को तैयार नही। वह गर्व से कहतें हैं कि 12 देशों के साथ सीमा विवाद समाप्त कर चुकें है, केवल भारत और भूटान रह गए हैं। यह ज़ख़्म वह जानबूझ कर खुला छोड़ा रहें है। भारत कह रहा है कि अगर सम्बंध सामान्य करने हैं तो सीमा पर शान्ति और सामान्यता ज़रूरी है जबकि चीन चाहता है कि सीमा विवाद द्विपक्षीय रिश्ते के रास्ते में नहीं आना चाहिए। वह तो अरूणाचल प्रदेश पर भी दावा कर रहा हैं। अब उनका नया प्रस्ताव है कि सीमा के मध्य के हिस्से को तय कर लिया जाए और पूर्वी और पश्चिमी सीमा को बाद में देखा जाए। चीन में हमारे पूर्व राजदूत अशोक कांथा ने लिखा है, “जब तक चीन भारत को बराबर सभ्यता भी नहीं समझता, तब तक दोनों के बीच समस्या बनी रहेगी”।  

एलएसी पर चीन के सैनिकों का जमावड़ा कुछ कम हुआ है पर पीछे से सेना कम नहीहुई। भारत  स्पष्ट कर रहा है कि सीमा पर क्या होता है को बाक़ी सम्बंधों से अलग डिब्बे में नही रखा जा सकता। भारत और चीन में जो अविश्वास है वह ब्रिक्स को प्रभावी संगठन नहीं बनने देगा। चीन बहुत बड़ी आर्थिक और सामरिक शक्ति बन चुका है, हम उनकी उपेक्षा नहीं कर सकते। पर भारत की विश्व में अपनी विशिष्ट जगह हैं।  चीन और रूस हमें पश्चिम विरोधी कैम्प में लेजाना चाहेंगे। विदेश मंत्री एस.जयशंकर भारत की ग़ैर-पश्चिमी पहचान के बारे कई बार कह चुकें हैं पर इसका मतलब यह नहीं कि हम पश्चिम विरोधी है। डानल्ड ट्रंप से नाराज़गी के बावजूद हमारे अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अच्छे संबंध है और रहेंगे।  हम डानल्ड ट्रंप के बाद के अमेरिका की इंतज़ार करेंगे। हम यह भी नहीं चाहते कि ब्रिक्स पर चीन हावी हो जाए।

यह एक अजीब अनिश्चित दुनिया बन रही है। जो एआई के निर्माता हैं,वह ही कह रहें हैं कि यह मानवता के अस्तित्व के लिए ख़तरा है। इस पर इंसानी नियंत्रण खो सकता है जो मानवता का अंत कर सकता है। पर इस पर शिखर सम्मेलन में कोई चर्चा नहीं हुई। जो युद्ध चल रहें है उनका कोई अंत नज़र नहीं आता। अब हूतियों ने लाल सागर में वयापार का रास्ता रोक दिया है। दुनिया गमभीर आर्थिक अस्थिरता की ओर बढ़ रही है। प्रधानमंत्री मोदी बार बार राष्ट्रपति पुतिन से कह चुकें है कि वह युक्रेन के साथ युद्ध समाप्त करें पर कोई विशेष असर होता नज़र नहीं आता। नेपाल की त्रासदी और पिघलते ग्लेशियर बता रहें है कि जलवायु में परिवर्तन से आगे चल कर कितनी तबाही हो सकती है। इस बीच ब्रिक्स का सम्मेलन हो कर हटा है।  ऐसे सम्मेलनों में बातें अच्छी होती हैं पर सब कुछ अमल पर निर्भर करता है। यह ही उपलब्धि नहीं होनी चाहिए कि सब कुछ ठीक ठाक बिना विघ्न के हो गया। अगला ब्रिक्स शिखर सम्मेलन चीन में होगा। देखतें हैं तब तक दुनिया का क्या हाल रहता है।

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Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.