पाकिस्तान को लंच, हमें झुनझुना, Lunch For Pakistan, Rattle for India

अमेरिका ने पहलगाम हमले के गुनहगार पाकिस्तानी आतंकी संगठन टीआरएफ को आतंकी ग्रुप घोषित कर दिया है। इसका ज़मीनी मतलब यह है कि टीआरएफ को वित्तीय मदद देना अमेरिकी क़ानून के नीचे अपराध होगा। इस संगठन से जुड़े लोगों की अमेरिका में सम्पत्ति ज़ब्त होगी और अमेरिका में एंट्री नहीं हो सकेगी। अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो का कहना है कि टीआरएफ को आतंकी संगठन घोषित करना पहलगाम के पीड़ितों को न्याय दिलवाने की कोशिश है। उनके विदेश विभाग का कहना है कि टीआरएफ लश्करे तोयबा की ‘प्राक्सी’ अर्थात् प्रतिनिधि है। मार्क रुबियो का यह भी कहना था कि उनका आतंकवाद के प्रति ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ है। हमारे विदेश मंत्री एस.जयशंकर के अनुसार यह सही समय पर लिया गया फ़ैसला है और यह ‘आतंकवाद के साथ लड़ने के लिए भारत और अमेरिका के बीच सहयोग की मज़बूत पुष्टि है’। हमारे अख़बारों की बड़ी सुर्ख़ियाँ भी बता रही हैं कि भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत हुई है और पाकिस्तान को ज़बरदस्त संदेश दिया गया है।

पर क्षमा करें, मैं असहमत हूँ।

पहलगाम पर हमले के बाद टीआरएफ ने सोशल मीडिया पर इसकी ज़िम्मेवारी क़बूल की थी। इसलिए यह कदम उठाना सही है पर ज़मीन पर इसका कोई असर नहीं होगा। पाकिस्तान बाज़ नहीं आएगा। जिनके बारे कहा गया है कि वह अमेरिका में प्रवेश नहीं कर सकेंगे उनके पास तो पासपोर्ट भी नहीं होगा, अमेरिका में खाते होने का सवाल ही नही। खुद पीछे रह कर लश्करे तोयबा ने टीआरएफ को खड़ा किया है। इसके मुरीदके और भावलपुर जैसे मुख्यालय नहीं है जिन्हें आपरेशन सिंदूर के दौरान हमने ध्वस्त किया था। पाबंदी के कुछ दिन शांत रहने के बाद यही लोग फिर सक्रिय हो जाएँगे। केवल बिल्ला बदलने की ज़रूरत है। इन लोगों के लिए भारत में खून बहाना महत्व रखता है बिल्ला नही। पाकिस्तान नहीं चाहता कि जैश या लश्कर अपने नाम से हमले करें इसलिए टीआरएफ को आगे कर दिया गया। पिछले कुछ वर्षों में कशमीर में सक्रिय आतंकी संगठनों ने कई नाम बदले है। अगली बार फिर कोई और नाम सामने आ जाएगा।

 मार्क रूबियो की घोषणा तीन महीने के बाद आई है। तीन महीने आप क्या देखते रहे जनाब? तीन महीने आपकी आतंकवाद के प्रति ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ क्यों सोई रही? इस दौरान पाकिस्तान को आईएमएफ़ और वर्ल्ड बैंक से भारी ऋण दिया गया। यह अमेरिका की सहमति के बिना नहीं हो सकता था। भारत शिकायत करता रहा कि आप आतंकवाद को प्रोत्साहित कर रहे हो पर आपत्ति की ज़रा परवाह नहीं की गई। सबसे शर्मनाक था डानल्ड ट्रम्प का पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष असीम मुनीर को व्हाइट हाउस मे लंच पर आमंत्रित करना। बड़े बड़े राष्ट्राध्यक्ष व्हाइट हाउस से निमंत्रण को तरसते हैं पर यहाँ पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष के साथ अमेरिका के राष्ट्रपति ने बैठ कर दो घंटे लंच किया। उस समय ईरान संकट चरम पर था पर अमेरिका के राष्ट्रपति ने उस  व्यक्ति के लिए समय निकाला जिसे भारत आतंकवाद का खलनायक कहता है। मुनीर शायद पहला सेनाध्यक्ष है जिसे यह सम्मान मिला है। उसके बाद बहुत लापरवाह ढंग से हमारे प्रधानमंत्री को ट्रम्प ने कनाडा से वापिसी में व्हाइट हाउस में लंच पर रूकने का निमंत्रण दे दिया। यह तो अच्छी बात है कि प्रधानमंत्री ने रूकने से इंकार कर दिया पर अमेरिका का रवैया बताता है कि उन्हें हमारी तकलीफ़ों की चिन्ता नहीं। बार बार युद्ध विराम का श्रेय लेकर ट्रम्प नरेन्द्र मोदी के लिए राजनीतिक समस्या खड़ी कर रहें है। अब कह दिया कि पाकिस्तान और भारत के बीच भिड़ंत के दौरान पाँच विमान गिराए गए। यह तो नहीं बताया गया कि किसके विमान गिरे, पर भारत सरकार को तो अपने लोगों के आगे जवाबदेह बना दिया। सीडीएस जनरल चौहान यह तो स्वीकार कर चुकें हैं कि युद्ध में नुक़सान होता है पर मामला अस्पष्ट रखा गया। अब इस पर भी ट्रम्प दबाव बना रहे है। 

इसीलिए मेरा मानना है कि टीआरएफ पर पाबंदी बेमानी है, भारत सरकार को बजाने के लिए झुनझुना दे दिया गया है कि लोगों को बता सकें कि बड़ी कूटनीतिक कामयाबी हुई है। यह आई वॉश ही है। मुनीर के बाद पाकिस्तान के वायुसेना अध्यक्ष ज़ाहीर अहमद सिद्धू को वहाँ बुलाया गया। एक दशक के बाद पाकिस्तान के किसी वायुसेना अध्यक्ष की यह अमेरिका यात्रा थी। साफ़ है कि अमेरिका की सरकार पाकिस्तान के साथ रिश्ते मज़बूत करने में लगी है। इसका कारण उन्हें चीन से अलग करना है या ईरान से संघर्ष में उनका इस्तेमाल करना हो सकता है, पर यह सच्चाई है कि हमारी संवेदनाओं की उन्हें चिन्ता नहीं। हमें चुप करवाने के लिए टीआरएफ पर बैन लगा दिया गया है। अमेरिका अब तक पाकिस्तान के 13 आतंकी संगठनों पर बैन लगा चुका है। यह कितने प्रभावी रहे यह पहलगाम पर हमले से पता चलता है। हाफ़िज़ सईद, मसूद अज़हर, दाऊद इब्राहीम सब पर बैन लग चुका है पर उनकी गतिविधियाँ बदस्तूर चालू हैं। अमेरिका तब सक्रिय होता है जब उसका अपना हित जुड़ा हो जैसे पाकिस्तान में घुस कर ओसामा बिन लादेन को मारा गया। हमारे किसी ऐसे मामले में न पहले सक्रियता दिखाई गई, न आगे दिखाई जाएगी।

 ट्रम्प का दूसरा कार्यकाल पहले अवतार से बहुत अलग है। पहले कार्यकाल में खुशामद और जन समर्थन के प्रदर्शन के मिश्रण से हम अमेरिका के राष्ट्रपति को ख़ुश रह सके। वह ‘हाऊडी ट्रम्प’ और ‘अब की बार ट्रम्प सरकार’ के जोशीले दिन थे। उन दिनों मोदी सरकार की कूटनीति का यह हिस्सा थे पर यह न ट्रम्प और न ही शी जिनपिंग को सम्भाल सकी। अब ज़रूर कई देश खुशामद का इस्तेमाल कर रहें है। पहले पाकिस्तान ने और फिर इज़राइल ने ट्रम्प का नाम नोबेल सम्मान के लिए पेश कर अमेरिका के राष्ट्रपति का दिल जीत लिया। भारत से वह ख़फ़ा है क्योंकि दो दर्जन बार दावा करने पर कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध रुकवा दिया था, भारत उन्हें श्रेय नहीं दे रहा। अमेरिका के प्रमुख साथी देश, जापान, आस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड,दक्षिण कोरिया भी नाराज़ चल रहें हैं।  ट्रम्प उनके नेताओं के साथ इंडो-पैसेफिक को लेकर वार्ता करना चाहते थे पर रोज़ की धमकियों और टैरिफ़ युद्ध से परेशान उन देशों के नेताओं ने मिलने से  इंकार कर दिया।

हमें भी धमकी दी जा रही है कि अगर रूस से तेल लेना बंद नहीं किया तो भारी टैरिफ़ लगाया जाएगा। ट्रम्प चाहते हैं कि पुतिन यूक्रेन में युद्ध बंद कर दें। यह सही सोच है पर पुतिन बात नहीं मान रहे इसलिए दबाव डालने के लिए धमकी दी गई है कि अगर 50 दिन में युद्ध समाप्त नहीं किया तो उन देशों पर 100% टैरिफ़ लगाया जाएगा जो वहाँ से तेल लेते हैं। इन देशों में चीन और ब्राज़ील के साथ भारत भी  शामिल है। एक अमरीकी सेनेटर तो धमकी दे रहा है कि वह हमारी अर्थव्यवस्था को तबाह कर देगा। कहते हैं कि बड़े मियाँ सो बड़े मियाँ छोटे मियाँ सुभानअल्लाह।अमेरिका तो अपनी धौंस लगा रहा है पर अब नाटो के सचिव ने भी घोषणा कर दी है कि अगर भारत, चीन, ब्राज़ील रूस से तेल लेना बंद नहीं करते तो “मैं 100%दंडात्मक टैरिफ़ लगाऊँगा”। यह ‘मैं’ दिलचस्प है क्योंकि नाटो का अपना कोई देश नहीं और योरूप के कई देश तीसरे देशों से रूस का तेल ख़रीदते है क्योंकि यह सस्ता है। लेकिन ट्रम्प को देखते हुए पश्चिम में बहुत लोग अहंकार की भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं। चीन उन्हें सीधा कर चुका है। हमें भी स्पष्ट करना चाहिए कि एकतरफ़ा कदमों की बड़ी राजनीतिक क़ीमत हो सकती है।

भारत और अमेरिका के बीच जिस स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप का बहुत ढँढोरा पीटा गया था वह अब कहीं नज़र नहीं आ रही। इसके विपरीत अमेरिका भारत और पाकिस्तान को एक साथ जोड़ता जा रहा हैं। पाकिस्तान की खुशामद से ट्रम्प की ईगो प्रसन्न है। अमेरिका पाकिस्तान को आतंक की सजा नहीं देने वाला। हाँ, क्योंकि चीन के खिलाफ क्वाड जैसे संगठन में हमारी ज़रूरत है इसीलिए हमें शांत करने के लिए टीआरएफ पर पाबंदी लगाने का झुनझुना पकड़ा दिया गया है ताकि सरकार को लोगों के बताने के लिए कुछ मिल जाऐं। पर यह भी स्पष्ट है कि अगर कल को चीन के साथ हमारा टकराव होता है तो अमेरिका से मदद की कोई आशा नहीं। जहां तक पाकिस्तान का सवाल है, अगर अमेरिका वास्तव में दबाव डालता तो वह देश कुछ सुधर जाता। आतंकवाद के प्रति अमेरिका की ढुलमुल नीति उन्हें और दुस्साहसी बनाएगी।

अमेरिका बहुत शक्तिशाली देश है। डानल्ड ट्रम्प को ख़ुश रखना एक ज़रूरत बन गई है। पर देश की इज़्ज़त से कोई समझौता नहीं होना चाहिए। ट्रम्प बहुत अनाप शनाप बोलते हैं पर अफ़सोस है कि हमारे प्रधानमंत्री ने इसका जवाब नहीं दिया। एक हद तक यह अच्छी कूटनीति हो सकती है पर पहलगाम पर हमले के बाद मुनीर का सम्मान तो हमारे ज़ख़्मों पर नमक छिड़कने के बराबर है। हमें स्पष्ट कर देना चाहिए कि अगर उन्होंने पाकिस्तान को गोद में लेना है और हम पर पाबंदियाँ लगानी है तो यह आशा नहीं करना चाहिए कि अंतराष्ट्रीय मामलों में भारत सहयोग करता रहेगा। हम किसी का मोहरा नहीं है। आशा है इस संसद अधिवेशन में प्रधानमंत्री मोदी इन मामलों पर अपनी खामोशी तोड़ेंगे और कड़ा जवाब देंगे। देश बेसब्री से इंतज़ार कर रहा है।

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Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.