मोहन भागवत: देश और विदेश, Mohan Bhagwat : Home And Abroad

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत हाल ही में अमेरिका,कनाडा और इंग्लैंड का दौरा कर लौटें हैं। उन्होंने वहां जो कुछ कहा उसकी चर्चा प्रशंसकों और आलोचकों दोनों में हो रही है। यह स्वभाविक भी है क्योंकि वह एक विशाल संगठन के प्रमुख है, जैसा दुनिया में कहीं नही है। टोरंटो में उन्होंने कहा कि “भारत का चरित्र सभी से मित्रता, ज़रूरतमंदों की मदद और विविधता के सम्मान पर आधारित है”। उनका कहना था कि हिन्दू सबका सम्मान करतें हैं और सभी को स्वीकार करतें हैं। सबसे महत्वपूर्ण उनका न्यूयार्क के मैडिसन स्क्वेयर में दिया भाषण था जहां लगभग 5000 लोगों की हाजरी में भागवत ने यहां तक कह दिया कि “जो हिन्दू भारत में मुसलमानों को नहीं चाहता, वह सच्चा हिन्दू नहीं है”। यह बहुत स्पष्ट बयान है। भागवत ने अपने विचारों के बारे कोई संदेह नहीं छोड़ा कि देश में मुसलमानों का वही स्थान है जो हिन्दुओं का है। उनका कहना था कि “विभिन्नता में एकता” भारत के सभ्यतागत चरित्र का स्वभाविक अंग है”।

इससे पहले भी मोहन भागवत यही बातें कह चुकें है। वह कह चुकें हैं कि हिन्दुओं और मुसलमानों का डीएनए एक है। उन्हें संघ में मॉडरेट अर्थात् नरमपंथी समझा जाता है। पिछले कुछ सालों में वह लगातार मुस्लिम नेताओं से बात करते आ रहे है। उन्होंने तो यहां तक कह दिया था कि “हर मस्जिद के नीचे शिवलिंग नहीं देखना चाहिए”। यह आसाधारण तौर पर साहसी बयान है जिसके लिए उन्हें अपने ही कुछ लोगों की आलोचना भी सहनी पड़ी कि वह गांधीवादी बन रहें हैं। उन्होंने कह दिया कि संघ अब अयोध्या जैसे किसी आंदोलन का नेतृत्व नही करेगा। इस सब से आभास यह मिलता है कि संघ प्रमुख अपने संगठन की दिशा बदलना चाहते है। उनकी पश्चिम की यात्रा को भी इसी संदर्भ में देखना चाहिए। अपने संदेश के द्वारा वह खुद को स्वामी विवेकानन्द की शिक्षा से भी जोड़ने का प्रयास कर रहें हैं जिन्होंने शिकागो में अपने प्रसिद्ध भाषण में कहा था कि “मुझे ऐसे धर्म से होने का गर्व है जिसने दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकार्यता का पाठ पढ़ाया था”। उन्होंने कट्टरता, संकीर्णता और धार्मिक उन्माद की भी निन्दा की थी। पूर्व सरसंघचालक बालासाहब देवरस भी कह चुकें हैं कि “संघ का हिन्दुत्व राष्ट्रवादी और सब को साथ लेकर चलने वाला है”।

यह भारतीय चिन्तन की सही व्याख्या है पर सवाल है कि क्या ज़मीन पर यह ही हो रहा है? क्या भारत पिछले कुछ सालों में अधिक उदार हुआ है या यहां भय और असहिष्णुता का वातावरण बढा है?

मैं दो मिसाल से शुरू होता हूँ। आपरेशन सिंदूर के दौरान रक्षा मंत्रालय ने ब्रीफिंग के लिए जिनको उतारा उनमें कर्नल सोफिया क़ुरैशी भी थीं जिन्होंने बढ़िया ढंग से भारत का पक्ष दुनिया के सामने रखा। लेकिन मध्यप्रदेश के एक भाजपा मंत्री ने उन्हें ‘टैरेरिस्ट की सिस्टर’ कह दिया। बाद में माफ़ी ज़रूर माँगी पर यह बकवास करने का हिम्मत कैसे हो गई? उसे दंड देने की जगह इसे ‘मानवीय गलती’ कह दिया गया। दूसरा मामला कांग्रेस के अध्यक्ष मलिक्कार्जुन खड़गे से सम्बंधित है जिनकी हल्दवानी के रामलीला ग्राउंड में सभा के बाद तथित हिन्दुत्ववादियों ने सभा स्थल के शुद्धिकरण के लिए वहां हवन करवाया। खड़गे जो दलित हैं, का कहना है कि उन्हें इससे ‘छुआछूत का डंक’ पहुँचा है। भाजपा ने खुद को उसे अलग कर लिया पर आज के भारत में जहां अस्पृश्यता के खिलाफ इतने क़ानून हैं किसी की भी ऐसी हिम्मत क्यों हो? क्या रवैया है कि, सैंया भय कोतवाल डर काहे का?

मोहन भागवत ने आरएसएस को आधुनिक बनाने का बहुत प्रयास किया है। गोलवालकर के विचारों से खुद को अलग कर लिया है। मनुस्मृति के कुछ विवादास्पद हिस्सों से भी खुद को अलग किया है। हाल ही में जहां संघ के एक बड़े अधिकारी अतुल लिमये ने जंतर मंतर पर प्रदर्शन को अराजक कहा तो मोहन भागवत ने प्रतिवाद करते हुए कहा कि वह राष्ट्र विरोधी नहीं है। वह यह भी कह चुकें हैं कि, “देश से प्रेम का मतलब यह नहीं कि केवल ज़मीन से ही प्रेम करना है। इसका मतलब यहां के लोगों, नदियों, संस्कृति और परम्परा से भी प्रेम करना है”। पर सवाल तो यह है कि उनका संदेश ज़मीन पर देखने को क्यों नहीं मिल रहा? पिछले दस-बारह सालों में देश पहले से अधिक असहिष्णु और विभाजित क्यों है? मोहन भागवत उस ज़िम्मेवारी से बच नही सकते क्योंकि वर्तमान शासन उनके विशाल संगठन के सहयोग और समर्थन से चल रहा है।

मैंने पहले भी लिखा था कि मोहन भागवत अगर हिम्मत दिखाएँ तो वह देश को सही दिशा में डाल सकते हैं पर वह अपने नीचे संगठनों के हॉट हैंड को सम्भालने में असफल रहें है। उनके संगठन हिन्दू धर्म के सहिष्णुता, भाईचारे और विवेक के सिद्धांतों से दूर क्यों जा रहें है? वह उन्हें ‘विभिन्नता में एकता’का पाठ क्यों नहीं पढ़ा सके?  विविधता का सम्मान क्यों नहीं हो रहा? भागवत लगातार मुसलिम नेताओं से बात कर रहे हैं पर नतीजा तो कोई नहीं निकला। इसीलिए विदेश में विचारों को बहुत गम्भीरता से नहीं लिया जा रहा क्योंकि देश की हकीकत कुछ और है।

मोहन भागवत को इस समय विदेश क्यों जाना पड़ा? उनसे पहले दत्तात्रेय होसबोले भी अमेरिका गए थे जहां कुछ विरोध का भी सामना करना पड़ा। लंडन में मोहन भागवत ने खुद इस पर रोशनी डाली है। उनका कहना था “मैंने सुना है कि हमारे काम का आधार अत्यंत नफ़रत है, जबकि यह इसके उलट है। हमारे काम का आधार शुद्ध सात्विक प्रेम है”। स्वामी विवेकानन्द के विचार को दोहराते हुए उन्होंने कहा, “मैं अपने रास्ते से लक्ष्य को प्राप्त करूँगा। आप अपने रास्ते से उसी लक्ष्य तक पहुँचोगे”। बात तो बहुत अच्छी भागवत जी ने कही है पर ज़मीन पर क्या हालत है वह भी जानते है। किन को औरंगजेब की औलाद कहा जाता है? अगर देश के अंदर सब सही चल रहा होता तो विदेशी प्रेस इतना विरोधी न होता। न्यूयार्क के भारतीय मूल के मेयर ज़ोहरान ममदानी ने तो यहां तक कह दिया कि वह चाहतें थे कि भागवत की रैली को रोक दें पर कानूनन नहीं कर सकते। ममदानी की बात ठीक नहीं है। भागवत से आप सहमत हो या न हो, उन्हें अपनी बात कहने का पूरा हक है पर उन्हें भी देखना चाहिए कि देश पिछले दस बारह वर्षों में अधिक असहिष्णु क्यों बन गया है? यही कारण है कि बाहर देश और हिन्दुत्ववादी संगठनों की छवि मैली हो रही है।

जहां तक ‘शुद्ध सात्विक प्रेम’ का सवाल है, यह लंडन में ही क्यों नज़र आरहा है देश के भीतर क्यों नही? देश और विदेश में अलग-अलग शब्दावली क्यों हो? जिन उत्सवों को हिन्दू और मुसलमान मिल कर मनाते थे उनसे कुछ तत्व मुसलमानों को अलग करना चाहते हैं। मुगल पीरियड को इतिहास की किताबों से निकाला जा रहा है। आप प्राचीन भारत के साम्राज्यों को विस्तार से देना चाहतें हैं तो अच्छी बात है। वह सचमुच सुनहरा काल था पर मुग़ल साम्राज्य भी तो इतिहास का हिस्सा है। छात्रों को इसे पढ़ने से वंचित क्यों किया जाए? वह खुद फ़ैसला करें कि वह कैसा था। यह भी दिलचस्प है कि जो ग़ुस्सा मुग़लों के प्रति दिखाया जाता है वह अंग्रेज़ों के प्रति नहीं दिखाया जाता जबकि मुग़ल तो यहाँ बस गए थे, भारत की दौलत का असली शोषण करने वाले तो गोरे थे।

 अगर उनकी उस धारणा को गम्भीरता से लिया जाए कि वह सच्चा हिन्दू नहीं हैं जो भारत में मुसलमानों को नहीं चाहता, तो उन मंत्रियों सासंदो, विधायको और दूसरे पदाधिकारियों के बारे क्या कहा जाएगा जो लगातार दूसरों के प्रति नफ़रत फैलातें हैं? कम से कम तीन भाजपा मुख्यमंत्री हैं जो ऐसे बयान देते हैं या हरकतें करतें हैं जो वैमनस्य बढ़ाता है। इन्हें क्यों नही रोका जाता ? असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने तो एआई का एक वीडियो भी बनाया था जिसमें वह राइफ़ल से निशाना साध रहें हैं और उनके निशाने पर दो अल्प संख्यक समुदायों के आदमी थे। बाद में यह वीडियो वापिस ले लिया गया पर क्या मोहन भागवत ने इस पर आपत्ति जताईं? क्या सरमा को पद से हटाया गया ? विदेश में ‘शुद्ध सात्विक प्रेम” की जो धारा मोहन भागवत बहाना चाहतें हैं वह तो यहां साम्प्रदायिकता, नफ़रत और कट्टरवाद में फँसी हुई है। कपिल सिब्बल ने सही कहा है कि भागवत “बाहर विवेक की बात करते हैं पर घर में ख़ामोश रहतें है”। कथनी और करनी में यह जो अंतर है यह विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है।

देश के अंदर माहौल बदलने की जरूरत है। जिस तरह टीएमसी जैसी पार्टियां तोड़ी जा रही है उस से चुनावी लोकतंत्र कमजोर हो रहा है। इसे भी सही करने की जरूरत है। लोगों की रोजमर्रा कि समस्याओं पर केन्द्रित होने की जरूरत है। विदेश में छवि ख़राब हो रही है। संघ तो अपने अनुशासन पर गर्व करता है फिर सरसंघचालक के सही संदेश पर अमल क्यों नहीं होता? वैसे भी धर्म एक निजी मामला है। एक बार यह सार्वजनिक बन जाए तो राजनीति इसे पथ भ्रष्ट कर देती है। देश इसकी बहुत बड़ी क़ीमत चुकाता है। मोहन भागवत देश को भटकने से रोक सकतें हैं क्योंकि वह बहुत बड़े संगठन के प्रमुख है। उनके विचार सही हैं पर नीचे अमल नहीं होता। वह मजबूर क्यों हैं? क्या वो जिन्न जो राजनीतिक लाभ के लिए बाहर निकाला गया था, वह अब वापिस बोतल में बंद होने से इंकार कर रहा है?

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About Chander Mohan 832 Articles
Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.