यह संतोष की बात है कि इस बार संसद चल रही है। रूकावट कम डाली गई और कई प्रभावशाली भाषण सुनने को मिले पर संसद में वंदे मातरम को लेकर 10 घंटे की जो बहस हुई है वह मेरी समझ के बाहर है। इस महान राष्ट्रीय गीत की 150वीं वर्षगाँठ पर इसके कवि को श्रद्धांजलि देना और आज़ादी की लड़ाई में इसके योगदान को याद करना अलग बात है, पर यहाँ तो इस गौरवमय क्षण को अपने राजनीतिक विरोधियों पर गोलीबारी करने के लिए इस्तेमाल किया गया। गृहमंत्री अमित शाह ने तो यहां तक कह दिया कि क्योंकि इस राषटीय गीत के कुछ हिस्से काट दिए गए तो यह तुष्टिकरण का मामला बन गया जिसने देश के विभाजन की नींव रख दी। भाजपा ने इसके लिए एक बार फिर जवाहरलाल नेहरू को ज़िम्मेवार ठहराया। वंदे मातरम को केवल दो पहले पद्यों तक सीमित रखने का निर्णय कांग्रेस की कार्यकारिणी ने 1937 में लिया था। तब से लेकर अब तक किसी ने इस मामले को नहीं उठाया। संसद के किसी अधिवेशन में इस पर बहस नहीं हुई। आज अचानक यह मामला इतना ज्वलंत और महत्वपूर्ण कैसे बन गया कि दिसम्बर 2025 के संसद अधिवेशन में बाक़ी ज़रूरी मामलों की अंदेखी करते हुए इसे उठाने का फ़ैसला लिया गया ? क्या केवल कवि और महान देशभक्त बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय (चैटर्जी अंग्रेजों का बिगाड़ा हुआ नाम है क्योंकि वह चट्टोपाध्याय नहीं बोल सकते थे) को श्रद्धांजलि देना पर्याप्त न रहता?
वंदे मातरम वह रचना है जिस ने देश की आज़ादी के लिए तड़प रहे देश को जागृत किया था। क्रान्तिकारियों के भी दो नारे थे, इन्कलाब ज़िन्दाबाद और वंदे मातरम। यही नारे लगाते भगत सिंह और उनके साथी फाँसी पर झूम गए थे। बंगाल से लेकर पंजाब तक जो लहर चली थी वह अंग्रेज़ों के विरूद्ध सिंहनाद थी। भाषा, प्रदेशिक, धार्मिक, मज़हबी, हर प्रकार के मतभेदों को पार करते हए वंदे मातरम गोरों के लिए एक चुनौती बन गया था। गीत बंगला और संस्कृत में है जिसे बहुत लोग समझ नहीं पाए थे पर वह उसका भावार्थ समझ गए थे। मातृभूमि का नमन है, वंदना है, पूजा है, गुणगान है। उस ‘माँ’ की महिमा का वर्णन है जो जल, फल-फूल, हरी भरी फसलें, समुद्र की ठंडी हवा, का वरदान देती हैं। ए आर रहमान द्वारा रचित गीत में भी ‘माँ तुझे सलाम’ कहा गया है। दुख है कि इतने सालों के बाद इसे लेकर अनावश्यक विवाद खड़ा किया जा रहा है और गीत की भावना के विपरीत देश को और बाँटने की कोशिश हो रही है।
संक्षिप्त इतिहास कुछ उस प्रकार है: 1857 के विद्रोह के बाद लोगों में अंग्रेजों के खिलाफ बहुत रोष था। 1870 में बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने वंदे मातरम की कुछ पंक्तियाँ लिखी थी। 1882 में उनके उपन्यास आनन्द मठ में इसका विस्तारित संस्करण शामिल किया गया। रवीन्द्र नाथ टैगोर ने इस गीत का संगीत तैयार किया था और पहली बार 1896 के कांग्रेस अधिवेशन में इसे खुद गाया था। इस मामले में टैगोर की भूमिका महत्वपूर्ण है। उन्होंने ही सुझाव दिया था कि पहले दो पद्य ही पर्याप्त है। यह असामान्य नही है। कई देशों के राष्ट्रीय गान छोटे किए गए है। राष्ट्रीय गान जन गण मन भी रविन्द्र नाथ टैगोर की पूरी कविता का हिस्सा है। कुछ मुसलमानों द्वारा पूरे गीत में दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के वर्णन पर आपत्ति की गई थी क्योंकि उनके अनुसार देवी की स्तुति उनकी धार्मिक भावना को आहत करती है।
उस वक़्त नेताजी सुभाष बोस ने नेहरू को पत्र लिखा था कि कांग्रेस कार्यकारिणी में इस पर बहस होनी चाहिए। जवाहरलाल नेहरू का जवाब था कि “वंदे भारत का विरोध फ़िरक़ापरस्तो द्वारा किया जा रहा है… हमें साम्प्रदायिक तत्वों को बढ़ावा नहीं देना चाहिए। पर जहां सही शिकायतें हैं उनका निवारण होना चाहिए”। डा.राजेन्द्र प्रसाद ने भी सरदार पटेल को पत्र लिखा था कि उन्हें आशंका है कि इस गीत का भारी विरोध होगा और इस पर बहस होनी चाहिए। तब दोनों जवाहरलाल नेहरू और सुभाष बोस ने टैगोर को पत्र लिख कर पूछा कि हमें क्या करना चाहिए? टैगोर का नेहरू को जवाब था, “मैं पूरी तरह से यह स्वीकार करता हूँ कि पूरी वंदे मातरम कविता… मुसलमानों की भावना को आघात पहुँचा सकती है”। साथ में उन्होंने यह भी जोड़ दिया कि पहले दो पद्य ही राष्ट्रीय गीत के लिए पर्याप्त हैं। कांग्रेस की कार्यकारिणी ने यह सुझाव स्वीकार कर लिया। इतिहासकार सबयसाची भट्टाचार्य ने लिखा है कि इसके बाद वंदे मातरम को उस रूप में स्वीकार कर लिया गया। 1939 में गांधी जी ने लिखा, “आपत्ति को देखते हुए कांग्रेस ने वही पद्य रखें हैं जिन पर कोई आपत्ति न हो सके”। स्पष्ट है कि जिस समय देश आज़ादी की बड़ी लड़ाई में लगा हुआ था नेतृत्व नहीं चाहता कि वंदे मातरम को लेकर कोई विवाद खड़ा हो जिससे लड़ाई कमजोर पड़ जाए। गांधी जी ने फिर अपनी पत्रिका हरिजन में लिखा था कि वह “वंदे मातरम को लेकर एक भी झगड़े का जोखिम उठाने को तैयार नहीं है”।
मुहम्मद अली जिन्ना ने तो पहले दो पद्यों का भी विरोध किया था। 1938 में उसने नेहरू को लिखा था कि “चारों तरफ़ मुसलमानों ने वंदे मातरम या इसके मुस्लिम विरोधी गीत के संक्षिप्त संस्करण को राष्ट्रीय गीत स्वीकार करने से इंकार कर दिया है”। संविधान सभा में राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने घोषणा की थी कि जन गण मन और वंदे मातरम दोनो का बराबर का दर्जा होगा। यह भी उल्लेखनीय है कि जो भी फ़ैसला लिया गया वह सब नेताओं, गांधी जी, टैगोर, नेहरू, पटेल,राजेन्द्र प्रसाद, सुभाष बोस ने मिल कर लिया था। आज भी वंदे मातरम को राष्ट्रीय गीत का दर्जा मिला हुआ है पर अधिकतर पहले दो पद्य ही गाए जाते हैं। पर जैसा आजकल आम होता है, यह राष्ट्रीय गीत भी विवाद का विषय बन गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस कार्यकारिणी के प्रस्ताव का ज़िक्र करते हुए एक बार फिर सारा दोष नेहरू के सर पर मढ़ दिया है। उनका कहना था कि नेहरू मुस्लिम लीग के दबाव में आ गए और वंदे मातरम से विश्वासघात किया गया।
यह निर्णय जैसे हम उपर देख कर हटें हैं, सामूहिक था। केवल नेहरू पर निशाना लगाना जायज़ नहीं है। वैसे भी उस समय के नेतृत्व ने क्या निर्णय लिए, क्या नही, उसे आज की परिस्थिति से तोलना भी सही नहीं है। उन्होंने देश को आज़ादी लेकर दी। जेल गए। यातनाएँ झेली। संघर्ष किया। उनका सम्मान होना चाहिए। जो भी बड़े निर्णय लिए गए उनमें सभी बड़े नेता शामिल थे, वह केवल नेहरू के नहीं थे। सरदार पटेल ने भी देश के बँटवारे को “अप्रिय लेकिन अपरिहार्य” कहा था पर दोष केवल नेहरू पर मढ़ा जा रहा है। नेहरू ने 9-10 साल जेल काटी थी।सरदार पटेल ने लिखा था कि किसी ने भी आज़ादी के लिए इतनी क़ुर्बानी नहीं दी जितनी जवाहरलाल नेहरू ने दी थी। पर आज उनकी अनावश्यक आलोचना हो रही है। भारत आज जो है उसकी नींव जिन लोगों ने रखी उन में नेहरू प्रमुख थे। वैसे भी हमारी तो संस्कृति है कि जिसका देहांत हो गया उसकी अवमानना नहीं करते। संसद में अपने प्रभावशाली भाषण में प्रियंका गांधी वाड्रा ने कहा है कि नेहरू जी को जो गालियाँ निकालनी है एक बार निकाल लो, फिर बस करो और जनता के मुद्दों पर बहस करो।
यही बात सारा देश भी कह रहा है। संसद ने दस घंटे वंदे मातरम पर बहस की पर क्या इससे आम आदमी के जीवन में कोई सुधार हुआ? लोग तो हैरान हैं कि 150 वर्ष बाद वंदे मातरम विवादास्पद कैसे बन गया? किसी भी क्षेत्र से इस पर बहस की माँग नहीं उठी थी। संसद में जो बोल रहे थे, कुछ तो कवि का पूरा नाम भी नहीं जानते थे। और कितने हैं जो पूरा वंदे मातरम गा सकतें हैं? पर उसका राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल हो रहा है। प्रदूषण से दिल्ली का दम घुट रहा है। जनजीवन अस्त व्यस्त है। हमारी राजधानी दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी है। महंगाई की समस्या है। शिक्षा और मैडिकल व्यवस्था बेहतर करने की ज़रूरत है। बेरोज़गारी से जूझना है। सारे देश में क्राइम बढ़ रहा हैं। इन सब पर गम्भीर बहस की ज़रूरत है। इंडिगो का संकट बताता है कि हमारे नागरिक उड्डयन विभाग का भट्ठा बैठ गया है। कोई ज़िम्मेवार नहीं?लोग अपनी संसद पर बहुत आशा लगा कर बैठें है पर संसद वर्तमान की चिन्ता करने की जगह पीछे की तरफ़ देख रही है। वंदे मातरम के 150 साल जश्न मनाने का अवसर है, अनावश्यक विवाद खड़े करने का नही। न केवल उसके शब्दों का, बल्कि उसकी भावना का भी जश्न होना चाहिए। इतिहास का इस्तेमाल जोड़ने के लिए होना चाहिए तोड़ने के लिए नही।
इस देश में विवाद खड़ा करना बहुत आसान है। ढेरों मसले मिल जाएँगे। पर कभी तो रूकना है और आगे की तरफ़ देखना है। केवल चुनाव जीतना ही पर्याप्त नहीं होना चाहिए स्वस्थ समाज की रचना भी करनी है। मुक़ाबला चीन से है जो भविष्य पर केन्द्रित है। वहाँ एआई पर बहस होती है। मानवता को आने वाली चुनौतियों पर चर्चा होती है। विश्व शक्ति बनने पर विचार होता है। चीन में 150 वर्ष पुराने मुद्दे पर बहस नहीं होती। हैरानी नहीं कि हमारे और उनके बीच फ़ासला बढ़ रहा है।