पंजाब में धर्म संकट

पंजाब में धर्म संकट

जब राहुल गांधी ने कहा था कि पंजाब में ड्रग्स अर्थात् नशा बहुत बड़ी समस्या है और करीब 70 प्रतिशत युवा इसमें फंस चुके हैं तो अकाली तथा भाजपा नेताओं ने उनकी आलोचना की थी कि पंजाब को बदनाम किया जा रहा है। अब अमृतसर से जबरदस्त मुकाबले में फंसे अरुण जेतली ने माना है कि पंजाब के चुनाव में ड्रग्स बहुत बड़ा मुद्दा है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि सिंथैटिक ड्रग्स पंजाब में ही बनते थे हालांकि पंजाब के मंत्री बिक्रमजीत सिंह मजीठिया ने इसे नकारते हुए कहा कि ड्रग्स हिमाचल प्रदेश तथा महाराष्ट्र में बनते हैं पंजाब में नहीं। सुखबीर बादल ने भी ड्रग्स के लिए अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर ढील के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेवार ठहराया है। जेतली का यह कहना भी था कि पंजाब पुलिस इस तरह की गतिविधियों को रोकने में सहयोग ही कर सकती है इसे रोकने की जिम्मेवारी नारकौटिक कंट्रोल ब्यूरो की है। सचमुच अजीब तर्क है। घर आपका जल रहा है और आप कह रहे हैं कि पानी डालने की जिम्मेवारी किसी और की है! नशा अब पंजाब की समस्या नम्बर 1 बन चुका है। हज़ारों परिवार तबाह हो चुके हैं। शहरों तथा कस्बों में लूटपाट की जो ये घटनाएं रोज़ाना हो रही हैं इसका कारण भी ड्रग्स है। पाकिस्तान की संलिप्तता तो है ही। पाकिस्तान से मामला उठाने की जिम्मेवारी निश्चित तौर पर केंद्र सरकार की है लेकिन अकाली नेता भी तो पंजाब-पंजाब सहयोग की बात करते हैं। पाकिस्तान पंजाब के मुख्यमंत्री को यहां बुला कर लाल गलीचा स्वागत किया गया। क्या उनसे यह मामला उठाया गया? और यह भी कड़वी सच्चाई है कि अकाली-भाजपा सरकार के इन 7 वर्षों में ड्रग्स का चलन बहुत बढ़ गया है। गांवों में ‘चिट्टा पाऊडर’ खुला बिक रहा है।

पंजाब के चुनाव में स्थानीय मुद्दे हावी हो गए हैं। सड़कें, रोज़गार, सीवरेज़, प्रापर्टी टैक्स, उद्योग की शोचनीय स्थिति, रेत-बजरी की आकाश छूती कीमतें जिन्होंने आम आदमी के लिए दीवार तक बनाना भी मुश्किल कर दिया है, वैट का रिफंड नहीं मिलना, आदि मसलों से जूझ रहा पंजाब का नागरिक अपनी सरकार से जवाब मांग रहा है कि यह सब क्यों हो रहा है? हमारे शहर स्लम क्यों बन गए? राष्ट्रीय मुद्दे लोकसभा चुनाव में महत्त्व रखते हैं लेकिन पंजाब में स्थानीय मुद्दे बराबर महत्त्वपूर्ण हो गए हैं। सेना में भर्ती के लिए पंजाब से जवान नहीं मिल रहे क्योंकि ड्रग्स उनकी सेहत को तमाम कर गए हैं। खेलों के मामले में कभी नम्बर 1 रहा पंजाब अब किसी गिनती में नहीं है। राष्ट्रमंडल खेलों में भारत को मिले 38 स्वर्ण पदकों में से 22 हरियाणवी खिलाडिय़ों ने जीते थे। पंजाब थक गया लगता है और कमज़ोर पड़ रहा है हरियाणा उसकी जगह ले रहा है। हरियाणा में ओल्ड एज पैंशन 1000 रुपए मासिक है जबकि पंजाब में यह 250 रुपए है। जो लोककल्याण की स्कीमें जारी की गई उनके लिए भी पूरे पैसे नहीं हैं। कैंसर मरीज़ों को भत्ते की जो घोषणा की गई वह भी नहीं पहुंच रही।

पंजाब का आर्थिक पतन सारे देश के लिए चुनौती है क्योंकि देश की तरक्की में पंजाब का भारी योगदान है। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय जैसी प्रतिष्ठित संस्था भी अब बुरे दिन देख रही है। 19,000 कारखाने बंद हो गए हैं। इससे कितनी बेरोजगारी बढ़ी है? अंदाज़ा तो लगाइए। लेकिन इस सबसे गंभीर यह कम्बख्त ड्रग्स की समस्या है क्योंकि यह समाज को अंदर से खोखला कर रही है। पंजाब को इससे उतना ही खतरा है जितना मिलिटैंसी से था जो बात अरुण जेतली ने भी स्वीकार की है। इससे निबटने के लिए एक बार फिर युद्धस्तर का संघर्ष करना पड़ेगा लेकिन इस वक्त कोई बेअंत सिंह या केपीएस गिल नज़र नहीं आता। बादल सरकार तो इधर-उधर बहाने बना रही है। नशा बेचने के मामले में महिलाएं भी पकड़ी जा रही हैं। हर पार्टी के उम्मीदवार को यहां उत्तेजित परिवार वालों का सामना करना पड़ता है जो बता रहे हैं कि उनके बच्चे ड्रग्स में फंस रहे हैं। यह नशा गांव-गांव, कस्बा-कस्बा और शहर-शहर पहुंच चुका है। इतनी आसानी से यहां नारकौटिक्स कैसे मिल रहे हैं? अगर आप पाकिस्तान से आती सप्लाई को नहीं रोक सकते, दूसरे प्रदेशों में सिंथैटिक ड्रग्स बनने से नहीं रोक सकते तो कम से कम पंजाब के अंदर बिक्री को तो रोक सकते हैं? क्योंकि इस धंधे में बड़े अकाली नेताओं का नाम भी आया है इसलिए पंजाब सरकार जवाबदेह है। अरुण जेतली अब पंजाब आए हैं। अच्छी बात है कि वे इस मुद्दे से भाग नहीं रहे। लेकिन लोगों के इस सवाल का जवाब तो मिलना चाहिए कि 7 साल में पंजाब उजड़ क्यों रहा है?

पंजाब में शहरी, विशेष तौर पर हिन्दू, मतदाता धर्मसंकट का सामना कर रहा है। किसे वोट दें? वे नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं। लेकिन समस्या यह है कि पंजाब की अकाली-भाजपा सरकार ने शहरी मतदाता की ऐसी उपेक्षा की है कि लोग अकाली-भाजपा को भी वोट नहीं देना चाहते। न कांग्रेस को न अकाली-भाजपा को, तो फिर विकल्प क्या है? कुछ सप्ताह पहले तक आम राय नरेंद्र मोदी के पक्ष में थी लेकिन पिछले कुछ सप्ताह में यहां यह बदलती नज़र आ रही है। पंजाब में लोग अकाली दल से ही नहीं बल्कि भारतीय जनता पार्टी से भी बेहद नाराज़ है और समझते हैं कि अपनी कुर्सियों के लिए इन्होंने अपने समर्थकों के हित बेच दिए हैं। मतदाता प्रादेशिक मसलों को प्राथमिकता देता लगता है। पंजाब की राजनीति देश की राजनीति से अलग हो गई है।  21/11/2013 को मैंने पंजाब के बारे लेख लिखा था ‘जहां कमल मुरझा रहा है।’ मैंने चेतावनी दी थी कि पंजाब में भाजपा के लिए समस्या खड़ी हो रही है क्योंकि लोग असंतुष्ट हैं, लेकिन किसी ने बात नहीं सुनी। तब से लेकर अब तक स्थिति और खराब हुई है।

मामला उस मानसिकता का भी है जो शहरी को केवल टैक्स देने वाली मशीन समझती है लेकिन उसे बराबर का सम्मान देने को तैयार नहीं! मामला स्वर्ण मंदिर के अंदर बनाए गए आतंकवादियों की याद में स्मारक का भी है। इस मामले में हिन्दुओं की भावना की परवाह ही नहीं की गई। जब लोग यह मांग करते हैं कि आतंकवाद में मारे गए बेकसूर लोगों की याद में भी स्मारक बनाया जाए तो बादल साहिब यह अहसास देते हैं कि उन्होंने बात सुनी ही नहीं। शहरों की हालत पर नाराज़गी तो सिम्पटम है, लक्षण है। असली शिकायत तो अकाली मानसिकता तथा भाजपा के समर्पण की है। लोगों के पास अपनी नाराज़गी व्यक्त करने के लिए भी तो यही मौका है। सिर्फ एक वोट है। कैसे पता चलेगा प्रदेश के हाकिमों को कि लोग असंतुष्ट हैं? अगर उन्हें फिर समर्थन दिया गया तो वे आगे से भी अधिक बेधड़क हो जाएंगे। लेकिन समस्या यह है कि कांग्रेस भी कोई विकल्प नहीं। आज अजीब हालत है। लोग न अकाली-भाजपा से संतुष्ट हैं न कांग्रेस से प्रसन्न। राष्ट्रीय मुद्दों पर वोट डालें या प्रदेश की जर्जर हालत को सामने रखें? इसलिए यहां धर्मसंकट है।

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Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.

1 Comment

  1. You hit the nail on the head……….

    Really a perspicacious study of the current dilemma being faced by the Punjabis…….
    AAP may benefit from the strong anti- incumbency against the inept, feudal SAD regime……& d lack of choice/s before the voters…..
    Punjab BJP ……..has failed to carve its separate identity & is happy playing a second fiddle to Badals…….
    BJP needs leaders Like Dr. Baldev Parkash ………..who stood tall………like a rock of Gibraltar & never stooped to conquer a ministerial birth……..

    Punjabis want MODI but are highly skeptical & hesitant of voting for SAD- BJP in Punjab……..

    Alas! The present crop of BJP leaders in Punjab have failed miserably in establishing that they are a ‘party with a difference’…..

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