कूटनीतिक धुंध में भारत- रूस, Diplomatic Fog and Indo-Russia

रूस के राष्ट्रपति पुतिन अपनी दो दिन भारत यात्रा से बहुत संतुष्ट लौटें होंगें। उन पर पश्चिम के देशों ने प्रतिबंध लगाया हुआ है, उन्हें वॉर क्रिमिनल तक कहा जा रहा है, पर यहाँ दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री उनका भव्य स्वागत कर रहे थे। हवाई अड्डे पर नरेन्द्र मोदी ने पुतिन को हग किया, दोनों एक ही कार में बैठ कर वह प्रधानमंत्री के निवास स्थान तक पहुँचे जहां उनके लिए प्राईवेट डिनर रखा गया। यह कूटनीतिक शिष्टाचार के सामान्य कदम नहीं हैं। जिसे लंडन के गार्डियन अख़बार ने मोदी -पुतिन ‘ब्रोमांस’ अर्थात् बिरादर+रोमांस,कहा है पश्चिमी राजधानियों में निश्चित तौर पर अखरा होगा। यूक्रेन युद्ध द्वारा अंतराष्ट्रीय कानून के खुले उल्लंघन के बावजूद पुतिन अपने लोगों को बता सकेंगे कि उनकी अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता क़ायम है।

इस यात्रा के द्वारा भारत रूस के साथ अपने संबंधों को दोहरा रहा है और दुनिया को बता रहा है कि हमारे पास भी अपने विकल्प हैं। भारत और रूस की ‘दोस्ती’ के बारे बहुत कुछ कहा जा रहा है। कई टी वी एंकर तो उछल उछल कर इसकी बात कर रहे थे। यह लोग तब भी उछले थे जब डानल्ड ट्रम्प के साथ हमारे संबंध अच्छे थे। हम यह नज़रंदाज़ नहीं कर सकते कि पुतिन की भारत यात्रा चार साल के बाद हो रही थी जबकि दोनों देशों के बीच वार्षिक शिखर बैठक का प्रावधान है। पहलगाम हमले के बाद भी पुतिन का फ़ोन दो सप्ताह के बाद आया था। लेकिन इसके बावजूद रूस के साथ हमारे सम्बंध मज़बूत रहें हैं। पूर्व विदेश सचिव निरुपमा राव ने लिखा है कि, “यह भारत का समय के साथ सबसे परखा और सबसे भरोसेमंद रिश्ता है”। यह सम्बंध सोवियत यूनियन के पतन, भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक सांझेदारी, चीन के उत्थान, भारत और चीन के बीच टकराव,युक्रेन युद्ध और अब डानल्ड ट्रम्प के भारत पर धावे के बीच क़ायम रहा है। पर समय आगया था कि इसे फिर से परिभाषित किया जाए, जो पुतिन का गर्मजोशी से स्वागत कर भारत ने कर भी दिया है। और दुनिया ने नोट भी किया है।

अमेरिका के साथ रिश्तों को लेकर जिस विश्वास के साथ हम पिछले पच्चीस सालों से चल रहे थे उन्हें डानल्ड ट्रम्प ने रद्दी की टोकरी में डाल दिए हैं। भारत पहले भी रूस से तेल आयात करता रहा है पर बाइडेन सरकार ने इसे भारत की मजबूरी समझते हुए बहुत आपत्ति नहीं की थी पर ट्रम्प ने भारत पर अतिरिक्त 25% टैरिफ़ लगा दिया है। चीन और ईयू सब रूस से तेल आयात करते हैं पर उन्हें इस अतिरिक्त टैरिफ़ से अलग रखा गया। अमेरिका खुद रूस से आयात कर रहा है। ट्रम्प का आरोप है कि ‘भारत पुतिन की वॉर-मशीन को तेल ख़रीद कर फंड कर रहा है”।  पुतिन ने भी एक इंटरव्यू में सवाल किया है कि अगर अमेरिका रूस से तेल ख़रीद सकता है तो भारत क्यों नहीं? ऐसा लगता है कि ट्रम्प भारत को आर्थिक ज़ख़्म पहुँचाना चाहते है। पहलगाम हमले के कुछ ही दिनों के बाद उन्होंने व्हाइट हाउस में शहबाज़ शरीफ़ और असीम मुनीर का स्वागत किया। मुनीर की प्रशंसा के पुल बांधे गए। उसे दोबारा व्हाइट हाउस बुलाया गया यह जानते हुए कि भारत इस व्यक्ति से नफ़रत करता है और पहलगाम हमले का मुजरिम समझता है।

लेकिन इससे उपर पुतिन को निमंत्रण एक बड़ा और महत्वपूर्ण संदेश था कि हमारी विदेश नीति हम तय करेंगे, तुम नहीं। बीबीसी ने तो कहा भी है कि यह ‘रणनीतिक स्वायत्तता का खेल है’। आज़ादी के बाद, जब भारत बहुत कमजोर था तब भी गुट निरपेक्ष की नीति हमारी स्वायत्तता की अभिव्यक्ति थी। अब तो भारत मज़बूत देश बन चुका है। हम अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अच्छे रिश्ते चाहते हैं पर इसका यह अर्थ नहीं कि वह तय करेंगे कि कौन हमारा मित्र है, कौन नही। पुतिन की यात्रा एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक बयान है कि हम दोस्ती के लिए तैयार है, झुकने के लिए नही। पश्चिम, विशेष तौर पर अमेरिका, की नीति प्रतीत होती है कि जो हमारे साथ नहीं, वह हमारा विरोधी है। भारत यह नीति रद्द कर रहा है। डानल्ड ट्रम्प ने हमारे साथ बहुत नीच व्यवहार किया है। हमने उन्हें संदेश भेज दिया है कि न हम रूस के साथ व्यापार बंद करेंगे और नहीं उन्हें अपने से दूर करेंगे। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हमारी इज़्ज़त बढ़ी है। जिस डानल्ड ट्रम्प के आगे ईयू, जापान, कोरिया, यूके आदि ने समर्पण कर दिया उसके आगे भारत ने झुकने से इंकार कर दिया। ट्रम्प की प्रतिक्रिया क्या होती है यह देखना होगा।

डानल्ड ट्रम्प ने भारत के साथ ऐसा घटिया व्यवहार क्यों किया? अमेरिका के रक्षा विभाग के एक पूर्व अधिकारी ने इसके लिए ‘चापलूसी और रिश्वत’ को ज़िम्मेवार ठहराया है। यह ‘रिश्वत’ ट्रम्प परिवार को पाकिस्तान से मिली है और वह ही देश बार बार ट्रम्प को नोबेल सम्मान के लिए मनोनीत करता रहा है। इस सारे खेल में दो और खिलाड़ी है जो अंतर्राष्ट्रीय शतरंज को प्रभावित कर रहें है। युक्रेन और चीन। जब पुतिन ने चार वर्ष पहले युक्रेन पर हमला किया था तब उन्हें आशा नहीं थी कि यह युद्ध इतना लम्बा चलेगा।रूस ने इसकी बहुत क़ीमत चुकाई है।  पर पश्चिम को भी समझ आगई है कि रूस को उसकी अपनी सीमा के अंदर हराना असम्भव है। युक्रेन मारा गया और यह स्पष्ट हो गया कि वह रूस को पराजित नही कर सकता और पश्चिम रूस से पूरे युद्ध के लिए तैयार नहीं। पर इस टकराव के कारण भारत अनावश्यक सजा भुगत रहा है। मास्को जा कर नरेन्द्र मोदी कह चुकें हैं कि “यह युद्ध का युग नही है”। अब फिर पुतिन की यात्रा के दौरान कहा गया कि “भारत तटस्थ नहीं है, शान्ति के पक्ष में है”। पता नहीं कि इसका पुतिन पर कितना असर होगा। उन पर युद्ध समाप्त करने का अधिक से अधिक दबाव डाला जाना चाहिए।

 लेकिन भारत की यह ही समस्या नहीं है। भारत चिन्ता से देख रहा है कि पश्चिम की नीति ने रूस को चीन  के साथ सम्बंध घनिष्ठ करने पर मजबूर कर दिया है। दोनों देश कह रहें हैं कि “उनकी पार्टनरशिप की कोई सीमा नहीं”। अतीत में रूस और चीन के बीच टकराव हो चुका है पर इस वक़्त दोनों अमेरिका के विरोध का सामना कर रहें है। चीन की नज़र भी पुतिन की भारत यात्रा पर थी। कई चीनी टिप्पणीकार कह रहें हैं कि एक सीमा का बाद रूस भारत की पार्टनरशिप चीन के हितों को प्रभावित कर सकती है क्योंकि आख़िर में भारत और चीन विरोधी है और नियंत्रण रेखा अभी भी तनाव ग्रस्त है। पर नए सरकारी वक्तव्य में चीन ने इस यात्रा पर सकारात्मक टिप्पणी की है।

आपरेशन सिंदूर में  S-400 और ब्रह्मोस मिसाइल, जो दोनों रूसी मूल के हैं, ने पाकिस्तान को पराजित करने में बहुत प्रमुख भूमिका निभाई है। रूस के साथ और उन्नत मिसाइल और Su-57 सुखोई जैट पर वार्ता चल रही है। पाकिस्तान इससे परेशान है और उनका मीडिया कह रहा है कि इससे क्षेत्रीय संतुलन बिगड़ेगा। इसके बाद पाकिस्तान की अमेरिका की झोली मे और गिरने की सम्भावना है। रूस के साथ हमारे रक्षा समबंधो पर अत्यधिक ज़ोर यह भी बताता है कि दूसरे क्षेत्रों में सम्बंध क्षमता से कम हैं। आपसी व्यापार में बहुत असंतुलन है। केवल रक्षा उत्पादन और सस्ते तेल के बल पर स्थाई रिश्ता सम्भव नहीं। सामरिक विशेषज्ञ सी राजा मोहन के अनुसार, “आर्थिक आधार के बिना दिल्ली के मास्को को साथ मज़बूत रिश्ते की बात निरर्थक है”। भारत रूस को केवल 5 अरब डालर का निर्यात करता है जबकि बांग्लादेश को भी 11 अरब डालर का निर्यात होता है। रूस से हमारा आयात 53 अरब डालर है। 2030 तक दोनों देश आपसी व्यापार को 100 अरब डालर तक ले जाना चाहते है पर देखने की बात तो यह होगी कि जो इतना असंतुलन है वह कम होता है कि नही? यह भी नहीं भूलना चाहिए कि चाहे हम वर्तमान अमरीकी सरकार को कोस रहें हैं पर अमेरिका के साथ हमारा व्यापार 130 अरब डालर है जिसमें हमारा निर्यात 87 अरब डॉलर है। रूस के विपरीत अमेरिका के साथ व्यापार का संतुलन लगभग 43 अरब डालर हमारी तरफ़ झुका है। यह वह हक़ीक़त है जो हमें फूंक फूंक कर कदम उठाने पर मजबूर करता है।

 युक्रेन पर युद्ध लाद कर पुतिन ने दुनिया में अनावश्यक अशान्ति पैदा की है। हमारे लिए विशेष समस्या पैदा कर दी हैं। हमारा हित केवल रूस के साथ ही नही, अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ अच्छे रिश्ते बनाने में भी है। पुतिन की यात्रा के बाद यूरोपीय संघ के नेताओं को गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि बना हमारी सरकार  ने कूटनीति कौशल दिखाया है। यह भी चर्चा है कि युक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की को भारत बुलाया जा रहा है। डानल्ड ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने के बाद दुनिया बहुत कनफयूज़ड चल रही है। जिसे ‘कूटनीतिक धुँध’ कहा जाता है, उसमें से रास्ता निकालना कठिन होता है। कई ध्रुव उभर रहें हैं। पर ऐसी चुनौतियों हमने पहले भी देखी है। परमाणु विस्फोट के बाद सारी दुनिया हमारे ख़िलाफ़ थी फिर भी हम उस में से निकल आए थे। तब से लेकर भारत बहुत मज़बूत हो चुका है। अब बहुत ज़रूरी था कि यह ऊँचा संदेश दिया जाए कि हमारी विदेश नीति दिल्ली में ही बनेगी और हमारी रणनीतिक स्वायत्तता हमारी विदेश नीति का मार्गदर्शक सिदंधात रहेगा।

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Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.