कैसा देश संभाला था, डॉ. साहिब, कैसा बना दिया?

कैसा देश संभाला था, डॉ. साहिब, कैसा बना दिया?

भारत की आज़ादी का तीखा विरोध करते हुए ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री विसंटन चर्चिल ने ब्रिटिश संसद में कहा था, ‘सत्ता बदमाशों, धूर्तों तथा मुफ्तखोरों के हाथ आ जाएगी.. वे एक-दूसरे के साथ लड़ते रहेंगे और भारत राजनीतिक कलह में खो जाएगा।’ पिछले वीरवार को अलग तेलंगाना बनाने के मुद्दे को लेकर संसद में जो कुछ हुआ वह क्या चर्चिल के शब्दों को सही साबित नहीं कर रहा? एक हमला हमारी संसद पर दिसंबर 2001 में आतंकवादियों ने किया यह दूसरा हमला सांसदों ने ही संसद पर कर दिया। राज्यमंत्री राजीव शुक्ला कह रहे हैं कि यह सांसदों की हत्या का प्रयास था। क्या हमने इसलिए इन्हें वोट दिए थे कि वे सदन में जाकर दंगा करें? जिन लोगों ने देश को संभालना है, कानून बनाना है वे बार-बार साबित कर रहे हैं कि वे इसके लायक नहीं। देश अपमानित है। दुनिया भर ने देख लिया कि हम कितने गिर गए हैं। रेल राज्यमंत्री ने रेल बजट का ही विरोध कर दिया। छ: मंत्रियों ने अंतरिम बजट पेश करने के समय हंगामा किया। ब्रिटेन की संसद हाऊस ऑफ कामंस को एक दिन स्थगित नहीं करना पड़ता यहां संसद में एक दिन काम नहीं होता। प्रधानमंत्री तमाशबीन बन कर रह गए। न मंत्री उनके  नियंत्रण में हैं, न सांसद, न  सरकार और न ही देश। नेतृत्व खोखला हो चुका है, निष्क्रिय है, कमज़ोर है, मूकदर्शक और असहाय है।

ये हमारे संसदीय इतिहास में सबसे बुरे पांच वर्ष रहे हैं। दोनों सदनों के अध्यक्ष भी अपने-अपने सदन संभालने में बिल्कुल असफल हैं क्योंकि सांसद अनुशासनहीनता की सभी सीमाएं लांघ रहे हैं। नियम है लेकिन अध्यक्ष इन्हें लागू करने से परहेज करते रहे। केवल ‘बैठ जाईए’, ‘बैठ जाईए’ कहने से संसद नहीं चलेगी। सांसदों की राजनीतिक मजबूरियों का ध्यान रखना चाहिए लेकिन बर्दाश्त की भी सीमा होनी चाहिए। सांसद अपने विशेषाधिकारों का बहुत शोर मचाते हैं लेकिन क्या ये लोग विशेषाधिकार के पात्र भी हैं? वे तो शायद यह भी समझ बैठे हैं कि अराजकता फैलाना भी उनके विशेषाधिकार में है। लेकिन देश को तो यह बर्दाश्त करने की जरूरत नहीं। देश की राय तो यह है कि न केवल दंगा करने वाले सांसदों की सदस्यता ही छीनी जानी चाहिए बल्कि उन्हें किसी भी चुनाव लडऩे के लिए आजीवन अयोग्य घोषित किया जाए। वे ‘माननीय’ नहीं रहे। संसद सांसदो की ही नहीं वह वास्तव में देश की जनता की है। और जनता इन्हें माफ करने के मूड में नहीं। मंगलवार को संसद के बाहर एम्बुलैंस तथा फायर ब्रिगेड तैयार रखे गए थे। यह कैसा संसदीय लोकतंत्र है?

राष्ट्रपति ने संसद को लोकतंत्र की गंगोत्री कहा है। अगर गंगोत्री अपवित्र होगी तो नीचे तक ऐसा होगा और हो भी यही रहा है। क्या हम स्कूलों को अनुशासित कर सकते हैं जबकि संसद अराजक है? हमारी समस्या है कि यह जरूरत से अधिक आज़ादी है। लगाम खुली छोड़ दी गई। शायद अंग्रेजी हकूमत का मुकाबला करने के लिए यहां अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने की परंपरा पड़ गई है अपने कर्त्तव्य के बारे कोई बात नहीं करता। यहां तो एक निर्वाचित मुख्यमंत्री ही कानून का उल्लंघन कर धरने पर बैठ गया था। हरेक के पास अपनी शर्मनाक हरकत के लिए औचित्य है, तर्क है। लेकिन ये लोग समझते नहीं कि ऐसा कर वे देश को कमज़ोर कर रहे हैं, लोकतंत्र का मज़ाक बना रहे हैं और लोगों का इसमें विश्वास कम कर रहे हैं। बहस का स्तर बहुत गिर गया।

अरविंद केजरीवाल सरकार छोड़ कर भाग गए हैं। वे फिर सड़क की राजनीति करेंगे। मालूम था कि नियम जनलोकपाल बिल पेश करने के खिलाफ है; वे इसे अदालत में चुनौती दे सकते थे लेकिन वह टमाटर का कैचप लगा कर शहीद बनना चाहते थे। सब कुछ योजना के अनुसार लोकसभा चुनाव को सामने रख कर किया गया। यह ‘डिसाईनर शहादत’ है। जो वास्तव में कुर्बानी देना चाहते हैं वे दो पुलिस कर्मियों के तबादले पर ही अपना धरना खत्म नहीं कर देते। और हां, पीछे भगतसिंह की तस्वीर लगाने से भी कोई भगत सिंह नहीं बनता। वे तो ढिंशू ढिंशू सलमान खान का राजनीतिक अवतार लगते हैं! योगेन्द्र यादव ने माना है कि अभी आप की कोई आर्थिक सोच नहीं है। यह मान कर चला जा सकता है कि आप की कोई विदेश नीति नहीं, रक्षा नीति नहीं, आंतरिक नीति नहीं लेकिन फिर भी अरविंद केजरीवाल राष्ट्रीय विकल्प बनना चाहते हैं। यह घटिया किस्म की अवसरवादिता है।

लेकिन असली खेद है कि केंद्रीय सरकार लावारिस हो गई है। हालत के बारे कहा जा सकता है कि:

किश्तियां डूब चुकी हैं सारी अब लिए फिरता है दरिया हमको!

अलग तेलंगाना बनाने का निर्णय ही त्रुटिपूर्ण था। आंध्रप्रदेश का बहुमत इसके लिए तैयार नहीं। विधानसभा इसके खिलाफ मत पारित कर चुकी है, साधनों के बंटवारे के बारे कुछ स्पष्टता नहीं। हैदराबाद का क्या बनेगा इसके बारे कुछ मालूम नहीं फिर भी जबरदस्ती प्रदेश को बांटा जा रहा है क्योंकि हताश कांग्रेस को आशा है कि कम से कम तेलंगाना क्षेत्र की 17 सीटें उन्हें मिलेंगी। सरकार की अदूरदर्शिता तथा अनाड़ीपन ने वहां इतनी विस्फोटक स्थिति पैदा कर दी कि इसे शांत होने में दशकों लग जाएंगे। अपने संकीर्ण राजनीतिक हित के लिए एक अच्छे भले राज्य में चारों तरफ नफरत फैला दी गई है। प्रदेश को बांटते हुए लोगों के दिल बांट दिए गए हैं।

अफसोस है कि चारों तरफ पतन हो रहा है। राजनीति का पतन हुआ, आर्थिकता का पतन हुआ, नैतिकता का पतन हुआ, प्रधानमंत्री के पद का पतन हुआ, समाज का पतन हुआ, संसद का पतन हुआ। देश का ही पतन हो गया। यूपीए II के ये पांच वर्ष देश को तबाह कर गए। जो अनैतिक समझौते किए गए वे अब कीमत वसूल रहे हैं। देश आर्थिक फिसलन, जर्जर तंत्र तथा राजनीतिक अस्थिरता में फंस गया है। जो संसद में हुआ वह तो मुहावरे के अनुसार वह तिनका था जिसने ऊंट की कमर तोड़ दी। यह ही मालूम नहीं कि कौन घर संभाल रहा है? सोनिया गांधी? मनमोहन सिंह या अब राहुल गांधी? यह विरोधाभास है जिसने वह अस्पष्टता पैदा कर दी जिसमें सब कुछ लुट गया। कांग्रेस की राजनीति के कारण प्रधानमंत्री के प्राधिकार से जो समझौता किया गया उसके दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। भ्रष्टाचार के बारे अरनब गोस्वामी द्वारा पूछे जाने पर राहुल का कहना था, ‘मैंने प्रधानमंत्री को बिल्कुल स्पष्ट कर दिया था।’

अर्थात् अगर रिकार्ड भ्रष्टाचार हुआ है तो गांधी परिवार तो जिम्मेवार हो ही नहीं सकता। यह जिम्मेवारी मनमोहन सिंह की है जबकि सारे राजनीतिक फैसले सोनिया गांधी के आदेश पर लिए गए। जनार्दन द्विवेदी का कहना है कि 2009 में कांग्रेस को सरकार नहीं बनानी चाहिए थी। उस समय द्रमुक के साथ समझौता कर लिया गया। करुणानिधि की जिद्द कि ए राजा को संचार मंत्री बनाया जाए मान ली गई। द्रमुक की धमकी थी कि अगर नहीं मानते तो वे समर्थन वापिस ले लेंगे। प्रधानमंत्री जानते थे कि यह राजनीतिक मामला नहीं है, यह कमाई का मामला है पर उन्होंने समर्पण कर दिया और अपना नैतिक अधिकार खो दिया। डॉक्टर मनमोहन सिंह की इज्जत तथा नैतिक दबदबा 2009 से ही फिसलने शुरू हो गए थे। तब से लेकर अब तक वे लुढ़कते ही गए। कसूर केवल उनका ही नहीं था सोनिया गांधी भी सब राजनीतिक निर्णय में बराबर हिस्सेदार थी लेकिन सरकार तो मनमोहन सिंह की है। वे चाहते तो गलत निर्णय या उनका ब्लैकमेल मानने से इंकार कर सकते थे लेकिन डॉक्टर साहिब अपनी कुर्सी से चिपके रहे। अब वे कहते हैं कि वे खून के आंसू रो रहे हैं लेकिन प्रधानमंत्रीजी आप ही नहीं, देश भी खून के आंसू रो रहा है। 2004 में आपको जो देश हमने सौंपा था उसका आपने क्या बना दिया? अब जबकि यह सरकार इतिहास का हिस्सा बनने जा रही है डा. मनमोहन सिंह का कहना है कि उन्हें आशा है कि इतिहास उनके प्रति उदार होगा। यह होता है या नहीं लेकिन इस वक्त तो वर्तमान छुटकारा पाने की इंतज़ार में है।

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Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.

1 Comment

  1. Agreed Sir………………

    But how to bring the change …………We keep on selecting these people no choice……………BJP /Congress……………..they both are same……
    BJP too supported Telgana bill at Parliament ………….cameras were switched off in the Parliament…..

    At the end we says if congress is not working well then support BJP ,,, becasue country need stable government …………but how to bring the change …..
    Do we have ..right …….choices .. avilable ……..?

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